फ़ज्र की ताक़ीबात (दुआएँ)

फ़र्ज़ नमाज़ के बाद पढ़ी जाती है


2.मिसबाह से रिवायत | 3.सलवात 10 मर्तबा
4.हज़रत अली (अ) का किरदार
5,6,7. 10 मर्तबा दोहराएँ
8.इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की दुआ
शैख़ मजलिसी और शैख़ बहाई की दुआ

2.मिसबाह अल-मुतहज्जिद से नक़्ल:
اَللَّهُمَّ صَلِّ علَىٰ مُحَمَّد وَآلِ مُحَمَّد
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आले मुहम्मद
ऐ अल्लाह! हज़रत मुहम्मद और आले मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा

وَٱهْدِنِي لِمَا ٱخْتُلِفَ فِيهِ مِنَ ٱلحَقِّ بِإِذْنِكَ
वह्दिनी लिमा उख़्तुलिफ़ा फ़ीहि मिनल-हक़्क़ि बि-इज़्निका
और अपनी इजाज़त से मुझे उस हक़ की तरफ़ राह दिखा जिसमें इख़्तिलाफ़ किया गया है

إِنَّكَ تَهْدي مَنْ تَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ
इन्नका तहदी मन तशाऊ इला सिरातिम मुस्तक़ीम
बेशक तू जिसे चाहता है सीधे रास्ते की हिदायत देता है

3.निम्न दुआ 10 मर्तबा पढ़ें:
اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आले मुहम्मद
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा

اَلْأَوْصِيَاءِ ٱلرَّاضِيـنَ ٱلْمَرْضِيِّينَ
अल-अवसियाइर्-राज़ीना अल-मरज़ीय्यीन
जो वसी रज़ामंद और अल्लाह के पसंदीदा हैं

بِأَفْضَلِ صَلَوَاتِكَ
बि-अफ़ज़लि सलवातिका
तेरी बेहतरीन सलवातों के साथ

وَبَارِكْ عَلَيْهِمْ بِأَفْضَلِ بَرَكَاتِكَ
व बारिक अलैहिम बि-अफ़ज़लि बरकातिका
और उन पर अपनी बेहतरीन बरकतें नाज़िल फ़रमा

وَٱلسَّلاَمُ عَلَيْهِمْ
वस्सलामु अलैहिम
और उन पर सलामती हो

وَعَلىٰ أَرْوَاحِهِمْ وَ أَجْسَادِهِمْ
व अला अरवाहिहिम व अजसादिहिम
और उनकी रूहों और जिस्मों पर भी

وَرَحْمَةُ ٱللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ
व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु
और अल्लाह की रहमत और बरकतें हों

4.इमाम अली (अ) के किरदार पर ज़िंदगी माँगें:
اللّهُمَّ أَحْيِنِي عَلى ما أَحْيَيْتَ عَلَيْهِ عَلِيَّ بْنَ أَبِي طالِبٍ
अल्लाहुम्मा अह्यिनी अला मा अह्यैता अलैहि अलीय्य बिन अबी तालिब
ऐ अल्लाह! मुझे उसी तरीक़े पर ज़िंदा रख जिस तरीक़े पर तूने अली बिन अबी तालिब को ज़िंदा रखा

وَأَمِتْنِي عَلى ما ماتَ عَلَيْهِ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طالِبٍ عليه‌السلام
व अमित्नी अला मा माता अलैहि अलीय्यु बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम
और मुझे उसी उसूल पर मौत दे जिस उसूल पर अली बिन अबी तालिब (अ) ने जान दी


5.निम्न हर जुमला (i–x) 10 मर्तबा पढ़ें (100 मर्तबा का भी ज़िक्र है):
أَسْتَغْفِرُ ٱللَّهَ وَ أَتُوبُ إِلَيْهِ
अस्तग़फ़िरुल्लाह व अतूबु इलैह
(i) मैं अल्लाह से मग़फ़िरत माँगता हूँ और उसी की तरफ़ रुजू करता हूँ

أَسْأَلُ ٱللَّهَ ٱلْعَافِيَةَ
असअलुल्लाहल्-आफ़ियह
(ii) मैं अल्लाह से आफ़ियत और सलामती माँगता हूँ

أَسْتَجِيـرُ بِٱللَّهِ مِنَ ٱلنَّارِ
अस्तजीरु बिल्लाहि मिनन्नार
(iii) मैं जहन्नम की आग से अल्लाह की पनाह माँगता हूँ

وَ أَسْأَلُهُ ٱلْجَنَّةَ
व असअलुहुल्-जन्नह
(iv) और उससे जन्नत की दरख़्वास्त करता हूँ

أَسْأَلُ ٱللَّهَ ٱلْحُورَ ٱلْعِيـنَ
असअलुल्लाहल्-हूरल्-ईन
(v) मैं अल्लाह से हूरुल-ईन की दुआ माँगता हूँ

لاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ ٱلْمَلِكُ ٱلْحَقُّ ٱلْمُبينُ
ला इलाहा इल्लल्लाहुल्-मलिकुल्-हक़्कुल्-मुबीन
(vi) अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वही बादशाह और ज़ाहिर हक़ है


(vii) सूरह तौहीद पढ़ें

صَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَىٰ مُحَمَّد وَآلِ مُحَمَّد
सल्लल्लाहु अला मुहम्मद व आले मुहम्मद
(viii) अल्लाह मुहम्मद और आले मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमाए

سُبْحَانَ ٱللَّه
ِوَٱلْحَمْدُ لِلَّهِوَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ اللَّهُوَٱللَّهُ أَكْبَرُ وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلْعَلِيِّ ٱلْعَظِيمِ
सुब्हानल्लाहि वल्-हम्दु लिल्लाहि व ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर
व ला हौल व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल्-अलिय्यिल्-अज़ीम
(ix) अल्लाह पाक है, सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, अल्लाह सबसे बड़ा है
और अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न क़ुव्वत, जो बुलंद और अज़ीम है

مَا شَاءَ ٱللَّهُ كَانَ وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلْعَلِيِّ ٱلْعَظِيمِ
मा शा-अल्लाहु काना व ला हौल व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल्-अलिय्यिल्-अज़ीम
(x) वही होता है जो अल्लाह चाहता है, और अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न क़ुव्वत, जो बुलंद और अज़ीम है

6.तहज़ीबुल-अहकाम (शैख़ तूसी) में नक़्ल है कि जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ के बाद निम्न ज़िक्र दस मर्तबा पढ़े तो अल्लाह तआला उसे अंधेपन, दीवानगी, कोढ़, फ़क़्र और घर के ढहने या बुज़ुर्गी की कमज़ोरी से महफ़ूज़ रखेगा:
سُبْحَانَ ٱللَّهِ ٱلْعَظِيمِ وَبِحَمْدِهِ
सुब्हानल्लाहिल्-अज़ीमि व बिहम्दिहि
अल्लाह पाक है जो बहुत अज़ीम है, और हम उसी की हम्द करते हैं

وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلْعَلِيِّ ٱلْعَظِيمِ
व ला हौल व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल्-अलिय्यिल्-अज़ीम
और अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न क़ुव्वत, जो बुलंद और अज़ीम है

7.शैख़ कुलैनी नक़्ल करते हैं कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने फ़रमाया: जो शख़्स फ़ज्र और मग़रिब की नमाज़ के बाद निम्न ज़िक्र सात मर्तबा पढ़े अल्लाह तआला उसे सत्तर क़िस्म की आफ़तों से बचाएगा, जिनमें सबसे हल्की कोढ़ और दीवानगी है, और अगर उसका नाम बदक़िस्मतों की फ़ेहरिस्त में हो तो उसे मिटा दिया जाएगा:
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمٰنِ ٱلرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाहिर्-रहमानिर्-रहीम
अल्लाह के नाम से जो बहुत मेहरबान, बेहद रहम करने वाला है

لاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلْعَلِيِّ ٱلْعَظِيمِ
ला हौल व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल्-अलिय्यिल्-अज़ीम
अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न क़ुव्वत, जो बुलंद और अज़ीम है

8.इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से यह भी नक़्ल है कि जो शख़्स दुनिया और आख़िरत की भलाई चाहता हो और जिसे आँखों की तकलीफ़ हो, वह फ़ज्र और मग़रिब की नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़े:


اَللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِحَقِّ مُحَمَّد وَآلِ مُحَمَّد عَلَيْكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बिहक़्क़ि मुहम्मद व आले मुहम्मद अलैका
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मुहम्मद और आले मुहम्मद के उस हक़ के वसीले से सवाल करता हूँ जो तुझ पर साबित है

صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّد وَآلِ مُحَمَّد
सल्लि अला मुहम्मद व आले मुहम्मद
कि तू मुहम्मद और आले मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा

وَٱجْعَلِ ٱلنُّورَ فِي بَصَرِي
वज्अलिन्नूरा फ़ी बसरी
और मेरी नज़र में नूर अता फ़रमा

وَٱلْبَصِيـرَةَ فِي دِينِي
वल्-बस़ीरता फ़ी दीनी
और मेरे दीन में समझ और सूझ-बूझ अता फ़रमा

وَٱلْيَقِيـنَ فِي قَلْبِي
वल्-यक़ीना फ़ी क़ल्बी
और मेरे दिल में यक़ीन पैदा फ़रमा

وَٱلإِخْلاَصَ فِي عَمَلِي
वल्-इख़लासा फ़ी अमली
और मेरे आमाल में इख़लास अता फ़रमा

وَٱلسَّلاَمَةَ فِي نَفْسِي
वस्सलामता फ़ी नफ़्सी
और मेरी जान में सलामती रख

وَٱلسَّعَةَ فِي رِزْقِي
वस्सअता फ़ी रिज़्क़ी
और मेरे रिज़्क़ में कुशादगी अता फ़रमा

وَٱلشُّكْرَ لَكَ أَبَداً مَا أَبْقَيْتَنِي
वश्शुक्रा लका अबदन मा अबक़ैतनी
और जब तक तू मुझे ज़िंदा रखे, तेरा हमेशा शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ दे

9.शैख़ बहाई फ़ज्र की नमाज़ के बाद पढ़ी जाने वाली दुआओं के बारे में लिखते हैं (हवाला: मिफ़ताह-उल-फ़लाह, सफ़ा 206; मिसबाह-उल-मुतहज्जिद, सफ़ा 53):
दाएँ हाथ से दाढ़ी पकड़ कर और बायाँ हाथ आसमान की तरफ़ उठाकर सात मर्तबा पढ़ें:
يا رَبَّ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ ، صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ ، وَعَجِّلْ فَرَجَ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ .
ऐ मुहम्मद और आले मुहम्मद के परवरदिगार! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुहम्मद और आले मुहम्मद की फ़रज में जल्दी फ़रमा

मजलिसी (अल्लाह उन पर रहमत करे) ने “अल-मक़बास” में, फ़ज्र की नमाज़ के बाद की दुआ के बाब में नक़्ल किया है कि आदमी किसी से बात करने से पहले यह पढ़े:
يا رَبِّ صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ ، وَعَجِّلْ فَرَجَ آلِ مُحَمَّدٍ ، وَأَعْتِقْ رَقَبَتي مِنَ النَّارِ.
ऐ मेरे परवरदिगार! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा, आले मुहम्मद की फ़रज में जल्दी फ़रमा और मुझे जहन्नम की आग से आज़ाद कर दे

छठा बाब – पाँचवाँ मसअला – इमाम रज़ा (अ) ने फ़रमाया कि इकतालीस (41) मर्तबा यह पढ़ा जाए:
یَا عَزِیْزُ.
या अज़ीज़ु
ऐ ग़ालिब और ताक़तवर

इमाम (अ) ने फ़रमाया: जो शख़्स पूरी आज़िज़ी, ख़ुज़ू और दिली तवज्जोह के साथ अल्लाह की बारगाह में यह ज़िक्र करेगा, वह किसी का मोहताज नहीं रहेगा और लोगों के दरमियान इज़्ज़त और मक़बूलियत पाएगा।





फ़ज्र की नमाज़ से पहले
तहज्जुद की नमाज़

1. दो रकअत नफ़िला अदा करें
अल-जाफ़रिय्यात में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स) फ़ज्र से पहले दो रकअत नफ़िला अदा फ़रमाते, तो दाहिनी करवट लेटते, दाहिना हाथ दाहिने गाल के नीचे रखते और फिर यह फ़रमाते:
اِسْتَمْسَكْتُ بِعُرْوَةِ اللهِ الْوُثْقٰى الَّتِيْ لَا انْفِصَامَ لَهَا وَ اسْتَعْصَمْتُ بِحَبْلِ اللهِ الْمَتِيْنِ.
इस्तमसक्तु बि-उरवतिल्लाहिल वुस्क़ा अल्लती ला इन्फ़िसामा लहा वस्तअ़स़म्तु बि-हब्लिल्लाहिल मतीन
मैंने अल्लाह की उस मज़बूत रस्सी को थाम लिया है जो कभी टूटने वाली नहीं और मैंने अल्लाह की मज़बूत डोर से पनाह ले ली है

اَعُوْذُ بِاللهِ مِنْ فَوْرَةِ الْعَرَبِ وَ الْعَجَمِ وَ اَعُوْذُ بِاللهِ مِنْ شَرِّ شَيَاطِيْنِ الْاِنْسِ وَ الْجِنِّ. ‏
अऊज़ु बिल्लाहि मिन फ़ौरतिल अरबि वल अजमि व अऊज़ु बिल्लाहि मिन शर्रि शयातीनिल इन्सि वल जिन्न
मैं अरब और अजम के फ़साद से अल्लाह की पनाह चाहता हूँ और इंसानों व जिन्नों के शैतानों के शर से भी अल्लाह की पनाह चाहता हूँ

تَوَكَّلْتُ عَلَى اللهِ طَلَبْتُ حَاجَتِيْ مِنَ اللهِ حَسْبِيَ اللهُ وَ نِعْمَ الْوَكِيْلُ لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيْمِ.
तवक्कल्तु अलल्लाह तलाब्तु हाजती मिनल्लाह हस्बियल्लाहु व निअ़मल वकील ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अ़लिय्यिल अ़ज़ीम
मैंने अल्लाह पर भरोसा किया मैं अपनी ज़रूरतें अल्लाह से माँगता हूँ अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है और वही सबसे बेहतर कारसाज़ है और अल्लाह के सिवा कोई ताक़त और क़ुव्वत नहीं


सहीफ़ा अलविया 17 फ़ज्र के वक़्त पढ़ी जाने वाली सुबह की दुआ

بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ.
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह के नाम से जो बेहद मेहरबान और रहम करने वाला है

اَللّٰہُمَّ اِنَّ ذُنُوْبِیْ وَ اِنْ کَانَتْ قَطِیْعَۃً
अल्लाहुम्मा इन्ना ज़ुनूबी व इन कानत क़तीअ़तन
ऐ अल्लाह! अगरचे मेरे गुनाह ताल्लुक़ तोड़ देने के क़ाबिल हों

فَاِنِّیْ مَا اَرَدْتُ بِہٖ قَطِیْعَۃً وَ لَا اَقُوْلُ لَکَ الْعُتْبٰی
फ़इन्नी मा अरदतु बिही क़तीअ़तन व ला अक़ूलु लकल उ़त्बा
लेकिन मैं अपने गुनाहों की वजह से रिश्ते तोड़ना नहीं चाहता और न ही तुझसे कोई शिकायत करता हूँ

لَا اَعُوْدُ بِمَا اَعْلَمُہٗ مِنْ خَلَّتِیْ وَ لَا اسْتَتِمُّ التَّوْبَۃَ لِمَا اَعْلَمُہٗ مِنْ ضَعُفِیْ
ला आऊदु बिमा आअ़लमहु मिन खल्लती व ला अस्ततिम्मुत तौबता लिमा आअ़लमहु मिन ज़अ़फ़ी
मैं अपनी हालत को जानते हुए दोबारा उसी तरफ़ नहीं लौट सकता और अपनी कमज़ोरी को जानने की वजह से पूरी तरह तौबा भी नहीं कर पाता

وَ قَدْ جِئْتُ اَطْلُبُ عَفْوَکَ وَ وَسِیْلَتِیْ اِلَیْکَ کَرَمُکَ
व क़द जिअ़तु अतलुबु अ़फ़्वका व वसीलती इलैका करमुका
और मैं तेरी बारगाह में तेरे दरगुज़र की तलाश में आया हूँ तेरा करम ही मेरा सहारा है

فَصَلِّ عَلٰی مُحَمَّدٍ وَّ اٰلِ مُحَمَّدٍ وَّ اَکْرِمْنِیْ بِمَغْفِرَتِکَ یَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِیْنَ.
फ़सल्लि अ़ला मुहम्मदिन व आले मुहम्मद व अक़रिम्नी बि-मग़फ़िरतिका या अरह़मर्राहिमीन
तो मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दरूद भेज और अपनी मग़फ़िरत से मुझे इज़्ज़त अता फ़रमा ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले

फिर तीन सौ (300) मर्तबा पढ़ें:
اَلْعَفْوَ अल-अ़फ़्व यानी माफ़ी।

नाफ़िला ऐप से
फ़ज्र की नाफ़िला नमाज़ के बाद इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की दुआ
أَسْتَمْسَكُ بِعُرْوَةِ اللَّهِ الْوُثْقَى الَّتِي لَا انْفِصَامَ لَهَا وَاعْتَصَمْتُ بِحَبْلِ اللَّهِ الْمَتِينِ أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنْ شَرِّ شَيَاطِينِ الْإِنْسِ وَالْجِنِّ أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنْ شَرِّ فَسَقَةِ الْعَرَبِ وَالْعَجَمِ حَسْبِيَ اللَّهُ تَوَكَّلْتُ عَلَى اللَّهِ أَلْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَى اللَّهِ طَلَبْتُ حَاجَتِي مِنَ اللَّهِ لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ.
اَللّهُمَّ اجْعَلْ لِي نُوراً فِي قَلْبِي وَنُوراً فِي بَصَرِي وَنُوراً فِي سَمْعِي وَنُوراً فِي لِسَانِي وَنُوراً فِي بَشَرِي وَنُوراً فِي شَعْرِي وَنُوراً فِي لَحْمِي وَنُوراً فِي دَمِي وَنُوراً فِي عِظَامِي وَنُوراً فِي عَصَبِي وَنُوراً بَيْنِ يَدَيَّ وَنُوراً مِنْ خَلْفِي وَنُوراً عَنْ يَمِينِي وَنُوراً عَنْ شِمَالِي وَنُوراً مِنْ فَوْقِي وَنُوراً مِنْ تَحْتِي اَللّهُمَّ أَعْظِمْ لِي نُوراً
अस्तमसिकु बि-उरवतिल्लाहिल वुस्क़ा अल्लती ला इन्फ़िसामा लहा वअ़तसम्तु बि-हब्लिल्लाहिल मतीन अऊज़ु बिल्लाहि मिन शर्रि शयातीनिल इन्सि वल जिन्न अऊज़ु बिल्लाहि मिन शर्रि फ़सक़तिल अरबि वल अजम हस्बियल्लाह तवक्कल्तु अलल्लाह अल्जअ़तु ज़ह्री इलल्लाह तलाब्तु हाजती मिनल्लाह ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह अल्लाहुम्मज्अल ली नूरन फ़ी क़ल्बी व नूरन फ़ी बसरी व नूरन फ़ी सम्अी व नूरन फ़ी लिसानी व नूरन फ़ी बशरी व नूरन फ़ी शअ़री व नूरन फ़ी लह्मी व नूरन फ़ी दमी व नूरन फ़ी इज़ामी व नूरन फ़ी अ़सबी व नूरन बैन यदैय्य व नूरन मिन ख़ल्फ़ी व नूरन अ़न यमीनी व नूरन अ़न शिमाली व नूरन मिन फ़ौक़ी व नूरन मिन तहती अल्लाहुम्मा अ़ज़िम ली नूरा
मैं अल्लाह की उस मज़बूत रस्सी को थामे हुए हूँ जो कभी टूटने वाली नहीं और मैंने अल्लाह की मज़बूत डोर से पनाह ली है मैं इंसानों और जिन्नों के शैतानों के शर से अल्लाह की पनाह चाहता हूँ और अरब व अजम के फ़ासिक़ लोगों के शर से भी अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है मैंने अल्लाह पर भरोसा किया मैंने अपनी पीठ अल्लाह की तरफ़ लगा दी मैंने अपनी हर ज़रूरत अल्लाह से माँगी अल्लाह के सिवा कोई ताक़त और क़ुव्वत नहीं ऐ अल्लाह! मेरे दिल में नूर रख मेरी आँखों में नूर दे मेरे कानों में नूर दे मेरी ज़बान में नूर दे मेरी खाल, मेरे बाल, मेरे गोश्त, मेरे ख़ून, मेरी हड्डियों और मेरी नसों में नूर रख मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे दाएँ, मेरे बाएँ, मेरे ऊपर और मेरे नीचे नूर रख ऐ अल्लाह! मेरे लिए नूर को बहुत बढ़ा दे
फिर **सूरह आले-इमरान की आख़िरी आयतें** पढ़ें:
إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ... ﴿١٩٤﴾
इन्न फ़ी ख़ल्क़िस्समावाति वल अर्ज़ि वख़्तिलाफ़िल्लैलि वन्नहार... (१९०–१९४)
निस्संदेह आसमानों और ज़मीन की पैदाइश में और रात-दिन के फेरबदल में अक़्ल वालों के लिए निशानियाँ हैं… (सूरह आले-इमरान 190-194)
फिर **तीन मर्तबा** कहें:
سُبْحَانَ رَبِّ الصَّبَاحِ فَالِقِ الْإِصْبَاحِ وَجَاعِلِ اللَّيْلِ سَكَناً وَالشَّمْسِ وَالْقَمَرِ حُسْبَاناً.
सुब्हान रब्बिस्सबाह फ़ालिक़िल इस्बाह व जाअ़िलिल्लैलि सकनन वश्शम्सि वल क़मरि हुस्बाना
पाक है सुबह का परवरदिगार जो सुबह को चीर निकालता है और रात को सुकून बनाता है और सूरज व चाँद को हिसाब से चलाता है
फिर कहें:
اَللّهُمَّ اجْعَلْ أَوَّلَ يَوْمِي هَذَا صَلَاحاً وَأَوْسَطَهُ نَجَاحاً وَآخِرَهُ فَلَاحاً. اَللّهُمَّ وَمَنْ أَصْبَحَ وَحَاجَتُهُ وَطَلِبَتُهُ إِلَى مَخْلُوقٍ فَإِنَّ حَاجَتِي وَطَلِبَتِي إِلَيْكَ وَحْدَكَ لَا شَرِيكَ لَكَ.
अल्लाहुम्मज्अल अव्वल यौमी हाज़ा सलाहा व औसतहू नजाहा व आख़िरहू फ़लाहा अल्लाहुम्मा व मन अस्बह व हाजतहू व त़लिबतहू इला मख़लूक़ फ़इन्न हाजती व त़लिबती इलैका वहदका ला शरीक़ लका
ऐ अल्लाह! मेरे इस दिन की शुरुआत सुधार से कर बीच को कामयाबी बना और आख़िर को निजात बना ऐ अल्लाह! जो लोग अपनी ज़रूरतें मख़लूक़ से माँगते हैं मेरी हर ज़रूरत और हर माँग सिर्फ़ तुझसे है तेरा कोई साझी नहीं
फिर **आयतुल कुर्सी**, **सूरह फ़लक़** और **सूरह नास** पढ़ें फिर **100 मर्तबा** पढ़ें:
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْعَظِيمِ وَبِحَمْدِهِ أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ.
सुब्हान रब्बियिल अ़ज़ीम व बि-हम्दिही अस्तग़फ़िरुल्लाह व अतूबु इलैह
मेरा परवरदिगार अज़ीम है और मैं उसकी हम्द करता हूँ मैं अल्लाह से मग़फ़िरत माँगता हूँ और उसी की तरफ़ रुजू करता हूँ



9.तीन दुआएँ (i, ii, iii) सैय्यद मुहम्मद अल-सुल्तानाबादी ने शैख़ मुहम्मद सादिक़ अल-इराक़ी को (इमाम महदी — अलैहिस्सलाम — के ज़रिये) सिखाईं, जिनसे उनकी सख़्त परेशानी और ग़रीबी दूर हुई:
(i) उन्होंने उन्हें सिखाया कि फ़ज्र की नमाज़ के बाद सीने पर हाथ रखकर सत्तर (70) मर्तबा यह पढ़ें:
يَا فَتَّاحُ
या फ़त्ताहु
ऐ खोलने वाले परवरदिगार

(ii) उन्होंने उन्हें यह दुआ नियमित पढ़ने की तालीम दी जो अल-काफ़ी में दर्ज है। रसूलुल्लाह (स) ने यह दुआ एक सहाबी को सिखाई थी जो बीमारी और ग़रीबी में مبتला थे। थोड़े ही अरसे में वह सेहतयाब हुए और ग़रीबी से निजात पा गए। दुआ यह है:
لاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاََّ بِٱللَّهِ
ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह
अल्लाह के सिवा कोई ताक़त और क़ुव्वत नहीं

تَوَكَّلْتُ عَلَىٰ ٱلْحَيِّ ٱلَّذِي لاَ يَمُوتُ
तवक्कल्तु अलल-हय्यिल्-लज़ी ला यमूतु
मैं उस हमेशा ज़िंदा रहने वाले पर भरोसा करता हूँ जो कभी मरता नहीं

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَداً
वल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी लम यत्तख़िज़ वलदन
सारी हम्द अल्लाह के लिए है जिसने न औलाद बनाई

وَلَمْ يَكُنْ لَهُ شَرِيكٌ فِي ٱلْمُلْكِ
व लम यकुन लहू शरीकुन फ़िल-मुल्क
और न ही उसकी हुकूमत में कोई साझी है

وَلَمْ يَكُنْ لَهُ وَلِيٌّ مِنَ ٱلذُّلِّ
व लम यकुन लहू वलिय्युं मिनज़-ज़ुल्ल
और न ही उसे किसी सहारे की ज़रूरत है जो उसे जिल्लत से बचाए

وَكَبِّرْهُ تَكْبِيراً
व क़ब्बिरहु तक्बीरा
और उसकी बड़ाई बयान करो

(iii) उन्होंने उन्हें यह दुआ पढ़ने की तालीम दी। `उद्दत-उद-दाई` में शैख़ इब्न फ़हद ने इमाम अली बिन मूसा अल-रज़ा (अ) से रिवायत की है कि जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ेगा, अल्लाह उसकी तमाम मुश्किलें आसान कर देगा और हर ग़म से उसकी हिफ़ाज़त करेगा:

بِسْمِ ٱللَّهِ
बिस्मिल्लाह
अल्लाह के नाम से

وَصَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَىٰ مُحَمَّد وآلِهِ
व सल्लल्लाहु अ़ला मुहम्मद व आलिही
अल्लाह मुहम्मद और उनकी आले पर रहमत नाज़िल फ़रमाए

﴿وَأُفَوِّضُ أَمْرِي إِلَىٰ ٱللَّهِ
व उफ़व्विज़ु अम्री इलल्लाह
मैं अपना मामला अल्लाह के सुपुर्द करता हूँ

إِنَّ ٱللَّهَ بَصيرٌ بِٱلْعِبَادِ
इन्नल्लाहा बस़ीरुन बिल-इबाद
निस्संदेह अल्लाह अपने बन्दों को देखने वाला है

فَوَقَاهُ ٱللَّهُ سَيِّئَاتِ مَا مَكَرُوا﴾
फ़वक़ाहुल्लाहु सैय्यिआति मा मकरू
तो अल्लाह ने उसे उनकी चालों की बुराइयों से बचा लिया

﴿لاَ إِلٰهَ إِلاَّ أَنْتَ سُبْحَانَكَ
ला इलाहा इल्ला अंता सुब्हानक
तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है

إِنِّي كُنْتُ مِنَ ٱلظَّالِمِيـنَ
इन्नी कुंतु मिनज़्-ज़ालिमीन
बेशक मैं ज़ालिमों में से था

فَٱسْتَجَبْنَا لَهُ وَنَجَّيْنَاهُ مِنَ ٱلغَمِّ
फ़स्तजब्ना लहू व नज्जैनाहु मिनल-ग़म्म
तो हमने उसकी दुआ क़बूल की और उसे ग़म से निजात दी

وَكَذٰلِكَ نُنْجِي ٱلْمُؤْمِنينَ﴾
व कज़ालिका नुन्ज़िल-मुमिनीन
और इसी तरह हम मोमिनों को निजात देते हैं

﴿حَسْبُنَا ٱللَّهُ وَنِعْمَ ٱلْوَكِيلُ
हसबुनल्लाहु व निअ़मल-वकील
अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वही बेहतरीन कारसाज़ है

فَٱنَقَلَبُوٱ بِنِعْمَةٍ مِنَ ٱللَّهِ وَفَضْلٍ
फ़नक़लबू बिनिअ़मतिन मिनल्लाहि व फ़ज़्ल
फिर वे अल्लाह की नेमत और फ़ज़्ल के साथ लौटे

لَمْ يَمْسَسْهُمْ سُوءٌ﴾
लम यमस्सहुम सूअ़
और उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचा

مَا شَاءَ ٱللَّهُ
मा शाअल्लाह
वही होता है जो अल्लाह चाहता है

لاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ
ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह
अल्लाह के सिवा कोई ताक़त और क़ुव्वत नहीं

مَا شَاءَ ٱللَّهُ لاَ مَا شَاءَ ٱلنَّاسُ
मा शाअल्लाह ला मा शाअन्नास
वही होता है जो अल्लाह चाहता है, लोग नहीं

مَا شَاءَ ٱللَّهُ وَإِنْ كَرِهَ ٱلنَّاسُ
मा शाअल्लाह व इन करिहन्नास
वही होता है जो अल्लाह चाहता है, चाहे लोग नापसंद करें

حَسْبِيَ ٱلرَّبُّ مِنَ ٱلْمَرْبُوبِيـنَ
हस्बियर्रब्बु मिनल-मर्बूबीन
मेरे लिए मेरा रब काफ़ी है, तमाम मातहतों के मुक़ाबले में

حَسْبِيَ ٱلْخَالِقُ مِنَ ٱلْمَخْلُوقِيـنَ
हस्बियल-ख़ालिक़ु मिनल-मख़लूक़ीन
मेरे लिए मेरा ख़ालिक़ काफ़ी है, सारी मख़लूक़ के मुक़ाबले में

حَسْبِيَ ٱلرَّازِقُ مِنَ ٱلْمَرْزُوقِيـنَ
हस्बियर्राज़िक़ु मिनल-मर्ज़ूक़ीन
मेरे लिए मेरा रिज़्क़ देने वाला काफ़ी है, तमाम रोज़ी पाने वालों के मुक़ाबले में

حَسْبِيَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَالَمِيـنَ
हस्बियल्लाहु रब्बुल-आलमीन
मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, जो सारे जहानों का रब है

حَسْبِي مَنْ هُوَ حَسْبِي
हस्बी मन हु वा हस्बी
मेरे लिए वही काफ़ी है जो मेरे लिए काफ़ी है

حَسْبِي مَنْ لَمْ يَزَلْ حَسْبِي
हस्बी मन लम यज़ल हस्बी
मेरे लिए वही काफ़ी है जो हमेशा से मेरे लिए काफ़ी रहा है

حَسْبِي مَنْ كَانَ مُذْ كُنْتُ لَمْ يَزَلْ حَسْبِي
हस्बी मन काना मुज़ कुंतु लम यज़ल हस्बी
मेरे लिए वही काफ़ी है जो मेरी पैदाइश से पहले भी था और आज भी मेरे लिए काफ़ी है

﴿حَسْبِيَ ٱللَّهُ لاَ إِلٰهَ إِلاَّ هُوَ
हस्बियल्लाहु ला इलाहा इल्ला हु वा
अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है उसके सिवा कोई माबूद नहीं

عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ
अलैहि तवक्कल्तु
उसी पर मैंने भरोसा किया है

وَهُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ﴾
व हु वा रब्बुल-अर्शिल-अज़ीम
और वही अज़ीम अर्श का रब है


हमारे बुज़ुर्ग आलिम शैख़ अल-नूरी ने अपनी किताब **दार-उस-सलाम** में अपने उस्ताद फ़तह अली अल-सुल्तानाबादी के हवाले से नक़्ल किया है कि शैख़ मुहम्मद सादिक़ अल-इराक़ी लंबे अरसे तक सख़्त ग़रीबी में रहे और उनकी हालत का कोई हल न निकल सका यहाँ तक कि उन्होंने ख़्वाब में देखा कि वह एक वादी में हैं जहाँ एक बहुत बड़ा ख़ेमा है जिसके ऊपर गुम्बद है।
जब उन्होंने उस ख़ेमे के मालिक के बारे में पूछा तो बताया गया कि यह इमाम महदी (अ) का ख़ेमा है — जो मज़लूमों की पनाह और बेबसों की राहत हैं — अल्लाह उनकी ज़ुहूर में जल्दी फ़रमाए। वह फ़ौरन उस ख़ेमे की तरफ़ बढ़े और अपनी ग़रीबी और परेशानियों की शिकायत की और इमाम (अ) से ऐसी दुआ सिखाने की दरख़्वास्त की जो उनके ग़म दूर कर दे और मुसीबतों से निजात दिला दे। इमाम (अ) ने उनकी बात सुनकर उन्हें अपने एक फ़र्ज़ंद के ख़ेमे की तरफ़ भेजा।
वह इमाम (अ) के ख़ेमे से निकलकर जिस ख़ेमे की तरफ़ रहनुमाई की गई थी वहाँ पहुँचे। वहाँ उन्होंने सैय्यद मुहम्मद अल-सुल्तानाबादी को नमाज़ की जगह बैठे देखा जो दुआओं और ज़िक्र में मशग़ूल थे। उन्होंने उन्हें सलाम किया और इमाम (अ) से हुआ पूरा वाक़िआ बयान किया।
सैय्यद ने उन्हें एक ऐसी दुआ सिखाई जो ग़रीबी दूर करने और वसीअ रिज़्क़ दिलाने वाली थी।
जब वह शख़्स नींद से जागा तो उसने देखा कि वह दुआ उसे पूरी तरह याद है। वह फ़ौरन सैय्यद के घर पहुँचा और उन्हें उसी हालत में पाया जैसा ख़्वाब में देखा था। मानो सैय्यद पहले से सब जानते हों। उन्होंने उसका इस्तिक़बाल किया और मुस्कुराए। उस शख़्स ने दुआ के बारे में पूछा और सैय्यद ने उसे बता दिया। जब उसने उस दुआ को पाबंदी से पढ़ना शुरू किया तो बहुत जल्द उस पर दौलत हर तरफ़ से छा गई।
हाजी फ़तह अली अल-सुल्तानाबादी सैय्यद की बहुत तारीफ़ किया करते थे और कुछ अरसा उनके शागिर्द भी रहे। उपर्युक्त तीनों अमल उसी सैय्यद ने उस शख़्स को सिखाए थे।


10.चार नेमतें
11.सैय्यदा ज़हरा (सा)
12.हिजरत की रात
13-14.रसूलुल्लाह (स)
15.रबीउल अनाम
16.अकीक़ की अंगूठी को देखना
17.छठे इमाम की दुआ
18.सज्दा-ए-शुक्र
19.इमाम अली (अ) – 104 सहिफ़ा

10.क़ुतुब रावंदी ने इमाम अली (अ) से रिवायत की है कि रसूलुल्लाह (स) ने फ़रमाया: मुझे उस शख़्स के बारे में डर है जो सुबह चार नेमतों को याद नहीं करता, कहीं ऐसा न हो कि वे उससे छीन ली जाएँ


اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ‏ عَرَّفَنِيْ‏ نَفْسَهٗ‏ وَ لَمْ يَتْرُكْنِيْ عَمْيَانَ الْقَلْبِ
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अर्रफ़नी नफ़्सहू व लम यतरुकनी उम्यानल-क़ल्ब
तमाम हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने मुझे अपनी पहचान दी और मुझे दिल का अंधा नहीं छोड़ा

اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ جَعَلَنِيْ مِنْ اُمَّةِ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللہُ عَلَیْہِ وَ اٰلِہ
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी जअलनी मिन उम्मति मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि
तमाम हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने मुझे उम्मत-ए-मुहम्मद में शामिल किया

اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ جَعَلَ رِزْقِيْ فِيْ يَدَيْهِ وَ لَمْ يَجْعَلْ رِزْقِيْ فِي اَيْدِيْ النَّاسِ
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी जअला रिज़्क़ी फ़ी यदैहि व लम यजअल रिज़्क़ी फ़ी ऐदिन-नास
तमाम हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने मेरा रिज़्क़ अपने हाथ में रखा और लोगों के हाथों में नहीं दिया

اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ سَتَرَ ذُنُوْبِيْ وَ عُيُوْبِيْ وَ لَمْ يَفْضَحْنِيْ بَيْنَ الْخَلَایِقِ.
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी सतरा ज़ुनूबी व उयूबि व लम यफ़ज़हनी बैनल-ख़लाइक़
तमाम हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने मेरे गुनाहों और ऐबों पर पर्दा डाला और मुझे लोगों के बीच रुस्वा नहीं किया
वैकल्पिक बयान:
अल्लाह की हम्द है जिसने मुझे अपनी पहचान दी और मुझे उन लोगों में नहीं छोड़ा जिनके दिल समझ नहीं रखते।
अल्लाह की हम्द है जिसने मुझे मुहम्मद (स) और उनकी आल की इताअत की तौफ़ीक़ दी।
अल्लाह की हम्द है जिसने मेरा रिज़्क़ अपने हाथ में रखा ताकि मुझे लोगों से माँगना न पड़े।
अल्लाह की हम्द है जिसने मेरे ऐबों पर पर्दा डाला और लोगों के सामने मेरी बेइज़्ज़ती नहीं की।



11.सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा (सा) की सुबह की नमाज़ के बाद की दुआ
لَا اِلٰہَ اِلَّا اللہُ وَحْدَہٗ لَا شَرِیْكَ لَہٗ، لَہُ الْمُلْكُ وَ لَہُ الْحَمْدُ، یُحْیِیْ وَ یُمِیْتُ، بِیَدِہِ الْخَیْرُ، وَ ہُوَ عَلٰی كُلِّ شَيْءٍ قَدِیْرٌ.
ला इलाहा इल्लल्लाह वहदहू ला शरीक लहू लहुल मुल्कु व लहुल हम्द युहयी व युमीत बियदिहिल ख़ैर व हु वा अला कुल्ले शैइन क़दीर
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी का बादशाहत है और उसी के लिए हम्द है। वही ज़िन्दा करता है और वही मौत देता है। हर भलाई उसके हाथ में है और वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।
यह दुआ सुबह की नमाज़ के बाद दस बार और मग़रिब की नमाज़ के बाद दस बार पढ़ी जाए। इसके बदले दस नेकियाँ लिखी जाती हैं, दस गुनाह माफ़ होते हैं, और यह इस्माईल की औलाद में से एक ग़ुलाम आज़ाद करने के बराबर है। यह सुबह से शाम तक शैतानों और हर बुराई से हिफ़ाज़त है, सिवाय शिर्क करने वाले के।

12.यह दुआ इमाम अली अमीरुल मोमिनीन (अ) से हिजरत की रात के बारे में रिवायत की गई है, और इसे हर सुबह और शाम कहा जाता है


أَصْبَحْتُ ٱللَّهُمَّ مُعْتَصِماً بِذِمَامِكَ ٱلْمَنِيعِ
अस्बहतुल्लाहुम्मा मुअतसिमन बि-धिमामिकल-मनीअ
ऐ अल्लाह! मैंने सुबह की शुरुआत तेरी मज़बूत पनाह में की

ٱلَّذِي لاَ يُطَاوَلُ وَلاَ يُحَاوَلُ
अल्लज़ी ला युतावलु वला युहावलु
जो न छुआ जा सकता है और न उस तक पहुँचा जा सकता है

مِنْ شَرِّ كُلِّ غَاشِمٍ وَطَارِقٍ
मिन शर्रि कुल्लि ग़ाशिमिन व तारीक़िन
हर ज़ालिम और हमला करने वाले के शर से

مِنْ سَائِرِ مَنْ خَلَقْتَ وَمَا خَلَقْتَ
मिन साएरि मन ख़लक़्ता व मा ख़लक़्ता
तेरी तमाम मख़लूक़ में से, चलने वाली और बेजान

مِنْ خَلْقِكَ ٱلصَّامِتِ وَٱلنَّاطِقِ
मिन ख़लक़िकस्सामिति वन्नातिक़ि
चाहे बोलने वाली हों या खामोश

في جُنَّةٍ مِنْ كُلِّ مَخُوفٍ
फ़ी जुन्नतिन मिन कुल्लि मख़ूफ़िन
हर डरावनी चीज़ से पूरी हिफ़ाज़त में

بِلِبَاسٍ سَابِغَةٍ
बि-लिबासिन साबिग़तिन
एक मुकम्मल ओढ़न में

وَلاَءِ أَهْلِ بَيْتِ نَبِيِّكَ
वलाइ अह्लि बैति नबिय्यिक
यानी तेरे नबी के अहले-बैत की वलायत में

مُحْتَجِباً مِنْ كُلِّ قَاصِدٍ لِي إِلىٰ أَذِيَّةٍ
मुहतजिबन मिन कुल्लि क़ासिदिन ली इला अज़िय्यतिन
और हर उस शख़्स से पर्दा करके जो मुझे नुकसान पहुँचाना चाहता है

بِجِدَارٍ حَصِينٍ
बि-जिदारिन हसीनिन
एक मज़बूत दीवार के पीछे

ٱلإِخْلاَصِ فِي ٱلإِعْتِرَافِ بِحَقِّهِمْ
अल-इख़लासि फ़िल-इअतिराफ़ि बि-हक़्क़िहिम
उनके हक़ को मानने में पूरी सच्चाई के साथ

وَٱلتَّمَسُّكِ بَحَبْلِهِمْ
वत्तमस्सुकी बि-हब्लिहिम
और उनकी रस्सी को मज़बूती से थामे हुए

مُوقِناً أَنَّ ٱلْحَقَّ لَهُمْ وَمَعَهُمْ
मुक़िनन अन्नल-हक़्क़ लहुम व मअहुम
इस यक़ीन के साथ कि हक़ उन्हीं का है और उन्हीं के साथ है

وَفيهِمْ وَبِهِمْ
व फ़ीहिम व बिहिम
उन्हीं में है और उन्हीं के ज़रिये है

أُوَالِي مَنْ وَالَوْٱ
उवाली मन वालव
मैं उसी से दोस्ती करता हूँ जिससे वे दोस्ती करते हैं

وَأُجَانِبُ مَنْ جَانَبُوٱ
व उजानिबु मन जानबू
और उससे दूर रहता हूँ जिससे वे दूर रहते हैं

فَأَعِذْنِي اَللَّهُمَّ بِهِمْ
फ़-अइज़्नी अल्लाहुम्मा बिहिम
ऐ अल्लाह! उनके वसीले से मुझे पनाह दे

مِنْ شَرِّ كُلِّ مَا أَتَّقيهِ يَا عَظِيمُ
मिन शर्रि कुल्लि मा अत्तक़ीहि या अज़ीम
हर उस चीज़ के शर से जिससे मैं डरता हूँ, ऐ अज़ीमत वाले

حَجَزْتُ ٱلأَعَادِيَ عَنِّي بِبَدِيعِ ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلأَرْضِ
हजज़्तुल-अअादिया अन्नी बि-बदीइस्समावाति वल-अर्ज़
मैंने दुश्मनों को आसमानों और ज़मीन के बेमिसाल बनाने वाले के ज़रिये अपने से रोक लिया

وَجَعَلْنَا مِنْ بَيْنِ أَيْديهِمِ سَدّاً
व जअल्ना मिन बैनि ऐदीहिम सद्दन
और हमने उनके आगे एक दीवार क़ायम कर दी

وَمِنْ خَلْفِهِمْ سَدّاً
व मिन ख़ल्फ़िहिम सद्दन
और उनके पीछे भी एक दीवार बना दी

فَأَغْشَيْنَاهُمْ فَهُمْ لاَ يُبْصِرُونَ
फ़-अग़शैनाहुम फ़हुम ला युब्सिरून
फिर हमने उन्हें ढाँप लिया, इसलिए वे देख नहीं पाते


13.रसूलुल्लाह (स) से दुआ मुफ़ीदुद्दीन ने किताब अल-मजालिस में रिवायत की है
अबू बरज़ा अल-अस्लमी ने अपने वालिद से रिवायत की: जब रसूलुल्लाह (स) ने फ़ज्र की नमाज़ अदा की, तो आपने आवाज़ बुलंद की ताकि सहाबी सुन सकें, और यह दुआएँ तीन-तीन बार फ़रमाईं:
اَللّٰهُمَّ اَصْلِحْ لِيْ دِيْنِيَ الَّذِيْ جَعَلْتَهٗ لِيْ عِصْمَةً.
अल्लाहुम्मा अस्लिह ली दीनीयल-लज़ी जअल्तहू ली इस्मतन
ऐ अल्लाह! मेरे दीन को दुरुस्त कर जिसे तूने मेरी हिफ़ाज़त का ज़रिया बनाया है

اَللّٰهُمَّ اَصْلِحْ لِي دُنْيَايَ الَّتِيْ جَعَلْتَ فِيْهَا مَعَاشِيْ.
अल्लाहुम्मा अस्लिह ली दुनयायल-लती जअल्ता फीहा मआशी
ऐ अल्लाह! मेरी दुनिया को दुरुस्त कर जिसमें तूने मेरी रोज़ी रखी है

اَللّٰهُمَّ اَصْلِحْ لِيْ آخِرَتِيَ الَّتِيْ جَعَلْتَ اِلَيْهَا مَرْجَعِيْ.
अल्लाहुम्मा अस्लिह ली आख़िरतियल-लती जअल्ता इलैहा मरजिई
ऐ अल्लाह! मेरी आख़िरत को दुरुस्त कर जिसे तूने मेरी वापसी की जगह बनाया है

اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ وَ اَعُوْذُ بِعَفْوِكَ مِنْ نِقْمَتِكَ.
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिरिज़ाका मिन सख़तिक व अऊज़ु बि-अफ़्विक मिन निक़मतिका
ऐ अल्लाह! मैं तेरी रज़ा के वसीले से तेरे ग़ज़ब से पनाह चाहता हूँ और तेरी माफ़ी के ज़रिये तेरी सज़ा से बचाव चाहता हूँ
फिर यह फ़रमाया:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ لَا مَانِعَ لِمَا اَعْطَيْتَ وَ لَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ وَ لَا يَنْفَعُ ذَا الْجَدِّ مِنْكَ الْجَدُّ.
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका ला मानिअ लिमा अअतैत वला मुअति लिमा मनअत वला यनफ़उ ज़ल-जद्दि मिंक़ल-जद्द
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ; जिसे तू दे, उसे कोई रोक नहीं सकता, और जिसे तू रोक ले, उसे कोई दे नहीं सकता, और किसी की कोशिश तेरे बग़ैर कामयाब नहीं होती
[1] अमाली तुसी, जिल्द 1, सफ़ा 158; बिहारुल अनवार, जिल्द 86, सफ़ा 134 क़ुतुब ने अपनी किताब दअवात में लिखा: जब रसूलुल्लाह (स) ने सुबह की नमाज़ अदा की, तो आपने यह दुआ फ़रमाई:
اَللّٰهُمَّ مَتِّعْنِيْ بِسَمْعِيْ وَ بَصَرِيْ وَ اجْعَلْهُمَا الْوَارِثَيْنِ مِنِّيْ وَ اَرِنِيْ ثَارِيْ مِنْ عَدُوِّيْ.
अल्लाहुम्मा मत्तिअनी बि-समई व बसरि वजअलहुमल-वारिसैन मिन्नी व अरिनी साअरी मिन अदुव्वी
ऐ अल्लाह! मुझे मेरी सुनने और देखने की ताक़त से फ़ायदा पहुँचाता रह, और इन्हें आख़िरी दम तक मेरे साथ बाक़ी रख, और मुझे मेरे दुश्मन की हलाकत दिखा
[2] अल-मजलिसी ने इसे बिहारुल अनवार, जिल्द 86, सफ़ा 130 से नक़्ल किया
सैय्यद इब्न ताऊस ने किताब *अल-इक़बाल* में जाफ़र बिन मुहम्मद (अ) से, और उन्होंने अपने वालिद (अ) से रिवायत की, जिन्होंने एक हदीस में फ़रमाया:
जब रसूलुल्लाह (स) फ़ज्र की नमाज़ मुकम्मल फ़रमाते, तो सूरज निकलने तक क़िब्ला की तरफ़ मुँह किए रहते और अल्लाह तआला का ज़िक्र करते रहते। इसी दौरान अली बिन अबी तालिब (अ) आगे बढ़कर रसूलुल्लाह (स) के पीछे बैठते, और लोग अपनी ज़रूरतें पेश करने की इजाज़त माँगते। यह वही अमल था जिसकी रसूलुल्लाह (स) ने उन्हें तालीम दी थी। [3] इक़बालुल आमाल, सफ़ा 320; बिहारुल अनवार, जिल्द 35, सफ़ा 289
14. अल-फ़क़ीह में रिवायत है कि रसूलुल्लाह (स) फ़ज्र की नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ा करते थे:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَ الْحُزْنِ وَ الْعَجْزِ وَ الْكَسَلِ وَ الْبُخْلِ وَ الْجُبْنِ وَ ضَلْعِ الدَّيْنِ وَ غَلَبَةِ الرِّجَالِ وَ بَوَارِ الْاَيَّمِ وَ الْغَفْلَةِ وَ الذِّلَّةِ وَ الْقَسْوَةِ وَ الْعَيْلَةِ وَ الْمَسْكَنَةِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-हम्मि वल-हुज़्न वल-अज़्ज़ि वल-कसल वल-बुख़्लि वल-जुब्न व ज़लअिद्दैन व ग़लबतिर-रिजाल व बवारिल-अय्याम वल-ग़फ़्लत वज़-ज़िल्लत वल-क़सवत वल-ऐलत वल-मसकनत
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे ग़म और रंज, कमज़ोरी और सुस्ती, बुख़्ल और बुज़दिली, क़र्ज़ के बोझ, लोगों के ग़लबे, उम्र की बरबादी, ग़फ़लत, ज़िल्लत, सख़्ती-ए-दिल, तंगी और ग़रीबी से पनाह माँगता हूँ

وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ نَفْسٍ لَا تَشْبَعُ وَ مِنْ قَلْبٍ لَا يَخْشَعُ وَ مِنْ عَيْنٍ لَا تَدْمَعُ وَ مِنْ دُعَاءٍ لَا يُسْمَعُ وَ مِنْ صَلَاةٍ لَا تَنْفَعُ (تُرْفَعُ)
व अऊज़ु बिका मिन नफ़्सिन ला तश्बअ व मिन क़ल्बिन ला यख़्शअ व मिन ऐनिन ला तद्मअ व मिन दुआइन ला युस्मअ व मिन सलातिन ला तनफ़अ
और मैं तुझसे उस नफ़्स से पनाह चाहता हूँ जो कभी राज़ी न हो, उस दिल से जो झुकता नहीं, उस आँख से जो रोती नहीं, उस दुआ से जो क़बूल न हो, और उस नमाज़ से जो फ़ायदा न दे

وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنِ امْرَاَةٍ تُشَيِّبُنِيْ قَبْلَ اَوَانَ مَشِيْبِيْ وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ وَلَدٍ يَكُوْنُ عَلَيَّ رِبًّا وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ مَالٍ يَكُوْنُ عَلَيَّ عَذَابًا وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ صَاحِبِ خَدِيْعَةٍ اِنْ رَاَى حَسَنَةٍ دَفَنَهَا وَ اِنْ رَاَىْ سَيِّئَةً اَفْشَاهَا.
व अऊज़ु बिका मिन इम्रअतिन तुशय्यिबुनी क़ब्ला अवानि मश़ीबी व अऊज़ु बिका मिन वलदिन यकूनु अलय्य रिब्बन व अऊज़ु बिका मिन मालिन यकूनु अलय्य अज़ाबन व अऊज़ु बिका मिन साहिबि ख़दीअतिन
और मैं तुझसे उस औरत से पनाह चाहता हूँ जो मुझे वक़्त से पहले बूढ़ा कर दे, और उस औलाद से जो मुझ पर हुकूमत करने लगे, और उस माल से जो मेरे लिए अज़ाब बन जाए, और उस धोख़ेबाज़ साथी से जो अच्छाई को दफ़ना दे और बुराई को फैला दे

اَللّٰهُمَّ لَا تَجْعَلْ لِفَاجِرٍ عَلَیَّ (عِنْدِيْ) يَدًا وَ لَا مِنَّةً.‏
अल्लाहुम्मा ला तजअल लि-फ़ाजिरिन अलय्य यदन वला मिन्नतन
ऐ अल्लाह! किसी बदकार को मुझ पर एहसान रखने वाला न बना और न उसे मुझसे कोई उम्मीद दे
[1] अल-फ़क़ीह, जिल्द 1, सफ़ा 335; बिहारुल अनवार, जिल्द 86, सफ़ा 186

किताब “रबीउल अनाम” से — फ़ज्र की नमाज़ के बाद की मुनाजात:
बिहारुल अनवार में एक लंबी और फ़ज़ीलत वाली दुआ रिवायत की गई है, जिसे हमने किताब “अबवाबुल जिन्नात फ़ी आदाबिल जुमुआत” में भी ज़िक्र किया है। यह एक बहुत ही आला और मुबारक दुआ है, जिसे बराबर पढ़ने का हुक्म दिया गया है, और वह दुआ यह है:
اََللَّهُمَّ وَ کُنْ لِوَلِيِّكَ فِيْ خَلْقِكَ وَ لِيَا وَ حَافِظًا وَ قَائِدًا وَ نَاصِرًا حَتّیٰ تُسْكِنَهُ اَرْضَكَ طَوْعًا وَ تُمَتِّعَهُ مِنْهَا (فِيْهِا) طَوِيْلًا،
وَ تَجْعَلَهُ وَ ذُرِّيَّتَهُ فِيْهِا اْلاَئِمَّةَ الْوَارِثِيْنَ،
وَ اجْمَعْ لَهُ شَمْلَهُ،
وَ اَکْمِلْ لَهُ اَمْرَهُ،
وَ اَصْلِحْ لَهُ رَعِيَّتَهُ،
وَ ثَبِّتْ رُکْنَهُ،
وَ اَفْرِغِ الصَّبْرَ مِنْكَ عَلَيْهِ حَتّیٰ يَنْتَقِمَ،
فِيْشْتَفِيْ وَ يَشْفِيْ حَزَازَاتِ قُلُوْبٍ نَغِلَةٍ وَ حَرَارَاتِ صُدُرٍ وَ غِرَةٍ وَ حَسَرَاتِ اَنْفُسٍ تَرِحَةٍ،
مَنْ دِمَاءٍ مَسْفُوكَةٍ وَ اَرْحَامٍ مَقْطُوْعَةٍ وَ طَاعَةٍ مَجْهُوْلَةٍ،
قَدْ اَحْسَنْتَ اِلَيْهِ الْبَلاَءَ وَ وَ سَّعْتَ عَلَيْهِ اْلآلاَءَ وَ اَتْمَمْتَ عَلَيْهِ النَّعْمَاءَ فِيْ حُسْنِ الْحِفْظِ مِنْكَ لَهُ،
اََللَّهُمَّ اکْفِهِ هَوْلَ عَدُوِّهِ،
وَ اَنْسِهِمْ ذِکْرَهُ،
وَ اَرِدْ مَنْ اَرَادَهُ وَ كِدْ مَنْ كَادَهُ،
وَ امْکُرْ بِمَنْ مَكَرَ بِهِ وَ اجْعَلْ دَائِرَةَ السَّوْءِ عَلَيْهِمْ...
अल्लाहुम्मा व कुं लिवलिय्यिका फ़ी ख़लक़िका व वलिय्यन व हाफ़िज़न व क़ाइदन व नासिरन हत्ता तुस्किनहू अरज़क तौअन व तुमत्तिअहू मिन्हा तवीलन, व तजअलहू व ज़ुर्रिय्यतहू फ़ीहा अल-अइम्मतल वारिसीन, व अज्मअ लहू शम्लहू, व अकमिल लहू अम्रहू, व अस्लिह लहू रइय्यतहू, व थब्बित रुक्नहू, व अफ़रिघिस्सब्र मिनका अलैह हत्ता यंतक़िम, फ़यश्तफ़ी व यश्फ़ी हज़ाज़ाति क़ुलूबिन नग़िलह, व हराराति सुदूर, व हसराति अन्फ़ुस, मिन दिमा-इं मस्फूक़ह, व अरहामिं मक़तूअह, व ताअतिं मजहूलह, क़द अहसन्त इलैहिल बलाअ, व वस्सअत अलैहिल आला, व अतममत अलैहिन निअमा, अल्लाहुम्मकफ़िहि हौल अदुव्विहि, व अन्सिहिम ज़िक्रहू, व अरिद मन अरादहू, व किद मन कादहू, वम्कुर बिमन मकर बही, वजअल दाइरतस्सूइ अलैहिम…
ऐ अल्लाह! तू अपने वली को अपनी मख़लूक़ में रहबर, निगहबान, सरपरस्त और मददगार बना, यहाँ तक कि तू उसे अपनी ज़मीन में ख़ुशी से आबाद कर दे और उसे लम्बी उम्र तक उससे फ़ायदा उठाने दे। तू उसे और उसकी नस्ल को वारिस इमामों में क़ायम कर, उसके बिखरे हुए हालात को इकट्ठा कर, उसके काम को मुकम्मल कर, उसकी रइय्यत को दुरुस्त कर, उसकी बुनियाद मज़बूत कर, और उस पर अपना सब्र नाज़िल कर यहाँ तक कि वह इंतेक़ाम ले और ज़ख़्मी दिलों, जले हुए सीनों और कुचले हुए नफ़्सों को सुकून पहुँचा दे, बहाए गए ख़ून, काटे गए रिश्तों और भुला दी गई इताअत का बदला ले। तूने उस पर इम्तिहान में भी एहसान किया, उस पर नेमतें वसीअ कीं और अपनी हिफ़ाज़त में उस पर नेमत पूरी की। ऐ अल्लाह! तू उसे उसके दुश्मनों की दहशत से बचा, उनसे उसका ज़िक्र भुला दे, जो उसके ख़िलाफ़ इरादा करे उसी को पलटा दे, जो चाल चले उस पर चाल चल, और बुराई का घेरा उन्हीं पर डाल दे।
अंत में यह कहा जाए:
اََللَّهُمََّّ صَلِّ عَلیٰ مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ وَ عَجِّلْ فَرَجَهُمْ.
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व आलि मुहम्मद व अज्जिल फ़रजहुम
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आल-ए-मुहम्मद पर दुरूद नाज़िल फ़रमा और उनकी फ़रज जल्द फ़रमा
अगर मुमकिन हो तो इसे सौ (100) बार पढ़ें। रिवायात की रौशनी में यह पहले बयान किया जा चुका है कि उनका ज़ुहूर अल्लाह के तमाम औलिया के ज़ुहूर के बराबर है।

अक़ीक़ की अंगूठी की फ़ज़ीलत और सुबह व नमाज़ के समय उसे देखने की अहमियत
अड़तीसवाँ: सैय्यद इब्न ताऊस ने इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से रिवायत की है कि जो शख़्स सुबह की शुरुआत दाएँ हाथ में अक़ीक़ की अंगूठी पहन कर करे, और किसी और चीज़ को देखने से पहले अंगूठी के पत्थर को हथेली की तरफ़ मोड़कर उसे देखे, सूरह क़द्र पढ़े और यह ज़िक्र कहे, तो अल्लाह तआला उस दिन उसे आसमान से उतरने वाली, आसमान की तरफ़ चढ़ने वाली, ज़मीन में दाख़िल होने वाली और ज़मीन से निकलने वाली हर चीज़ से महफ़ूज़ रखेगा, और वह शख़्स रात तक अल्लाह की और उसके ख़ास बंदों में से एक बंदे की पनाह में रहेगा:
اٰمَنْتُ بِاللهِ وَحْدَهُ لَا شَرِيْكَ لَهُ وَ كَفَرْتُ بِالْجِبْتِ وَ الطَّاغُوْتِ،وَ اٰمَنْتُ بِسِرِّ اٰلِ مُحَمَّدٍ وَ عَلَانِيَتِهِمْ،وَ ظَاهِرِهِمْ وَ بَاطِنِهِمْ وَ اَوَّلِهِمْ وَ اٰخِرِهِمْ۔
आमन्तु बिल्लाहि वहदहू ला शरीक लहू व कफ़रतु बिल-जिब्त वत्ताग़ूत, व आमन्तु बिसिर्रि आलि मुहम्मद, व अलानियतिहिम, व ज़ाहिरिहिम व बातिनिहिम, व अव्वलिहिम व आख़िरिहिम
मैं अल्लाह पर ईमान लाया, जो अकेला है, जिसका कोई शरीक नहीं, और मैंने झूठे माबूदों और ताग़ूत से इंकार किया। मैं आल-ए-मुहम्मद के राज़ और ज़ाहिर, उनके बाहर और अंदर, उनकी शुरुआत और अंत पर ईमान लाया।

इमाम सादिक़ (अ) की दुआ
इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमाया कि इसे मग़रिब और फ़ज्र के बाद दस (10) बार पढ़ा जाए:
أَسْتَعِيذُ بِاللهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ اكْتُبَا رَحِمَكُمَا اللَّهُ
अस्तईज़ु बिल्लाहि मिनश-शैतानिर-रजीम इक्तुबा रहिमकुमुल्लाह
मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ रद्द किए हुए शैतान से। लिख लो, अल्लाह तुम दोनों पर रहम करे।
फिर यह कहा जाए:

بِسْمِ اللهِ الرّحمنِ الرَّحِيمِ أَمْسَيْتُ وَ أَصْبَحْتُ بِاللَّهِ مُؤْمِناً عَلَى دِينِ مُحَمَّدٍ (صلّى اللهُ عليه وآله) وَ سُنَّتِهِ وَ عَلَى دِينِ عَلِيٍّ (عليه السَّلامُ) وَ سُنَّتِهِ وَ عَلَى دِينِ فَاطِمَةَ (عليها السَّلامُ) وَ سُنَّتِهَا وَ عَلَى دِينِ الْأَوْصِيَاءِ صَلَواتُ اللهِ عَلَيْهِمْ وَسُنَّتِهِمْ
آمَنْتُ بِسِرِّهِمْ وَعَلَانِيَتِهِمْ وَبِغَيْبِهِمْ وَشَهَادَتِهِمْ وَأَسْتَعِيذُ بِاللَّهِ فِي لَيْلَتِي هَذِهِ وَيَوْمِي هَذَا مِمَّا اسْتَعَاذَ مِنْهُ مُحَمَّدٌ وَعَلِيٌّ وَفَاطِمَةُ وَالْأَوْصِيَاءُ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِمْ وَأَرْغَبُ إِلَى اللَّهِ فِيمَا رَغِبُوا فِيهِ وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ.
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। अम्सैतु व अस्बहतु बिल्लाहि मोमिनन अला दीनि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही) व सुन्नतिही व अला दीनि अलीय्यिन (अलैहिस्सलाम) व सुन्नतिही व अला दीनि फ़ातिमह (अलैहस्सलाम) व सुन्नतिहा व अला दीनि अल-अवसियाइ सलवातुल्लाहि अलैहिम व सुन्नतिहिम। आमन्तु बिसिर्रिहिम व अलानियतिहिम व बि-ग़ैबिहिम व शहादतिहिम व अस्तईज़ु बिल्लाहि फ़ी लै्लतिहाज़िही व यौमिहाज़ा मिम्मस्तआज़ा मिन्हु मुहम्मद व अली व फ़ातिमा वल-अवसिया सल्लल्लाहु अलैहिम व अरग़बु इलल्लाहि फ़ीमा रग़िबू फीह व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बहुत मेहरबान, निहायत रहम वाला है। मैंने शाम भी की और सुबह भी की अल्लाह पर ईमान रखते हुए, मुहम्मद ﷺ के दीन और उनकी सुन्नत पर, अली (अ) के दीन और उनकी सुन्नत पर, फ़ातिमा (स) के दीन और उनकी सुन्नत पर, और अवसिया के दीन और उनकी सुन्नत पर। मैं उनके राज़, उनके ज़ाहिर, उनकी ग़ैबत और उनकी हाज़िरी पर ईमान लाया। मैं इस अपनी रात और इस अपने दिन में अल्लाह की पनाह चाहता हूँ उस हर चीज़ से जिससे मुहम्मद, अली, फ़ातिमा और अवसिया ने पनाह चाही। और मैं अल्लाह से वही चाहता हूँ जो उन्होंने चाहा। और अल्लाह के सिवा कोई ताक़त और कोई क़ुव्वत नहीं।


फ़ज्र की नमाज़ के बाद सज्दा-ए-शुक्र
بِسْمِ الله الرَّحْمنِ الرَّحِيمِ
يَا مَاجِدُ يَا جَوَادُ يَا حَيّاً حِينَ لَا حَيَّ
يَا فَرْدُ يَا مُنْفَرِداً بِالْوَحْدَانِيَّةِ يَا مَنْ لَا يَشْتَبِهُ عَلَيْهِ الْأَصْوَاتُ
يَا مَنْ لَا يَخْفَى عَلَيْهِ اللُّغَاتُ يَا مَنْ‏ يَعْلَمُ ما تَحْمِلُ كُلُّ أُنْثى‏ وما تَغِيضُ الْأَرْحامُ وما تَزْدادُ
يَا مَنْ‏ يَعْلَمُ خائِنَةَ الْأَعْيُنِ وما تُخْفِي الصُّدُورُ يَا مَنْ هُوَ أَعْلَمُ بِسَرِيرَتِي مِنِّي بِهَا
يَا مَالِكَ الْأَشْيَاءِ قَبْلَ تَكْوِينِهَا
أَسْأَلُكَ بِاسْمِكَ الْمَكْنُونِ الْمَخْزُونِ الْحَيِّ الْقَيُّومِ الَّذِي هُوَ نُورٌ مِنْ نُورٍ وأَسْأَلُكَ بِنُورِكَ السَّاطِعِ فِي الظُّلُمَاتِ وسُلْطَانِكَ الْغَالِبِ ومُلْكِكَ الْقَاهِرِ لِمَنْ دُونَكَ وبِقُدْرَتِكَ الَّتِي بِهَا تُذِلُّ كُلَّ شَيْ‏ءٍ وبِرَحْمَتِكَ الَّتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْ‏ءٍ
أَسْأَلُكَ أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وأَهْلِ بَيْتِهِ وأَنْ تُعِيذَنِي مِنْ جَمِيعِ مَضَلَّاتِ الْفِتَنِ ومِنْ شَرِّ جَمِيعِ مَا يَخَافُ أَحَدٌ مِنْ خَلْقِكَ إِنَّكَ سَمِيعُ‏ الدُّعَاءِ وأَنْتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ‏.
बिस्मिल्लाहर्रहमानिर्रहीम या माजिद या जव्वाद या हय्यन हीना ला हय्य या फ़र्द या मुनफ़रिदन बिल-वहदानिय्यह या मन ला यश्तबहु अलैहिल अस्वात या मन ला यख़्फ़ा अलैहिल लुग़ात या मन यअलमु मा तह्मिलु कुल्लु उन्सा व मा तग़ीज़ुल अरहाम व मा तज़्दाद या मन यअलमु ख़ाइनतल अय्युन व मा तुख़्फ़िस्सुदूर या मन हुवा अअलमु बि सरीरती मिन्नी बिहा या मालिक अल-अश्याइ क़ब्ल तक्वीनिहा असअलुका बिस्मिक अल-मक्नून अल-मख़ज़ून अल-हय्यिल क़य्यूम अल्लज़ी हुवा नूरुन मिन नूर व असअलुका बिनूरिकल साते फ़िज़्ज़ुलुमात व सुल्तानिकल ग़ालिब व मुल्किकल क़ाहिर लिमन दूनक व बि क़ुदरतिकल लती बिहा तुज़िल्लु कुल्ल शय व बि रहमतिकल लती वसिअत कुल्ल शय असअलुका अन तुसल्लिया अला मुहम्मद व अहलि बैतिही व अन तुईज़नी मिन जमीई मज़ल्लातिल फ़ितन व मिन शर्रि जमीई मा यख़ाफु अहदुन मिन ख़ल्किक इन्नका समीउद्दुआ व अंता अरहमुर्राहिमीन
अल्लाह के नाम से, जो बहुत मेहरबान, निहायत रहम वाला है। ऐ बहुत बुज़ुर्ग, ऐ बहुत देने वाले, ऐ हमेशा ज़िंदा रहने वाले जब कोई ज़िंदा न होगा। ऐ एक, अपनी यकताई में बे-मिसाल, ऐ वह जिन पर आवाज़ें कभी मुश्तबह नहीं होतीं। ऐ वह जिनसे कोई ज़बान छुपी नहीं। ऐ वह जो जानता है हर मादा क्या उठाए हुए है, और रहम क्या घटाते और क्या बढ़ाते हैं। ऐ वह जो जानता है आँखों की चोरी और सीनों के भेद। ऐ वह जो मेरे दिल के राज़ मुझसे भी ज़्यादा जानता है। ऐ हर चीज़ के मालिक उसकी पैदाइश से पहले। मैं तुझसे सवाल करता हूँ तेरे उस नाम के वासिते से जो छुपा हुआ, महफ़ूज़, ज़िंदा और क़ायम रखने वाला है, जो नूर में से नूर है। और मैं तुझसे सवाल करता हूँ तेरे उस चमकते नूर के वासिते से जो अँधेरों में है, तेरी ग़ालिब हुकूमत के वासिते से, तेरी ज़बरदस्त बादशाहत के वासिते से, तेरी उस क़ुदरत के वासिते से जिससे तू हर चीज़ को दबा देता है, और तेरी उस रहमत के वासिते से जो हर चीज़ पर छाई हुई है। मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि तू मुहम्मद और उनके अहले-बैत पर दुरूद भेजे, और मुझे हर गुमराही और हर उस चीज़ के शर से बचाए जिससे तेरी मख़लूक़ में से कोई डरता है। बेशक तू दुआ सुनने वाला है और तू सबसे बढ़कर रहम करने वाला है।
वसीला नफ़िला ऍप्लिकेशन

सह़ीफ़ा अलविया नं. 104 सुबह की नमाज़ के बाद की दुआ
اِلٰہِیْ ہٰذِہٖ صَلَاتِیْ صَلَّیْتُہَا لَا لِحَاجَۃٍ مِنْکَ اِلَیْہَا، وَ لَا رَغْبَۃٍ مِنْکَ فِیْہَا اِلَّا تَعْظِیْمًا وَ طَاعَۃً وَ اِجَابَۃً لَکَ اِلٰی مَا اَمَرْتَنِیْ بِہٖ. اِلٰہِیْ اِنْ کَانَ فِیْہَا خَلَلٌ اَوْ نَقْصٌ مِنْ رُکُوْعِہَا اَوْ سُجُوْدِہَا، فَلَا تُؤَاخِذْنِیْ وَ تَفَضَّلَ عَلَیَّ بِالْقُبُوْلِ وَ الْغُفْرَانِ بِرَحْمَتِکَ یَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِیْنَ.
इलाही हाज़िही सलाती सल्लैतुहा ला लिहाजतिन मिन्का इलैहा व ला रग़बतिन मिन्का फीहा इल्ला तअज़ीमन व ताअतन व इजाबतन लका इला मा अमरतनी बिही। इलाही इन काना फीहा ख़ललुन औ नक़्सुन मिन रुकूइहा औ सुजूदिहा फला तुआख़िज़नी व तफ़ज़्ज़ल अलय्या बिल-क़ुबूल वल-ग़ुफ़रान बि-रहमतिका या अरहमर-राहिमीन।
ऐ मेरे ख़ुदा! यह मेरी वह नमाज़ है जो मैंने अदा की, न इस लिए कि तुझे इसकी कोई ज़रूरत है और न इसलिए कि तू इससे किसी फ़ायदे का इच्छुक है, बल्कि सिर्फ़ तेरी अज़मत के इज़हार के लिए, तेरी इताअत के लिए और तेरे उस हुक्म की तामील के लिए जो तूने मुझे दिया है। ऐ मेरे परवरदिगार! अगर मेरी इस नमाज़ में कोई कमी या कोई ख़लल रह गया हो, चाहे वह रुकू में हो या सज्दे में, तो मुझे उस पर गिरफ़्त में न लेना, बल्कि अपनी रहमत से मुझे इसकी क़बूलियत और मग़फ़िरत अता फ़रमा। ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले!




सूरह तलाक़ – आयत 2 और 3 की तिलावत करें


20. मुसीबतों से हिफ़ाज़त के लिए छः आयतें
इमाम अली (अ.) ने फ़रमाया: “जो शख़्स हर सुबह इन छः आयतों की तिलावत करता है, अल्लाह उसे हर तरह की आफ़त से महफ़ूज़ रखता है, चाहे वह पहले से ही ख़तरे में क्यों न हो।”
बिहारुल अनवार, जिल्द 83, सफ़ा 337
قُل لَّن يُصِيبَنَا إِلَّا مَا كَتَبَ اللَّـهُ لَنَا هُوَ مَوْلَانَا ۚ وَعَلَى اللَّـهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
क़ुल लं युसीबना इल्ला मा क़तबल्लाहु लना हुवा मौलाना व अलल्लाहि फल-यतवक्कलिल-मुमिनून
कह दीजिए: हमें वही पहुँचेगा जो अल्लाह ने हमारे लिए लिखा है। वही हमारा मालिक है और मोमिनों को सिर्फ़ अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।

وَإِن يَمْسَسْكَ اللَّـهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُ إِلَّا هُوَ
व इन यमससकल-लाहु बि-दुर्रिन फला काशिफ़ लहू इल्ला हुवा
और अगर अल्लाह तुम्हें कोई तकलीफ़ पहुँचाए, तो उसके सिवा कोई उसे दूर करने वाला नहीं।

وَمَا مِن دَابَّةٍ فِي الْأَرْضِ إِلَّا عَلَى اللَّـهِ رِزْقُهَا
व मा मिन दाब्बतिन फ़िल-अर्ज़ि इल्ला अलल्लाहि रिज़्क़ुहा
ज़मीन पर चलने वाला कोई भी जानदार ऐसा नहीं जिसका रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे न हो।

وَكَأَيِّن مِّن دَابَّةٍ لَّا تَحْمِلُ رِزْقَهَا اللَّـهُ يَرْزُقُهَا وَإِيَّاكُمْ
व कअय्यिम मिन दाब्बतिन ला तह्मिलु रिज़्क़हा अल्लाहु यरज़ुक़ुहा व इय्याकुम
कितने ही जानदार ऐसे हैं जो अपना रिज़्क़ ख़ुद नहीं उठाते, अल्लाह उन्हें भी रिज़्क़ देता है और तुम्हें भी।

مَّا يَفْتَحِ اللَّـهُ لِلنَّاسِ مِن رَّحْمَةٍ فَلَا مُمْسِكَ لَهَا
मा यफ्तहिल्लाहु लिन्नासि मिर्रहमतिन फला मुम्सिका लहा
अल्लाह जो रहमत लोगों के लिए खोल दे, उसे कोई रोकने वाला नहीं।

قُلْ حَسْبِيَ اللَّـهُ عَلَيْهِ يَتَوَكَّلُ الْمُتَوَكِّلُونَ
क़ुल हस्बियल्लाहु अलैहि यतवक्कलुल मुतवक्किलून
कह दीजिए: मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, और भरोसा करने वाले उसी पर भरोसा करते हैं।

ऊपर की आयतें पढ़ने के बाद यह पढ़ें:
حسْبِیَ اللَّهُ لا إِلهَ إِلَّا هُوَ عَلَیْهِ تَوَکَّلْتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِیمِ
हस्बियल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवा अलैहि तवक्कल्तु वहुवा रब्बुल-अर्शिल-अज़ीम
मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं। मैंने उसी पर भरोसा किया और वही अर्श-ए-अज़ीम का रब है।


21. सूरह तलाक़ (65) की दो आयतें आयत 2 (आख़िरी हिस्सा) और आयत 3 फ़ज्र की नमाज़ के बाद
ये आयतें उस हालात में पढ़ी जाती हैं जहाँ हर रास्ता बंद नज़र आता हो (ख़ास तौर पर माली परेशानियों में)। इसका पस-ए-मंज़र इमाम अली (अ.) से मंसूब एक वाक़िआ है जहाँ एक टूटे हुए मोती ने नेअमत का रूप ले लिया। यह दुआ ख़ास तौर पर आर्थिक मुश्किलात में मुजर्रब है।
وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يَجْعَل لَّهُۥ مَخْرَجًا
व मं यत्तक़िल्लाह यजअल लहू मख़रजा
और जो अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसके लिए निकलने का रास्ता पैदा कर देता है।
وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ ۚ
व यरज़ुक़्हू मिन हैसु ला यहतसिब
और अल्लाह उसे वहाँ से रोज़ी देता है जहाँ से उसे गुमान भी नहीं होता।

وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُۥٓ ۚ
व मन यतवक्कल अलल्लाहि फहुवा हस्बुहू
और जो शख़्स अल्लाह पर भरोसा करता है, तो अल्लाह उसके लिए काफ़ी हो जाता है।

إِنَّ ٱللَّهَ بَـٰلِغُ أَمْرِهِۦ ۚ قَدْ جَعَلَ ٱللَّهُ لِكُلِّ شَىْءٍ قَدْرًا
इन्नल्लाह बालिग़ु अम्रिही क़द जअलल्लाहु लिकुल्लि शैइन् क़द्रा
यक़ीनन अल्लाह अपना हुक्म पूरा करके रहता है। अल्लाह ने हर चीज़ के लिए एक मुक़र्रर मिक़दार तय कर रखी है।