रजब आखिरी दिन
माह-ए-रजब की आख़िरी रात और दिन के आमाल माह-ए-रजब की फ़ेहरिस्त

इक़बाल-ए-आमाल से लिया गया:-
28, 29 और 30 तारीख़ को रोज़ा रखो।
आख़िरी दिन ग़ुस्ल करो
सलमान फ़ारसी की नमाज़ अदा करो – अगला टैब देखो

सेक्शन 108 : माह-ए-रजब को ख़त्म करने का तरीक़ा – इक़बाल-ए-आमाल, सैयद इब्न ताऊस
माह-ए-रजब की शुरुआत की रात और दिन के आमाल के बयान में, इस मुबारक महीने की अज़मत और अल्लाह तआला के क़रीब इसके मक़ाम के बारे में कुछ बातें बयान की गई हैं, जिन्हें कोई भी समझदार इंसान नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
अगर तुम सच्चे मुसलमान हो, तो तुम इस बात का फ़र्क़ ज़रूर जानते हो कि हुक्मरानों की पनाह में जाना क्या है और उस ख़ुदा की मदद से निकल जाना क्या है, जिसने उन्हें इज़्ज़त दी, महफ़ूज़ रखा और अमन अता फ़रमाया।
और यह भी जान लो कि जब तुम माह-ए-रजब से विदा होते हो, जो मुक़द्दस महीनों में आख़िरी और बुलंद दर्जे वाला महीना है, तो तुम मदद और अमन के दायरे से बाहर आ जाते हो। इसलिए इस महीने से निकलते वक़्त डरना चाहिए, जैसे कोई ऐसा शख़्स जिससे उसका सहारा मुँह मोड़ ले, या जिसे ठुकरा कर दूर कर दिया गया हो।
तुम अल्लाह तआला से, जो वजूद का मालिक और करम का मालिक है, उसकी रहमत और ख़ज़ानों से मदद और हिफ़ाज़त माँगो, ताकि वह माह-ए-रजब के बाद भी तुम्हारी निगहबानी फ़रमाए, यहाँ तक कि तुम दूसरे मुक़द्दस महीने में दाख़िल हो जाओ, जिनकी ख़ूबियाँ भी माह-ए-रजब जैसी हैं, और फिर से उसकी मदद और इनायतों में आ जाओ।
और तुम अपने तमाम आमाल जमा करके उन्हें इमाम महदी (अ.ज.) की ख़िदमत में पेश करो, जो माह-ए-रजब के आख़िरी दिन तुम्हारे मेहमान थे। अल्लाह के वसीले से उनकी तरफ़ रुजू करो, जो चीज़ उन्हें पसंद है उसे अपनाओ, और इलाही क़ायेद (अ.ज.) से दरख़्वास्त करो कि वे तुम्हारे आमाल और रोज़ों की कमियों को पूरा करें और उन्हें अल्लाह की बारगाह में पेश करें, ताकि अल्लाह तुम पर तवज्जोह फ़रमाए और तुम्हारी दुआएँ क़बूल हों।

शाबान की तैयारी करो
माह-ए-शाबान की फ़ेहरिस्त


माह-ए-रजब के आख़िरी जुमाअ़ की ख़ास दुआ – उम्र में इज़ाफ़े के लिए
आयतुल्लाह मुहम्मद बाक़िर फ़िराश्क़ी अपनी किताब-ए-आमाल में इसका ज़िक्र करते हैं
يَا أَجَلَّ مِنْ كُلِّ جَلِيْل، يَا أكْرَمَ مِنْ كُلِّ كَرِيْم، وَيَا أَعَزَّ مِنْ كُلِّ عَزِيْز،
أغِثنِى يَا غيَات الْمُستَغِيثِينَ بِفَضْلِكَ وَ جُوْدِكَ وَ كَرَمِكَ
وَ مُدًّ عُمرنَا وَهَب لنامِن لَدُنكَ عَمراً
بِالعافيَةِ يَا ذُالْجَلَالِ وَ الْاِكْرَام
या अजल्ला मिन कुल्लि जलील, या अकरमा मिन कुल्लि करीम,
व या अअज़्ज़ा मिन कुल्लि अज़ीज़,
अग़िस्नी या ग़ियासल मुस्तग़ीसीन बि-फ़ज़्लिका वजूदिका व करमिक,
व मुद्द उम्रना व हब् लना मिन लदुन्‍का उम्रन
बिल-आफ़ियति या ज़ल-जलालि वल-इकराम
ऐ वह ज़ात जो हर बड़े से बढ़कर है, ऐ वह जो हर करीम से ज़्यादा करीम है।
और ऐ वह जो हर ताक़तवर से ज़्यादा ताक़तवर है।
हम बेबसों की फ़रियाद सुन, ऐ फ़रियाद सुनने वाले।
अपने फ़ज़्ल, सख़ावत और करम से हमारी उम्र में बढ़ोतरी फ़रमा,
और हमें अपनी तरफ़ से आफ़ियत और सलामती वाली ज़िंदगी अता फ़रमा,
ऐ जलाल और इकराम वाले।
रजब की आख़िरी जुमाअ़

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माह-ए-रजब के पहले, पंद्रहवें और आख़िरी दिन दस रकअत नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा
10 रकअत (हर दो रकअत × 5)।
हर रकअत में: सूरह अल-फ़ातिहा एक बार, सूरह अल-इख़लास तीन बार और सूरह अल-काफ़िरून तीन बार पढ़ें
सलाम के बाद (हर दो रकअत के आख़िर में) हाथ उठाएँ और आम ज़िक्र तथा हर दिन के लिए ख़ास ज़िक्र पढ़ें:
आम ज़िक्र (पहला, पंद्रहवाँ और आख़िरी दिन) – हर दो रकअत के बाद।
لاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ
ला इलाहा इल्लल्लाहु
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।

وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ
वहदहू ला शरीक लहू
वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं।

لَهُ ٱلْمُلْكُ وَلَهُ ٱلْحَمْدُ
लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु
बादशाही उसी की है और सारी तारीफ़ उसी के लिए है।

يُحْيِي وَيُمِيتُ
युहयी व युमीतु
वही ज़िंदगी देता है और वही मौत देता है।

وَهُوَ حَيٌّ لاَ يَمُوتُ
वहुवा हय्युं ला यमूतु
और वही हमेशा ज़िंदा है, जिसे कभी मौत नहीं।

بِيَدِهِ ٱلْخَيْرُ
बि-यदिहिल ख़ैरु
हर भलाई उसी के हाथ में है।

وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
वहुवा अला कुल्लि शैइन क़दीरुन
और वह हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखता है।

माह-ए-रजब का आख़िरी दिन — हर दो रकअत के आख़िर में पहले ज़िक्र के बाद यह ज़िक्र बढ़ाया जाए:
وَصَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِهِ ٱلطَّاهِرِينَ
व सल्लल्लाहु अला मुहम्मदिन व आलिहित्ताहिरीन
अल्लाह मुहम्मद और उनकी पाक आल पर दरूद और रहमत नाज़िल फ़रमाए।

وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلْعَلِيِّ ٱلْعَظِيمِ
व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम
अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है और न कोई क़ुव्वत, जो सबसे बुलंद और अज़ीम है।

फिर हाथों को चेहरे पर फेरें और अपनी हाजतें अल्लाह की बारगाह में पेश करें।

सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया: “ऐ सलमान! कोई भी मोमिन मर्द या औरत ऐसा नहीं जो माह-ए-रजब में तीस रकअत नमाज़ अदा करे, मगर यह कि अल्लाह उसके गुनाह माफ़ फ़रमा देता है और उसे ऐसा सवाब अता करता है जैसे उसने पूरा महीना रोज़ा रखा हो। आने वाले साल में वह नमाज़ में साबित-क़दम रहने वालों में शामिल हो जाता है। उसके लिए एक दिन के आमाल शहीद के आमाल के बराबर लिखे जाते हैं। उसे जंग-ए-बद्र के शुहदा के साथ उठाया जाएगा। हर दिन के रोज़े के बदले एक साल की इबादत लिखी जाती है और उसका दर्जा हज़ार दर्जे बुलंद कर दिया जाता है।”
और आपने फ़रमाया कि जिब्रील ने मुझसे कहा: “ऐ मुहम्मद! यह तुम्हारे और मुशरिकीन तथा मुनाफ़िक़ीन के बीच फ़र्क़ की निशानी है, क्योंकि मुनाफ़िक़ यह नमाज़ अदा नहीं करता।”