मग़रिब-ईशा ताक़ीबात (दुआएँ)

फ़र्ज़ नमाज़ के बाद पढ़ी जाती है


--नमाज़-ए-मग़रिब के बाद पढ़ी जाने वाली दुआएँ (मिस्बाह अल-मुतहज्जिद से नक़्ल की गई)--
1. तस्बीह-ए-ज़हरा (स.अ.) पढ़ने के बाद दरूद की यह दुआ पढ़ें:
﴿إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلاَئِكَتَهُ يُصَلُّون عَلَىٰ ٱلنَّبِيِّ
इन्नल्लाह व मलाइकतहू युसल्लूना अलन्नबी
यक़ीनन अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर दरूद भेजते हैं।

يَا أَيُّهَا ٱلَّذينَ آمَنُوٱ صَلُّوٱ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوٱ تَسْليماً﴾
या अय्युहल्लज़ीना आमनू सल्लू अलैहि व सल्लिमू तस्लीमा
ऐ ईमान वालो! उन पर दरूद भेजो और पूरी तरह सलाम भेजो।

اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّد ٱلنَّبِيِّ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन नबी
ऐ अल्लाह! नबी मुहम्मद ﷺ पर दरूद भेज,

وَعَلَىٰ ذُرِّيَّتِهِ
व अला ज़ुर्रिय्यतिही
और उनकी औलाद पर,

وَعَلَىٰ أَهلِ بَيْتِهِ
व अला अह्लि बैतिही
और उनके अहले-बैत पर।


2. इमाम मूसा अल-काज़िम (अ.स.) से रिवायत है कि मग़रिब की नमाज़ के बाद, किसी से बात किए बिना, यह दुआ 7 मर्तबा पढ़ें:
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمٰنِ ٱلرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और बहुत रहम करने वाला है।

وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلْعَلِيِّ ٱلْعَظيِمِ
व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम
और अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है और न कोई क़ुव्वत, जो बहुत बुलंद और अज़ीम है।


3. फिर नीचे दी गई तस्बीह को तीन (3) मर्तबा दोहराएँ:
اَلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذي يَفْعَلُ مَا يَشَاءُ
अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी यफ़अलु मा यशा
सारी हम्द अल्लाह के लिए है जो वही करता है जो चाहता है,

وَلاَ يَفْعَلُ مَا يَشَاءُ غَيْرُهُ
व ला यफ़अलु मा यशा ग़ैरुहू
और उसके सिवा कोई भी जो चाहे वैसा करने वाला नहीं।


4. यह दुआ पढ़ें: अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका मुझिबाते

اَللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مُوجِبَاتِ رَحْمَتِكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका मूजिबाते रहमतिका
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी रहमत को वाजिब करने वाली चीज़ें माँगता हूँ,

وَعَزَائِمِ مَغْفِرَتِكَ
व अज़ाइमे मग़फिरतिका
और तेरी माफ़ी के पुख़्ता सबब,

وَٱلنَّجَاةَ مِنَ ٱلنَّارِ
वन्नजात मिन्नन्नार
और आग (जहन्नम) से निजात,

وَمِنْ كُلِّ بِلِيَّةٍ
व मिन कुल्लि बलिय्यतिन
और हर तरह की मुसीबत से बचाव,

وَٱلْفَوْزَ بِٱلْجَنَّةِ
वलफ़ौज़ा बिलजन्नति
और जन्नत की कामयाबी,

وَٱلرِّضْوَانِ في دَارِ ٱلسَّلاَمِ
वर्रिज़वाने फी दारिस्सलाम
और दारुस्सलाम में तेरी रज़ामंदी,

وَجَوَارِ نَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ عَلَيْهِ وَآلِهِ ٱلسَّلاَمُ
व जिवारि नबीय्यिका मुहम्मदिन अलैहि व आलिहिस्सलाम
और तेरे नबी मुहम्मद ﷺ और उनकी आल के क़रीब रहने की नेमत।

اَللَّهُمَّ مَا بِنَا مِنْ نِعْمَةٍ فَمِنْكَ
अल्लाहुम्मा मा बिना मिन नेमतिन फ़मिनका
ऐ अल्लाह! हमारे पास जो भी नेमत है वह तेरी ही तरफ़ से है।

لاَ إِلٰهَ إِلاَّ أَنْتَ
ला इलाहा इल्ला अन्त
तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।

أَسْتَغْفِرُكَ وَ أَتُوبُ إِلَيْكَ
अस्तग़फ़िरुका व अतूबु इलैका
मैं तुझसे मग़फिरत माँगता हूँ और तेरी तरफ़ रुजू करता हूँ।


5. फिर नीचे दी गई तस्बीह “सुब्हानका” पढ़ें:
سُبْحَانَكَ لاَ إِلٰهَ إِلاَّ أَنْتَ
सुब्हानका ला इलाहा इल्ला अन्त
तू पाक है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।

إِغْفِرْ لِي ذُنُوبِي كُلَّهَا جَمِيعاً
इग़्फ़िर ली ज़ुनूबी कुल्लहा जमीअन
मेरे सारे गुनाह एक साथ बख़्श दे,

فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ ٱلذُّنُوبَ كُلَّهَا جَمِيعاً إِلاَّ أَنْتَ
फ़इन्नहू ला यग़्फ़िरुज़्-ज़ुनूबा कुल्लहा जमीअन इल्ला अन्त
क्योंकि तेरे सिवा कोई भी सारे गुनाह एक साथ माफ़ नहीं कर सकता।


सूरह वाक़िआ पढ़ें






सूरज डूबने की दुआएँ पढ़ें



मग़रिब से पहले, अज़ान और इक़ामत के दरमियान, यह दुआ पढ़ें

اللَّهُمَّ إِنِّي اسْالُكَ بِإِقْبَالِ لَيْلِكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बि इक़बाले लैलेक
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी रात के आने के वसीले से सवाल करता हूँ,

وَإِدْبَارِ نَهَارِكَ
व इदबारे नहारिक
और तेरे दिन के ढल जाने के वसीले से,

وَحُضُورِ صَلَوَاتِكَ
व हुदूरे सलावातिक
और तेरी नमाज़ों की हाज़िरी के वसीले से,

وَاصْوَاتِ دُعَاتِكَ
व अस्वाते दुआतिक
और तुझे पुकारने वालों की आवाज़ों के वसीले से,

وَتَسْبِيحِ مَلاَئِكَتِكَ
व तस्बीहे मलाइकतिक
और तेरे फ़रिश्तों की तस्बीह के वसीले से,

انْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिन व आलि मुहम्मद
कि तू मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर दरूद भेजे,

وَانْ تَتُوْبَ عَلَيَّ
व अन ततूबा अलैय्य
और मेरी तौबा क़बूल फ़रमा,

إِنَّكَ انْتَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
इन्नका अन्तत्तव्वाबुर्रह़ीम
बेशक तू बहुत तौबा क़बूल करने वाला, बेहद रहम करने वाला है।


6. इमाम अली (अ.स.) से रिवायत है कि जो शख़्स क़ुरआन की सूरह रूम (30:17–18) की यह आयतें मग़रिब की नमाज़ के वक़्त तीन (3) मर्तबा पढ़े, उसे कोई नुक़सान नहीं पहुँचेगा और वह अगली सुबह तक क़ुदरती आफ़ात से महफ़ूज़ रहेगा:
فَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ حِينَ تُمْسُونَ وَحِينَ تُصْبِحُونَ
फ़सुब्हानल्लाहि हीना तुम्सूना व हीना तुस्बिहून
तो अल्लाह की पाकी बयान करो जब तुम शाम में दाख़िल होते हो और जब सुबह करते हो।

وَلَهُ ٱلْحَمْدُ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَعَشِيًّا وَحِينَ تُظْهِرُونَ
व लहुल हम्दु फ़िस्समावाति वल अरज़ि व अशिय्यन व हीना तुज़्हिरून
और उसी के लिए हम्द है आसमानों में और ज़मीन में, और शाम के वक़्त भी और दोपहर के वक़्त भी।


7. यह पढ़ें : अल्लाहुम्मा अजिरना मिनन्नार
اَللّٰهُمَّ أَجِرْنَا مِنَ النَّارِ سَالِمِیْنَ وَ أَدْخِلْنَا الْجَنَّةَبِسَلَامٍ آمِنِيْنَ وَ تَوَفَّنا مُسْلِمِيْنَ‏ وَ أَلْحِقْنَا بِالصَّالِحِيْنَ‏بِفَضْلِکَ وَرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ.
अल्लाहुम्मा अजिरना मिनन्नारि सालिमीन व अदख़िल्नल जन्नता बिसलामिन आमिनीन व तवफ़्फ़ना मुस्लिमीन व अल्हिक़ना बिस्सालिहीन बिफ़ज़्लिका व रहमतिका या अरहमर्राहिमीन
ऐ अल्लाह! हमें जहन्नम की आग से सलामती के साथ बचा ले, हमें अमन और सलामती के साथ जन्नत में दाख़िल फ़रमा, हमें मुसलमान की हालत में मौत अता कर, और अपनी फ़ज़्ल व रहमत से हमें नेक लोगों में शामिल फ़रमा, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।


8. फिर यह दुआ पढ़ें “अल्लाहुम्मा मुक़ल्लिबल क़ुलूब”

اَللّٰهُمَّ مُقَلِّبَ‏ الْقُلُوْبِ‏ وَ الْأَبْصَارِ ثَبِّتْ قَلْبِي عَلىٰ دِيْنِكَ
अल्लाहुम्मा मुक़ल्लिबल क़ुलूबि वल अब्सार थब्बित क़ल्बी अला दीनिक
ऐ अल्लाह! दिलों और नज़रों को फेरने वाले, मेरे दिल को अपने दीन पर क़ायम रख।

وَ لَا تُزِغْ قَلْبِي بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنِي وَ هَبْ لِي‏ مِنْ لَّدُنْكَ رَحْمَةً إِنَّكَ أَنْتَ الْوَهَّابُ‏
व ला तुज़िग़ क़ल्बी बादा इज़ हदैतनी व हब ली मिल्लदुनका रह्मत इन्नका अन्तल वह्हाब
और हिदायत देने के बाद मेरे दिल को टेढ़ा न कर, और अपनी तरफ़ से मुझे रहमत अता फ़रमा, बेशक तू बहुत देने वाला है।

وَ أَجِرْنِي مِنَ النَّارِ بِرَحْمَتِكَ
व अजिरनी मिनन्नारि बिरहमतिका
और अपनी रहमत से मुझे आग से बचा ले।

اَللّٰہُمَّ امْدُدْ لِيْ فِيْ عُمُرِي وَ اَوْسِعْ عَلیَّ فِیْ رِزْقِیْ وَانْشُرْ عَلَيَّ رَحْمَتَكَ
अल्लाहुम्मम्दुद ली फ़ी उम्री व औसिअ अलैय्या फ़ी रिज़्क़ी वन्शुर अलैय्या रह्मतका
ऐ अल्लाह! मेरी उम्र में बढ़ोतरी फ़रमा, मेरे रिज़्क़ में कुशादगी अता कर, और मुझ पर अपनी रहमत फैला दे।

وَ إِنْ كُنْتُ عِنْدَكَ فِي أُمِّ الْكِتَابِ شَقِيًّا فَاجْعَلْنِي سَعِيْدًا
व इन कुंतु इंदका फ़ी उम्मिल किताबि शक़िय्यन फ़ज्अलनी सईदन
और अगर तेरे इल्म में मैं बदनसीब लिखा गया हूँ, तो मुझे ख़ुशनसीब बना दे।

فَإِنَّكَ تَمْحُوْ مَا تَشَاءُ وَ تُثْبِتُ وَ عِنْدَكَ أُمُّ الْكِتَاب‏ِ.
फ़इन्नका तम्हू मा तशाऊ व तुथ्बितु व इंदका उम्मुल किताब
बेशक तू जो चाहे मिटा देता है और जो चाहे बाक़ी रखता है, और असल किताब तेरे ही पास है।


9. “ला इलाहा इल्लल्लाह” 100 मर्तबा या 10 मर्तबा पढ़ें
i. आप गुनाहों की आज़माइशों से महफ़ूज़ रहेंगे। ii. अल्लाह आपसे राज़ी होगा। iii. क़ब्र की मुश्किलों से आपको अमन मिलेगा।

10. इमाम जाफ़र अल-सादिक़ (अ.स.) से रिवायत है कि जो शख़्स दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई चाहता हो, और जिसे आँखों में दर्द हो, वह फज्र और सूरज डूबने के बाद यह दुआ पढ़े:

اَللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِحَقِّ مُحَمَّد وَآلِ مُحَمَّد عَلَيْكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बिहक्क़ि मुहम्मद व आलि मुहम्मद अलैका
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मुहम्मद ﷺ और उनकी आल के उस हक़ के वसीले से सवाल करता हूँ जो तुझ पर है,

صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّد وَآلِ مُحَمَّد
सल्लि अला मुहम्मदिव्व आलि मुहम्मद
कि तू मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर दरूद भेजे,

وَٱجْعَلِ ٱلنُّورَ فِي بَصَرِي
वज्अलिन्नूर फ़ी बसरी
और मेरी नज़र में नूर अता कर,

وَٱلْبَصِيـرَةَ فِي دِينِي
वलबसीरता फ़ी दीनी
और मेरे दीन में समझ और बसीरत अता कर,

وَٱلْيَقِيـنَ فِي قَلْبِي
वलयक़ीना फ़ी क़ल्बी
और मेरे दिल में यक़ीन पैदा कर,

وَٱلإِخْلاَصَ فِي عَمَلِي
वलइख़लासा फ़ी अमली
और मेरे अमल में इख़लास अता कर,

وَٱلسَّلاَمَةَ فِي نَفْسِي
वस्सलामता फ़ी नफ़्सी
और मेरी जान को सलामती अता कर,

وَٱلسَّعَةَ فِي رِزْقِي
वस्सअता फ़ी रिज़्क़ी
और मेरे रिज़्क़ में कुशादगी अता कर,

وَٱلشُّكْرَ لَكَ أَبَداً مَا أَبْقَيْتَنِي
वश्शुक्र लका अबदन मा अब्क़ैतनी
और जब तक तू मुझे ज़िंदा रखे, तेरा हमेशा शुक्र अदा करने वाला बना।

11. नीचे दी गई दुआएँ (a–f) नफ़िला ऐप से ली गई हैं –
नोट: नीचे दी गई दुआओं का उर्दू अर्थ और देवनागरी उच्चारण ChatGPT की मदद से किया गया है (गलती की गुंजाइश मौजूद है)


a. इमाम सादिक़ (अ.स.) की दुआ — मग़रिब के बाद 10 मर्तबा पढ़ें
أَسْتَعِيذُ بِاللهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ اكْتُبَا رَحِمَكُمَا اللَّهُ
अल्लाह की पनाह चाहता हूँ रद्द किए हुए शैतान से। ऐ अल्लाह! मुझे उन लोगों में लिख दे जिन पर तूने रहमत फ़रमाई है। फिर यह पढ़ें

بِسْمِ اللهِ الرّحمنِ الرَّحِيمِ أَمْسَيْتُ وَ أَصْبَحْتُ بِاللَّهِ مُؤْمِناً عَلَى دِينِ مُحَمَّدٍ (صلّى اللهُ عليه وآله) وَ سُنَّتِهِ وَ عَلَى دِينِ عَلِيٍّ (عليه السَّلامُ) وَ سُنَّتِهِ وَ عَلَى دِينِ فَاطِمَةَ (عليها السَّلامُ)
وَ سُنَّتِهَا وَ عَلَى دِينِ الْأَوْصِيَاءِ صَلَواتُ اللهِ عَلَيْهِمْ وَسُنَّتِهِمْ
آمَنْتُ بِسِرِّهِمْ وَعَلَانِيَتِهِمْ وَبِغَيْبِهِمْ وَشَهَادَتِهِمْ
وَأَسْتَعِيذُ بِاللَّهِ فِي لَيْلَتِي
هَذِهِ وَيَوْمِي هَذَا مِمَّا اسْتَعَاذَ مِنْهُ مُحَمَّدٌ وَعَلِيٌّ وَفَاطِمَةُ وَالْأَوْصِيَاءُ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِمْ
وَأَرْغَبُ إِلَى اللَّهِ فِيمَا رَغِبُوا فِيهِ وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ.
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अम्सैतु व अस्बहतु बिल्लाहि मोमिनन अला दीनि मुहम्मद ﷺ व सुन्नतिही व अला दीनि अली अलैहिस्सलाम व सुन्नतिही व अला दीनि फ़ातिमा अलैहस्सलाम व सुन्नतिहा व अला दीनि औसिया अलैहिमुस्सलाम आमन्तु बिसिर्रिहिम व अलानियतिहिम व बिघैबिहिम व शहादतिहिम व अस्तईज़ु बिल्लाहि फ़ी लै़लती हाज़िही व यौमी हाज़ा मिम्मा स्तआज़ा मिन्हु मुहम्मद व अली व फ़ातिमा वल औसिया व अरग़बु इलल्लाहि फीमा रग़िबू फ़ीहि व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह
अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है। मैं अल्लाह पर ईमान लाया, मुहम्मद ﷺ के दीन और उनकी सुन्नत पर, अली और फ़ातिमा (अ.स.) के दीन और उनकी सुन्नत पर, और औलिया-ए-ख़ुदा के दीन और उनकी सुन्नत पर। मैं उनके छुपे और ज़ाहिर हालात पर, और उनके ग़ैब व शहादत पर ईमान रखता हूँ। और मैं इस रात और इस दिन में अल्लाह की पनाह चाहता हूँ उन चीज़ों से जिनसे मुहम्मद, अली, फ़ातिमा और औलिया ने पनाह चाही। और मैं अल्लाह से वही चाहता हूँ जो उन्होंने चाहा, और ताक़त और क़ुदरत सिर्फ़ अल्लाह ही की है।


b. इमाम अली (अ.स.) की दुआ — मग़रिब के बाद

بِسْمِ الله الرَّحْمنِ الرَّحِيمِ
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي يُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَيُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ
الْحَمْدُ لِلَّهِ كُلَّمَا وَقَبَ لَيْلٌ وَغَسَقَ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ كُلَّمَا لَاحَ نَجْمٌ وَخَفَقَ.
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी यूलिजुल्लैला फ़िन्नहारी व यूलिजुन्नहारा फ़िल्लैल अलहम्दु लिल्लाहि कुल्लमा वक़बा लै़लुन व ग़सक़ व अलहम्दु लिल्लाहि कुल्लमा लाहा नज्मुन व ख़फ़क़
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है। तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जो रात को दिन में दाख़िल करता है और दिन को रात में दाख़िल करता है। और हर उस वक़्त अल्लाह की हम्द है जब रात छा जाती है और अंधेरा फैलता है, और हर उस वक़्त जब सितारे चमकते और झिलमिलाते हैं।


c. वही दुआ जो ऊपर नंबर 10 में है

d. चोरी से हिफ़ाज़त की दुआ

بِسْمِ الله الرَّحْمنِ الرَّحِيمِ
أَعُوذُ بِعِزَّةِ اللَّهِ وَأَعُوذُ بِقُدْرَةِ اللَّهِ وَأَعُوذُ بِمَغْفِرَةِ اللَّهِ وَأَعُوذُ بِرَحْمَةِ اللَّهِ وَأَعُوذُ بِسُلْطَانِ اللَّهِ الَّذِي هُوَ عَلَى كُلِّ شَيْ‏ءٍ قَدِيرٌ
وَأَعُوذُ بِكَرَمِ اللَّهِ وَأَعُوذُ بِجَمْعِ اللَّهِ مِنْ شَرِّ كُلِّ جَبَّارٍ عَنِيدٍ وَشَيْطَانٍ مَرِيدٍ
وَكُلِّ مُغْتَالٍ وَسَارِقٍ وَعَارِضٍ وَمِنْ شَرِّ السَّامَّةِ وَالْهَامَّةِ والْعَامَّةِ
وَمِنْ شَرِّ كُلِّ دَابَّةٍ صَغِيرَةٍ أَوْ كَبِيرَةٍ بِلَيْلٍ أَوْ نَهَارٍ
وَمِنْ شَرِّ فُسَّاقِ الْعَرَبِ وَالْعَجَمِ وَ فُجَّارِهِمْ
وَمِنْ شَرِّ فَسَقَةِ الْجِنِّ وَالْإِنْسِ
وَمِنْ شَرِّ كُلِّ دَابَّةٍ رَبِّي آخِذٌ بِنَاصِيَتِهَا إِنَّ رَبِّي عَلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ.
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम आऊज़ु बि-इज़्ज़तिल्लाहि वा आऊज़ु बि-क़ुदरतिल्लाहि वा आऊज़ु बि-मग़फ़िरतिल्लाहि वा आऊज़ु बि-रहमतिल्लाहि वा आऊज़ु बि-सुल्तानिल्लाहि अल्लज़ी हुआ ‘अला कुल्लि शैइ़न क़दीर वा आऊज़ु बि-करमिल्लाहि वा आऊज़ु बि-जमीइ़िल्लाहि मिन शर्रि कुल्लि जब्बारिन अनीद वा शैतानिन मरीद वा कुल्लि मुग़्तालिन वा सारिक़िन वा ‘आरिद़िन वा मिन शर्रिस्साम्माति वल-हमामाति वल-‘अमामाति वा मिन शर्रि कुल्लि दाब्बतिन सग़ीरतिन औ कबीरतिन बिल्लैलि औ नहार वा मिन शर्रि फ़ुस्साक़िल-‘अरबि वल-‘अजमि वा फ़ुज्जारिहिम वा मिन शर्रि फ़सक़तिल-जिन्नि वल-इन्स वा मिन शर्रि कुल्लि दाब्बतिन रब्बी आख़िज़ुन बिनासियतिहा इन्ना रब्बी ‘अला सिरातिन मुस्तक़ीम
अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम करने वाला है। मैं अल्लाह की इज़्ज़त, उसकी क़ुदरत, उसकी मग़फ़िरत, उसकी रहमत और उसकी बादशाहत की पनाह चाहता हूँ, जो हर चीज़ पर क़ादिर है। मैं अल्लाह के करम और उसकी पनाह में आता हूँ, हर ज़ालिम और सरकश जब्बार के शर से, और बहकाने वाले शैतान के शर से। हर क़ातिल, चोर और लुटेरे के शर से, और बिच्छुओं, साँपों और हर ज़हरीले जानवर के शर से, रात हो या दिन, छोटा हो या बड़ा। फ़ासिक़ अरबों और अजमियों के शर से, और उनकी बदकारियों से। गुनहगार जिन्नों और इंसानों के शर से। हर उस मख़लूक़ के शर से जिसकी पेशानी मेरे रब के क़ब्ज़े में है। बेशक मेरा रब सीधे रास्ते पर है।

अबू जाफ़र या अबू अब्दुल्लाह (अलैहिमुस्सलाम) से रिवायत है: जो शख़्स इन कलिमात को हर रात पढ़े और इस दुआ को अपनाए, वह रात और दिन क़ातिल के क़त्ल और चोर की चोरी से महफ़ूज़ रहता है। नमाज़-ए-इशा के बाद यह दुआ पढ़े।
e.इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) से मंसूब दुआ
بِسْمِ الله الرَّحْمنِ الرَّحِيمِ
أُعِيذُ نَفْسِي وَذُرِّيَّتِي وَأَهْلَ بَيْتِي
وَمَالِي بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ
وَهَامَّةٍ وَمِنْ كُلِّ عَيْنٍ لَامَّةٍ وهي العوذة الَّتِي عَوَّذَ بِهَا جَبْرَائِيلُ الْحَسَنَ وَالْحُسَيْنَ (عليهما السَّلامُ).
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम उईज़ु नफ़्सी वा ज़ुर्रिय्यती वा अह्ला बैती वा माली बि-कलीमातिल्लाहित्ताम्माति मिन कुल्लि शैतानिन वा हाम्मतिन वा मिन कुल्लि ‘ऐनिन लाम्मतिन वहिया अल-‘औज़तु अल्लती ‘औव्वज़ा बिहा जिब्राईलु अल-हसन वल-हुसैन (अलैहिमस्सलाम)
अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम करने वाला है। मैं अपनी जान, अपनी औलाद, अपने अहले-बैत और अपने माल को अल्लाह के मुकम्मल कलिमात के ज़रिये हर शैतान, हर नुक़सान पहुँचाने वाली चीज़ और बुरी नज़र से पनाह में देता हूँ।

यही वह दुआ है जिससे जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) ने हसन और हुसैन (अलैहिमस्सलाम) को पनाह दी थी। अबू अब्दुल्लाह (अलैहिस्सलाम) से रिवायत है: इस दुआ के ज़रिये अपने माल और अपने घरवालों की हिफ़ाज़त करो, और इसे आख़िरी रात की नमाज़ के बाद पढ़ो।
f.मग़रिब की नफ़्ल नमाज़ के बाद – इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) से मंसूब
يَا شَدِيدَ الْمَحَالِ يَا عَزِيزاً ذَلَّلْتَ بِعِزَّتِكَ جَمِيعَ مَا خَلَقْتَ اكْفِنِي شَرَّ (فُلانٍ بِمَا شِئْتَ).
या शदीदुल-महाल या अज़ीज़न ज़ल्लल्ता बि-इज़्ज़तिका जमीअ मा ख़लक़्ता इक्फ़िनी शर्र (फ़ुलानिन) बिमा शिअ्ता
ऐ वह ज़ात जो सख़्त पकड़ रखने वाला है। ऐ ग़ालिब और ताक़तवर, तूने अपनी इज़्ज़त से हर मख़लूक़ को अपने क़ाबू में कर रखा है। जिससे तू चाहे, उसके शर से मुझे काफ़ी कर दे।






12.सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की मग़रिब की नमाज़ के बाद की दुआ — सह़ीफ़ा फ़ातिमिया से


اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ لَا يَبْلُغُ مَدْحَتَهُ الْقَائِلُوْنَ، وَ الْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ لَا يُحْصِيْ نَعْمَاءَهُ الْعَادُّوْنَ، وَ الْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ لَا يُؤَدِّيْ حَقَّهُ الْمُجْتَهِدُوْنَ، وَ لَا اِلٰهَ اِلَّا اللهُ الْاَوَّلُ وَ الْاٰخِرُ، وَ لَا اِلٰهَ اِلَّا اللهُ الظَّاهِرُ وَ الْبَاطِنُ، وَ لَا اِلٰهَ اِلَّا اللهُ الْمُحْيِيْ الْمُمِيْتُ، وَ اللهُ اَكْبَرُ ذُوْ الطَّوْلِ وَ اللهُ اَكْبَرُ ذُوْ الْبَقَاءِ الدَّائِمِ.
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी ला यब्लुग़ु मद्हतहुल क़ाइलून, वल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी ला युह्सी नेअमाअहुल आद्दून, वल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी ला युअद्दी हक़्क़हुल मुज्तहिदून, व ला इलाहा इल्लल्लाहुल अव्वलु वल आख़िर, व ला इलाहा इल्लल्लाहुज़ ज़ाहिरु वल बातिन, व ला इलाहा इल्लल्लाहुल मुह्यी वल मुमीत, वल्लाहु अकबरु ज़ुत्तौल, वल्लाहु अकबरु ज़ुल बक़ा-इद दाइम।
तमाम तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है, जिसकी तारीफ़ बयान करने वाले बयान नहीं कर सकते। और तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिए है जिसकी नेमतों को गिनने वाले गिन नहीं सकते। और तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिए है जिसका हक़ अदा करने वाले अदा नहीं कर सकते। उसके सिवा कोई माबूद नहीं, वही अव्वल है और वही आख़िर है। वही ज़ाहिर है और वही बातिन है। वही ज़िंदगी देने वाला और मौत देने वाला है। और अल्लाह सबसे बड़ा है, हमेशा बाक़ी रहने वाला।

وَ الْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ لَا يُدْرِكُ الْعَالِمُوْنَ عِلْمَهٗ، وَ لَا يَسْتَخِفُّ الْجَاهِلُوْنَ حِلْمَهٗ، وَ لَا يَبْلُغُ الْمَادِحُوْنَ مِدْحَتَهٗ، وَ لَا يَصِفُ الْوَاصِفُوْنَ صِفَتَهٗ وَ لَا يُحْسِنُ الْخَلْقُ نَعْتَهٗ.
वल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी ला युदरिकुल आलिमून इल्महू, व ला यस्तख़िफ़्फुल जाहिलून हिल्महू, व ला यब्लुग़ुल मादिहून मद्हतहू, व ला यसिफ़ुल वासिफ़ून सिफ़तहू, व ला युह्सिनुल ख़ल्क़ु नअतहू।
और तमाम तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है जिसके इल्म तक आलिम भी नहीं पहुँच सकते, और जिसकी हिल्म को जाहिल हल्का नहीं समझ सकते, और जिसकी तारीफ़ करने वाले उसकी इंतिहा तक नहीं पहुँच सकते, और बयान करने वाले उसकी सिफ़त बयान नहीं कर सकते, और तमाम मख़लूक़ मिलकर भी उसका पूरा वस्फ़ नहीं कर सकती।

وَ الْحَمْدُ لِلهِ ذِيْ الْمُلْكِ وَ الْمَلَكُوْتِ، وَ الْعَظَمَةِ وَ الْجَبَرُوْتِ (وَ الْعِزِّ) وَ الْكِبْرِيَاءِ، وَ الْبَهَاءِ وَ الْجَلَالِ، وَ الْمَهَابَةِ وَ الْجَمَالِ، وَ الْعِزَّةِ وَ الْقُدْرَةِ وَ الْحَوْلِ وَ الْقُوَّةِ، وَ الْمِنَّةِ وَ الْغَلَبَةِ، وَ الْفَضْلِ وَ الطَّوْلِ، وَ الْعَدْلِ وَ الْحَقِّ وَ الْخَلْقِ وَ الْعَلَاءِ، وَ الرِّفْعَةِ وَ الْمَجْدِ، وَ الْفَضِيْلَةِ وَ الْحِكْمَةِ وَ الْغِنَاءِ وَ السَّعَةِ وَ الْبَسْطِ وَ الْقَبْضِ، وَ الْحِلْمِ وَ الْعِلْمِ، وَ الْحُجَّةِ الْبَالِغَةِ وَ النِّعْمَةِ السَّابِغَةِ وَ الثَّنَاءِ الْحَسَنِ الْجَمِيْلِ وَ الْاٰلَاءِ الْكَرِيْمَةِ، مَلِكِ الدُّنْيَا وَ الْاٰخِرَةِ وَ الْجَنَّةِ وَ الْنَّارِ، وَ مَا فِيْهِنَّ تَبَارَكَ (اللهُ) وَ تَعَالٰى.
वल्हम्दु लिल्लाहि ज़िल मुल्कि वल मलाकूत, वल अज़मत वल जबरूत (वल इज़्ज़) वल किब्रियाई, वल बहा वल जलाल, वल महाबत वल जमाल, वल इज़्ज़त वल क़ुदरत वल हौल वल क़ुव्वत, वल मिन्नत वल ग़लबत, वल फ़ज़्ल वत्तौल, वल अद्ल वल हक़ वल ख़ल्क़ वल अला, वर्रिफ़अत वल मज्द, वल फ़ज़ीलत वल हिकमत, वल ग़िना वस्सअत वल बस्त वल क़ब्ज़, वल हिल्म वल इल्म, वल हुज्जतिल बालिग़त वन्नेअमतिस साबिग़त, वस्सनाइल हसनिल जमीले वल आलाइल करीमे, मलिकिद्दुन्या वल आख़िरत वल जन्नत वन्नार।
और तमाम तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है जो मुल्क और बादशाहत का मालिक है, अज़मत और जबरूत का मालिक है, इज़्ज़त, किब्रियाई, जलाल और जमाल का मालिक है, क़ुदरत, ताक़त और क़ुव्वत का मालिक है, फ़ज़्ल, इनाम, इंसाफ़ और हक़ का मालिक है, दुनिया और आख़िरत, जन्नत और जहन्नम का बादशाह है, और वही सबसे बुलंद और बरकत वाला है।

اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ عَلِمَ اَسْرَارَ الْغُيُوْبِ، وَ اطَّلَعَ عَلٰى مَا تَجِنُّ الْقُلُوْبُ فَلَيْسَ عَنْهُ مَذْهَبٌ وَ لَا مَهْرَبٌ، وَ الْحَمْدُ لِلهِ الْمُتَكَبِّرِ فِيْ سُلْطَانِهِ الْعَزِيْزِ فِيْ مَكَانِهِ، الْمُتَجَبِّرِ فِيْ مُلْكِهِ، الْقَوِيِّ فِيْ بَطْشِهِ، الرَّفِيْعِ فَوْقَ عَرْشِهِ، الْمُطَّلِعِ عَلٰى خَلْقِهٖ، وَ الْبَالِغِ لِمَا اَرَادَ مِنْ عِلْمِهٖ.
अल-हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अलिमा असरारल-ग़ुयूब, वत्तलाʿ अला मा तजिन्नुल-क़ुलूब, फ़लैसा अन्हु मज़हबुन व ला महरब, वल-हम्दु लिल्लाहिल-मुतकब्बिरि फी सुल्तानिहिल-अज़ीज़ि फी मकानिहि, अल-मुतजब्बिरि फी मुल्किहि, अल-क़विय्यि फी बत्शिहि, अर-रफ़ीʿ फ़ौक़ा अर्शिहि, अल-मुत्तलिʿ अला ख़ल्क़िहि, वल-बालिग़ि लिमा अरादा मिन ʿइल्मिहि।
तमाम तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है, जो ग़ैब के तमाम राज़ जानता है, और दिलों के छुपे हुए हालात से वाक़िफ़ है, उससे बच निकलने की न कोई राह है और न कोई पनाह। और तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिए है जो अपनी बादशाहत में बड़ा और अपने मक़ाम में अज़ीज़ है, जो अपने मुल्क में ग़ालिब और अपनी गिरफ़्त में ताक़तवर है, जो अपने अर्श के ऊपर बुलंद है, जो अपनी मख़लूक़ के हालात को जानने वाला है, और अपने इल्म से जो चाहे उसे पूरा करने वाला है।

اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ بِكَلِمَاتِهٖ قَامَتِ السَّمَاوَاتُ الشِّدَادُ، وَ ثَبَتَتِ الْاَرَضُوْنَ الْمِهَادُ، وَ انْتَصَبَتِ الْجِبَالُ الرَّوَاسِيْ الْاَوْتَادُ، وَ جَرَتِ الرِّيَاحُ اللَّوَاقِحُ، وَ سَارَ فِيْ جَوِّ السَّمَاءِ السَّحَابُ، وَ وَقَفَتْ عَلٰى حُدُوْدِهَا الْبِحَارُ، وَ وَجِلَتِ الْقُلُوْبُ مِنْ مَخَافَتِهٖ، وَ انْقَمَعَتِ الْاَرْبَابُ لِرُبُوْبِيَّتِهٖ تَبَارَكْتَ يَا مُحْصِيْ قَطْرِ الْمَطَرِ، وَ وَرَقِ الشَّجَرِ، وَ مُحْيِيْ اَجْسَادِ الْمَوْتٰى لِلْحَشْرِ.
अल-हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी बि-कलिमातिहि क़ामतिस-समावातुश-शिदाद, व सबततिल-अरज़ूनल-मिहाद, वन्तसबतिल-जिबालुर-रवासिल-अव्ताद, व जरतिर-रियाहुल-लवाक़िह, व सारा फी जव्विस-समा-इस-सहाब, व वक़फ़त अला हुदूदिहल-बिहार, व वजिलतिल-क़ुलूबु मिन मख़ाफ़तिहि, वन-क़मअतिल-अरबाबु लि-रुबूबिय्यतिहि, तबारकता या मुह्सी क़त्रिल-मतर, व वरक़िश-शजर, व मुह्यी अजसादिल-मव्ता लिल-हश्र।
तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिए है जिसके कलिमात से मज़बूत आसमान क़ायम हुए, और ज़मीनें जमाई गईं, और पहाड़ मज़बूत खूंटों की तरह गाड़े गए। उसी के हुक्म से हवाएँ चलती हैं, आसमान में बादल चलते हैं, और समुंदर अपनी हदों पर रुके हुए हैं। दिल उसके ख़ौफ़ से कांप उठते हैं, और सारे सरदार उसकी रबूबियत के सामने दब जाते हैं। तू बरकत वाला है ऐ बारिश की बूँदों को गिनने वाले, दरख़्तों के पत्तों को जानने वाले, और क़यामत के दिन मुर्दों को ज़िंदा करने वाले।

سُبْحَانَكَ يَا ذَا الْجَلَالِ وَ الْاِكْرَامِ، مَا فَعَلْتَ بِالْغَرِيْبِ الْفَقِيْرِ اِذَا اَتَاكَ مُسْتَجِيْرًا مُسْتَغِيْثًا؟ مَا فَعَلْتَ بِمَنْ اَنَاخَ بِفِنَائِكَ وَ تَعَرَّضَ لِرِضَاكَ وَ غَدَا اِلَيْكَ، فَجَثَا بَيْنَ يَدَيْكَ، يَشْكُوْ اِلَيْكَ مَا لَا يَخْفٰى عَلَيْكَ؟ فَلَا يَكُوْنَنَّ يَا رَبِّ حَظِّيْ مِنْ دُعَائِيْ الْحِرْمَانُ، وَ لَا نَصِيْبِيْ مِمَّا اَرْجُوْ مِنْكَ الْخِذْلَانُ.
सुब्हानक या ज़ल-जलालि वल-इकराम, मा फ़अल्ता बिल-ग़रीबिल-फ़क़ीरि इज़ा अताका मुस्तजीरन मुस्तग़ीसन? मा फ़अल्ता बिमन अनाख़ा बि-फ़िनाइका व तअऱ्रज़ा लि-रज़ाका व ग़दा इलैका, फ़जसा बैन यदैका, यश्कू इलैका मा ला यख़फ़ा अलैका? फ़ला यकूनन्ना या रब्बि हज़्ज़ी मिन दुआइयल-हिरमान, व ला नसीबी मिम्मा अर्जू मिंक अल-ख़िज़लान।
पाक है तू, ऐ जलाल और करम वाले! तू उस ग़रीब और मजबूर के साथ क्या सुलूक करता है जब वह तेरी पनाह माँगने और फ़रियाद करने आता है? और उसका क्या हाल होता है जो तेरे आँगन में आकर ठहर जाता है, तेरी रज़ा का तलबगार बनता है, तेरे सामने झुक जाता है और तुझसे वह सब अर्ज़ करता है जो तुझसे छुपा हुआ नहीं है। ऐ मेरे रब! मेरी दुआ का हिस्सा महरूमी न हो, और मेरी उम्मीदों का नतीजा मायूसी न बने।

يَا مَنْ لَمْ يَزَلْ وَ لَا يَزُوْلُ كَمَا لَمْ يَزَلْ قَائِمًا عَلٰى كُلِّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ
या मन् लम् यज़ल् वला यज़ूलु कमा लम् यज़ल् क़ाइमन् अला कुल्लि नफ़्सिन् बिमा क़सबत
ऐ वह ज़ात जो हमेशा से है और कभी ज़ाइल नहीं होती, जैसे वह हमेशा से हर जान पर उसके किए हुए आमाल की निगरानी करने वाली है।

يَا مَنْ جَعَلَ اَيَّامَ الدُّنْيَا تَزُوْلُ، وَ شُهُوْرَهَا تَحُوْلُ، وَ سِنِيَّهَا تَدُوْرُ.
या मन् जअल अय्यामद-दुन्या तज़ूलु व शुहूरहा तहूलु व सिनीयहा तदूरु
ऐ वह जिसने दुनिया के दिनों को ख़त्म होने वाला बनाया, उसके महीनों को बदलने वाला और उसके सालों को घूमने वाला क़रार दिया।

وَ اَنْتَ الدَّائِمُ لَا تُبْلِيْكَ الْاَزْمَانُ، وَ لَا تُغَيِّرُكَ الدُّهُوْرُ.
व अंतद्-दाइम ला तुब्लीकल-अज़मानु व ला तुग़य्यिरुकद्-दुहूर
और तू ही हमेशा क़ायम रहने वाला है, जिसे न ज़माने पुराना कर सकते हैं और न दौर तुझमें कोई तब्दीली ला सकते हैं।

يَا مَنْ كُلُّ يَوْمٍ عِنْدَهٗ جَدِيْدٌ، وَ كُلُّ رِزْقٍ عِنْدَهٗ عَتِيْدٌ، لِلضَّعِيْفِ وَ الْقَوِيِّ وَ الشَّدِيْدِ، قَسَّمْتَ الْاَرْزَاقَ بَيْنَ الْخَلَائِقِ، فَسَوَّيْتَ بَيْنَ الذَّرَّةِ وَ الْعُصْفُوْرِ.
या मन् कुल्लु यौमिन् इंदहू जदीद व कुल्लु रिज़्क़िन् इंदहू अतीद लिज़-ज़ईफ़ि वल-क़विय्यि वश-शदीद क़स्सम्तल-अरज़ाक़ा बैनल-ख़लाइक़ फ़सव्वैत बैनज़-ज़र्रति वल-उस्वूर
ऐ वह जिसकी बारगाह में हर दिन नया है और हर कमज़ोर, ताक़तवर और सख़्त के लिए रोज़ी तैयार है। तूने मख़लूक़ात के दरमियान रोज़ियाँ बाँटीं और चींटी और चिड़िया के बीच भी बराबरी रखी।

اَللّٰهُمَّ اِذَا ضَاقَ الْمُقَامُ بِالنَّاسِ، فَنَعُوْذُ بِكَ مِنْ ضِيْقِ الْمُقَامِ.
अल्लाहुम्मा इज़ा ज़ाक़ल-मुक़ामु बिन्नास फ़नऊज़ु बिका मिन ज़ीक़िल-मुक़ाम
ऐ अल्लाह! जब लोगों पर जगह तंग हो जाए तो हम तेरी पनाह चाहते हैं उस तंगी से।

اَللّٰهُمَّ اِذَا طَالَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ عَلَى الْمُجْرِمِيْنَ، فَقَصِّرْ ذٰلِكَ الْيَوْمَ عَلَيْنَا كَمَا بَيْنَ الصَّلَاةِ اِلَى الصَّلَاةِ.
अल्लाहुम्मा इज़ा ताल यौमुल-क़ियामति अलल-मुज्रिमीन फ़क़स्सिर ज़ालिकल-यौम अलेयना कमा बैनस-सलाति इलस-सलात
ऐ अल्लाह! जब क़यामत का दिन गुनहगारों पर लंबा हो जाए तो हमारे लिए उसे इतना छोटा कर दे जितना एक नमाज़ से दूसरी नमाज़ के बीच होता है।

اَللّٰهُمَّ اِذَا اَدْنَيْتَ الشَّمْسَ مِنَ الْجَمَاجِمِ، فَكَانَ بَيْنَهَا وَ بَيْنَ الْجَمَاجِمِ مِقْدَارُ مِيْلٍ، وَ زِيْدَ فِيْ حَرِّهَا حَرَّ عَشْرِ سِنِيْنَ، فَاِنَّا نَسْاَلُكَ اَنْ تُظِلَّنَا بِالْغَمَامِ، وَ تَنْصِبَ لَنَا الْمَنَابِرَ وَ الْكَرَاسِيَّ نَجْلِسُ عَلَيْهَا وَ النَّاسُ يَنْطَلِقُوْنَ فِيْ الْمُقَامِ، اٰمِيْنَ رَبَّ الْعَالَمِيْنَ.
अल्लाहुम्मा इज़ा अदनैतश-शम्स मिनल-जमाजिम फ़काना बैनहा व बैनल-जमाजिम मिक़दारु मील व ज़ीदा फी हर्रिहा हर्र अश्रि सिनीं फ़इन्ना नसअलुका अन तुज़िल्लना बिल-ग़माम व तनसिब लनल-मनााबिर वल-कुरासिय्य नजलिसु अलैहा वन-नासु यंतलिक़ूना फिल-मुक़ाम आमीन रब्बल-आलमीन
ऐ अल्लाह! जब तू सूरज को सिरों के क़रीब कर देगा और उसके और सिरों के बीच सिर्फ़ एक मील का फ़ासला रह जाएगा और उसकी गर्मी दस साल की गर्मी जितनी बढ़ा दी जाएगी, तो हम तुझसे सवाल करते हैं कि तू हमें अपनी रहमत के साये में जगह दे और हमारे लिए मिम्बर और कुर्सियाँ लगाए जिन पर हम बैठें जब लोग हिसाब के मुक़ाम की तरफ़ बढ़ रहे हों। आमीन, ऐ रब्बुल आलमीन।

اَسْاَلُكَ اَللّٰهُمَّ بِحَقِّ هٰذِهِ الْمَحَامِدِ، اِلَّا غَفَرْتَ لِيْ وَ تَجَاوَزْتَ عَنِّيْ وَ اَلْبَسْتَنِيْ الْعَافِيَةَ فِيْ بَدَنِيْ، وَ رَزَقْتَنِيْ السَّلَامَةَ فِيْ دِيْنِيْ.
असअलुका अल्लाहुम्मा बि-हक़्क़ि हाज़िहिल-महामिद इल्ला ग़फ़रता ली व तजावज़ता अन्नी व अलबस्तनील-आफ़ियता फी बदनी व रज़क़्तनीस-सलामता फी दीनी
मैं तुझसे सवाल करता हूँ ऐ अल्लाह इन तमाम हम्दों के वसीले से कि तू मुझे बख़्श दे और मुझसे दरगुज़र फ़रमा और मेरे बदन को आफ़ियत का लिबास पहनाए और मेरे दीन में सलामती अता फ़रमा।

فَاِنِّيْ اَسْاَلُكَ، وَ اَنَا وَاثِقٌ بِاِجَابَتِكَ اِيَّايَ فِيْ مَسْاَلَتِيْ، وَ اَدْعُوْكَ وَ اَنَا عَالِمٌ بِاسْتِمَاعِكَ دَعْوَتِيْ، فَاسْتَمِعْ دُعَائِيْ، وَ لَا تَقْطَعْ رَجَائِيْ، وَ لَا تَرُدَّ ثَنَائِيْ وَ لَا تُخَيِّبْ دُعَائِيْ، اَنَا مُحْتَاجٌ اِلٰى رِضْوَانِكَ، وَ فَقِيْرٌ اِلٰى غُفْرَانِكَ وَ اَسْاَلُكَ وَ لَا اٰيِسٌ مِنْ رَحْمَتِكَ، وَ اَدْعُوْكَ وَ اَنَا غَيْرُ مُحْتَرِزٍ مِنْ سَخَطِكَ.
फ़-इन्नी अस्अलुका, व अना वासिक़ुन बि-इजाबतिका इय्याया फी मस्अलती, व अदऊका व अना आलिमुन बि-इस्तिमाअिका दावत़ी, फ़स्तमिअ दुआई, व ला तक़्ताʿ रजाई, व ला तरुद्द सनााई व ला तुख़य्यिब दुआई, अना मुहताजुन इला रिज़वानिका, व फ़क़ीरुन इला ग़ुफ़रानिका व अस्अलुका व ला आयिसुन मिन रहमतिका, व अदऊका व अना ग़ैरु मुहतिरिज़िन मिन सख़तिका.
मैं तुझसे सवाल करता हूँ और मुझे अपने सवाल की क़बूलियत पर पूरा यक़ीन है, और मैं तुझसे दुआ करता हूँ जबकि मुझे इल्म है कि तू मेरी दुआ सुनता है। पस मेरी दुआ सुन, मेरी उम्मीद को क़तअ न कर, मेरी हम्द को रद्द न कर और मेरी दुआ को नामुराद न बना। मैं तेरी रज़ा का मुहताज हूँ और तेरी मग़फ़िरत का फ़क़ीर हूँ, मैं तुझसे सवाल करता हूँ और तेरी रहमत से मायूस नहीं हूँ, और मैं तुझसे दुआ करता हूँ जबकि मैं तेरे ग़ज़ब से बेपरवाह नहीं हूँ।

رَبِّ فَاسْتَجِبْ لِيْ، وَ امْنُنْ عَلَيَّ بِعَفْوِكَ، وَ تَوَفَّنِيْ مُسْلِمًا، وَ اَلْحِقْنِيْ بِالصَّالِحِيْنَ،
रब्बि फ़स्तजिब ली, व उम्नुन अलय्या बि-अफ़्विका, व तवफ़्फ़नी मुसलिमन, व अल्हिक़नी बिस्सालिह़ीन.
ऐ मेरे रब! मेरी दुआ क़बूल फ़रमा, अपने अफ़्व से मुझ पर एहसान फ़रमा, मुझे मुसलमान हालत में वफ़ात अता कर और मुझे नेक लोगों के साथ मिला दे।

رَبِّ لَا تَمْنَعْنِيْ فَضْلَكَ يَا مَنَّانُ، وَ لَا تَكِلْنِيْ اِلٰى نَفْسِيْ مَخْذُوْلًا، يَا حَنَّانُ.
रब्बि ला तम्नअनी फ़ज़्लका या मन्नान, व ला तकिलनी इला नफ़्सी मख़ज़ूलन, या हन्नान.
ऐ मेरे रब! ऐ बहुत देने वाले! मुझे अपने फ़ज़्ल से महरूम न कर और मुझे मेरे नफ़्स के हवाले न कर, ऐ बहुत मेहरबान।

رَبِّ ارْحَمْ عِنْدَ فِرَاقِ الْاَحِبَّةِ صَرْعَتِيْ، وَ عِنْدَ سُكُوْنِ الْقَبْرِ وَحْدَتِيْ وَ فِيْ مَفَازَةِ الْقِيَامَةِ غُرْبَتِيْ، وَ بَيْنَ يَدَيْكَ مَوْقُوْفًا لِلْحِسَابِ فَاقَتِيْ.
रब्बिर्रह़म इंद फ़िराक़िल-अह़िब्बति सरअती, व इंद सुकूनिल-क़ब्रि वह़दती, व फी मफ़ाज़तिल-क़ियामति ग़ुरबती, व बैन यदैक मौक़ूफ़न लिल-हिसाबि फ़ाक़ती.
ऐ मेरे रब! मौत के वक़्त अपनों की जुदाई में मेरी बेबसी पर रहम फ़रमा, क़ब्र की तन्हाई में मेरी तन्हाई पर रहम फ़रमा, क़ियामत के मैदान में मेरी बेगानगी पर रहम फ़रमा, और तेरे सामने हिसाब के वक़्त मेरी मजबूरी पर रहम फ़रमा।

رَبِّ اَسْتَجِيْرُ بِكَ مِنَ النَّارِ فَاَجِرْنِيْ، رَبِّ اَعُوْذُ بِكَ مِنَ النَّارِ فَاَعِذْنِيْ (رَبِّ) اَفْزَعُ اِلَيْكَ مِنَ النَّارِ فَاَبْعِدْنِيْ، رَبِّ اَسْتَرْحِمُكَ مَكْرُوْبًا فَارْحَمْنِيْ.
रब्बि अस्तजीरु बिका मिनन-नारि फ़-अजिरनी, रब्बि अऊज़ु बिका मिनन-नारि फ़-अइ़ज़नी, (रब्बि) अफ़ज़अु इलैका मिनन-नारि फ़-अब्इ़दनी, रब्बि अस्तरह़िमुका मक्रूबन फ़रह़मनी.
ऐ मेरे रब! मैं आग से तेरी पनाह चाहता हूँ, मुझे पनाह दे, मैं आग से तेरी हिफ़ाज़त चाहता हूँ, मुझे महफ़ूज़ रख, मैं आग से डरकर तेरी तरफ़ आता हूँ, मुझे उससे दूर रख, मैं परेशानी में तेरी रहमत चाहता हूँ, मुझ पर रहम फ़रमा।

رَبِّ اَسْتَغْفِرُكَ لِمَا جَهِلْتُ فَاغْفِرْ لِي، (رَبِّ) قَدْ اَبْرَزَنِيْ الدُّعَاءُ لِلْحَاجَةِ اِلَيْكَ فَلَا تُؤْيِسْنِيْ، يَا كَرِيْمُ ذَا الْاٰلَاءِ وَ الْاِحْسَانِ وَ التَّجَاوُزِ.
रब्बि अस्तग़फ़िरुका लिमा जहिल्तु फ़ग़फ़िर ली, (रब्बि) क़द अब्रज़निद्दुआओ लिल-हाजति इलैका फ़ला तुय्यिस्नी, या करीमु ज़ल आलाए वल एहसानि वत तजावुज़.
ऐ मेरे रब! मैं अपनी नादानी पर तुझसे मग़फ़िरत चाहता हूँ, पस मुझे बख़्श दे। ऐ मेरे रब! मेरी ज़रूरतें मुझे तेरे दर पर दुआ के लिए ले आई हैं, पस मुझे मायूस न कर, ऐ करम, नेमत, एहसान और दरगुज़र करने वाले।

سَيِّدِيْ يَا بَرُّ يَا رَحِيْمُ، اِسْتَجِبْ بَيْنَ الْمُتَضَرِّعِيْنَ اِلَيْكَ دَعْوَتِيْ وَ ارْحَمْ بَيْنَ الْمُنْتَحِبِيْنَ بِالْعَوِيْلِ عَبْرَتِيْ، وَ اجْعَلْ فِيْ لِقَائِكَ يَوْمَ الْخُرُوْجِ مِنَ الدُّنْيَا رَاحَتِيْ، وَ اسْتُرْ بَيْنَ الْاَمْوَاتِ يَا عَظِيْمَ الرَّجَاءِ عَوْرَتِيْ، وَ اعْطِفْ عَلَيَّ عِنْدَ التَّحَوُّلِ وَحِيْدًا اِلٰى حُفْرَتِيْ، اِنَّكَ اَمَلِيْ وَ مَوْضِعُ طَلِبَتِيْ، وَ الْعَارِفُ بِمَا اُرِيْدُ فِيْ تَوْجِيْهِ مَسْاَلَتِيْ.
सय्यिदी या बर्रु या रहीमु, इस्तजिब बैनल-मुतज़र्रिईना इलैका दावत़ी वरहम बैनल-मुन्तहिबीना बिल-अवीली अब्रती, वजअल फी लिक़ाइका यौमल-ख़ुरूजि मिनद-दुन्या राहती, वस्तुर बैनल-अम्वाति या अज़ीमर-रजा इवरती, वअतिफ़ अलय्य इंदत-तहव्वुलि वह़ीदन इला हुफ़रती, इन्नका अमली व मौज़िअु तलबती, वल-आरिफ़ु बिमा उरीदु फी तौजीहि मसअलती.
ऐ मेरे आका! ऐ नेकियों वाले! ऐ रहम करने वाले! गिड़गिड़ाने वालों के दरमियान मेरी दुआ क़बूल फ़रमा और रोने वालों के बीच मेरे आँसुओं पर रहम फ़रमा। दुनिया से निकलने के दिन अपनी मुलाक़ात को मेरी राहत बना दे। ऐ मेरी बड़ी उम्मीदों के सहारे! मुर्दों के दरमियान मेरी कमज़ोरियों को ढाँप ले। जब मैं अकेला क़ब्र की तरफ़ जाऊँ तो मुझ पर मेहरबानी फ़रमा। तू ही मेरी उम्मीद है और मेरी माँग का मरकज़ है और तू जानता है कि मैं अपनी दुआ में क्या चाहता हूँ।

فَاقْضِ يَا قَاضِيَ الْحَاجَاتِ حَاجَتِيْ، فَاِلَيْكَ الْمُشْتَكٰى وَ اَنْتَ الْمُسْتَعَانُ وَ الْمُرْتَجٰى، اَفِرُّ اِلَيْكَ هَارِبًا مِنَ الذُّنُوْبِ فَاقْبَلْنِيْ، وَ اَلْتَجِأُ مِنْ عَدْلِكَ اِلٰى مَغْفِرَتِكَ فَاَدْرِكْنِيْ، وَ اَلْتَاذُ بِعَفْوِكَ مِنْ بَطْشِكَ فَامْنَعْنِيْ وَ اَسْتَرْوِحُ رَحْمَتَكَ مِنْ عِقَابِكَ فَنَجِّنِيْ، وَ اَطْلُبُ الْقُرْبَةَ مِنْكَ بِالْاِسْلَامِ فَقَرِّبْنِيْ، وَ مِنَ الْفَزَعِ الْاَكْبَرِ فَاٰمِنِّيْ، وَ فِيْ ظِلِّ عَرْشِكَ فَظَلِّلْنِيْ، وَ كِفْلَيْنِ مِنْ رَحْمَتِكَ فَهَبْ لِيْ، وَ مِنَ الدُّنْيَا سَالِمًا فَنَجِّنِيْ، وَ مِنَ الظُّلُمَاتِ اِلَى النُّوْرِ فَاَخْرِجْنِيْ.
फ़क़ज़ि या क़ाज़ियल-हाजाति हाजती, फ़इलैकल-मुश्तका व अंतल-मुस्तआनु वल-मुर्तजा, अफ़िर्रु इलैका हारिबन मिनज़-ज़ुनूबि फ़क़बलनी, वल्तजिउ मिन अद्लिका इला मग़फ़िरतिका फ़अद्रिकनी, वल्ताज़ु बिअफ़्विका मिन ब़त्शिका फ़म्नअनी, वस्तरवीहु रहमतिका मिन इक़ाबिक़ फ़नज्जिनी, वअतलुबुल-क़ुरबता मिनका बिल-इस्लामि फ़क़र्रिबनी, वमिनल-फ़ज़अिल-अकबरि फ़आमिन्नी, वफ़ी ज़िल्लि अर्शिका फ़ज़ल्लिलनी, वकिफ़लैनि मिन रहमतिका फ़हब ली, वमिनद-दुन्या सालिमन फ़नज्जिनी, वमिनज़-ज़ुलुमाति इलन-नूरि फ़अख़रिजनी.
ऐ ज़रूरतें पूरी करने वाले! मेरी ज़रूरत पूरी फ़रमा। मेरी फ़रियाद तेरी तरफ़ है और तू ही मेरा मददगार और उम्मीद है। मैं गुनाहों से भागकर तेरी तरफ़ आता हूँ, मुझे क़बूल फ़रमा। तेरे इंसाफ़ से तेरी मग़फ़िरत की पनाह चाहता हूँ, मेरी मदद फ़रमा। तेरे अज़ाब से तेरे अफ़्व की पनाह चाहता हूँ, मुझे महफ़ूज़ रख। तेरे अज़ाब के मुक़ाबले तेरी रहमत चाहता हूँ, मुझे जहन्नम से बचा। इस्लाम के ज़रिये तेरी क़ुरबत चाहता हूँ, मुझे क़रीब कर। क़ियामत के बड़े डर से मुझे अमन दे। अपने अर्श के साए में मुझे जगह दे। अपनी रहमत के दो हिस्से मुझे अता कर। दुनिया से सलामती के साथ निकाल और अंधेरों से निकाल कर नूर की तरफ़ ले जा।

وَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَبَيِّضْ وَجْهِيْ، وَ حِسَابًا يَسِيْرًا فَحَاسِبْنِيْ وَ بِسَرَائِرِيْ فَلَا تَفْضَحْنِيْ، وَ عَلٰى بَلَائِكَ فَصَبِّرْنِيْ، وَ كَمَا صَرَفْتَ عَنْ يُوْسُفَ السُّوْءَ وَ الْفَحْشَاءَ فَاصْرِفْهُ عَنِّيْ، وَ مَا لَا طَاقَةَ لِيْ بِهٖ فَلَا تُحَمِّلْنِيْ.
व यौमल-क़ियामति फ़बैय्यिज़ वज्ही, व हिसाबन यसीरन फ़हासिबनी, व बिसराइरी फ़ला तफ़ज़हनी, व अला बलाइका फ़सब्बिरनी, व कमा सरफ़्ता अं यूसुफ़स-सूअ वल-फ़ह्शा फ़स्रिफ़हु अन्नी, व मा ला ताक़ता ली बिहि फ़ला तुहम्मिलनी.
क़ियामत के दिन मेरा चेहरा रौशन फ़रमा, मुझसे आसान हिसाब ले और मेरे राज़ों की वजह से मुझे रुस्वा न कर। अपनी आज़माइशों पर मुझे सब्र अता कर। जैसे तूने यूसुफ़ से बुराई और बेहयाई को दूर किया, वैसे ही उसे मुझसे भी दूर कर दे। और जो बोझ मैं उठा नहीं सकता, वह मुझ पर न डाल।

وَ اِلٰى دَارِ السَّلَامِ فَاهْدِنِيْ، وَ بِالْقُرْاٰنِ فَانْفَعْنِيْ، وَ بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فَثَبِّتْنِيْ، وَ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيْمِ فَاحْفَظْنِيْ، وَ بِحَوْلِكَ وَ قُوَّتِكَ وَ جَبَرُوْتِكَ فَاعْصِمْنِيْ، وَ بِحِلْمِكَ وَ عِلْمِكَ وَ سَعَةِ رَحْمَتِكَ مِنْ جَهَنَّمَ فَنَجِّنِيْ، وَ جَنَّتَكَ الْفِرْدَوْسَ فَاَسْكِنِّيْ، وَ النَّظَرَ اِلٰى وَجْهِكَ فَارْزُقْنِيْ، وَ بِنَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ ﷺ فَاَلْحِقْنِيْ، وَ مِنَ الشَّيَاطِيْنِ وَ اَوْلِيَائِهِمْ وَ مِنْ شَرِّ كُلِّ ذِيْ شَرٍّ فَاكْفِنِيْ.
व इला दारिस-सलामि फ़हदिनी, व बिल-क़ुरआनि फ़नफ़अनी, व बिल-क़ौलिस-साबिति फ़सब्बितनी, व मिनश-शैतानिर-रजीमि फ़हफ़ज़नी, व बिहौलिका व क़ुव्वतिका व जबरूतिका फ़असिमनी, व बिहिल्मिका व इल्मिका व सअति रहमतिका मिन जहन्नम फ़नज्जिनी, व जन्नतकल-फ़िरदौस फ़अस्किननी, वन-नज़र इला वज्हिका फ़रज़ुक़नी, व बिनबिय्यिका मुहम्मद ﷺ फ़अल्हिक़नी, व मिनश-शयातीनी व औलियाइहिम व मिन शर्रि कुल्लि ज़ी शर्रिन फ़कफ़िनी.
मुझे दारुस्सलाम की तरफ़ हिदायत दे, क़ुरआन से मुझे फ़ायदा पहुँचा, मुझे सच्चे क़ौल पर क़ायम रख। मुझे शैतान-ए-रजीम से महफ़ूज़ रख। अपनी क़ुदरत, ताक़त और जलालत से मेरी हिफ़ाज़त कर। अपने हिल्म, इल्म और वसीअ रहमत से मुझे जहन्नम से बचा। मुझे जन्नतुल-फ़िरदौस में बसने की जगह दे। मुझे अपने दीदार की नेमत अता कर। मुझे अपने नबी मुहम्मद ﷺ के साथ मिला दे। शैतानों, उनके साथियों और हर बुराई से मुझे काफ़ी हो जा।

اَللّٰهُمَّ وَ اَعْدَائِيْ وَ مَنْ كَادَنِيْ بِسُوْءٍ اِنْ اَتَوْا بَرًّا فَجَبِّنْ شَجِيْعَهُمْ، فَضِّ جُمُوْعَهُمْ، كَلِّلْ سِلَاحَهُمْ، عَرْقِبْ دَوَابَّهُمْ، سَلِّطْ عَلَيْهِمُ الْعَوَاصِفَ وَ الْقَوَاصِفَ اَبَدًا حَتّٰى تُصْلِيْهِمُ النَّارَ، اَنْزِلْهُمْ مِنْ صَيَاصِيْهِمْ، وَ اَمْكِنَّا مِنْ نَوَاصِيْهِمْ اٰمِيْنَ رَبَّ الْعَالَمِيْنَ.
अल्लाहुम्मा व अअदाई व मन कादनी बिसूइन, इन अतौ बर्रन फ़जिब्बिन शजीअहुम, फ़ज़्ज़ि जुमूअहुम, कल्लिल सिलाहहुम, अरक़िब दवाब्बहुम, सल्लित अलैहिमुल-अवा़सिफ़ वल-क़वा़सिफ़ अबदन हत्ता तुस्लीहिमुन-नार, अनज़िलहुम मिन सयासीहिम, व अम्किन्ना मिन नवासीहिम, आमीन रब्बल-आलमीन.
ऐ अल्लाह! मेरे दुश्मनों और मुझे नुक़सान पहुँचाने वालों के ख़िलाफ़, अगर वे ज़ुल्म के इरादे से आएँ तो उनकी हिम्मत तोड़ दे। उनकी जमाअतों को बिखेर दे, उनके हथियार बेकार कर दे, उनकी सवारियाँ रोक दे, उन पर सख़्त आँधियाँ और तबाही भेज दे यहाँ तक कि तू उन्हें आग में झोंक दे। उन्हें उनके क़िलों से निकाल दे और हमें उनकी पेशानियों पर क़ाबू दे दे। आमीन, ऐ रब्बुल-आलमीन।

اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ اٰلِ مُحَمَّدٍ، صَلَاةً يَشْهَدُ الْاَوَّلُوْنَ مَعَ الْاَبْرَارِ وَ سَيِّدِ الْمُرْسَلِيْنَ وَ خَاتَمِ النَّبِيِّيْنَ، وَ قَائِدِ الْخَيْرِ، وَ مِفْتَاحِ الرَّحْمَةِ.
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिं व आले मुहम्मद, सलातन यश्हदुल अव्वलूना मअल-अबरार, व सय्यिदिल मुरसलीन, व खातमिन-नबिय्यीन, व क़ाइदिल-ख़ैर, व मिफ़्ताहिर-रह्मत।
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर ऐसी दरूद नाज़िल फ़रमा जिसकी गवाही अगले और पिछले सब दें, और नेक लोग गवाह हों कि वह रसूलों के सरदार, नबियों के ख़ातिम, भलाई के रहनुमा और रहमत की कुंजी हैं।

اَللّٰهُمَّ رَبَّ الْبَيْتِ الْحَرَامِ، وَ الشَّهْرِ الْحَرَامِ، وَ رَبَّ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ وَ رَبَّ الرُّكْنِ وَ الْمَقَامِ، وَ رَبَّ الْحِلِّ وَ الْحَرَامِ، بَلِّغْ رُوْحَ مُحَمَّدٍ مِنَّا التَّحِيَّةَ وَ السَّلَامَ.
अल्लाहुम्मा रब्बल-बैतिल-हराम, वश्शह्रिल-हराम, व रब्बल-मश्अरिल-हराम, व रब्बर-रुक्नि वल-मक़ाम, व रब्बल-हिल्लि वल-हराम, बल्लिग़ रूहा मुहम्मदिं मिन्नत-तहिय्यत वस्सलाम।
ऐ अल्लाह! ऐ बैतुल-हराम के रब, और हराम महीने के रब, और मशअर-ए-हराम के रब, और रुक्न व मक़ाम के मालिक, और हिल्ल व हराम के रब! हमारी तरफ़ से हज़रत मुहम्मद ﷺ की रूह तक सलाम और ताज़ीम पहुँचा दे।

اَلسَّلَامٌ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللهِ، سَلَامٌ عَلَيْكَ يَا اَمِيْنَ اللهِ، سَلَامٌ عَلَيْكَ يَا مُحَمَّدَ بْنَ عَبْدِ اللهِ، اَلسَّلَامُ عَلَيْكَ وَ رَحْمَةُ اللهِ وَ بَرَكَاتُهٗ.
अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह, सलामुन अलैका या अमीनल्लाह, सलामुन अलैका या मुहम्मद बिन अब्दिल्लाह, अस्सलामु अलैका व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।
आप पर सलाम हो ऐ रसूलुल्लाह! आप पर सलाम हो ऐ अमीनुल्लाह! आप पर सलाम हो ऐ मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह! आप पर अल्लाह की रहमत और बरकतें नाज़िल हों।

فَهُوَ كَمَا وَصَفْتَهٗ بِالْمُؤْمِنِيْنَ رَءُوْفٌ رَحِيْمٌ.
फ़हुवा कमा वसफ़्तहू बिल-मोमिनीन रऊफ़ुन रहीम।
पस वह वही हैं जैसा तूने उन्हें बयान किया, कि वह ईमान वालों के लिए निहायत मेहरबान और बहुत रहम करने वाले हैं।

اَللّٰهُمَّ اَعْطِهٖ اَفْضَلَ مَا سَاَلَكَ، وَ اَفْضَلَ مَا سُئِلْتَ لَهٗ، وَ اَفْضَلَ مَا اَنْتَ مَسْئُوْلٌ لَهٗ اِلٰى يَوْمِ الْقِيَامَةِ، اٰمِيْنَ يَا رَبَّ الْعَالَمِيْنَ.‏ ‏
अल्लाहुम्मा अअतिहि अफ़ज़ल मा सअलका, व अफ़ज़ल मा सु’इल्ता लहू, व अफ़ज़ल मा अंत मस्ऊलुन लहू इला यौमिल-क़ियामह, आमीन या रब्बल-आलमीन।
ऐ अल्लाह! उन्हें वह सब से बेहतरीन अता फ़रमा जो उन्होंने तुझसे माँगा, और जो उनके लिए माँगा गया, और जो क़ियामत के दिन तक उनके हक़ में माँगा जाता रहेगा। आमीन, ऐ रब्बुल-आलमीन।





मग़रिब और इशा के दरमियान सलात-उल-ग़ुफ़ैला पढ़ें
नीचे दी गई तस्वीर देखें


मग़रिब के बाद 4 रकअत नफ़िला (2×2) पढ़ें, जिनमें से 2 रकअत ग़ुफ़ैला की हो सकती हैं
फ़र्ज़ और नफ़िला नमाज़-ए-मग़रिब के दरमियान के वक़्त में (दुआओं के अलावा) किसी भी तरह की बात न करना मुस्तहब है।
पहली रकअत में सूरह अल-काफ़िरून (नंबर 109) और दूसरी रकअत में सूरह अल-तौहीद पढ़ी जाए।
तीसरी और चौथी रकअत में किसी भी पसंदीदा सूरह का पढ़ना इख़्तियारी है, जैसा कि दूसरी नफ़िला नमाज़ों में होता है।
हर रकअत में केवल सूरह अल-फ़ातिहा पढ़ लेना भी काफ़ी है। सूरहों को बुलंद आवाज़ में पढ़ना बेहतर समझा जाता है।
हर रात तमाम नफ़िला नमाज़ों की आख़िरी सज्दा में, ख़ास तौर पर जुमे की रात से पहले, नीचे दी गई दुआ को सात बार दोहराना भी मुस्तहब है:
اَللَّهُمَّ إِنِّي اسْالُكَ بِوَجْهِكَ ٱلْكَرِيـمِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका बि-वज्हिका अल-करीमि
ऐ अल्लाह, मैं तुझसे तेरे बुज़ुर्ग और करीम चेहरे के वसीले से सवाल करता हूँ,

وَٱسْمِكَ ٱلْعَظِيمِ
व-अस्मिका अल-अज़ीमि
और तेरे अज़ीम नाम के वसीले से,

وَمُلْكِكَ ٱلْقَدِيـمِ
व-मुल्किका अल-क़दीमि
और तेरी क़दीम बादशाहत के वसीले से,

انْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّد وَآلِهِ
अन तुसल्लिया अला मुहम्मद व आ़लिही
कि तू मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेजे,

وَ انْ تَغْفِرَ لِي ذَنْبِيَ ٱلْعَظِيمَ
व अन तग़्फ़िरा ली ज़म्बिय अल-अज़ीम
और मेरे अज़ीम गुनाह को माफ़ फ़रमा दे,

إِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ ٱلْعَظِيمَ إِلاَّ ٱلْعَظِيمُ
इन्नहू ला यग़्फ़िरुल अज़ीम इल्लल अज़ीम
क्योंकि अज़ीम गुनाह को अज़ीम ज़ात के सिवा कोई माफ़ नहीं कर सकता।

फिर नीचे लिखे हुए कलिमात को दस बार दोहराएँ:
مَا شَاءَ ٱللَّهُ
मा शा-अल्लाह
जो अल्लाह चाहता है वही होता है।

لاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ
ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह
अल्लाह के सिवा कोई ताक़त नहीं।

اَسْتَغْفِرُ ٱللَّهَ
अस्तग़्फ़िरुल्लाह
मैं अल्लाह से मग़फ़िरत माँगता हूँ।


मग़रिब की नफ़िला नमाज़ की तीसरी और चौथी रकअत में ज़ाइद तिलावतें
तीसरी रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा के बाद नीचे दी गई आयात की तिलावत करना मुस्तहब है, जो सूरह अल-हदीद (नंबर 57) की पहली छह आयात हैं:
سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِي ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ
सब्बह लिल्लाहि मा फ़िस्समावाति वल-अर्दि
जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, सब अल्लाह की पाकी बयान करता है,

وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ.
वहुवा अल-अज़ीज़ुल हकीम
और वही ग़ालिब और हिकमत वाला है।

لَهُ مُلْكُ ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ
लहू मुल्कुस्समावाति वल-अर्दि
आसमानों और ज़मीन की बादशाहत उसी की है,

يُحْيِي وَيُمِيتُ
युह्यी व युमीत
वही ज़िन्दा करता है और वही मौत देता है,

وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ.
वहुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर
और वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है।

هُوَ ٱلاوَّلُ وَٱلآخِرُ
हुवल अव्वलु वल-आख़िर
वही अव्वल है और वही आख़िर,

وَٱلظَّاهِرُ وَٱلْبَاطِنُ
वज़्ज़ाहिरु वल-बातिन
और वही ज़ाहिर है और वही बातिन,

وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ.
वहुवा बिकुल्लि शैइन अलीम
और वह हर चीज़ का पूरा इल्म रखता है।

هُوَ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضَ
हुवल्लज़ी ख़लकस्समावाति वल-अर्द
वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया,

فِي سِتَّةِ ايَّامٍ
फ़ी सित्तति अय्याम
छह दिनों में,

ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَىٰ ٱلْعَرْشِ
सुम्मस्तवा अलल-अर्श
फिर वह अर्श पर क़ायम हुआ,

يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِي ٱلارْضِ
या’लमु मा यलिजु फ़िल-अर्द
वह जानता है जो ज़मीन में दाख़िल होता है,

وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا
व मा यख़रुजु मिन्हा
और जो उससे निकलता है,

وَمَا يَنْزِلُ مِنْ ٱلسَّمَاءِ
व मा यनज़िलु मिनस्समा
और जो आसमान से उतरता है,

وَمَا يَعْرُجُ فِيهَا
व मा यअ’रुजु फ़ीहा
और जो उसकी तरफ़ चढ़ता है,

وَهُوَ مَعَكُمْ ايْنَ مَا كُنْتُمْ
वहुवा मअकुम ऐना मा कुंतुम
और वह तुम्हारे साथ है जहाँ कहीं भी तुम हो,

وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ.
वल्लाहु बिमा तअ’मलूना बसीर
और अल्लाह तुम्हारे आमाल को देखने वाला है।

لَهُ مُلْكُ ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ
लहू मुल्कुस्समावाति वल-अर्ज़
आसमानों और ज़मीन की बादशाहत उसी की है।

وَإِلَىٰ اللَّهِ تُرْجَعُ ٱلامُورُ.
वा इलल्लाहि तुरजउल उमूर
और तमाम मामलात अल्लाह ही की तरफ़ लौटाए जाते हैं।

يُولِجُ ٱللَّيْلَ فِي ٱلنَّهَارِ
यूलिजुल लैला फिन्नहार
वह रात को दिन में दाख़िल करता है,

وَيُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِي ٱللَّيْلِ
वा यूलिजुन्नहारा फिल्लैल
और दिन को रात में दाख़िल करता है,

وَهُوَ عَلِيمٌ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ.
वहुवा अलीमुन बिज़ातिस्सुदूर
और वह सीनों के भेद तक जानने वाला है।


नफ़िला मग़रिब की **चौथी रकअत** में भी सूरह अल-फ़ातिहा के बाद नीचे दी गई मुबारक आयात की तिलावत करना मुस्तहब है, जो सूरह अल-हश्र (नंबर 59) की आख़िरी चार आयात हैं:
لَوْ انْزَلْنَا هٰذَا ٱلْقُرْآنَ عَلَىٰ جَبَلٍ
लौ अंजलना हाज़ल कुरआना अला जबल
अगर हम इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर उतारते,

لَرَايْتَهُ خَاشِعاً مُتَصَدِّعاً مِنْ خَشْيَةِ اللَّهِ
लरअैतहू ख़ाशिअन मुतसद्दिअन मिन ख़शयतिल्लाह
तो तुम उसे अल्लाह के ख़ौफ़ से दबा हुआ और फटा हुआ देखते,

وَتِلْكَ ٱلامْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ
वा तिल्कल अम्सालु नज़रिबुहा लिन्नास
और ये मिसालें हम लोगों के लिए बयान करते हैं,

لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
लअल्लहुम यतफ़क्करून
ताकि वे ग़ौर-ओ-फ़िक्र करें।

هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِي لاَ إِلٰهَ إِلاَّ هُوَ
हुवल्लाहुल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हू
वही अल्लाह है, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं,

عَالِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَادَةِ
आलिमुल ग़ैबि वश्शहादह
वह ग़ैब और ज़ाहिर सब का जानने वाला है,

هُوَ ٱلرَّحْمٰنُ ٱلرَّحِيمُ
हुवर्रहमानुर्रहीम
वही बेहद मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है।

هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِي لاَ إِلٰهَ إِلاَّ هُوَ
हुवल्लाहुल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हू
वही अल्लाह है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं,

ٱلْمَلِكُ ٱلْقُدُّوسُ
अल-मलिकुल-क़ुद्दूस
बादशाह, बिल्कुल पाक,

ٱلسَّلاَمُ ٱلْمُؤْمِنُ ٱلْمُهَيْمِنُ
अस्सलामुल-मोमिनुल-मुहैमिन
सलामती देने वाला, अमन देने वाला, निगहबान,

ٱلْعَزِيزُ ٱلْجَبَّارُ ٱلْمُتَكَبِّرُ
अल-अज़ीज़ुल-जब्बारुल-मुतकब्बिर
ज़बरदस्त, ग़ालिब, बुज़ुर्गी वाला है।

سُبْحَانَ ٱللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
सुब्हानल्लाहि अम्मा युश्रिकून
अल्लाह पाक है उनसे, जिन्हें वे उसका शरीक ठहराते हैं।

هُوَ ٱللَّهُ ٱلْخَالِقُ ٱلْبَارِئُ ٱلْمُصَوِّرُ
हुवल्लाहुल-ख़ालिकुल-बारिउल-मुसव्विर
वही अल्लाह है, पैदा करने वाला, सूरत बनाने वाला,

لَهُ ٱلاسْمَاءُ ٱلْحُسْنَىٰ
लहुल-अस्माउल-हुस्ना
सब अच्छे नाम उसी के हैं,

يُسَبِّحُ لَهُ مَا فِي ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ
युसब्बिहु लहू मा फ़िस्समावाति वल-अर्द
जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, सब उसकी तस्बीह करता है,

وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ.
वहुवल-अज़ीज़ुल-हकीम
और वही ग़ालिब, हिकमत वाला है।

दूसरी नफ़िला नमाज़ों की तरह, हर रकअत में सिर्फ़ सूरह अल-फ़ातिहा पढ़ना भी काफ़ी है। सूरहों को बुलंद आवाज़ से पढ़ना मुस्तहब समझा जाता है,
आप इसके बाद सज्दा-ए-शुक्र अदा करें और यह पढ़ें
شُكْراً شُكْراً شُكْراً
शुक्रन शुक्रन शुक्रन
शुक्र, शुक्र, शुक्र।


अल-कुलैनी ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) से रिवायत की है: जब तुम मग़रिब की नफ़िला नमाज़ पूरी कर लो, तो अपने हाथ को पेशानी पर फेरो और नीचे दी गई दुआ को तीन बार पढ़ो :
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلَّذِي لاَ إِلٰهَ إِلاََّ هُوَ
बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हू
अल्लाह के नाम से, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं,

عَالِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَادَةِ
आलिमुल ग़ैबि वश्शहादह
जो ग़ैब और ज़ाहिर सब कुछ जानने वाला है,

ٱلرَّحْمٰنُ ٱلرَّحِيمُ
अर्रहमानुर्रहीम
वह बेहद मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है।

اللَّهُمَّ اذْهِبْ عَنِّيَ ٱلْهَمَّ وَٱلْحَزَنَ
अल्लाहुम्मज़्हिब अन्नियल-हम्मा वल-हज़न
ऐ अल्लाह, मुझसे ग़म और परेशानी को दूर फ़रमा।


Responsive image



ईशा के बाद पढ़ी जाने वाली दुआएँ (मिस्बाह अल-मुतहज्जिद से नक़्ल)


1. यह दुआ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) से रिवायत है, और रोज़ी (रिज़्क़) हासिल करने के लिए बहुत ज़्यादा मुस्तहब मानी गई है।



اَللَّهُمَّ إِنَّهُ لَيْسَ لِي عِلْمٌ بِمَوْضِعِ رِزْقِي
अल्लाहुम्मा इन्नहू लैसा ली इल्मुन बि-मौज़ेइ रिज़्क़ी
ऐ अल्लाह! बेशक मुझे अपने रिज़्क़ की जगह का इल्म नहीं है,

وَإِنَّمَا أَطْلُبُهُ بِخَطَرَاتٍ تَخْطُرُ عَلَىٰ قَلْبِي
वा इन्नमा अतलुबुहू बि-ख़तरातिन तख़तुरु अला क़ल्बी
बल्कि मैं उसे अपने दिल में आने वाले ख़यालों के सहारे तलाश करता हूँ,

فَأَجُولُ فِي طَلَبِهِ ٱلْبُلْدَانَ
फा-अजूलु फ़ी तलबीहिल बुल्दान
इसलिए मैं उसे ढूँढने के लिए शहरों और मुल्कों में भटकता हूँ,

فَأَنَا فِيمَا أَنَا طَالِبٌ كَٱلْحَيْرَانِ
फा-अना फ़ीमा अना तालिबुन कल-हैरान
और मैं अपने इस तलाश में एक हैरान आदमी की तरह हो जाता हूँ,

لاَ أَدْرِي أَفِي سَهْلٍ هَوُ أَمْ فِي جَبَلٍ
ला अद्री अफ़ी सहलिन हुआ अम फ़ी जबलिन
मुझे नहीं मालूम कि मेरा रिज़्क़ मैदान में है या पहाड़ में,

أَمْ في أَرْضٍ أَمْ في سَمَاءٍ
अम फ़ी अरज़िन अम फ़ी समा-इन
ज़मीन में है या आसमान में,

أَمْ فِي بَرٍّ أَمْ فِي بَحْرٍ
अम फ़ी बर्रिन अम फ़ी बहरिन
खुश्की में है या समुंदर में,

وَعَلَىٰ يَدَيْ مَنْ
वा अला यदैय मन
किसके हाथों से,

وَمِنْ قِبَلِ مَنْ
वा मिन क़िबलि मन
और किस की तरफ़ से मिलेगा।

وَقَدْ عَلِمْتُ أَنَّ عِلْمَهُ عِنْدَكَ
वा क़द अलिम्तु अन्ना इल्महू इंदक
हालाँकि मुझे यक़ीन है कि इसका पूरा इल्म तेरे ही पास है,

وَ أَسْبَابَهُ بِيَدِكَ
वा अस्बाबहू बि-यदिक
और उसके सारे ज़राए तेरे ही हाथ में हैं,

وَ أَنْتَ ٱلَّذي تَقْسِمُهُ بِلُطْفِكَ
वा अन्तल्लज़ी तक़सिमुहू बि-लुत्फ़िक
और तू ही है जो अपनी मेहरबानी से उसे तक़सीम करता है,

وَتُسَبِّبُهُ بِرَحْمَتِكَ
वा तुसब्बिबुहू बि-रहमतिका
और अपनी रहमत से उसके रास्ते बनाता है।

اَللَّهُمَّ فَصَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अल्लाहुम्मा फ़-सल्लि अला मुहम्मदिं व आलिही
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेज,

وَٱجْعَلْ يَا رَبِّ رِزْقَكَ لِي وَاسِعاً
वज्अल या रब्बि रिज़्क़का ली वासिआ
और ऐ मेरे रब! मेरे लिए अपना रिज़्क़ वसीअ कर दे,

وَمَطْلَبَهُ سَهْلاً
वा मतलबहू सहला
और उसे हासिल करना मेरे लिए आसान बना,

وَمَاْخَذَهُ قَرِيباً
वा मा’ख़ज़हू क़रीबा
और उसके ज़रिए को मेरे क़रीब कर दे।

وَلاَ تُعَنِّنِي بِطَلَبِ مَا لَمْ تُقَدِّرْ لِي فيهِ رِزْقاً
वा ला तुअन्निनी बि-तलबि मा लम् तुक़द्दिर ली फ़ीहि रिज़्क़ा
ऐ अल्लाह! मुझे उस चीज़ की तलाश में न थकाना, जिसमें तूने मेरे लिए कोई रिज़्क़ मुक़र्रर नहीं किया,

فَإِنَّكَ غَنِيٌّ عَنْ عَذَابِي
फ़-इन्नका ग़निय्युन अन अज़ाबी
क्योंकि तू मुझे अज़ाब देने से बेनियाज़ है,

وَ أَنَا فَقِيـرٌ إِلَىٰ رَحْمَتِكَ
वा अना फ़क़ीरुन इला रहमतिका
और मैं तेरी रहमत का सख़्त मोहताज हूँ,

فَصَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
फ़-सल्लि अला मुहम्मदिन व आलिही
पस मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेज,

وَجُدْ عَلَىٰ عَبْدِكَ بِفَضْلِكَ
वा जु्द अला अब्दिका बि-फ़ज़लिका
और अपने बंदे पर अपने फ़ज़्ल से करम फ़रमा,

إِنَّكَ ذُو فَضْلٍ عَظيم
इन्नका ज़ू फ़ज़्लिन अज़ीम
बेशक तू बड़े फ़ज़्ल वाला है।


2. ईशा की नमाज़ के बाद **सूरह अल-क़द्र (नंबर 97) सात बार** पढ़ो। इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) से रिवायत है कि जो ऐसा करेगा, वह सुबह तक अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) की पनाह और अमान में रहेगा।
3. फिर यह दुआ पढ़ो — “अल्लाहुम्मा रब्बस्समावाति…” :

اللَّهُمَّ رَبَّ ٱلسَّمَاوَاتِ ٱلسَّبْعِ وَمَا اظَلَّتْ
अल्लाहुम्मा रब्बस्समावातिस्सब्‌इ व मा अज़ल्लत
ऐ अल्लाह! सातों आसमानों के रब, और उन सब चीज़ों के जिन पर उन्होंने साया किया,

وَرَبَّ ٱلارَضِينَ ٱلسَّبْعِ وَمَا اقَلَّتْ
वा रब्बल-अरज़ीनिस्सब्‌इ व मा अक़ल्लत
और सातों ज़मीनों के रब, और उन सब चीज़ों के जिनका उन्होंने बोझ उठाया,

وَرَبَّ ٱلشَّيَاطِينِ وَمَا اضَلَّتْ
वा रब्बश्शयातीनि व मा अज़ल्लत
और शैतानों के रब, और उन सब के जिनको उन्होंने गुमराह किया,

وَرَبَّ ٱلرِّيَاحِ وَمَا ذَرَتْ
वा रब्बर्रियाहि व मा ज़रत
और हवाओं के रब, और उन सब चीज़ों के जिनको उन्होंने फैलाया,

اللَّهُمَّ رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ
अल्लाहुम्मा रब्ब कुल्लि शय-इन
ऐ अल्लाह! हर चीज़ के रब,

وَإِلٰهَ كُلِّ شَيْءٍ
वा इलाहा कुल्लि शय-इन
और हर चीज़ के माबूद।

وَمَلِيكَ كُلِّ شَيْءٍ
वा मलीक कुल्लि शय-इन
और हर चीज़ का मालिक,

انْتَ ٱللَّهُ ٱلْمُقْتَدِرُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ
अन्तल्लाहुल-मुक्तदिरु अला कुल्लि शय-इन
तू ही अल्लाह है, जो हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखता है,

انْتَ ٱللَّهُ ٱلاوَّلُ فَلاَ شَيْءَ قَبْلَكَ
अन्तल्लाहुल-अव्वलु फ़ला शय-अ क़बलक
तू ही अल्लाह है, सबसे पहला, तुझसे पहले कुछ भी नहीं,

وَانْتَ ٱلآخِرُ فَلاَ شَيْءَ بَعْدَكَ
वा अन्तल-आख़िरु फ़ला शय-अ बादक
और तू ही आख़िरी है, तुझके बाद कुछ भी नहीं,

وَانْتَ ٱلظَّاهِرُ فَلاَ شَيْءَ فَوْقَكَ
वा अन्तज़-ज़ाहिरु फ़ला शय-अ फ़ौक़क
और तू ही ज़ाहिर है, तुझसे ऊपर कुछ भी नहीं,

وَانْتَ ٱلْبَاطِنُ فَلاَ شَيْءَ دُونَكَ
वा अन्तल-बातिनु फ़ला शय-अ दूनक
और तू ही बातिन है, तुझसे कोई चीज़ छुपी हुई नहीं,

رَبَّ جَبْرَائِيلَ وَمِيكَائِيلَ وَإِسْرَافِيلَ
रब्ब जिब्राईल व मीका-ईल व इस्राफ़ील
ऐ जिब्राईल, मीका-ईल और इस्राफ़ील के रब,

وَإِلٰهَ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ
वा इलाहा इब्राहीम व इस्माईल
और इब्राहीम और इस्माईल के माबूद,

وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلاسْبَاطِ
वा इस्हाक़ व याक़ूब वल-असबात
और इस्हाक़, याक़ूब और तमाम क़बीलों के,

اسْالُكَ انْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अस-अलुका अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिन व आले मुहम्मद
मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दुरूद भेज,

وَانْ تَوَلاَّنِي بِرَحْمَتِكَ
वा अन तवल्लानी बिरहमतिका
और अपनी रहमत से मेरी सरपरस्ती फ़रमा,

وَلاَ تُسَلِّطْ عَلَيَّ احَداً مِنْ خَلْقِكَ
वा ला तुसल्लित अलय्य अहदन मिन ख़लक़िका
और अपनी मख़लूक़ में से किसी को मुझ पर मुसल्लत न कर,

مِمَّنْ لاَ طَاقَةَ لِي بِهِ
मिम्मन ला ताक़ता ली बिही
जिसका बोझ उठाने की मुझमें ताक़त न हो,

اللَّهُمَّ إِنِّي اتَحَبَّبُ إِلَيْكَ فَحَبِّبْنِي
अल्लाहुम्मा इन्नी अतहब्बबु इलैक फ़हब्बिबनी
ऐ अल्लाह! मैं तेरी मोहब्बत चाहता हूँ, तू भी मुझे महबूब बना दे,

وَفِي ٱلنَّاسِ فَعَزِّزْنِي
वा फ़िन्नासि फ़अज़्ज़िज़नी
और लोगों के बीच मुझे इज़्ज़त और क़ुबूलियत अता फ़रमा,

وَمِنْ شَرِّ شَّيَاطِينِ ٱلْجِنِّ وَٱلإِنْسِ فَسَلِّمْنِي
वा मिन शर्रि श्शयातीनिल-जिन्नि वल-इंसि फ़सल्लिमनी
और जिन्नों और इंसानों के शैतानों के हर शर से मुझे महफ़ूज़ रख।

يَا رَبَّ ٱلْعَالَمِينَ
या रब्बल आलमीन
ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार,

وَصَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
वा सल्लि अला मुहम्मदिं व आलेही
और मुहम्मद और उनकी आले पर दरूद नाज़िल फ़रमा।


Responsive image


4. इशा की नाफ़िला नमाज़
नाफ़िला नमाज़ दो रकअत होती है और इसे बैठकर पढ़ा जाता है। पहली रकअत में सूरह वाक़िआ (56) और दूसरी रकअत में सूरह तौहीद पढ़ना मुस्तहब है।

5. इमाम हसन अस्करी (अ.) ने इशा की नाफ़िला के बाद हर ज़रूरत के लिए 100 मर्तबा सलवात पढ़ने की तौसीया फ़रमाई है।
हवाला

6. इशा के बाद की तिलावत – इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) से, अब्दुर्रहमान द्वारा रिवायत की गई।
दो रकअत नमाज़ पढ़ें।
7. फिर अपना दायाँ गाल ज़मीन पर रखकर यह कहें:
يَا مُذِلَّ كُلِّ جَبَّارٍ وَمُعِزَّ كُلِّ ذَليلٍ قَدْ وَحَقِّكَ بَلِّغْ مَجْهُودِي
या मुज़िल्ला कुल्लि जब्बारिन व मु’इज़्ज़ा कुल्लि ज़लीलिन क़द व हक़्क़िका बल्लिघ मजहूदी
ऐ हर सरकश को ज़लील करने वाले और हर ज़लील को इज़्ज़त देने वाले, अपने हक़ की क़सम मेरी पूरी कोशिश को क़ुबूल फ़रमा।
इसे राहत के लिए तीन रातों तक पढ़ें।


8. दो रकअत नमाज़
पहली रकअत: सूरह हम्द, आयतुल कुर्सी, सूरह काफ़िरून
दूसरी रकअत: सूरह हम्द और 30 मर्तबा सूरह इख़्लास
फिर हाथ उठाकर यह कहें:
اَللّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ يَا مَنْ لَا تَرَاهُ الْعُيُونُ وَلَا تُخَالِطُهُ الظُّنُونُ
وَلَا يَصِفُهُ الْوَاصِفُونَ يَا مَنْ لَا تُغَيِّرُهُ الدُّهُورُ وَلَا تُبْلِيهِ الْأَزْمِنَةُ وَلَا تَحْمِلُهُ الْأُمُورُ
يَا مَنْ لَا يَذُوقُ الْمَوْتَ وَلَا يَخَافُ الْفَوْتَ
يَا مَنْ لَا تَضُرُّهُ الذُّنُوبُ وَلَا تَنْقُصُهُ الْمَغْفِرَةُ
صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ وَهَبْ لِي مَا لَا يَنْقُصُكَ وَاغْفِرْ لِي مَا لَا يَضُرُّكَ وَافْعَلْ بِي .
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका या मं ला तराहुल उयून व ला तुख़ालितुहूज़ ज़ुनून व ला यसिफ़ुहुल वासिफ़ून या मं ला तुग़य्यिरुहुद्दुहूर व ला तुब्लीहिल अज़मिना व ला तह्मिलुहुल उमूर या मं ला यज़ूक़ुल मौत व ला यख़ाफ़ुल फ़ौत या मं ला तज़ुर्रुहुद्दुनूब व ला तनक़ुसुहुल मग़फ़िरह सल्लि अला मुहम्मदिं व आलेही व हब ली मा ला यनक़ुसुक वग़्फ़िर ली मा ला यज़ुर्रुक वफ़अल बी
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सवाल करता हूँ ऐ वह जिसकी आँखें न देख सकें जिसे गुमान छू न सके जिसे बयान करने वाले बयान न कर सकें जिसे ज़माने न बदल सकें जिसे वक्त फ़ना न कर सके जो मौत को न चखे और ज़वाल से न डरे जिसे गुनाह नुक़सान न पहुँचाएँ और जिसकी मग़फ़िरत कम न हो मुहम्मद और उनकी आले पर दरूद भेज और मुझे वह अता फ़रमा जो तुझे कम न करे और मुझे वह बख़्श दे जो तुझे नुक़सान न दे।
अपनी ज़रूरतें माँगें
नــाफ़िــला
9. सूरह मुल्क (67) की तिलावत करें
10. यह दुआ पढ़ें : “अल्लाहुम्मा आफ़िना”
اَللّٰھُمَّ عَافِنَا مِنْ كُلِّ بَلَاءِ الدُّنْیَا
وَاصْرِفْ عَنَّا شَرَّ الدُّنْیَا وَ شَرَّ الْآخِرَۃِ
وَارْزُقْنَا خَیْرَ الدُّنْیَا وَ خَیْرَ الْآخِرَۃِ
بِفَضْلِکَ وَ رَحْمَتِکَ یَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِیْنَ.
अल्लाहुम्मा आफ़िना मिन कुल्लि बलाइद्दुन्या वस्रिफ़ अन्ना शर्रद्दुन्या व शर्रल आख़िरह वरज़ुक़ना ख़ैरद्दुन्या व ख़ैरल आख़िरह बि फ़ज़्लिका व रहमतिका या अरहमर राहिमीन
ऐ अल्लाह! हमें दुनिया की हर आफ़त से बचा और हमसे दुनिया और आख़िरत की हर बुराई दूर फ़रमा और हमें दुनिया की भलाई और आख़िरत की भलाई अता फ़रमा अपने फ़ज़्ल और रहमत से, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

11. यह पढ़ें: “अल्लाहुम्मा हाज़ा सलाती”
اَللّٰهُمَّ هٰذِهٖ صَلَاتِي صَلَّيْتُهَا لَا لِحَاجَةٍ مِنْكَ‏ إِلَيْهَا وَ لَا رَغْبَةٍ مِنْكَ فِيْهَا إِلَّا تَعْظِيمًا وَ طَاعَةً وَ إِجَابَةً لَّكَ إِلىٰ مَا أَمَرْتَنِي
अल्लाहुम्मा हाज़िही सलाती सल्लैतुहा ला लिहाजतिं मिंका इलैहा व ला रग़्बतिं मिंका फीहा इल्ला तअज़ीमन व ताअतन व इजाबतन लका इला मा अमरतनी
ऐ अल्लाह! यह मेरी वह नमाज़ है जो मैंने अदा की, न तुझसे किसी ज़रूरत के लिए और न किसी निजी चाहत के लिए, बल्कि तेरी अज़मत के इज़हार, तेरी इताअत और तेरे हुक्म की पैरवी के तौर पर।
إِلَهِي إِنْ كَانَ فِيْهَا خَلَلٌ أَوْ نَقْصٌ مِنْ رُكُوْعِهَا أَوْ سُجُوْدِهَا أَوْ قِیَامِھَا أَوْ قُعُوْدِھَا فَلَا تُؤَاخِذْنِي وَ تَفَضَّلْ عَلَيَّ بِالْقَبُوْلِ وَ الْغُفْرَانِ بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ‏.
इलाही इन कान फीहा खललुन औ नक़्सुन मिर रुकूइहा औ सुजूदिहा औ क़ियामिहा औ क़उऊदिहा फ़ला तुआख़िज़नी व तफ़ज़्ज़ल अ़लय्य बिल क़ुबूलि वल ग़ुफ़रान बि रहमतिका या अरहमर राहिमीन
ऐ मेरे माबूद! अगर इस नमाज़ में रुकू, सज्दा, क़ियाम या क़उद में कोई कमी या ख़ामी रह गई हो तो मुझे गिरफ़्त में न लेना, बल्कि अपनी रहमत से इसे क़ुबूल फ़रमा और मुझे बख़्श दे, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

12. फिर यह पढ़ें: "अऊज़ु बि इज़्ज़तिल्लाह"
أَعُوْذُ بِعِزَّةِ اللہِ وَ أَعُوْذُ بِقُدْرَةِ اللہ وَ أَعُوْذُ بِمَغْفِرَةِ اللہِ وَ أَعُوْذُ بِرَحْمَةِ اللہِ وَ أَعُوْذُ بِسُلْطَانِ اللہِ الَّذِيْ‏ هُوَ عَلىٰ‏ كُلِّ شَيْ‏ءٍ قَدِيْرٌوَ
अऊज़ु बि इज़्ज़तिल्लाह व अऊज़ु बि क़ुदरतिल्लाह व अऊज़ु बि मग़फ़िरतिल्लाह व अऊज़ु बि रहमतिल्लाह व अऊज़ु बि सुल्तानिल्लाह अल्लज़ी हु्वा अला कुल्लि शैइ़न क़दीर
मैं अल्लाह की इज़्ज़त की पनाह चाहता हूँ, और अल्लाह की क़ुदरत की पनाह चाहता हूँ, और अल्लाह की मग़फ़िरत की पनाह चाहता हूँ, और अल्लाह की रहमत की पनाह चाहता हूँ, और अल्लाह की बादशाहत की पनाह चाहता हूँ, जो हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखता है।

أَعُوْذُ بِكَرَمِ اللہِ وَ أَعُوْذُ بِجَمْعِ اللہِ مِنْ شَرِّ كُلِّ جَبَّارٍ عَنِيْدٍ وَ شَيْطَانٍ مَرِيْدٍ وَ كُلِّ مُغْتَالٍ وَ سَارِقٍ وَ عَارِضٍ
अऊज़ु बि करमिल्लाह व अऊज़ु बि जम्अिल्लाह मिन शर्रि कुल्लि जब्बारिन अनीद व शैतानिन मरीद व कुल्लि मुग़्ताल व सारिक़ व आरिज़
और मैं अल्लाह के करम की पनाह चाहता हूँ हर सरकश ज़ालिम, सरकश शैतान, घात लगाकर हमला करने वाले, चोर और हर अचानक आने वाली आफ़त से।

وَ مِنْ شَرِّ السَّامَّةِ وَ الْهَامَّةِ وَ الْعَامَّةِ
व मिन शर्रिस साम्मह वल हाम्मह वल आम्मह
और हर ज़हरीले जानवर, हानिकारक कीड़े और आम लोगों की बुराई से।

وَ مِنْ شَرِّ كُلِّ دَابَّةٍ صَغِيْرَةٍ وَ كَبِيْرَةٍ بِلَيْلٍ أَوْ نَهَارٍ
व मिन शर्रि कुल्लि दाब्बतिन सग़ीरा व कब़ीरा बि लै़लिन औ नहार
और हर छोटे-बड़े जानवर की बुराई से, चाहे रात हो या दिन।

وَ مِنْ شَرِّ فُسَّاقِ الْعَرَبِ وَ الْعَجَمِ وَ فُجَّارِهِمْ
व मिन शर्रि फ़ुस्साक़िल अरब वल अजम व फ़ुज्जारिहिम
और अरब व अजम के फ़ासिक़ों और उनके गुनाहगारों की बुराई से।

وَ مِنْ شَرِّ فَسَقَةِ الْجِنِّ وَ الْإِنْسِ
व मिन शर्रि फ़सक़तिल जिन्न वल इंस
और जिन्नों और इंसानों में से हर फ़ासिक़ की बुराई से।

وَ مِنْ شَرِّ كُلِّ دَابَّةٍ رَبِّي‏ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهَا إِنَّ رَبِّي عَلىٰ‏ صِرَاطٍ مُسْتَقِيْمٍ‏.
व मिन शर्रि कुल्लि दाब्बतिन रब्बी आख़िज़ुन बि नासियतिहा इन्ना रब्बी अला सिरातिम मुस्तक़ीम
और हर उस मख़लूक़ की बुराई से जिसकी पेशानी मेरे रब के क़ब्ज़े में है। यक़ीनन मेरा रब सीधी राह पर है।

13. फिर यह पढ़ें: “अल्लाहुम्मा बि हक़्क़े मुहम्मद…”
اَللّٰهُمَّ بِحَقِّ مُحَمَّدٍ وَّ آلِ مُحَمَّدٍ صَلِّ عَلىٰ مُحَمَّدٍ وَّ آلِ مُحَمَّدٍ
अल्लाहुम्मा बि हक़्क़े मुहम्मद व आले मुहम्मद सल्लि अला मुहम्मद व आले मुहम्मद
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद के हक़ के वास्ते मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दरूद नाज़िल फ़रमा।

وَ لَا تُؤْمِنَّا مَكْرَكَ وَ لَا تُنْسِنَا ذِكْرَكَ وَ لَا تَكْشِفْ عَنَّا سِتْرَكَ
व ला तूमिन्ना मकरक व ला तुन्सिना ज़िक्रक व ला तक्शिफ़ अन्ना सित्रक
हमें अपने मकर से महफ़ूज़ रख, हमें अपनी याद से ग़ाफ़िल न कर, और हमारी उन कमज़ोरियों को ज़ाहिर न कर जिन पर तूने पर्दा डाला है।

وَ لَا تَحْرِمْنَا فَضْلَكَ‏ وَ لَا تُحِلَّ عَلَيْنَا غَضَبَكَ وَ لَا تُبَاعِدْنَا مِنْ جِوَارِكَ وَ لَا تَنْقُصْنَا مِنْ رَحْمَتِكَ
व ला तहरिमना फ़ज़्लक व ला तुहिल्ल अलेना ग़ज़बक व ला तुबाअिदना मिन जिवारक व ला तन्क़ुसना मिन रहमतक
हमें अपने फ़ज़्ल से महरूम न कर, हम पर अपना ग़ज़ब न उतार, हमें अपनी क़ुर्बत से दूर न कर, और अपनी रहमत में कोई कमी न फ़रमा।

وَ لَا تَنْزِعْ مِنَّا بَرَكَتَكَ وَ لَا تَمْنَعْنَا عَافِيَتَكَ وَ أَصْلِحْ لَنَا مَا أَعْطَيْتَنَا
व ला तनज़िअ् मिन्ना बरकतक व ला तम्नअ़ना आफ़ियतक व अस्लिह् लना मा आअ़तैतना
हमसे अपनी बरकत न छीन, हमें अपनी आफ़ियत से महरूम न कर, और जो कुछ तूने हमें अता किया है उसे हमारे लिए दुरुस्त और बेहतर बना।

وَ زِدْنَا مِنْ فَضْلِكَ الْمُبَارَكِ الطَّيِّبِ الْحَسَنِ الْجَمِيْلِ وَ لَا تُغَيِّرْ مَا بِنَا مِنْ نِعْمَتِكَ وَ لَا تُؤْيِسْنَا مِنْ رَوْحِكَ وَ لَا تُهِنَّا بَعْدَ كَرَامَتِكَ
व ज़िदना मिन फ़ज़्लिकल मुबारक अत्तय्यिबिल हसनिल जमी़ल व ला तुग़य्यिर मा बिऩा मिन नेमतक व ला तुईसना मिन रौहिक व ला तुहिन्ना बा‘दा करामतिक
और हमें अपने मुबारक, पाक, बेहतर और ख़ूबसूरत फ़ज़्ल में और इज़ाफ़ा फ़रमा, हम पर जो नेमतें तूने अता की हैं उन्हें बदल न दे, हमें अपनी रहमत से मायूस न कर, और अपनी अज़मत देने के बाद हमें ज़लील न कर।

وَ لَا تُضِلَّنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنا وَ هَبْ لَنا مِنْ لَدُنْكَ رَحْمَةً إِنَّكَ أَنْتَ الْوَهَّابُ‏
व ला तुदिल्लना बा‘दा इज़ हदैतना व हब लना मिन लदुनका रह्मह इन्नका अन्तल वह्हाब
हमें हिदायत देने के बाद गुमराह न कर, और हमें अपनी तरफ़ से ख़ास रहमत अता फ़रमा, बेशक तू ही बहुत देने वाला है।

اَللّٰهُمَّ اجْعَلْ قُلُوْبَنَا سَالِمَةً وَ أَرْوَاحَنَا طَيِّبَةً وَ أَزْوَاجَنَا مُطَهَّرَةً وَ أَلْسِنَتَنَا صَادِقَةً وَ إِيْمَانَنَا دَائِماً وَ يَقِيْنَنَا صَادِقاً وَ تِجَارَتَنَا لَا تَبُورُ
अल्लाहुम्मज्‘अल कुलूबना सालिमह व अरवाहना तय्यिबह व अजवाजना मुतह्हरह व अल्सिनतना सादिक़ह व ईमानना दाइमं व यक़ीनना सादिक़ं व तिजारतना ला तबूर
ऐ अल्लाह! हमारे दिलों को पाक रख, हमारी रूहों को अच्छा बना, हमारे जोड़ों को पाकीज़ा रख, हमारी ज़बानों को सच्चा बना, हमारे ईमान को हमेशा क़ायम रख, हमारे यक़ीन को सच्चा बना, और हमारी रोज़ी-रोटी को नुक़सान से बचा।

اللَّهُمَ‏ آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَ فِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَ قِنَا عَذَابَ النَّارِ.
अल्लाहुम्मा आतिना फिद्दुन्या हसनह व फ़िल आख़िरति हसनह व क़िना अज़ाबन्नार
ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई अता फ़रमा और आख़िरत में भी भलाई अता फ़रमा, और हमें आग के अज़ाब से बचा।

14.सहीफ़ा-ए-महदी (अज्त्फ़स) से : किताब “जमाली सालेहीन” में इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया :
शियाओं पर हमारे हक़ों में से यह है कि फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद ठुड्डी पर हाथ रखकर नीचे दी गई दुआ तीन बार पढ़ें :
يا رَبَّ مُحَمَّدٍ عَجِّلْ فَرَجَ آلِ مُحَمَّدٍ ، يا رَبَّ مُحَمَّدٍ إِحْفَظْ غَيْبَةَ مُحَمَّدٍ ، يا رَبَّ مُحَمَّدٍ إِنْتَقِمْ لِابْنَةِ مُحَمَّدٍ عليهما السلام .
या रब्ब-ए-मुहम्मद, अज्जिल फ़रज आल-ए-मुहम्मद। या रब्ब-ए-मुहम्मद, इह्फ़ज़ गैबत-ए-मुहम्मद। या रब्ब-ए-मुहम्मद, इंतक़ाम ले इब्नत-ए-मुहम्मद अलैहिमस्सलाम।
ऐ मुहम्मद के रब! आल-ए-मुहम्मद की जल्द राहत फ़रमा। ऐ मुहम्मद के रब! मुहम्मद की ग़ैबत की हिफ़ाज़त फ़रमा। ऐ मुहम्मद के रब! मुहम्मद की बेटी का बदला ले (उन पर सलाम हो)।


15.रिवायत में आया है कि जो शख़्स इशा की नमाज़ के बाद इस दुआ को लगातार पढ़े, वह ज़िन्दगी से ऊबने तक जीवित रहेगा और उसे ज़माने के इमाम से मुलाक़ात का शरफ़ हासिल होगा (अल्लाह उनके ज़ुहूर में जल्दी फ़रमाए) :
أَللَّهُمَّ صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ . أَللَّهُمَّ إنَّ رَسُولَكَ الصَّادِقَ الْمُصَدَّقَ صَلَواتُكَ عَلَيْهِ وَآلِهِ قالَ إِنَّكَ قُلْتَ ما تَرَدَّدْتُ في شَيْ‏ءٍ أَنَا فاعِلُهُ كَتَرَدُّدي في قَبْضِ رُوحِ عَبْدِيَ الْمُؤْمِنِ، يَكْرَهُ الْمَوْتَ وَأَنَا أَكْرَهُ مَساءَتَهُ .
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आले मुहम्मद। अल्लाहुम्मा इन्ना रसूलकस्सादिक़ल मुसद्दक़ सलवातुका अलैहि व आलेहि क़ाला इन्नका क़ुल्ता मा तरद्दद्तु फ़ी शैइन अना फ़ाइलुहू कतरद्दुदी फ़ी क़ब्ज़े रूहे अब्दियल मोमिन, यक़्रहुल मौत व अना अक़रहु मसाअतहू।
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले-मुहम्मद पर दुरूद भेज। ऐ अल्लाह! तेरे सच्चे और तस्दीक़शुदा रसूल ने बयान किया है कि तूने फ़रमाया : मैं किसी काम में उतना ठिठकता नहीं जितना अपने मोमिन बन्दे की रूह क़ब्ज़ करने में, वह मौत को नापसंद करता है और मुझे उसे तकलीफ़ देना नापसंद है।

أَللَّهُمَّ فَصَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ ، وَعَجِّلْ لِوَلِيِّكَ الْفَرَجَ ، وَالنَّصْرَ وَالْعافِيَةَ ، وَلاتَسُؤْني في نَفْسي ، وَلا في فُلانٍ .
अल्लाहुम्मा फ़सल्लि अला मुहम्मद व आले मुहम्मद, व अज्जिल लिवलिय्यिकल फ़रज, वन्नस्र वल-आफ़ियत, व ला तसुअनी फ़ी नफ़्सी, व ला फ़ुलान।
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले-मुहम्मद पर दुरूद भेज, और अपने वली की जल्द राहत फ़रमा, नुसरत और आफ़ियत अता कर, और न मुझे मेरे नफ़्स के ज़रिये नुक़सान पहुँचा और न किसी फ़लाँ शख़्स के ज़रिये।

16.नीचे दी गई दुआ पढ़ें : (अब केवल उर्दू – हिंदी देवनागरी में उपलब्ध)
“ऐ अल्लाह! मैं तुझसे खुशदिल सब्र माँगता हूँ, बड़ा अज्र चाहता हूँ; सच्ची रुजूअत चाहता हूँ; ज़िक्र करने वाली ज़बान चाहता हूँ; बर्दाश्त करने वाला बदन चाहता हूँ; बढ़ा हुआ रिज़्क़, नफ़ा देने वाला इल्म और अच्छे आमाल चाहता हूँ; क़ुबूल होने वाली दुआ चाहता हूँ; बख़्शा हुआ गुनाह चाहता हूँ; हलाल और पाक रोज़ी चाहता हूँ; नेक और सलीक़ेदार औलाद चाहता हूँ; मुकम्मल शिफ़ा चाहता हूँ; बरकत वाली मंज़िल चाहता हूँ; क़रीबी फ़तह चाहता हूँ; और हमेशा की नेअमत, जन्नत, रेशम, ताज़गी, ताक़त और सुकून चाहता हूँ — तेरी रहमत से, ऐ सब से ज़्यादा रहम करने वाले!”



पढ़ें सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा (स.) की ईशा की नमाज़ के बाद की दुआ

سُبْحَانَ مَنْ تَوَاضَعَ كُلُّ شَيْ‏ءٍ لِعَظَمَتِهٖ، سُبْحَانَ مَنْ ذَلَّ كُلُّ شَيْ‏ءٍ لِعِزَّتِهٖ، سُبْحَانَ مَنْ خَضَعَ كُلُّ شَيْ‏ءٍ لِاَمْرِهٖ وَ مُلْكِهٖ.
सुब्हान मन तवाज़ा-अ कुल्लु शै-इन लि-अज़मतिही, सुब्हान मन ज़ल्ला कुल्लु शै-इन लि-इज़्ज़तिही, सुब्हान मन ख़ज़ा-अ कुल्लु शै-इन लि-अम्रिही व मुल्किही।
पाक है वह ज़ात जिसके जलाल के आगे हर चीज़ झुक जाती है। पाक है वह जिसकी क़ुदरत के सामने हर चीज़ बेबस हो जाती है। पाक है वह जिसकी हुकूमत और हुक्म के आगे हर चीज़ सर झुका देती है।

سُبْحَانَ مَنِ انْقَادَتْ لَهُ الْاُمُوْرُ بِاَزِمَّتِهَا.
सुब्हान मनिन इनक़ादत लहुल उमूरु बि-अज़िम्मतिहा।
पाक है वह जिसके हुक्म से तमाम मामले क़ाबू में आ जाते हैं।

اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ لَا يَنْسٰى مَنْ ذَكَرَهٗ، اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ لَا يَخِيْبُ مَنْ دَعَاهُ، اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ مَنْ تَوَكَّلَ عَلَيْهِ كَفَاهُ.
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी ला यंसा मन ज़करहू, अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी ला यखीबु मन दआहू, अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी मन तवक्कल अ़लैहि कफ़ाहू।
तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जो अपने ज़िक्र करने वालों को नहीं भूलता, जो पुकारने वालों को मायूस नहीं करता, और जो उस पर भरोसा करने वालों के लिए काफ़ी हो जाता है।

اَلْحَمْدُ لِلهِ سَامِكِ السَّمَاءِ، وَ سَاطِحِ الْاَرْضِ، وَ حَاصِرِ الْبِحَارِ وَ نَاضِدِ الْجِبَالِ، وَ بَارِءِ الْحَيَوَانِ، وَ خَالِقِ الشَّجَرِ، وَ فَاتِحِ يَنَابِيْعِ الْاَرْضِ، وَ مُدَبِّرِ الْاُمُوْرِ، وَ مُسَيِّرِ السَّحَابِ، وَ مُجْرِيْ الرِّيْحِ وَ الْمَاءِ وَ النَّارِ مِنْ اَغْوَارِ الْاَرْضِ مُتَسَارِعَاتٍ فِيْ الْهَوَاءِ، وَ مُهْبِطِ الْحَرِّ وَ الْبَرْدِ.
अल्हम्दु लिल्लाहि सामिकिस्समाआ, व सातेहिल अरज़, व हासिरिल बिह़ारि व नाज़िदिल जिबाल, व बारिअ़िल हयवान, व ख़ालिक़िश्शजर, व फ़ातिहि यनाबीअ़िल अरज़, व मुदब्बिरिल उमूर, व मुसैय्यिरिस्सहाब, व मुज्रीर्रिहि वल माआइ वन्नारि मिन अग़वारिल अरज़ि मुतसारिअ़ातिन फ़िल हवाआइ, व मुहब्बितिल हर्रि वल बर्द।
तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जो आसमान को बुलंद करने वाला, ज़मीन को फैलाने वाला, समंदरों को क़ाबू में रखने वाला, पहाड़ों को जमाने वाला, जानदारों को पैदा करने वाला, दरख़्तों को उगाने वाला, ज़मीन से चश्मे निकालने वाला, तमाम कामों का निज़ाम चलाने वाला, बादलों को चलाने वाला, हवा, पानी और आग को ज़मीन की गहराइयों से निकाल कर फिज़ा में दौड़ाने वाला, और गर्मी व सर्दी उतारने वाला है।

اَلَّذِيْ بِنِعْمَتِهٖ تَتِمُّ الصَّالِحَاتُ، وَ بِشُكْرِهٖ تُسْتَوْجَبُ الزِّيَادَاتُ وَ بِاَمْرِهٖ قَامَتِ السَّمَاوَاتُ، وَ بِعِزَّتِهِ اسْتَقَرَّتِ الرَّاسِياتُ، وَ سَبَّحَتِ الْوُحُوْشُ فِيْ الْفَلَوَاتِ، وَ الطَّيْرُ فِيْ الْوَكَنَاتِ.
अल्लज़ी बि-निअ़मतिही ततिम्मुस्सालिहात, व बि-शुक्रिही तुस्तौजबुज़् ज़ियादात, व बि-अम्रिही क़ामतिस्समावात, व बि-इ़ज़्ज़तिही इस्तक़र्रतिर्रासियात, व सब्बहतिल वुहूशु फिल फ़लवात, वत्तैरु फिल वकनात।
वह अल्लाह कि जिसकी नेमत से नेकियाँ पूरी होती हैं, और जिसके शुक्र से नेमतों में इज़ाफ़ा होता है, और जिसके हुक्म से आसमान क़ायम हैं, और जिसकी इज़्ज़त से पहाड़ जमा हुए हैं। जंगलों के जानवर और घोंसलों के परिंदे सब उसी की तस्बीह करते हैं।

اَلْحَمْدُ لِلهِ رَفِيْعِ الدَّرَجَاتِ، مُنْزِلِ الْاٰيَاتِ، وَاسِعِ الْبَرَكَاتِ، سَاتِرِ الْعَوْرَاتِ، قَابِلِ الْحَسَنَاتِ، مُقِيْلِ الْعَثَرَاتِ، مُنَفِّسِ الْكُرُبَاتِ، مُنْزِلِ الْبَرَكَاتِ، مُجِيْبِ الدَّعَوَاتِ، مُحْيِيْ الْاَمْوَاتِ، اِلٰهِ مَنْ فِيْ الْاَرْضِ وَ السَّمَاوَاتِ.
अल्हम्दु लिल्लाहि रफ़ीउद्दरजात, मुनज़िलिल आयात, वासिअ़िल बरकात, सातिरिल औ़रात, क़ाबिलिल हसनात, मुक़ीलिल अ़सरात, मुनफ़्फ़िसिल कुरुबात, मुनज़िलिल बरकात, मुजीबिद्दअ़वात, मुह्यिल अम्वात, इलाहि मन फिल अरज़ि वस्समावात।
तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जिसके दर्जे बुलंद हैं, जो आयतें नाज़िल करने वाला है, जिसकी बरकतें वसीअ़ हैं, जो ऐबों को ढाँपने वाला है, नेकीयों को क़बूल करने वाला है, ठोकरों को माफ़ करने वाला है, घबराहट दूर करने वाला है, दुआओं को क़बूल करने वाला है, मुर्दों को ज़िंदा करने वाला है, और ज़मीन व आसमानों वालों का माबूद है।

اَلْحَمْدُ لِلهِ عَلٰى كُلِّ حَمْدٍ وَ ذِكْرٍ، وَ شُكْرٍ وَ صَبْرٍ، وَ صَلَاةٍ وَ زَكَاةٍ وَ قِيَامٍ وَ عِبَادَةٍ، وَ سَعَادَةٍ وَ بَرَكَةٍ، وَ زِيَادَةٍ وَ رَحْمَةٍ، وَ نِعْمَةٍ وَ كَرَامَةٍ وَ فَرِيْضَةٍ وَ سَرَّاءٍ وَ ضَرَّاءٍ، وَ شِدَّةٍ وَ رَخَاءٍ، وَ مُصِيْبَةٍ وَ بَلَاءٍ، وَ عُسْرٍ وَ يُسْرٍ، وَ غِنَاءٍ وَ فَقْرٍ، وَ عَلٰى كُلِّ حَالٍ، وَ فِيْ كُلِّ اَوَانٍ وَ زَمَانٍ، وَ (فِىْ) كُلِّ مَثْوًى وَ مُنْقَلَبٍ وَ مُقَامٍ.
अल्हम्दु लिल्लाहि अ़ला कुल्लि हम्दिं व ज़िक्रिं, व शुक्रिं व सब्रिं, व सलातिं व ज़कातिं व क़ियामिं व इ़बादतिं, व सआदतिं व बरकतिं, व ज़ियादतिं व रहमतिं, व निअ़मतिं व करामतिं व फ़रीज़तिं व सर्राइं व ज़र्राइं, व शिद्दतिं व रखाइं, व मुसीबतिं व बलाइं, व उ़स्रिं व युस्रिं, व ग़िनाइं व फ़क़्रिं, व अ़ला कुल्लि हालिं, व फ़ी कुल्लि अवानिं व ज़मानिं, व (फ़ी) कुल्लि मसवां व मुन्क़लबिं व मुक़ामिं।
तमाम हम्द अल्लाह के लिए है हर हम्द, हर ज़िक्र, हर शुक्र और सब्र पर, हर नमाज़, ज़कात, क़ियाम और इबादत पर, हर खुशी और बरकत पर, हर बढ़ोतरी और रहमत पर, हर नेमत और इज़्ज़त पर, हर आराम और तकलीफ़ पर, हर सख़्ती और आसानी पर, हर मुसीबत और राहत पर, हर तंगी और फराख़ी पर, हर हालत, हर वक़्त, हर ठिकाने और हर लौटने की जगह पर।

اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ عَائِذٌ بِكَ فَاَعِذْنِيْ، وَ مُسْتَجِيْرٌ بِكَ فَاَجِرْنِيْ، وَ مُسْتَعِيْنٌ بِكَ فَاَعِنِّيْ، وَ مُسْتَغِيْثٌ بِكَ فَاَغِثْنِيْ، وَ دَاعِيْكَ فَاَجِبْنِيْ، وَ مُسْتَغْفِرُكَ فَاغْفِرْ لِيْ.
अल्लाहुम्मा इन्नी आ़इज़ुन बिका फ़ा-अ़इज़नी, व मुस्तजीरुन बिका फ़ा-अजिरनी, व मुस्तअ़ईनुन बिका फ़ा-अ़इन्नी, व मुस्तग़ीसुन बिका फ़ा-अ़ग़िसनी, व दाइ़यक फ़ा-अजिबनी, व मुस्तग़फ़िरुक फ़ग़फ़िर ली।
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ, तू मुझे पनाह दे। मैं तुझसे मदद माँगता हूँ, तू मेरी मदद कर। मैं तुझसे फ़रियाद करता हूँ, तू मेरी फ़रियाद क़बूल कर। मैं तुझसे मग़फ़िरत चाहता हूँ, तू मुझे माफ़ फ़रमा।

وَ مُسْتَنْصِرُكَ فَانْصُرْنِيْ، وَ مُسْتَهْدِيْكَ فَاهْدِنِيْ، وَ مُسْتَكْفِيْكَ فَاكْفِنِيْ.
व मुस्तन्सिरुका फ़न्सुरनी, व मुस्तहदीका फ़हदिनी, व मुस्तक़फ़ीका फ़क़फ़िनी।
और मैं तुझसे मदद चाहता हूँ तो मेरी मदद फ़रमा, और मैं तुझसे हिदायत चाहता हूँ तो मुझे हिदायत दे, और मैं तुझसे किफ़ायत चाहता हूँ तो मुझे काफ़ी हो जा।

وَ مُلْتَجِأٌ اِلَيْكَ فَاٰوِنِيْ، وَ مُسْتَمْسِكٌ بِحَبْلِكَ فَاعْصِمْنِيْ.
व मुल्तजिअ़ुन इलैका फ़आविनी, व मुस्तम्सिकुन बिहबलिका फ़अ़सिमनी।
और मैं तेरी पनाह लेता हूँ तो मुझे पनाह दे, और मैं तेरी रस्सी को थामे हुए हूँ तो मेरी हिफ़ाज़त फ़रमा।

وَ مُتَوَكِّلٌ عَلَيْكَ فَاكْفِنِيْ، وَ اجْعَلْنِيْ فِيْ عِيَاذِكَ وَ جِوَارِكَ وَ حِرْزِكَ وَ كَهْفِكَ وَ حِيَاطَتِكَ وَ حَرَاسَتِكَ وَ كَلَاءَتِكَ وَ حُرْمَتِكَ وَ اَمْنِكَ.
व मुतवक्किलुन अलैका फ़क़फ़िनी, वज्अलनी फ़ी इ़याज़िका व जिवारिका व हिरज़िका व कहफ़िका व हियाततिका व हिरासतिका व क़लाअतिका व हुरमतिका व अम्निका।
और मैं तुझ पर भरोसा करता हूँ तो मुझे काफ़ी हो जा, और मुझे अपनी पनाह में, अपने पड़ोस में, अपनी हिफ़ाज़त में, अपनी शरण में, अपनी निगरानी में, अपनी रखवाली में, अपनी हुरमत में और अपने अम्न में रख।

وَ تَحْتَ ظِلِّكَ، وَ تَحْتَ جَنَاحِكَ، وَ اجْعَلْ عَلَيَّ جُنَّةً وَاقِيَةً مِنْكَ.
व तहत ज़िल्लिका, व तहत जनाहिका, वज्अल अ़लय्य जुन्नतन वाक़ियतन मिंका।
और मुझे अपने साये के नीचे रख, और अपने परों की पनाह में रख, और मेरी खातिर अपनी तरफ़ से बचाने वाली ढाल मुक़र्रर फ़रमा।

وَ اجْعَلْ حِفْظَكَ وَ حِيَاطَتَكَ وَ حِرَاسَتَكَ وَ كَلَاءَتَكَ، مِنْ وَرَائِيْ وَ اَمَامِيْ وَ عَنْ يَمِيْنِيْ وَ عَنْ شِمَالِيْ، وَ مِنْ فَوْقِيْ وَ مِنْ تَحْتِيْ، وَ حَوَالِيَّ حَتّٰى لَا يَصِلَ اَحَدٌ مِنَ الْمَخْلُوْقِيْنَ اِلٰى مَكْرُوْهِيْ وَ اَذَايَ، لَا اِلٰهَ اِلَّا اَنْتَ اَنْتَ الْمَنَّانُ، بَدِيْعُ السَّمَاوَاتِ وَ الْاَرْضِ، ذُو الْجَلَالِ وَ الْاِكْرَامِ.
वज्अल हिफ़्ज़का व हियाततका व हिरासतका व क़लाअतका, मिन वराई व अमामी व अ़न यमीनी व अ़न शिमाली, व मिन फ़ौक़ी व मिन तहती, व हवालय्य हत्ता ला यसिल अहदुन मिनल मख़लूक़ीना इला मकरूही व अ़ज़ाया, ला इलाहा इल्ला अंत, अंतल मन्नानु, बदीउस्समावाति वल-अ़र्ज़ि, ज़ुल जलालि वल-इकराम।
और अपनी हिफ़ाज़त, अपनी निगहबानी, अपनी रखवाली और अपनी निगरानी मुझे अता फ़रमा—मेरे पीछे, मेरे आगे, मेरे दाहिने, मेरे बाएँ, मेरे ऊपर, मेरे नीचे और मेरे चारों ओर—यहाँ तक कि किसी भी मख़लूक़ में से कोई मेरे नापसंद और मेरी तकलीफ़ तक न पहुँच सके। तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू ही बहुत देने वाला है, आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला, जलाल और इकराम वाला।

اَللّٰهُمَّ اكْفِنِيْ حَسَدَ الْحَاسِدِيْنَ، وَ بَغْيَ الْبَاغِيْنَ، وَ كَيْدَ الْكَائِدِيْنَ، وَ مَكْرَ الْمَاكِرِيْنَ، وَ حِيْلَةَ الْمُحْتَالِيْنَ، وَ غِيْلَةَ الْمُغْتَالِيْنَ، وَ ظُلْمَ الظَّالِمِيْنَ، وَ جَوْرَ الْجَائِرِيْنَ، وَ اعْتِدَاءَ الْمُعْتَدِيْنَ، وَ سَخَطَ الْمُسْخِطِيْنَ، وَ تَشَحُّبَ الْمُتَشَحِّبِيْنَ، وَ صَوْلَةَ الصَّائِلِيْنَ، وَ اقْتِسَارَ الْمُقْتَسِرِيْنَ، وَ غَشْمَ الْغَاشِمِيْنَ، وَ خَبْطَ الْخَابِطِيْنَ، وَ سِعَايَةَ السَّاعِيْنَ، وَ نَمَامَةَ النَّمَّامِيْنَ، وَ سِحْرَ السَّحَرَةِ وَ الْمَرَدَةِ وَ الشَّيَاطِيْنِ، وَ جَوْرَ السَّلَاطِيْنِ وَ مَكْرُوْهَ الْعَالَمِيْنَ.
अल्लाहुम्मकफ़िनी हसदाल हासिदीन, व बग़्यल बाग़ीन, व क़ैदल क़ाइदीन, व मक्रल माकरिन, व हीलतल मुहतालीन, व ग़ीलतल मुग़्तालीन, व ज़ुल्मज़ ज़ालिमीन, व जौरल जाइरीन, व इ़तिदाअल मुअ़तदीन, व सख़तल मुस्ख़ितीन, व तशह्हुबिल मुतशह्हिबीन, व सौलतस्साइलिन, व इक़्तिसारल मुक़्तसिरीन, व ग़शमल ग़ाशिमीन, व ख़ब्तल ख़ाबितीन, व सिआयतस्साईन, व नमामतन नम्मामीन, व सिहरिस्सहरति वल मरदति वश्शयातीन, व जौरस्सलातीन, व मकरूहल आलमीन।
ऐ अल्लाह! मुझे हसद करने वालों के हसद से, ज़्यादती करने वालों की ज़्यादती से, चाल चलने वालों की चाल से, धोखा देने वालों के धोखे से, ज़ुल्म करने वालों के ज़ुल्म से, सरकशी करने वालों की सरकशी से, जादूगरों, सरकशों और शैतानों के जादू से, हुक्मरानों के ज़ुल्म से और तमाम आलम की बुराइयों से काफ़ी हो जा।

اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ بِاسْمِكَ الْمَخْزُوْنِ الطَّيِّبِ الطَّاهِرِ، الَّذِيْ قَامَتْ بِهِ السَّمَاوَاتُ وَ الْاَرْضُ، وَ اَشْرَقَتْ لَهُ الظُّلَمُ، وَ سَبَّحَتْ لَهُ الْمَلَائِكَةُ وَ وَجِلَتْ مِنْهُ الْقُلُوْبُ، وَ خَضَعَتْ لَهُ الرِّقَابُ، وَ اُحْيِيَتْ بِهِ الْمَوْتٰى: اَنْ تَغْفِرَ لِيْ كُلَّ ذَنْبٍ اَذْنَبْتُهٗ فِيْ ظُلَمِ اللَّيْلِ وَ ضَوْءِ النَّهَارِ، عَمْدًا اَوْ خَطَأً سِرًّا اَوْ عَلَانِيَةً، وَ اَنْ تَهَبَ لِيْ يَقِيْنًا وَ هَدْيًا، وَ نُورًا وَ عِلْمًا وَ فَهْمًا حَتّٰى اُقِيْمَ كِتَابَكَ، وَ اُحِلَّ حَلَالَكَ، وَ اُحَرِّمَ حَرَامَكَ، وَ اُؤَدِّيَ فَرَائِضَكَ، وَ اُقِيْمَ سُنَّةَ نَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ ﷺ.
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका बिस्मिकल मख़ज़ूनित तय्यिबित ताहिर, अल्लज़ी क़ामत बिहिस्समावातु वल-अ़र्ज़, व अश्रक़त लहुझ़-ज़ुलम, व सब्बहत लहुल मलाइकतु व वजिलत मिनहुल क़ुलूब, व ख़ज़अ़त लहुर-रिक़ाब, व उह्यियत बिहिल मौता…
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरे उस पाक और छुपे हुए नाम के वसीले से सवाल करता हूँ, जिससे आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, जिससे अँधेरों में रोशनी फैलती है, जिससे फ़रिश्ते तस्बीह करते हैं और दिल काँप उठते हैं—कि तू मेरे तमाम गुनाह बख़्श दे और मुझे यक़ीन, हिदायत, नूर, इल्म और समझ अता फ़रमा।

اَللّٰهُمَّ اَلْحِقْنِيْ بِصَالِحِ مَنْ مَضٰى، وَ اجْعَلْنِيْ مِنْ صَالِحِ مَنْ بَقِيَ وَ اخْتِمْ لِيْ عَمَلِيْ بِاَحْسَنِهٖ، اِنَّكَ غَفُوْرٌ رَحِيْمٌ، اَللّٰهُمَّ اِذَا فَنٰي عُمْرِيْ وَ تَصَرَّمَتْ اَيَّامَ حَيَاتِيْ، وَ كَانَ لَا بُدَّ لِيْ مِنْ لِقَائِكَ، فَاَسْاَلُكَ - يَا لَطِيْفُ - اَنْ تُوْجِبَ لِيْ مِنَ الْجَنَّةِ مَنْزِلًا يَغْبِطُنِيْ بِهِ الْاَوَّلُوْنَ وَ الْاٰخِرُوْنَ.
अल्लाहुम्मा अल्हिक़नी बिसालिहि मन मज़ा, वज्अलनी मिन सालिहि मन बाक़िया वख़्तिम ली अमली बि-अहसनिहि…
ऐ अल्लाह! मुझे गुज़रे हुए नेक लोगों से मिला दे, बाक़ी रहने वालों में नेक बना दे, और मेरे अमल का ख़ातिमा बेहतरीन फ़रमा। जब मेरी उम्र पूरी हो जाए तो मुझे जन्नत में ऐसा मक़ाम अता फ़रमा जिस पर पहले और बाद वाले रश्क करें।

اَللّٰهُمَّ اقْبَلْ مِدْحَتِيْ وَ الْتِهَافِيْ وَ ارْحَمْ ضَرَاعَتِيْ وَ هُتَافِيْ وَ اِقْرَارِيْ عَلٰى نَفْسِيْ وَ اعْتِرَافِيْ، فَقَدْ اَسْمَعْتُكَ صَوْتِيْ فِيْ الدَّاعِيْنَ، وَ خُشُوْعِيْ فِيْ الضَّارِعِيْنَ، وَ مِدْحَتِيْ فِيْ الْقَائِلِيْنَ، وَ تَسْبِيْحِيْ فِيْ الْمَادِحِيْنَ.
अल्लाहुम्मक़्बल मिध़हती वल-इल्तिहाफ़ी वर्रह़म ज़राअ़ती व हुटाफ़ी व इक़रारी अ़ला नफ़्सी व इअ़तिराफ़ी, फ़क़द अस्मअ़तुक सौती फ़िद्दाअ़ीन, व खुशूअ़ी फ़िज़्ज़ारिअ़ीन, व मिध़हती फ़िल्क़ाइलिन, व तस्बीही फ़िल्मादिहीन।
ऐ अल्लाह! मेरी तारीफ़ को क़ुबूल फ़रमा, मेरी फ़रियाद और मेरी गिड़गिड़ाहट पर रहम फ़रमा, मेरे अपने ऊपर इकरार और एतराफ़ को स्वीकार कर। मैंने तुझ तक अपनी आवाज़ पुकारने वालों में पहुँचा दी, गिड़गिड़ाने वालों में अपनी आजिज़ी दिखा दी, कहने वालों में तेरी तारीफ़ की और तारीफ़ करने वालों में तेरी तस्बीह बयान की।

وَ اَنْتَ مُجِيْبُ الْمُضْطَرِّيْنَ، وَ مُغِيْثُ الْمُسْتَغِيْثِيْنَ، وَ غِيَاثُ الْمَلْهُوْفِيْنَ، وَ حِرْزُ الْهَارِبِيْنَ، وَ صَرِيْخُ الْمُؤْمِنِيْنَ، وَ مُقِيْلُ الْمُذْنِبِيْنَ وَ صَلَّى اللهُ عَلَى الْبَشِيْرِ النَّذِيْرِ وَ السِّرَاجِ الْمُنِيْرِ، وَ عَلَى الْمَلَائِكَةِ وَ النَّبِيِّيْنَ.
व अंत मुजीबुल मुज़्तर्रीन, व मुगीसुल मुस्तगीसीन, व ग़ियासुल मलहूफ़ीन, व हिर्ज़ुल हारिबीन, व सरीख़ुल मोमिनीन, व मुक़ीलुल मुज़्निबीन, व सल्लल्लाहु अ़लल बशीरीन नज़ीरी वस्सिराजिल मुनीर, व अ़लल मलाइकल वन्नबियीन।
और तू बेबसों की पुकार सुनने वाला है, मदद चाहने वालों का मददगार है, घबराए हुओं का सहारा है, भागने वालों की पनाह है, मोमिनों की फ़रियाद सुनने वाला है और गुनहगारों को माफ़ करने वाला है। और अल्लाह की रहमतें हों खुशख़बरी देने वाले, डराने वाले और रोशन चिराग़ नबी पर, और तमाम फ़रिश्तों और नबियों पर।

اَللّٰهُمَّ دَاحِيَ الْمَدْحُوَّاتِ، وَ بَارِءَ الْمَسْمُوْكَاتِ، وَ جَبَّالَ الْقُلُوْبِ عَلٰى فِطْرَتِهَا، شَقِيِّهَا وَ سَعِيْدِهَا.
अल्लाहुम्मा दाहियल मद्हुव्वात, व बारिअ़ल मस्मूकात, व जब्बालल क़ुलूबि अ़ला फ़ित्रतिहा, शक़ीय्यिहा व सअ़ीदिहा।
ऐ अल्लाह! तू ज़मीनों को फैलाने वाला, आसमानों को ऊँचा करने वाला और दिलों को उनकी फ़ितरत पर पैदा करने वाला है—चाहे वह बदनसीब हों या खुशनसीब।

اِجْعَلْ شَرَائِفَ صَلَوَاتِكَ، وَ نَوَامِيَ بَرَكَاتِكَ وَ كَرَائِمَ تَحِيَّاتِكَ، عَلٰى مُحَمَّدٍ عَبْدِكَ وَ رَسُوْلِكَ وَ اَمِيْنِكَ عَلٰى وَحْيِكَ، الْقَائِمِ بِحُجَّتِكَ، وَ الذَّابِّ عَنْ حَرَمِكَ، وَ الصَّادِعِ بِاَمْرِكَ، وَ الْمُشَيِّدِ لِاٰيَاتِكَ وَ الْمُوْفِيْ لِنَذْرِكَ.
इज्अ़ल शराइफ़ा सलवातिका, व नवामिया बरकातिका व कराइम तहिय्यातिका, अ़ला मुहम्मदिन अ़ब्दिका व रसूलिका व अमीनिका अ़ला वह्यिका, अल्क़ाइमि बिहुज्जतिका, वज़्ज़ाब्बि अ़न हरमिका, वस्सादिअ़ि बि-अमरिका, वलमुशय्यिदि लिआयातिका वलमूफ़ी लिनज़्रिका।
अपनी सबसे शरीफ़ दरूदें, बढ़ती हुई बरकतें और इज़्ज़त वाली सलामतियाँ मुहम्मद पर नाज़िल फ़रमा—जो तेरे बंदे, तेरे रसूल और तेरी वह्य के अमीन हैं; जो तेरी हुज्जत क़ायम करने वाले, तेरे हरम की हिफ़ाज़त करने वाले, तेरे हुक्म को खुलकर बयान करने वाले, तेरी आयतों को बुलंद करने वाले और तेरे अहद को पूरा करने वाले हैं।

اَللّٰهُمَّ فَاَعْطِهٖ بِكُلِّ فَضِيْلَةٍ مِنْ فَضَائِلِهٖ، وَ مَنْقَبَةٍ مِنْ مَنَاقِبِهٖ، وَ حَالٍ مِنْ اَحْوَالِهٖ، وَ مَنْزِلَةٍ مِنْ مَنَازِلِهٖ، رَاَيْتَ مُحَمَّدًا لَكَ فِيْهَا نَاصِرًا، وَ عَلٰى مَكْرُوْهِ بَلَائِكَ صَابِرًا، وَ لِمَنْ عَادَاكَ مُعَادِيًا، وَ لِمَنْ وَالَاكَ مُوَالِيًا وَ عَمَّا كَرِهْتَ نَائِيًا، وَ اِلٰى مَا اَحْبَبْتَ دَاعِيًا.
अल्लाहुम्मा फ़अअ़तिही बिकुल्लि फ़ज़ीलतिन मिन फ़ज़ाइलेही, व मनक़बतिन मिन मनाक़िबेही, व हालिन मिन अह़वालेही, व मंज़िलतिन मिन मनाज़िलेही, रा-अयता मुहम्मदन लका फीहा नासिरन, व अला मक़रूहि बलाइका साबिरन, व लिमन आदाका मुआदियन, व लिमन वालाका मुवालियन, व अम्मा करिह्ता नाइयन, व इला मा अह़बब्ता दाइयन।
ऐ अल्लाह! तू मुहम्मद को हर वह फ़ज़ीलत अता फ़रमा जो उनकी फ़ज़ीलतों में से है, हर वह ख़ूबी जो उनकी ख़ूबियों में से है, हर वह हालत और हर वह दर्जा जिसमें तूने मुहम्मद को अपना मददगार पाया, तेरी आज़माइशों पर सब्र करने वाला पाया, तेरे दुश्मनों का दुश्मन और तेरे दोस्तों का दोस्त पाया, नापसंद चीज़ों से दूर और पसंदीदा चीज़ों की तरफ़ बुलाने वाला पाया।

فَضَائِلَ مِنْ جَزَائِكَ وَ خَصَائِصَ مِنْ عَطَائِكَ وَ حِبَائِكَ، تُسْنِيْ بِهَا اَمْرَهٗ، وَ تُعْلِيْ بِهَا دَرَجَتَهٗ مَعَ الْقُوَّامِ بِقِسْطِكَ، وَ الذَّابِّيْنَ عَنْ حَرَمِكَ حَتّٰى لَا يَبْقٰى سَنَاءٌ وَ لَا بَهَاءٌ وَ لَا رَحْمَةٌ وَ لَا كَرَامَةٌ اِلَّا خَصَصْتَ مُحَمَّدًا بِذٰلِكَ، وَ اٰتَيْتَهٗ مِنْكَ الذُّرٰى وَ بَلَّغْتَهُ الْمَقَامَاتِ الْعُلٰى، اٰمِيْنَ رَبَّ الْعَالَمِيْنَ.
फ़ज़ाइला मिन जज़ाइका व ख़साइसा मिन अताइका व हिबाइका, तुस्नी बिहा अम्रहू, व तुअ़ली बिहा दरजातहू मअल क़ुव्वामि बिक़िस्तिका, वज़्ज़ाब्बीना अन हरमिका, हत्ता ला यब़क़ा सना-उन व ला बहा-उन व ला रह़मतुन व ला करामतुन इल्ला ख़स्सस्ता मुहम्मदन बिज़ालिका, व आतैतहू मिंकज़्ज़ुरा व बल्लग़्तहुल मक़ामातिल उ़ला, आमीन रब्बल आलमीन।
तेरे बदले की फ़ज़ीलतें और तेरे अताओं की ख़ासियतें, जिनसे तूने उनका काम बुलंद किया और उनका दर्जा ऊँचा किया, अपने इंसाफ़ पर क़ायम रहने वालों और अपने हरम की हिफ़ाज़त करने वालों के साथ, यहाँ तक कि कोई रौनक़, कोई शान, कोई रहमत और कोई इज़्ज़त बाक़ी न रहे मगर यह कि तूने वह सब मुहम्मद के लिए ख़ास कर दी और उन्हें बुलंद से बुलंद मक़ाम तक पहुँचा दिया। ऐ आलमीन के रब! आमीन।

اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْتَوْدِعُكَ دِيْنِيْ وَ نَفْسِيْ وَ جَمِيْعَ نِعْمَتِكَ عَلَيَّ، فَاجْعَلْنِيْ فِيْ كَنَفِكَ وَ حِفْظِكَ، وَ عِزِّكَ وَ مَنْعِكَ.
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्तौदिउ़का दीनी व नफ़्सी व जमीअ़ नेमतिका अलय्या, फ़ज्अ़ल्नी फी कनफ़िका व हिफ़्ज़िका, व इ़ज़्ज़िका व मन्अ़िका।
ऐ अल्लाह! मैं अपना दीन, अपनी जान और अपनी सारी नेमतें तेरे सुपुर्द करता हूँ, पस मुझे अपनी पनाह, अपनी हिफ़ाज़त, अपनी इज़्ज़त और अपनी हिफ़्स में रख।

عَزَّ جَارُكَ، وَ جَلَّ ثَنَاؤُكَ وَ تَقَدَّسَتْ اَسْمَاؤُكَ، وَ لَا اِلٰهَ غَيْرُكَ حَسْبِيْ اَنْتَ فِيْ السَّرَّاءِ وَ الضَّرَّاءِ وَ الشِّدَّةِ وَ الرَّخَاءِ، وَ نِعْمَ الْوَكِيْلُ.
अ़ज़्ज़ा जारुका, व जल्ला सनाऊ़का व तक़द्दसत अस्माऊ़का, व ला इलाहा गै़रुका, हस्बी अंत फ़िस्सर्राइ वज़्ज़र्राइ वश्शिद्दति वर्रख़ाइ, व नेअ़मल वकीलु।
तेरी पनाह बहुत मज़बूत है, तेरी तारीफ़ बहुत बुलंद है, तेरे नाम पाक हैं और तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। हर आराम और तकलीफ़, सख़्ती और आसानी में तू ही मेरे लिए काफ़ी है, और तू सबसे बेहतर कारसाज़ है।

رَبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَاِلَيْكَ اَنَبْنَا وَاِلَيْكَ الْمَصِيْرُ۝۴ رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَۃً لِّلَّذِيْنَ كَفَرُوْا وَ اغْفِرْ لَنَا رَبَّنَا۝۰ۚ اِنَّكَ اَنْتَ الْعَزِيْزُ الْحَكِيْمُ۝۵ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَہَنَّمَ۝۰ۤۖ اِنَّ عَذَابَہَا كَانَ غَرَامًا۝۶۵ۤۖ اِنَّہَا سَاۗءَتْ مُسْتَــقَرًّا وَّ مُقَامًا۝۶۶
रब्बना अ़लैका तवक्कल्ना व इलैका अनब्ना व इलैकल मसीर। रब्बना ला तज्अ़ल्ना फ़ित्नतन लिल्लज़ीना कफ़रू वग़्फ़िर लना रब्बना, इन्नका अंतल अ़ज़ीज़ुल हकीम। रब्बनस्रिफ़ अ़न्ना अ़ज़ाब जहन्नम, इन्न अ़ज़ाबहा काना ग़रामाँ, इन्नहा साअ़त मुस्तक़र्रं व मुक़ामाँ।
ऐ हमारे रब! हमने तुझ पर भरोसा किया, तेरी ही तरफ़ रुजू किया और तेरी ही तरफ़ लौटकर जाना है। ऐ हमारे रब! हमें काफ़िरों के लिए आज़माइश न बना और हमें बख़्श दे। बेशक तू ही ग़ालिब और हिकमत वाला है। ऐ हमारे रब! हमसे जहन्नम का अ़ज़ाब दूर रख, बेशक उसका अ़ज़ाब बहुत सख़्त है और वह ठहरने की बहुत बुरी जगह है।

رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَ بَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَ اَنْتَ خَيْرُ الْفٰتِحِيْنَ۝۸۹
रब्बना इफ्तह़ बैनना व बैन क़ौमिना बिल्हक़्क़ि व अंत ख़ैरुल फातिह़ीन।
ऐ हमारे रब! हमारे और हमारी क़ौम के दरमियान हक़ के साथ फ़ैसला फ़रमा, और तू ही सबसे बेहतर फ़ैसला करने वाला है।

رَبَّنَا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوْبَنَا وَ كَفِّرْ عَنَّا سَيِّاٰتِنَا وَ تَوَفَّنَا مَعَ الْاَبْرَارِ۝۱۹۳ۚ رَبَّنَا وَ اٰتِنَا مَا وَعَدْتَّنَا عَلٰي رُسُلِكَ وَ لَا تُخْزِنَا يَوْمَ الْقِيٰمَۃِ۝۰ۭ اِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيْعَادَ۝۱۹۴
रब्बना फ़ग़्फ़िर लना ज़ुनूबना व कफ़्फ़िर अन्ना सय्यिआतिना व तवफ़्फ़ना मअल अबरार। रब्बना व आतिना मा वअ़त्तना अ़ला रुसुलिका व ला तुख़ज़िना यौमल क़ियामा, इन्नका ला तुख़लिफ़ुल मीआद।
ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को बख़्श दे, हमारी बुराइयों को हमसे दूर कर दे और हमें नेक लोगों के साथ मौत अता फ़रमा। ऐ हमारे रब! जो वादा तूने अपने रसूलों के ज़रिये हमसे किया है, वह हमें अता फ़रमा और क़ियामत के दिन हमें रुस्वा न करना। बेशक तू वादे के ख़िलाफ़ नहीं करता।

رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَآ اِنْ نَّسِيْنَآ اَوْ اَخْطَاْنَا۝۰ۚ رَبَّنَا وَ لَا تَحْمِلْ عَلَيْنَآ اِصْرًا كَـمَا حَمَلْتَہٗ عَلَي الَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِنَا۝۰ۚ رَبَّنَا وَ لَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَۃَ لَنَا بِہٖ۝۰ۚ وَ اعْفُ عَنَّا۝۰۪ وَ اغْفِرْ لَنَا۝۰۪ وَ ارْحَمْنَا۝۰۪ اَنْتَ مَوْلٰىنَا فَانْصُرْنَا عَلَي الْقَوْمِ الْكٰفِرِيْنَ۝۲۸۶ۧ
रब्बना ला तुआख़िज़ना इन नसीना औ अख़्तअ़ना, रब्बना व ला तह़मिल अ़लैना इस्रन कमा हमल्तहू अ़लल्लज़ीना मिन क़बलिना, रब्बना व ला तुह़म्मिलना मा ला ताक़ता लना बिही, वअ़फ़ु अ़न्ना वग़्फ़िर लना वरह़मना, अंत मौलाना फ़नसुरना अ़लल क़ौमिल काफ़िरीन।
ऐ हमारे रब! अगर हम भूल जाएँ या ग़लती कर बैठें तो हमें न पकड़ना। ऐ हमारे रब! हम पर वह बोझ न डाल जो तूने हमसे पहले लोगों पर डाला था। ऐ हमारे रब! हम पर वह चीज़ न लाद जिसको उठाने की ताक़त हममें नहीं। और हमें माफ़ फ़रमा, हमें बख़्श दे और हम पर रह़म कर। तू ही हमारा मालिक है, पस काफ़िर क़ौम के मुक़ाबले में हमारी मदद फ़रमा।

رَبَّنَآ اٰتِنَا فِيْ الدُّنْيَا حَسَنَۃً وَّ فِيْ الْاٰخِرَۃِ حَسَـنَۃً وَّ قِنَا عَذَابَ النَّارِ۝۲۰۱
रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या ह़सनतन व फ़िल आख़िरति ह़सनतन व क़िना अ़ज़ाबन्नार।
ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई अता फ़रमा और आख़िरत में भी भलाई दे, और हमें आग के अ़ज़ाब से बचा।

وَ صَلَّى اللهُ عَلٰى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ النَّبِيِّ وَ آلِهِ الطَّاهِرِيْنَ وَ سَلَّمَ تَسْلِيمًا.
व सल्लल्लाहु अ़ला सैय्यिदिना मुहम्मदिन नबिय्यि व आलिहित्ताहिरीन व सल्लम तसलीमा।
और अल्लाह दरूद व सलाम नाज़िल फ़रमाए हमारे सरदार हज़रत मुहम्मद नबी पर और उनकी पाक औलाद पर, और उन्हें मुकम्मल सलामती अता फ़रमाए।