इमाम हुसैन (अ.) मदीना से रवाना होते हैं
28 रजब 60 हिजरी – इमाम हुसैन (अ.) मदीना से रवाना हुए
वह दिन जब कर्बला की शुरुआत हुई…

28 रजब – इमाम हुसैन (अ.) के सफ़र की शुरुआत, अपने अहले-ख़ानदान और वफ़ादार साथियों के साथ इराक़ की तरफ़ (मक्का के रास्ते)। इमाम हसन (अ.) की शहादत के बाद मुआविया ने अपने बेटे यज़ीद को ख़िलाफ़त दिलाने के लिए खुला अभियान शुरू किया। इससे पहले वह अपने इस इरादे को छुपा कर रखता था। अपने मंसूबों को अमल में लाने के लिए उसने सबसे पहले शाम (सीरिया) में अपने भरोसेमंद लोगों के बीच प्रचार किया, जहाँ उसका मुख्यालय था। बाद में उसके कारकुनों ने इस पैग़ाम को इस्लामी दुनिया के दूसरे इलाक़ों तक पहुँचाया और बहुत सारा माल व रिश्वत बाँट कर कई बड़े शहरों से यज़ीद के लिए समर्थन हासिल किया।

60 हिजरी के रजब में उसकी मौत के बाद यज़ीद तख़्त पर बैठा और तमाम मुसलमानों से बैअत लेने का अभियान शुरू किया, ताकि सब उसे ख़लीफ़ा मान लें। उस दौर के दुनियादार लोग आगे आए और उसकी ख़िलाफ़त स्वीकार कर ली। इनमें ज़्यादातर वे लोग थे जो हमारे नबी हज़रत मुहम्मद (स.) के अहले-बैत (अ.) से दुश्मनी रखते थे। दूसरा गुट उन लोगों का था जिन्हें ज़ोर-ज़बरदस्ती, धोखे से मजबूर किया गया या जिनकी वफ़ादारियाँ माल-ओ-दौलत से ख़रीदी गईं।

जब यह अभियान शाम की सरहदों से बाहर निकला, तो मदीना के गवर्नर वलीद बिन अक़बा बिन अबू सुफ़यान को भी हुक्म भेजा गया कि इमाम हुसैन (अ.) से बैअत ली जाए। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यज़ीद ने यह भी कहा था कि अगर इमाम हुसैन (अ.) बैअत से इंकार करें तो उन्हें क़त्ल कर के उनका सिर शाम भेज दिया जाए। वलीद ने इमाम (अ.) को दरबार में बुलाया, यज़ीद का हुक्म सुनाया और बैअत का मुतालिबा किया। इमाम (अ.) ने फ़रमाया, “मेरे जैसा इंसान यज़ीद जैसे इंसान की बैअत कभी नहीं कर सकता।” इस जुमले में इमाम (अ.) ने तमाम मोमिनों के लिए साफ़ रास्ता बता दिया।

वलीद के एक मशीर मरवान बिन हकम ने वहीं इमाम (अ.) को क़त्ल करने के लिए उकसाया, लेकिन बनी हाशिम के कुछ अफ़राद हज़रत अब्बास (अ.) की क़ियादत में इमाम (अ.) के साथ आ गए और इमाम (अ.) सलामत वापस लौट आए। सियासी हालात बिल्कुल वाज़ेह हो गए थे कि यज़ीद या तो बैअत लेना चाहता है या इमाम हुसैन (अ.) को शहीद करना। इमाम (अ.) के ज़ेहन में मदीना की हुरमत और इस्लाम की हिफ़ाज़त दोनों थीं, इसलिए उन्होंने मदीना छोड़ कर इराक़ की तरफ़ जाने का फ़ैसला किया। उन्होंने अपने चुने हुए अहले-ख़ानदान और भरोसेमंद साथियों का क़ाफ़िला तैयार करने का हुक्म दिया और 28 रजब को इस लंबे सफ़र पर रवाना हो गए।

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चूँकि यह ग़म और मातम का दिन है, इसलिए इस वाक़िये से जुड़ी कुछ मसाइब पेश हैं।

जब इमाम (अ.) ने मदीना छोड़ने का फ़ैसला कर लिया, तो भारी दिल के साथ अपने भाई इमाम हसन (अ.) की क़ब्र पर गए। वहाँ कुछ देर ठहर कर अपने भाई से हम-कलाम हुए और फ़रमाया, “ऐ मेरे भाई, अब दुश्मन मेरे ख़ून का प्यासा है। लगता है मेरी शहादत का वक़्त क़रीब है और मैं तुमसे जुदा हो रहा हूँ।” तसव्वुर किया जाता है कि इमाम हसन (अ.) ने अपनी क़ब्र से जवाब दिया होगा, “ऐ मेरे भाई, मैं तुम्हें रुख़्सत करता हूँ और अपने बेटे क़ासिम को कर्बला में तुम्हारी सदक़ा के तौर पर देता हूँ।”

इसके बाद इमाम (अ.) अपने नाना, रसूल-ए-ख़ुदा हज़रत मुहम्मद (स.) की क़ब्र पर गए। वहाँ बहुत देर तक रोते रहे। आँख लग गई और ख़्वाब में रसूल-ए-ख़ुदा (स.) को देखा और अर्ज़ किया, “ऐ मेरे नाना, आपको मेरा सलाम। मदीना की ज़मीन मेरे लिए तंग हो गई है। उम्मत के ज़ालिम मेरे ख़ून के पीछे हैं और मैं भारी दिल के साथ मदीना छोड़ रहा हूँ।”
'शब्बीर ने सर नाना के सीने से लगाया,
रो कर कहा जिस दिन उठ्ठा आप का साया।
नाना की क़सम चैन कभी हमने न पाया,
अब ले चलो साथ अपने, कि उम्मत ने सताया।

जाने न दो सफ़र में, रहने दो वतन में,
हम तुम रहें एक क़ब्र में और एक कफ़न में।

वो बोले कि क्या वादा वफ़ा कर चुके शब्बीर,
सर को मेरी उम्मत पे फ़िदा कर चुके शब्बीर,
क्या लाश-ए-अकबर पे बुका कर चुके शब्बीर?
नैज़े के तले शुक्र-ए-ख़ुदा कर चुके शब्बीर?

क्या ऊँट से लाश-ए-पे तेरी गिर चुकी ज़ैनब?
क्या कूफ़े में सर खोले हुए फिर चुकी ज़ैनब?'

आख़िरकार इमाम हुसैन (अ.) अपनी वालिदा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की क़ब्र पर तशरीफ़ लाए। इतिहासकार लिखते हैं कि इमाम (अ.) अपनी माँ की क़ब्र की तरफ़ ऐसे दौड़े जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की गोद की तरफ़ दौड़ता है, और वह क़ब्र पर इस तरह गिर पड़े जैसे बच्चा अपनी माँ की गोद में गिर जाता है। इमाम (अ.) ने अर्ज़ किया, “ऐ मेरी माँ, मेरा आख़िरी सलाम क़बूल कीजिए। मैं मदीना की सरज़मीन छोड़ रहा हूँ और अब वापस नहीं आऊँगा। मेरे नाना की पेशगोई अब पूरी होने वाली है।” मैं तसव्वुर करता हूँ कि बीबी ज़हरा (स.) ने अपनी क़ब्र से फ़रमाया होगा, “ऐ मेरे प्यारे बेटे, ऐ वह जिसे मैंने रातों को जाग-जाग कर पाला है, मैं तुम्हें अकेला नहीं जाने दूँगी। आज के बाद मैं अपनी क़ब्र में आराम नहीं करूँगी बल्कि तुम्हारे पूरे सफ़र में तुम्हारे साथ रहूँगी।”

इतिहासकार लिखते हैं कि पूरे सफ़र के दौरान मुख़्तलिफ़ लोगों ने इमाम (अ.) से अर्ज़ किया कि “जब रात में सब लोग सो जाते हैं तो हम औरतों के रोने की आवाज़ें सुनते हैं और एक बीबी की आवाज़ सुनाई देती है जो पुकार रही होती है – ‘या हुसैन, या हुसैन’।” इमाम (अ.) ने उनसे फ़रमाया, “ऐ मेरे भरोसेमंद साथियो, यह मेरी माँ ज़हरा (स.) हैं, जो मदीना छोड़ने के दिन से मेरे साथ हैं।”