5. ज़ोहर की नमाज़ के बाद का वक़्त हमारे मौला इमाम-ए-अस्र (अ.ज.) के ज़ुहूर की दुआ के लिए बेहतरीन औक़ात में से है।
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) फ़रमाते हैं,
“जो शख़्स सुबह और ज़ोहर की नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ेगा, वह क़ायम-ए-आले मुहम्मद (अ.ज.) से मिलने से पहले वफ़ात नहीं पाएगा।”
या अहलत तक़वा वल मग़फ़िरह या अरहमर राहिमीन अन्त मौलाया व सय्यिदी फ़रज़ुक़नी अन्त ख़ैरुन ली मिन अबी व उम्मी व मिनन्नासि अज्मईन बी इलैका फ़क़रुन व फ़ाक़तुन व अन्त ग़नीyyुन अन्नी असअलुका बि वज्हिकल करीम व असअलुका अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिन व आलि मुहम्मद व अला इख़्वानिहिन नबिय्यीन वल आइम्मतित ताहिरीन व तस्तजीबा दुआई व तरहमा तज़़र्रुई वस्रिफ़ अन्नी अनवाअल बलाअ या रहमान
ऐ परहेज़गारी और मग़फ़िरत वाले! ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले! तू मेरा मौला और मेरा सरदार है। मुझे रिज़्क़ अता फ़रमा, तू मेरे लिए मेरे माँ-बाप और तमाम लोगों से बेहतर है। तेरे सामने मेरी ग़रीबी और ज़रूरत है और तू बेनियाज़ है। मैं तेरे करीम चेहरे के वसीले से सवाल करता हूँ कि तू मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर, नबियों और पाक इमामों पर दरूद भेजे, मेरी दुआ क़बूल करे, मेरी गिड़गिड़ाहट पर रहम करे और मुझसे हर क़िस्म की आफ़तें दूर कर दे, ऐ रहमान!
ऐ अल्लाह! मैं तेरे जूद और करम के ज़रिये तेरी क़ुरबत चाहता हूँ, और तेरे बन्दे और रसूल मुहम्मद ﷺ के ज़रिये, और तेरे क़रीबी फ़रिश्तों और भेजे हुए नबियों के ज़रिये, और ख़ुद तेरे वसीले से।
ऐ अल्लाह! तू मुझसे बेनियाज़ है और मैं तेरा मोहताज हूँ। तू ग़नी है और मैं फ़क़ीर हूँ। तूने मेरी لغزشें माफ़ कीं और मेरे गुनाहों पर पर्दा डाला। आज मेरी हाजत पूरी कर और मेरे बुरे आमाल की वजह से मुझे अज़ाब न दे, बल्कि तेरा अफ़्व और तेरा करम मुझे काफ़ी है।
ऐ तक़वा और मग़फ़िरत वालों के मालिक! ऐ नेक और रहम करने वाले! तू मेरे लिए मेरे माँ-बाप और तमाम मख़लूक़ से बेहतर है। मेरी हाजत पूरी करके मुझे क़बूल फ़रमा, मेरी दुआ क़बूल कर, मेरी आवाज़ पर रहम कर, और मुझसे हर क़िस्म की आफ़तें दूर कर दी हैं।
9. “या सामिअ कुल्लि सौत” की दुआ
( يَا سَامِعَ كُلّ صَوْتٍ ) ज़ुहर की नमाज़ के बाद — इमाम महदी (अ.ज.त.फ़.श.) के ज़ुहूर के लिए
फलाḥिस साइल में बयान हुआ है कि ज़ुहर की नमाज़ के बाद सबसे अहम दुआ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की पैरवी में इमाम महदी (अ.स.) के लिए की जाने वाली दुआ है।
इबाद बिन मुहम्मद मदाइनी से रिवायत है कि उन्होंने कहा: मैं मदीना में अबू अब्दुल्लाह (अ.स.) के पास पहुँचा, जब वह ज़ुहर की नमाज़ से फ़ारिग़ हुए और मैंने उन्हें आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर यह दुआ करते हुए देखा:
يا سامِعَ كُلِّ صَوْتٍ ،
يا جامِعَ (كُلِّ فَوْتٍ) ،
يا بارِئَ كُلِّ نَفْسٍ بَعْدَ الْمَوْتِ ،
या सामिअ कुल्लि सौत,
या जामिअ कुल्लि फ़ौत,
या बारिअ कुल्लि नफ़्सिन बादल मौत,
ऐ हर आवाज़ सुनने वाले, ऐ हर खोई हुई चीज़ को जमा करने वाले, ऐ मौत के बाद हर जान को पैदा करने वाले,
يا باعِثُ ،
يا وارِثُ ،
يا سَيِّدَ السَّادَةِ ،
يا إِلهَ الْآلِهَةِ ،
या बाअिस,
या वारिस,
या सैय्यिदस सादात,
या इलाहल आलिहा,
ऐ दोबारा उठाने वाले, ऐ वारिस, ऐ सारे सरदारों के सरदार, ऐ तमाम माबूदों के माबूद,
يا جَبَّارَ الْجَبابِرَةِ ،
يا مَلِكَ الدُّنْيا وَالْآخِرَةِ ،
या जब्बारल जबाबिरह,
या मलिकद दुनिया वल आख़िरह,
ऐ सारे ज़ालिमों पर क़ुदरत रखने वाले, ऐ दुनिया और आख़िरत के बादशाह,
يا رَبَّ الْأَرْبابِ ،
يا مَلِكَ الْمُلُوكِ
या रब्बल अरबाब,
या मलिकल मुलूक,
ऐ सारे रबों के रब, ऐ सारे बादशाहों के बादशाह,
يا بَطَّاشُ ، يا ذَا الْبَطْشِ الشَّديدِ ،
يا فَعَّالاً لِما يُريدُ ،
या बत्ताश,
या ज़ल बत्शिश्शदीद,
या फ़अ्आलन लिमा युरीद,
ऐ सख़्त पकड़ करने वाले, ऐ बेहद सख़्त पकड़ वाले, ऐ जो जो चाहता है वही करता है,
يا مُحْصِيَ عَدَدِ الْأَنْفاسِ وَنَقْلِ الْأَقْدامِ ،
या मुह्सिय अददल अन्फ़ासि व नक़्लिल अक़दाम,
ऐ हर साँस और हर क़दम की गिनती जानने वाले,
يا مَنِ السِّرُّ عِنْدَهُ عَلانِيَةٌ ،
يا مُبْدِئُ ، يا مُعيدُ .
या मनिस्सिर्रु इन्दहु अलानियह,
या मुबदि,
या मुईद,
ऐ वह जिसके सामने हर राज़ ज़ाहिर है, ऐ पहली बार पैदा करने वाले, ऐ दोबारा लौटाने वाले,
मैं तुझसे सवाल करता हूँ तेरे उस हक़ के वसीले से जो तूने अपनी बेहतरीन मख़लूक़ पर रखा, और उस हक़ के वसीले से जिसे तूने ख़ुद अपने ऊपर उनके लिए लाज़िम किया,
अन तुसल्लिया अला मुहम्मद व अहलि बैतिही,
व अन तमुन्ना अलैय्यस्साअतस्साअह बि फ़िकाक़ि रक़बती मिनन्नार,
व अन्जिज़ लि वलिय्यिका वब्नि नबिय्यिकद्दाइ इलेयका बि इज़्निका,
कि तू मुहम्मद ﷺ और उनके अहले बैत पर दरूद भेजे, हर लम्हा मुझे जहन्नम की आग से निजात अता करे, और अपने वली और अपने नबी की औलाद की उस दुआ को पूरा करे जो तेरे हुक्म से तुझे बुला रहा है,
وَأَمينِكَ في خَلْقِكَ ،
وَعَيْنِكَ في عِبادِكَ ،
وَحُجَّتِكَ عَلى خَلْقِكَ ،
عَلَيْهِ صَلَواتُكَ وَبَرَكاتُكَ وَعْدَهُ .
व अमीनिका फ़ी ख़लक़िका,
व अय्निका फ़ी इबादिका,
व हुज्जतिका अला ख़लक़िका,
अलैहि सलवातुका व बरकातुका वअदहू,
जो तेरी मख़लूक़ में तेरा अमीन है, तेरे बन्दों में तेरी निगाह है, और तेरी मख़लूक़ पर तेरी हुज्जत है, उस पर तेरी रहमतें और बरकतें हमेशा रहें।
वज्अल लहुम मिल लदुनका सुल्तानन नसीरा,
व अज्जिल फ़रजहू,
व अम्किनहु मिन अअदाइका व अअदाइ रसूलिका,
या अरहमर राहिमीन,
और उन्हें अपनी तरफ़ से मदद करने वाली हुकूमत अता कर, उसके ज़ुहूर में जल्दी फ़रमा, और उसे अपने और अपने रसूल के दुश्मनों पर ग़ालिब कर दे, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
1 बहारुल अनवार जिल्द 86 सफ़ा 77; मुस्तदरकुल वसाएल जिल्द 5 सफ़ा 96; जमालुस सालिहीन
मैंने इमाम से कहा: मेरी जान आप पर क़ुर्बान हो, क्या आपने अपने लिए दुआ नहीं की?
उन्होंने फ़रमाया: मैंने मुहम्मद ﷺ की औलाद के उस नूर के लिए दुआ की है जो अल्लाह के हुक्म से अपने दुश्मनों से बदला लेगा।
मैंने कहा: वह कब ज़ाहिर होंगे?
इमाम ने फ़रमाया: जब मख़लूक़ और हुक्म का मालिक चाहेगा।
मैंने कहा: उससे पहले निशानियाँ क्या हैं?
उन्होंने फ़रमाया: निशानियाँ बहुत और मुख़्तलिफ़ हैं।
मैंने कहा: जैसे?
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया: मशरिक़ और मग़रिब से परचम निकलेंगे, फ़ितना जारी रहेगा, यमन से मेरे चचा ज़ैद की औलाद में से एक शख़्स ज़ाहिर होगा, घरों की लूट होगी, फिर अल्लाह अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ अमल करेगा।
किताब “मिक्यालुल मकारिम” में लिखा है कि यह दुआ इन फ़ायदों के लिए पढ़ी जा सकती है:
पहला: ज़ुहर की नमाज़ के बाद इमाम की ज़ुहूर की जल्दी के लिए दुआ करना मुस्तहब है।
दूसरा: दुआ के वक़्त हाथ उठाना मुस्तहब है।
तीसरा: अहले बैत (अ.स.) को वसीला बनाकर दुआ करना मुस्तहब है।
चौथा: दुआ से पहले अल्लाह की हम्द और तस्बीह करना मुस्तहब है।
पाँचवाँ: दुआ से पहले मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर सलवात भेजना मुस्तहब है।
छठा: तौबा के ज़रिये नफ़्स को पाक करना ताकि दुआ क़बूल हो।
सातवाँ: मासूमीन (अ.स.) की दुआओं में “वली” से मुराद इमाम महदी (अ.स.) हैं।
आठवाँ: इमाम के साथियों के हक़ में दुआ करना मुस्तहब है।
नौवाँ: इमाम हर हाल में अपने मानने वालों के आमाल देखते हैं।
दसवाँ: इमाम का एक लक़ब “नूर-ए-आल-ए-मुहम्मद” है।
ग्यारहवाँ: इमाम महदी (अ.स.) तमाम इमामों से अफ़ज़ल हैं सिवाय अली, हसन और हुसैन (अ.स.) के।
बारहवाँ: अल्लाह ने उनके ज़ुहूर को दुश्मनों से बदला लेने के लिए देर से रखा है।
तेरहवाँ: उनके ज़ुहूर का वक़्त इलाही हिकमत से पोशीदा है।
चौदहवाँ: निशानियाँ तयशुदा नहीं हैं क्योंकि अल्लाह अपनी मर्ज़ी से अमल करता है।
अस्र की नमाज़ से पहले **8 रकअत नफ़्ल (2×4)** पढ़ें
1. पढ़ें 8 रकअत अस्र नफ़्ल (2×4) — अस्र की नमाज़ से पहले
अस्र के बाद की दुआएँ
2. मिस्बाह अल-मुतहज्जिद से नक़्ल की गई अस्र के बाद की दुआ:
5. इमाम जाफ़र अस-सादिक़ (अ.स.) से रिवायत है कि जो शख़्स अस्र की नमाज़ के बाद अल्लाह से मग़फ़िरत माँगे (यानी अस्तग़फ़िरुल्लाह) सत्तर (70) मर्तबा तो उसके सात सौ (700) गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।
6. इमाम मुहम्मद अल-तक़ी (अल-जवाद) (अ.स.) से भी रिवायत है कि जो शख़्स अस्र की नमाज़ के बाद सूरह अल-क़द्र (नंबर 97) दस (10) मर्तबा पढ़े, उसे उस दिन तमाम मख़लूक़ के आमाल का सवाब अता किया जाता है।
7. सहिफ़ा रज़विया से
— अस्र के बाद
बिहारुल अनवार, जिल्द 87, सफ़ा 85 — रजा इब्न अबी ज़ह्हाक़ बयान करते हैं: ख़ुरासान की यात्रा के दौरान इमाम रज़ा (अ.स.) अस्र की नमाज़ के बाद अपनी जाए-नमाज़ पर बैठे रहते और जितना चाहते तस्बीह (अल्लाह की पाकी बयान करना), तमजीद (अल्लाह की तारीफ़), तकबीर (अल्लाह सबसे बड़ा है) और तहलील (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं) पढ़ते। इसके बाद वह सज्दा-ए-शुक्र अदा करते और उसमें
सौ (100) मर्तबा
यह पढ़ते थे:
حَمْدًا لِلهِ.
हम्दन लिल्लाहि
तमाम तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है।
8. अस्र की नमाज़ अदा करने के बाद सतहत्तर (77) मर्तबा अल्लाह से मग़फ़िरत तलब करें।
मुहम्मद इब्न फ़ुज़ैल सैराफ़ी इमाम रज़ा (अ.स.) से, और वह अपने बुज़ुर्गों (अ.स.) से, और वह रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) से रिवायत करते हैं कि नबी करीम (स.अ.व.आ.) ने एक शख़्स से फ़रमाया: इस ज़िक्र की बरकत से अल्लाह तुम्हारे सतहत्तर (77) साल के गुनाह माफ़ फ़रमा देगा।
उस शख़्स ने अर्ज़ किया: अगर मेरी उम्र सतहत्तर साल न हो तो?
रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) ने फ़रमाया: तब तुम्हारे वालिद के गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।
उसने फिर पूछा: अगर मेरी और मेरे वालिद की उम्र सतहत्तर साल न हो?
नबी करीम (स.अ.व.आ.) ने फ़रमाया: तब तुम्हारे, तुम्हारे वालिद और तुम्हारी वालिदा के गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।
उसने फिर कहा: अगर मेरी, मेरे वालिद और मेरी वालिदा की उम्र भी सतहत्तर साल न हो?
रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) ने फ़रमाया: तब तुम्हारे, तुम्हारे वालिद, तुम्हारी वालिदा और तुम्हारे रिश्तेदारों के गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।
[2] जामे’ अहादीस अश-शीआ, जिल्द 6, सफ़ा 104; वसाएल अश-शीआ, जिल्द 4, सफ़ा 1053<
व असअलुका बिस्मिकाल अअज़मिल्लज़ी बिही तक़ूमुस्समावातु वल अरज़ु व बिही तुहयिल मौता़ व तरज़ुक़ुल अहया व तुफ़र्रिकु बैनल मुज्तमअि बैनल मुतफ़र्रिक व बिही अह्सैता अददल आजालि व वज़नल जिबालि व कीलल बिहार
मैं तुझसे तेरे उस अज़ीम नाम के वसीले से सवाल करता हूँ जिससे आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, जिससे तू मुर्दों को ज़िंदा करता है और ज़िंदों को रिज़्क़ देता है, जिससे तू जमा को जुदा और जुदा को जमा करता है, और जिससे तू उम्रों की गिनती, पहाड़ों का वज़न और समुंदरों का पैमाना जानता है।
असअलुका या मन् हुआ कज़ालिक अन तुसल्लिया अला मुहम्मद व्व आलि मुहम्मद व्व अन तफ़अल बी कज़ा व कज़ा
ऐ वह जो ऐसा ही है! मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि तू मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर दरूद भेजे और मेरी फलाँ-फलाँ हाजत पूरी फ़रमाए।
12. अतिरिक्त अस्र की दुआ
اللهم إني أسألك الطيبات وترك المنكرات وفكاك خيرتي أن تغفر لنا وترحمنا وتتوب علينا وتوفنا غير مفتونين برحمتك يا أرحم الراحم
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुकत्-तय्यिबाति व तरकल मुनकराति व फ़िकाक़ खैराती अन तग़फ़िर लना व तरहमना व ततूब अलैना व तवफ़्फ़ाना ग़ैर मफ़्तूनीन बिरहमतिका या अरहमर राहिमीन
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे पाक कामों की तौफ़ीक़ माँगता हूँ, बुराइयों को छोड़ने की, भलाई की राह अपनाने की; हमें बख़्श दे, हम पर रहम फ़रमा, हमारी तौबा क़बूल कर और हमें फ़ितने से बचाकर अपनी रहमत में मौत अता कर, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
13. इमाम काज़िम (अ.स.) की अस्र के बाद इमाम-ए-ज़माना (अ.त.फ़.स.) के ज़ुहूर के लिए दुआ
“फ़लाहिस साइल” में बयान हुआ है कि अस्र की नमाज़ के बाद अहम दुआओं में से यह दुआ है, जिसमें हमारे सरदार मूसा इब्न जाफ़र अल-काज़िम (अ.स.) की पैरवी करते हुए हमारे सरदार इमाम महदी (अ.स.) के लिए दुआ की जाती है। यह रिवायत यह्या बिन अल-फ़ज़्ल नौफ़ली से है। वह कहते हैं: मैं बग़दाद में अस्र की नमाज़ के बाद अबुल-हसन मूसा बिन जाफ़र (अ.स.) के पास गया। मैंने उन्हें आसमान की तरफ़ हाथ उठाए हुए सुना और यह दुआ पढ़ते हुए सुना:
व अन्तल्लाहु ला इलाहा इल्ला अन्त, ख़लक़्तल ख़ल्क़ बि ग़ैरि मअऊना मिन ग़ैरिका व ला हाजता इलैहिम
और तू ही अल्लाह है; तूने मख़लूक़ को बिना किसी मदद के पैदा किया और तुझे उनकी कोई ज़रूरत नहीं।
मैंने उनसे पूछा: आप किसके लिए दुआ कर रहे थे? उन्होंने फ़रमाया: रसूलुल्लाह ﷺ के अहले बैत में से इमाम महदी (अ.स.) के लिए।
उन्होंने आगे फ़रमाया: मेरे वालिद उन पर क़ुर्बान हों… वह अल्लाह के हुक्म से क़ियाम करेंगे।
मैंने पूछा: वह कब ज़ाहिर होंगे? उन्होंने फ़रमाया: जब अल्लाह चाहे। जब तुम इराक़ में अनबार से लश्करों को, फ़ुरात, सिराह और दजला के किनारों पर देखो… तब जान लो कि अल्लाह अपनी मर्ज़ी से अमल करेगा; उसके हुक्म को कोई रोक नहीं सकता।[1]
14.Dua after Asr -Nafilah app
सुब्हानल्लाहि वलहम्दु लिल्लाहि व ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर
व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और बहुत रहम करने वाला है।
अल्लाह पाक है, सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है।
और अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है और न कोई क़ुव्वत, जो बहुत बुलंद और अज़ीम है।
अल्लाह पाक है सुबह और शाम में।
अल्लाह पाक है शाम के वक़्त और सुबह के वक़्त।
तो अल्लाह की पाकी बयान करो जब तुम शाम में दाख़िल होते हो और जब सुबह करते हो।
व लहुल हम्दु फिस्समावाति वल अरज़ि व अशिय्यन व हीना तुज़्हिरून
सुब्हाना रब्बिका रब्बिल इज़्ज़ति अम्मा यसिफ़ून
और आसमानों और ज़मीन में उसी के लिए हम्द है, और शाम के वक़्त और दोपहर के वक़्त।
तुम्हारा रब, जो इज़्ज़त का रब है, उन बातों से पाक है जो लोग बयान करते हैं।
सुब्हानल्लाहिल क़ाइमिद्दाइम
सुब्हानल्लाहिल हय्यिल क़य्यूम
सुब्हानल अलीय्यिल आला सुब्हानहू व तआला
सुब्बूहुन क़ुद्दूसुन रब्बुल मलाइकतिर्रूह
पाक है अल्लाह जो हमेशा क़ायम और बाक़ी रहने वाला है।
पाक है अल्लाह जो ज़िंदा और सबको संभालने वाला है।
पाक है वह बहुत बुलंद, सबसे ऊँचा; वह पाक और बरतर है।
वह बहुत पाक, बहुत मुक़द्दस है — फ़रिश्तों और रूह का रब।
अल्लाहुम्मा इन्ना ज़म्बी अम्सा मुस्तजीरन बिअफ़्विका
व ख़ौफ़ी अम्सा मुस्तजीरन बिअमनिका
व फ़क़्री अम्सा मुस्तजीरन बिघिनाका
व ज़ुल्ली अम्सा मुस्तजीरन बिइज़्ज़िका
ऐ अल्लाह! मेरा गुनाह तेरी माफ़ी की पनाह चाहता है,
मेरा डर तेरी अमान की पनाह चाहता है,
मेरी ग़रीबी तेरी बेनियाज़ी की पनाह चाहती है,
और मेरी बेइज़्ज़ती तेरी इज़्ज़त की पनाह चाहती है।
अल्लाहुम्मा तम्मा नूरुका फ़हदैत
फ़लकल हम्दु व अज़ुमा हिल्मुका फ़अफ़ौत
फ़लकल हम्दु
वज्हुका रब्बना अकरमुल वुजूह
व जाहुका अअज़मुल जाह
व अतिय्यतुका अफ़ज़लुल अताया
ऐ अल्लाह! तेरा नूर मुकम्मल है, तूने हिदायत दी, इसलिए सारी हम्द तेरे लिए है।
तेरा हिल्म बहुत बड़ा है, तूने माफ़ फ़रमाया, इसलिए सारी हम्द तेरे लिए है।
ऐ हमारे रब! तेरा चेहरा सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला है,
तेरी शान सबसे बड़ी है, और तेरी अता सबसे बेहतर अता है।
रब्बना व तशकुरु व तुअसा फ़तग़फ़िर
व तुजीबुल मुज़्तर्र
व तक्शिफ़ुद्दुर्र
व तुनज्जी मिनल कर्ब
व तुग़नील फ़क़ीर
व तश्फ़िस्सक़ीम
व ला युजारी आला-अका अहद
व अन्त अरहमुर राहिमीन
ऐ हमारे रब! तू शुक्र क़बूल करता है, नाफ़रमानी पर माफ़ करता है,
मुसीबतज़दा की दुआ क़बूल करता है,
तकलीफ़ दूर करता है, ग़म से निजात देता है,
ग़रीब को ग़नी करता है, बीमार को शिफ़ा देता है।
तेरी नेमतों का कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता, और तू सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।
नाफ़िला – نــافلــة
फिर पढ़ें
يَا مَنْ خَتَمَ ٱلنُّبُوَّةَ بِمُحَمَّدٍ
या मन् ख़तमन्नुबूव्वता बि मुहम्मद
ऐ वह जिसने नुबूवत को मुहम्मद ﷺ पर ख़त्म किया,
صَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَ
सल्लल्लाहु अलैहि व
अल्लाह उन पर और
إِخْتِمْ لِي فِي يَوْمِي هٰذَا بِخَيْرٍ
इख़्तिम ली फ़ी यौमी हाज़ा बिख़ैर
मेरे आज के दिन को भलाई पर ख़त्म फ़रमा,
وَشَهْرِي بِخَيْرٍ
व शह्री बिख़ैर
मेरे इस महीने को भलाई पर,
وَسَنَتِي بِخَيْرٍ
व सनती बिख़ैर
मेरे इस साल को भलाई पर,
وَعُمْرِي بِخَيْرٍ
व उम्री बिख़ैर
और मेरी पूरी उम्र को भलाई पर ख़त्म फ़रमा।
15. इमाम अली नक़ी (अ.स.) की अस्र की नमाज़ के बाद की दुआ (अरबी मत्न नहीं)
ऐ वह ज़ात जिसने बुलंदी पाई और अज़ीम बनी, ग़ालिब हुई और ताक़तवर बनी, ताक़तवर हुई और ग़ालिब आई;
ऐ वह ज़ात जो अपनी क़ुदरत में अज़ीम है;
ऐ वह जिसने अपनी मख़लूक़ पर साया फैलाया और अपने बन्दों को नेमतों से नवाज़ा।
मैं तुझसे सवाल करता हूँ, ऐ बदला लेने में ताक़तवर, जो कुफ़्र वालों से अपनी क़ुदरत के साथ इंतिक़ाम लेता है।
मैं तुझसे तेरे वली अली बिन अबू तालिब (अ.स.) के हक़ के वसीले से सवाल करता हूँ और उन्हें अपने और अपनी हाजतों के दरमियान वसीला बनाता हूँ—
कि तू मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर रहमत नाज़िल फ़रमाए, मेरी हाजतें पूरी करे, मेरी नफ़्ल और फ़र्ज़ इबादतों को क़बूल फ़रमाए,
मुझे अपने भाइयों के साथ परहेज़गार बनाए और अपनी इताअत में मुझे कामिल करे—
ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
16. इसके बाद शुक्राने का सज्दा (सज्दा-ए-शुक्र) करें
जब आप मस्जिद से निकलने का इरादा करें, तो यह कहें:
اللَّهُمَّ دَعَوْتَنِي فَاجَبْتُ دَعْوَتَكَ
अल्लाहुम्मा दअव्तनी फ़अजब्तु दअवतका
ऐ अल्लाह! तूने मुझे बुलाया, तो मैंने तेरी पुकार पर लब्बैक कहा,
وَصَلَّيْتُ مَكْتُوبَتَكَ
व सल्लैतु मक्तूबतका
और मैंने तेरी फ़र्ज़ की हुई नमाज़ अदा की,
وَٱنْتَشَرْتُ فِي ارْضِكَ كَمَا امَرْتَنِي
व न्तशर्तु फ़ी अरज़िका कमा अमर्तनी
और मैं तेरी ज़मीन में फैला जैसा तूने मुझे हुक्म दिया,
فَاسْالُكَ مِنْ فَضْلِكَ ٱلْعَمَلَ بِطَاعَتِكَ
फ़असअलुका मिन फ़ज़्लिकल अमला बिताअतिका
तो मैं तुझसे तेरे फ़ज़्ल से सवाल करता हूँ कि मुझे अपनी इताअत में अमल करने की तौफ़ीक़ दे,
وَٱجْتِنَابَ مَعْصِيَتِكَ
वज्तिनाबा मअसियतिका
और तेरी नाफ़रमानी से बचाए रख,
وَٱلْكَفَافَ مِنَ ٱلرِّزْقِ بِرَحْمَتِكَ
वलकफ़ाफ़ा मिनर्रिज़्क़ि बिरहमतिका
और अपनी रहमत से मुझे काफ़ी और हलाल रिज़्क़ अता फ़रमा।
जैसे ही दोपहर का वक़्त हो, यह पढ़ें। रिवायत है कि इमाम अल-बाक़िर (अ.स.) ने मुहम्मद इब्न मुस्लिम को इसे लगातार पढ़ने की हिदायत दी थी, क्योंकि यह नज़र को हराम से बचाए रखती है।
वलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी लम यत्तख़िज़ साहिबतन व ला वलदा
और सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, जिसने न कोई बीवी बनाई और न कोई औलाद,
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ شَرِيكٌ فِي ٱلْمُلْكِ
व लम यकुन लहू शरीकुन फ़िल मुल्क
और जिसकी बादशाही में कोई शरीक नहीं,
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ وَلِيٌّ مِنَ ٱلذُّلِّ
व लम यकुन लहू वलिय्युं मिनज़्ज़ुल्लि
और जिसे बेइज़्ज़ती से बचाने वाला कोई मददगार नहीं,
وَكَبِّرْهُ تَكْبِيراً
व कब्बिरहू तक्बीरा
और उसकी बड़ाई पूरी बड़ाई के साथ बयान करो।
– ज़ुहर से पहले 8 रकअत / यूनिट (2 × 4) नफ़्ल नमाज़ पढ़ें (मुस्तहब)।
पहली दो रकअतों में सात (7) मर्तबा तकबीर कहें और फिर यह पढ़ें:
اعُوذُ بِٱللَّهِ مِنَ ٱلشَّيْطَانِ ٱلرَّجِيمِ
अऊज़ु बिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम
मैं रजिम किए हुए शैतान से अल्लाह की पनाह चाहता हूँ।
पहली रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा और सूरह अल-तौहीद पढ़ें,
और दूसरी रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा और सूरह अल-काफ़िरून (नंबर 109) पढ़ें।
नमाज़ पूरी होने के बाद तीन (3) मर्तबा तकबीर दोहराएँ, तस्बीह-ए-ज़हरा (स.अ.) पढ़ें,
और फिर यह दुआ कहें:
اللَّهُمَّ إِنِّي ضَعِيفٌ
अल्लाहुम्मा इन्नी ज़ईफ़ुन
ऐ अल्लाह! बेशक मैं कमज़ोर हूँ,
فَقَوِّ فِي رِضَاكَ ضَعْفِي
फ़क़व्वि फ़ी रिज़ाका ज़अफ़ी
तो अपनी रज़ा के रास्ते में मेरी कमज़ोरी को ताक़त दे,
وَخُذْ إِلَىٰ ٱلْخَيْرِ بِنَاصِيَتِي
व ख़ुज़् इला अल-ख़ैरि बिनासियत़ी
और मुझे भलाई की तरफ़ खींच ले,
وَٱجْعَلِ ٱلإِيـمَانَ مُنْتَهَىٰ رِضَائِي
वज्अलिल ईमान मुंतहा रिज़ाई
और ईमान को मेरी रज़ा की आख़िरी मंज़िल बना,
وَبَارِكْ لِي فِيمَا قَسَمْتَ لِي
व बारिक ली फीमा क़सम्ता ली
और जो कुछ तूने मेरे लिए मुक़र्रर किया है उसमें बरकत दे,
और अपनी रहमत से मुझे वह सब अता कर जिसकी मैं तुझसे उम्मीद रखता हूँ,
وَٱجْعَلْ لِي وُدّاً
वज्अल ली वुद्दन
और मेरे लिए मोहब्बत पैदा कर,
وَسُرُوراً لِلْمُؤْمِنِينَ
व सुरूरन लिल-मोमिनीन
और मोमिनों के लिए खुशी बना,
وَعَهْداً عِنْدَكَ
व अह्दन इंदका
और तेरे पास मेरे लिए एक अहद क़ायम कर।
इसके बाद आप खड़े होकर अगली दो रकअत बिल्कुल पहली दो रकअत की तरह अदा करें, बस फ़र्क़ इतना हो कि सात की जगह एक (1) मर्तबा तकबीर कहें।
फिर इसी तरह एक और जोड़ी रकअत अदा करें।
इन चार रकअतों के पूरा होने पर वही दुआएँ पढ़ें और तस्बीह-ए-ज़हरा (स.अ.) भी पढ़ें, जैसा पहले बयान हुआ है।
आठ रकअत नफ़्ल ज़ुहर की आख़िरी दो रकअत अज़ान और इक़ामत के दरमियान अदा की जा सकती हैं।
इक़ामत के बाद यह दुआ पढ़ें:
वज्अलनी बिहिम इंदका वजीहन फ़िद्दुन्या वल आख़िरति व मिनल मुक़र्रबीन
और उनके वसीले से मुझे दुनिया और आख़िरत में अपने क़रीबियों में शामिल फ़रमा।
आप सूरहें धीमी आवाज़ में पढ़ सकते हैं, बस बिस्मिल्लाह ज़ोर से पढ़ें।
बेहतर है कि पहली रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा और सूरह अल-क़द्र पढ़ी जाए,
और दूसरी रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा और सूरह अल-तौहीद पढ़ी जाए।
दूसरी रकअत में तशह्हुद के बाद यह पढ़ें:
وَتَقَبَّلْ شَفَاعَتَهُ وَٱرْفَعْ دَرَجَتَهُ
व तक़ब्बल शफ़ाअतहू व अरफ़अ् दरजतहू
और उसकी शफ़ाअत क़बूल फ़रमा और उसका दर्जा बुलंद फ़रमा।