सलाम हो उस पर जिसने उस हस्ती के हक़ में अजीब/हैरत-अंगेज़ ख़िताब किया, जिनके रुख़सार ख़ाक से अटे थे—यानी तुम्हारे वालिद, अबू अब्दुल्लाह हुसैन (अ) पर सलाम।
कि तू हमारी और तमाम मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों की हाजतें पूरी फ़रमा।
अस्सलामो अलैके या बिन्ते रसूलिल्लाहे
अस्सलामो अलैके या बिन्ते सुल्तानिल अनेयाए
अस्सलामो अलैके या बिन्ते साहेबिल हौज़े वल-लिवाए
अस्सलामो अलैके या बिन्ते मन अराजा इलस्समाए
वा वसला इला क़ाबा क़ौसैने अव अदना
अस्सलामो अलैके या बिन्ते नबीय्यिल हुदा
वा सय्येदिल वरा वा मुनक़िज़िल इबादे मिनज़ ज़लालत व-र्रदा
अस्सलामो अलैके या बिन्ते अकरमिल आलमीन हसबन
वा अफ़ज़लहिम नसबन वा अजमलहिम मंज़रन
वा अस्ख़ाहुम कफ़्फ़न वा अश्ज़अहिम क़ल्बन
वा अकमलहिम हिल्मन वा अकसरहिम इल्मन
वा अस्बतहिम अस्लन वा आला́हुम ज़िक्रन
वा अस्नाहुम ज़ुख़्रन वा अहमदहुम वस्फ़न
अस्सलामो अलैके या बिन्ते बहरिल उलूमे वा कह्फ़िल फ़ुक़राए
अस्सलामो अलैके या बिन्ते मन वुलिदा फ़िल काबते
वा ज़ुव्विजा फ़िस्समाए
अस्सलामो अलैके या बिन्ते सुल्तानिल औसियाए वा सय्येदिल औलियाए
अस्सलामो अलैके या बिन्ते सारिल्लाहे वम्बे सारेही
अस्सलामो अलैके या बिन्ते सय्येदिश-शोहदाए
अस्सलामो अलैके या बज़अते सय्येदे शबाबे अहलिल जन्नते
अस्सलामो अलैके या बिन्ते फ़ातेमतज़ ज़हरााए सय्येदते निसाइ़ल आलमीन
अस्सलामो अलैके या बिन्ते ख़दीजतिल कुबरा उम्मिल मोमिनीन
अस्सलामो अलैके या सकीनत बिन्ते उम्मे रब्बाबिन
वा रहमतुल्लाहे वा बरकातोहु
अस्सलामो अलैके अय्यतोहत ताक़िय्यतुन नक़िय्यतो
अस्सलामो अलैके अय्यतोहल फ़ाज़िलतुस सग़ीरतो
अस्सलामो अलैके अय्यतोहल करीमतुल बहिय्यतो
अस्सलामो अलैके अय्यतोहल मज़लूमतुष शहीदतो
अस्सलामो अलैके अय्यतोहल बईदतो अनिल औतान
अस्सलामो अलैके अय्यतोहल असीरतो फ़िल बुलदान
अस्सलामो अलैके या मुम्तहनातो बिइम्तिहानिल अज़ीमते
वस फ़दाहा नफ़्सहा ले-अबीहा वा वरीदहा
अस्सलामो अला मम मात मिन शिद्दतिश-शौक़े
फ़ी महब्बते सय्येदिश-शोहदाए
वा क़ामत क़ियामतो अहलिल बैते बि-मौतहा
फ़ी ख़राबतिश-शामे वा हिया मौज़ेअल मुम्तहनते वल बलाए
अस्सलामो अला मल-लाहिक़त इला जद्देहा
वा अबीहा फ़ी दारिल करीमते वल-लिक़ाए
वा रहमतुल्लाहे वा बरकातोहु
रसूलुल्लाह ﷺ की बेटी पर सलाम हो
नबियों के सरदार की बेटी पर सलाम हो
हौज़ और लिवा के मालिक की बेटी पर सलाम हो
उस हस्ती की बेटी पर सलाम हो जो आसमानों की ओर उरूज कर गई
और क़ाबा-क़ौसैन या उससे भी क़रीब पहुँच गई
हिदायत देने वाले नबी की बेटी पर सलाम हो
और तमाम मख़लूक़ के सरदार, और बंदों को गुमराही और रद्द से बचाने वाले की बेटी पर सलाम हो
तमाम आलमीन में नस्ब के एतबार से सबसे मुकर्रम की बेटी पर सलाम हो
और नस्ब में सबसे अफ़ज़ल, सूरत में सबसे हसीन
सख़ावत में सबसे बढ़कर, दिल में सबसे बहादुर
हिल्म में सबसे कामिल, इल्म में सबसे ज़्यादा
असल में सबसे साबित-क़दम, ज़िक्र में सबसे बुलंद
ज़ीनत में सबसे नुमायाँ, और वस्फ़ में सबसे ज़्यादा हम्द की गई
इल्म के समुंदर और फ़क़ीरों के सहारे की बेटी पर सलाम हो
उस हस्ती की बेटी पर सलाम हो जो ख़ाना-ए-काबा में पैदा हुए
और जिनका निकाह आसमान में हुआ
औलिया और औसिया के सरदार की बेटी पर सलाम हो
अल्लाह के ख़ून (सरिल्लाह) और उसके बदले की बेटी पर सलाम हो
सरदार-ए-शोहदा की बेटी पर सलाम हो
अहले-जन्नत के जवानों के सरदार के जिगर के टुकड़े पर सलाम हो
बीबी फ़ातिमा ज़हरा, तमाम आलमीन की औरतों की सरदार की बेटी पर सलाम हो
ख़दीजतुल कुबरा, उम्मुल मोमिनीन की बेटी पर सलाम हो
सकीना, उम्मे रब्बाब की बेटी पर सलाम हो
और अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों
ऐ परहेज़गार और पाकीज़ा बीबी, आप पर सलाम हो
ऐ नन्ही फ़ाज़िला, आप पर सलाम हो
ऐ बुज़ुर्ग और नूरानी बीबी, आप पर सलाम हो
ऐ मज़लूम और शहीद बीबी, आप पर सलाम हो
ऐ वतन से दूर रहने वाली, आप पर सलाम हो
ऐ शहरों में क़ैद रहने वाली, आप पर सलाम हो
ऐ बड़ी आज़माइश में डाली गई बीबी, आप पर सलाम हो
जिसने अपने बाप और अपने अज़ीज़ों के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी
उस पर सलाम हो जो शिद्दत-ए-शौक़ से इंतिक़ाल कर गई
सरदार-ए-शोहदा की मोहब्बत में
और जिसकी मौत से अहले-बैत पर क़ियामत क़ायम हो गई
शाम की वीरान जेल में, जो आज़माइश और बलाओं की जगह थी
उस पर सलाम हो जो अपने नाना से जा मिली
और अपने वालिद से, इज़्ज़त के घर और मुलाक़ात की जगह में
और अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों
ألتمل عكيك يا ينت تشذل اللء ألتملكه تكك تا ينت شلظاني الأثيماء لنملأ عليك تا
ني عرج إلى الممءودصل
أجملهم منكلرا و
أنخيهح كنا ك أشجيهح كلجا ؤ أكمليم جلكا و اكترهم علكا أنجيهم أضلاة أغليم
ؤكرا و فتاهم ؤنحا ؤ أتجمن هه وضقا ألتلايد تكيك تا ينت بخر الكلةه
الؤصياء د ميد الأذليآء الكلكد تكياك ا ينت كاي اللو دائي كايد ألتلاد ككيك تا ينت
مي الخهآء ادكلكد ككياك يا بضعة ميد قجاب آخل اجكة ألكلكد كلي تيذك قاطمة
الأهرآء ميدة نساء التاتينن السئلكد عياك تا يذك كدئكة الكترى أ اؤييين الئلاد
كياك يا مكيتة يذت أن تمباب كخمنة لء د تدكاثه ا كلكد عليلي اككها التية التتذ
الك عكبي أكك الماحيكة المييية املد تكيلي اكنها الكرغة لبوة للكيد ككبي
اكمها الظللومة الهينة لتملكد عكيك ألثكها الجبدة عن الذان اليملكد عكيك أككقا
الأيية ي البلان ألمل عكيك يا لتتكتة يإمتكان الحظيمة د كاما تشمنها لأييها ة
يية كها النلاي على تن بكات ين ثيدة الشوي ف كية ميد الخهداء د كاتث قمامة مل
الجيي يممؤا ي خحداية النام وهي مذقسع امتتكتة د ابء لنملكي كلى من حق إلى
جا يهاني كارالكرامة د الآء ءرنجنة ال أتدكائه.
आप पर सलाम हो, ऐ वह बीबी जो अल्लाह के चुने हुए बन्दों की औलाद हैं,
आप पर सलाम हो, ऐ वह जिनकी शान आसमानों तक बुलन्द की गई,
और जिनका दर्जा बुलन्द मक़ाम तक पहुँचाया गया।
आप तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत,
सबसे ज़्यादा करीम,
सबसे ज़्यादा शफ़ीक़ और
सबसे ज़्यादा इल्म व हिल्म वाली हैं।
आपका सब्र, आपकी इबादत और आपकी पाकीज़गी सबसे बढ़कर है,
और आपकी आज़माइश सबसे ज़्यादा सख़्त थी।
आप औसिया और औलिया के घराने से हैं,
आप उस ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती हैं जिसे अल्लाह ने हर नजासत से पाक किया।
आप फ़ातिमा ज़हरा (स) की पाक औलाद में से हैं,
जो तमाम आलम की औरतों की सरदार हैं।
आप वह नन्ही मज़लूमा हैं
जिन पर ज़ुल्म ढाए गए,
जिन्हें बेवतन किया गया,
और जिनका दिल ग़म से चकनाचूर कर दिया गया।
आप पर सलाम हो,
ऐ वह बीबी जिनकी मासूम आहें दिलों को हिला देती हैं,
जिनका दर्द इंसानियत को रुला देता है,
और जिनकी मुसिबत शहीदों की क़ुर्बानियों की याद दिलाती है।
आप वह हैं
जिनकी याद में आँखें नम हो जाती हैं,
दिल टूट जाते हैं,
और रूह काँप उठती है।
आपने कम उम्र में
वह सब कुछ सहा
जो पहाड़ भी न सह सकें।
आप पर सलाम हो
ऐ ग़रीबी, ग़म और आज़माइश की मिसाल,
ऐ सब्र और मासूमियत की तस्वीर,
ऐ करामत और शहादत की निशानी।
अल्लाह आप के ज़रिये
हमें हक़ की पहचान अता फ़रमाए,
और हमें करामत, रहमत और निज़ात की राह दिखाए।
Nाम:
रुकय्या (जो सकीना के नाम से भी म’रूफ़ हैं)
सकीना(अरबी:سكينة
अर्थात सकीना यानी सुकून, दिल का इत्मिनान[1])
(पैदाइशीरुकय्या बिन्त हुसैन)
वालिद:
इमाम हुसैन-बिन-अली-बिन-अबू तालिब (अ.स.)
वालिदा: बीबी उम्मे-रुबाब : (क़बीला किन्दा के सरदार इम्रा अल-क़ैस की बेटी)
पैदाइश: 20 रजब 56 हि. 5">रबीउ'स-सानी, 117 हि.;
वफ़ात: 10/13 सफर, दमिश्क, सीरिया
बीबी सकीना इमाम हुसैन (अ.स.) की सबसे छोटी बेटी थीं। वह एक चंचल बच्ची थीं, मुहब्बत और ख़ुशी से भरी हुई। हर कोई सकीना से मुहब्बत करता था। वह बहुत दीनदार बच्ची भी थीं। उन्हें क़ुरआन-ए-मजीद पढ़ना पसंद था और वह कभी नमाज़ नहीं छोड़ती थीं। दो साल की उम्र से ही वह इस बात का खास ख़याल रखती थीं कि जब वह लोगों के बीच हों तो उनका सर और चेहरा ठीक तरह से ढका हुआ हो।
सकीना इमाम हुसैन (अ.स.) की सबसे महबूब औलाद थीं। अक्सर हमारे इमाम से यह सुना जाता था, “सकीना के बग़ैर घर में रहना बेकार है!” उनके चेहरे पर हमेशा मीठी और ख़ुशनुमा मुस्कान रहती और उनका मिज़ाज बहुत दोस्ताना था। दूसरे बच्चे भी, जैसे बड़े लोग, उनकी संगत चाहते थे। वह बहुत सख़ी थीं और जो कुछ भी उनके पास होता, दूसरों के साथ बाँट देतीं।
हज़रत अब्बास और सकीना के दरमियान एक खास रिश्ता था। वह उन्हें अपने बच्चों से भी ज़्यादा मुहब्बत करते थे। अगर सकीना कुछ मांगतीं, तो अब्बास तब तक चैन से न बैठते जब तक उनकी ख़्वाहिश पूरी न कर देते। सकीना को ख़ुश करने के लिए ऐसा कोई काम नहीं था जो अब्बास न करते।
मदीना से मक्का और फिर मक्का से कर्बला के सफ़र के दौरान, अब्बास अक्सर उस महमिल तक आते दिखाई देते जिसमें सकीना बैठती थीं, ताकि यह देख लें कि उन्हें जो चाहिए, सब मौजूद है। सकीना भी अपने चाचा से उतनी ही मुहब्बत करती थीं। मदीना में वह दिन में कई बार उस घर जातीं जहाँ हज़रत अब्बास अपने घरवालों और अपनी माँ उम्मुल बनीन के साथ रहते थे।
सकीना भी किसी चार-पाँच साल की बच्ची की तरह रात को सोने से पहले अपने वालिद के साथ कुछ वक़्त बिताना चाहती थीं। इमाम हुसैन उन्हें अंबिया के किस्से और उनके नाना अली (अ.स.) की जंगों के हालात सुनाते थे। वह अपना सर अपने वालिद के सीने पर रख देतीं और हुसैन (अ.स.) तब तक न हटते जब तक वह सो न जातीं। जब मुहर्रम की दूसरी तारीख़ से यज़ीद की फौजें कर्बला में जमा होने लगीं, तो हुसैन (अ.स.) ने अपनी बहन ज़ैनब से कहा, “अब वक़्त आ गया है कि तुम सकीना को मेरे बग़ैर सोने की आदत डलवा दो!” सकीना रात में अपने वालिद के पीछे-पीछे चलतीं और हुसैन (अ.स.) को नर्मी से उन्हें ज़ैनब या रुबाब के पास ले जाना पड़ता।
कर्बला में जब सातवीं मुहर्रम से पानी कम होने लगा, तो सकीना के पास जो थोड़ा-बहुत पानी होता, वह उसे दूसरे बच्चों के साथ बाँट देतीं। जब फिर बिल्कुल पानी न रहा, तो प्यासे बच्चे उम्मीद भरी नज़रों से सकीना की तरफ़ देखते, और वह उनकी मदद न कर पाने पर आँखों में आँसू लिए रहतीं। सकीना के होंठ प्यास से सूख चुके थे।
आशूरा के दिन उन्होंने अपना मश्क हज़रत अब्बास को दे दिया। वह उनके लिए पानी लाने गए। बच्चे अपने छोटे-छोटे प्यालों के साथ सकीना के इर्द-गिर्द जमा हो गए, जानते थे कि जैसे ही हज़रत अब्बास पानी लाएँगे, सकीना पहले यह यक़ीन करेंगी कि बच्चों को मिल जाए, फिर खुद लेंगी। जब सकीना ने इमाम हुसैन (अ.स.) को ख़ून में भीगा हुआ अलम लाते देखा, तो उन्हें समझ आ गया कि उनके चाचा अब्बास शहीद हो चुके हैं। उस दिन के बाद सकीना ने कभी प्यास की शिकायत नहीं की।
फिर वह वक़्त आया जब ज़मीन काँप उठी और सकीना यतीम हो गईं! मगर तब भी वह सबसे पहले दूसरों का ख़याल करतीं। अली असग़र की शहादत पर वह अपनी माँ को तसल्ली देतीं, और जब किसी और औरत या बच्चे को रोते देखतीं तो अपने नन्हे बाजू उनके गिर्द डाल देतीं।
हाँ, सकीना ने फिर कभी किसी से पानी नहीं मांगा। बीबी ज़ैनब उन्हें कुछ घूँट लेने पर राज़ी करतीं, मगर वह खुद कभी पानी नहीं मांगतीं और न प्यास की शिकायत करतीं!!!!
जिस वक़्त इमाम हुसैन (अ.स.) मैदान-ए-जंग में गिर पड़े, उस वक़्त से सकीना मुस्कुराना भूल गईं! कूफ़ा ने उन्हें एक ग़मगीन, ख़ामोश बच्ची के रूप में देखा जो गहरी सोच में डूबी रहती। अक्सर वह रात में उठ बैठतीं। जब उनसे पूछा जाता कि क्या चाहिए, तो कहतीं, “मैंने अभी एक बच्चे के रोने की आवाज़ सुनी? क्या वह असग़र है? वह मुझे पुकार रहा होगा!”
यह जानते हुए कि उनका रोना उनकी माँ को बेचैन कर देता है, सकीना चुपचाप रोतीं और फ़ौरन अपने आँसू पोंछ लेतीं! शाम की कैदख़ाने में वह सूरज ढलते वक़्त अपने घोंसलों की तरफ़ उड़ते परिंदों को देखतीं और मासूमियत से बीबी ज़ैनब से पूछतीं, “क्या सकीना भी उन परिंदों की तरह अपने घर जा पाएगी?”
फिर एक बहुत ही भयानक रात आई जब सकीना जेल के ठंडे फ़र्श पर सोने चली गईं। बहुत देर तक वह अँधेरे में ताकती रहीं! फज्र की नमाज़ का वक़्त आ गया। सकीना अब भी आँखें खोले पड़ी थीं। उनकी माँ ने पुकारा: “उठो सकीना! उठो, नमाज़ का वक़्त है, मेरी बच्ची!” मगर बस दर्दनाक ख़ामोशी थी! हमारे चौथे इमाम वहाँ आए जहाँ सकीना पड़ी थीं। उन्होंने अपना हाथ उनके माथे पर रखा—वह ठंडा था! उन्होंने हाथ मुँह और नाक के क़रीब रखा। सकीना की साँस रुक चुकी थी। आहों और सिसकियों के बीच इमाम ज़ैनुल ‘आबिदीन ने कहा: “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।”
सकीना को दफ़न कैसे किया गया? ज़ैनब ने उस बे-हरकत बच्ची को गोद में थामे रखा, जबकि इमाम ज़ैनुल ‘आबिदीन ने उसी कोठरी में क़ब्र खोदी। जब दफ़न के बाद क़ब्र पर मिट्टी डाली जा रही थी, माँ के मुँह से एक चीख निकल गई! बीबी रुबाब को कौन तसल्ली दे सकता था? क्या कहा जा सकता था? सब उनके इर्द-गिर्द सिमट गए, और जेल की दीवारें इस सदा से काँप उठीं: “या सकीना, या मज़लूमा!!” बीबी रुबाब ने अपना गाल सकीना की क़ब्र पर रखा और रो पड़ीं: “मुझसे बात करो, सकीना! बस एक लफ़्ज़, मेरी बच्ची! मुझसे बात करो!!”
कर्बला के बाद के वाक़ियात
ख़्वाब-ए-सय्यदा सकीना, दुर्रे-इमाम हुसैन (अ.स)
“सफ़र-ए-आँसू” से इक़्तिबास तहरीर: बशीर हसनअली रहीम
सय्यदा सकीना (अ.स) बयान करती हैं कि जुमेरात के दिन मैंने शाम (सीरिया) में ख़्वाब देखा। फिर वह एक तवील ख़्वाब बयान करती हैं और आखिर में कहती हैं कि मैंने अपने ख़्वाब में एक खातून को देखा जो ऊँट के महमिल पर बैठी थीं और उनका हाथ सर पर था। मैंने पूछा कि वह कौन हैं, तो जवाब मिला कि “यह फातिमा (अ.स) हैं, मोहम्मद (स.अ.व.व.स) की बेटी, रसूलुल्लाह की बेटी, और तुम्हारी नानी।” मैंने अपने दिल में कहा, “ख़ुदा की क़सम! मुझे उनके पास जाना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि इन लोगों ने हमारे साथ क्या-क्या किया।” यह कहते हुए मैं उनकी तरफ़ दौड़ी। मैं उनके सामने बैठी और रोने लगी, फिर मैंने कहा, “ऐ प्यारी माँ! इन्होंने हमारे हक़ रोक लिए। ऐ प्यारी माँ! इन्होंने हमारी जमाअत बिखेर दी। ऐ प्यारी माँ! इन्होंने हमारी हुरमत तोड़ दी। ऐ प्यारी माँ! ख़ुदा की क़सम! इन्होंने मेरे वालिद हुसैन (अ.स) को क़त्ल कर दिया।” उन्होंने जवाब दिया, “ऐ प्यारी सकीना! ख़ामोश रहो, क्योंकि यह मेरी दिल की रग काट देता है। यह तुम्हारे वालिद की क़मीस है जिसे मैंने महफ़ूज़ रखा है, यहाँ तक कि मैं इसी के साथ अल्लाह से मुलाक़ात करूँ।”
[1] अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं (ला इलाहा इल्लल्लाह)। [2] अल्लाह सबसे बड़ा है (अल्लाहो अकबर)।
शैख़ इब्ने नीमा बयान करते हैं कि सय्यदा सकीना (अ.स) ने दमिश्क में ख़्वाब देखा कि पाँच रौशन घोड़े सामने आए, और हर एक पर एक मुकर्रम शख़्सियत सवार थी, और फ़रिश्ते हर तरफ़ से उन्हें घेरे हुए थे; जन्नत की एक ख़ादिमा भी उनके साथ थी। वे सवार आगे बढ़ गए और ख़ादिमा मेरी तरफ़ आई और कहा, “बेशक तुम्हारे नाना ने तुम्हें सलाम भेजा है।” मैंने कहा, “रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.स) पर सलाम! तुम कौन हो?” उसने कहा, “मैं जन्नत की ख़ादिमाओं में से हूँ।” मैंने पूछा, “ये लोग कौन हैं जो शरीफ़ घोड़ों पर सवार होकर आए हैं?” उसने कहा, “ये आदम (अ.स) हैं, अल्लाह के चुने हुए (सिफ़्वतुल्लाह); दूसरा इब्राहीम (अ.स) है, अल्लाह का दोस्त (ख़लीलुल्लाह); तीसरा मूसा (अ.स) है, जो अल्लाह से कलाम करने वाला (कलीमुल्लाह); चौथा ईसा (अ.स) है, रूहुल्लाह।” मैंने पूछा, “वह कौन है जिसने अपनी दाढ़ी हाथ में पकड़ी हुई है और गिरता-उठता है?” उसने कहा, “वह तुम्हारे नाना हैं, रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.स)।” मैंने कहा, “ये कहाँ जा रहे हैं?” उसने कहा, “ये तुम्हारे वालिद हुसैन (अ.स) की तरफ़ जा रहे हैं।” मैं उनकी तरफ़ दौड़ी ताकि उन्हें बताऊँ कि ज़ालिमों ने उनकी वफ़ात के बाद हमारे साथ कैसा सुलूक किया। उसी लम्हे पाँच रौशन महमिल आ पहुँचे और हर एक पर एक खातून बैठी थीं। मैंने पूछा, “ये खातून कौन हैं जो अभी-अभी आई हैं?” उन्होंने कहा, “पहली हव्वा हैं, इंसानियत की माँ; दूसरी आसिया हैं, मज़ाहिम की बेटी (और फ़िरऔन की बीवी); तीसरी मरयम हैं, इमरान की बेटी (और नबी ईसा की माँ); चौथी ख़दीजा (अ.स), ख़ुवैलिद की बेटी; और पाँचवीं—जिसका हाथ सर पर है और जो गिरती-उठती है—वह तुम्हारी नानी फातिमा (अ.स) हैं, मोहम्मद (स.अ.व.व.स) की बेटी, तुम्हारे वालिद की माँ।” मैंने कहा, “ख़ुदा की क़सम! मुझे उन्हें बताना चाहिए कि इन्होंने हमारे साथ कैसा सुलूक किया।” यह कहकर मैं उनके सामने बैठी और कहा, “ऐ प्यारी माँ! इन्होंने हमारे हक़ रोक लिए। ऐ प्यारी माँ! इन्होंने हमारी जमाअत बिखेर दी। ऐ प्यारी माँ! इन्होंने हमारी हुरमत तोड़ दी। ऐ प्यारी माँ! ख़ुदा की क़सम! इन्होंने मेरे वालिद हुसैन (अ.स) को क़त्ल कर दिया।” उन्होंने (अ.स) जवाब दिया, “ऐ सकीना! ख़ामोश रहो। तुमने मेरा जिगर जला दिया और मेरे दिल का जोड़ काट दिया। यह तुम्हारे वालिद हुसैन (अ.स) की क़मीस है जिसे मैंने महफ़ूज़ रखा है, यहाँ तक कि मैं इसी के साथ अल्लाह से मुलाक़ात करूँ।” फिर मैं नींद से जागी और चाहा कि इसे छुपा लूँ, मगर फिर मैंने इसे अपने क़रीबी रिश्तेदारों से बयान कर दिया और यह लोगों में मशहूर हो गया।” (नफ़सुल महमूम)
अरब दुनिया में इमाम हुसैन (अ.स.) की सबसे छोटी बेटी को बीबी रुक़य्या (अ.स.) के नाम से जाना जाता है, जबकि इस्लामी दुनिया के बाक़ी हिस्सों में उन्हें बीबी सकीना (अ.स.) के नाम से पहचाना जाता है। हम उन्हें बीबी सकीना (अ.स.) ही कहेंगे। बीबी सकीना (अ.स) इमाम हुसैन (अ.स) की सबसे छोटी बेटी थीं। “सकीना” लफ़्ज़ “सुकून” से निकला है, जिसका मतलब “अमन/सुकून” है। इमाम हुसैन (अ.स) सलातुल-लैल (नमाज़-ए-शब) में एक बेटी के लिए दुआ करते थे—ऐसी बेटी जो उन्हें सुकून दे—और अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) ने उनकी दुआ क़बूल की और उन्हें बीबी सकीना (अ.स) अता फ़रमाई। बीबी सकीना (अ.स) इमाम हुसैन (अ.स) की सबसे महबूब बेटी थीं और अक्सर रातों में उनके सीने पर सोती थीं। वह एक ज़िन्दादिल बच्ची थीं—मुहब्बत और ख़ुशी से भरी हुई। इमाम (अ.स) की बेटी होने की वजह से वह अपनी उम्र के दूसरे बच्चों से बहुत से पहलुओं में मुख़्तलिफ़ थीं। वह बहुत दीनदार थीं, क़ुरआन-ए-मजीद की तिलावत पसंद करती थीं और कभी नमाज़ नहीं छोड़ती थीं। बहुत छोटी उम्र से ही वह इस बात का खास ख़याल रखती थीं कि जब वह लोगों के सामने हों तो उनका सर और चेहरा ठीक तरह से ढका हुआ हो।
इमाम हुसैन (अ.स) से अक्सर यह सुना जाता था: “सकीना (अ.स) के बग़ैर घर में रहना क़ाबिल-ए-ज़िंदगी नहीं।” उनके चेहरे पर हमेशा मीठी और ख़ुशनुमा मुस्कान रहती और मिज़ाज बहुत दोस्ताना था। हर कोई सकीना (अ.स) से मुहब्बत करता था। बच्चे भी, और बड़े भी, उनकी संगत चाहते थे। वह बहुत सख़ी थीं और जो कुछ उनके पास होता, दूसरों के साथ बाँट देती थीं। किसी चार-पाँच साल की बच्ची की तरह, जब बीबी सकीना (अ.स) रात को सोने जातीं तो अपने वालिद के साथ कुछ वक़्त बिताना चाहतीं। इमाम हुसैन (अ.स) उन्हें अंबिया (अ.स) के वाक़ेआत और उनके नाना इमाम अली (अ.स) की जंगों के क़िस्से सुनाते। वह अपना सर अपने वालिद के सीने पर रख देतीं और इमाम हुसैन (अ.स) तब तक न हटते जब तक वह सो न जातीं।
बीबी सकीना (अ.स) और उनके चचा, हज़रत अब्बास बिन इमाम अली (अ.स) के दरमियान एक खास रिश्ता था। वह उन्हें अपने बच्चों से भी ज़्यादा मुहब्बत करते थे। अगर सकीना (अ.स) कुछ मांगतीं, तो हज़रत अब्बास (अ.स) तब तक आराम न करते जब तक उनकी ख़्वाहिश पूरी न कर देते। सकीना (अ.स) को ख़ुश करने के लिए ऐसा कोई काम नहीं था जो हज़रत अब्बास (अ.स) न करते। मदीना से मक्का और फिर मक्का से कर्बला के सफ़र में हज़रत अब्बास (अ.स) अक्सर उस महमिल के क़रीब आते दिखाई देते जिसमें बीबी सकीना (अ.स) बैठती थीं, ताकि यह देख लें कि उन्हें जो चाहिए, सब मौजूद है। बीबी सकीना (अ.स) भी अपने चचा से उतनी ही मुहब्बत करती थीं। मदीना में वह दिन में कई बार उस घर जातीं जहाँ हज़रत अब्बास (अ.स) अपने घरवालों और अपनी माँ उम्मुल-बनीन (अ.स) के साथ रहते थे।
जब मुहर्रम की 2 तारीख़ से यज़ीद बिन मुआविया (ल.अ) की फौजें कर्बला में जमा होने लगीं, तो इमाम हुसैन (अ.स) ने अपनी बहन बीबी ज़ैनब (अ.स) से कहा: “अब वक़्त आ गया है कि तुम सकीना को मेरे बग़ैर सोने की आदत डाल दो।” बीबी सकीना (अ.स) रात में अपने वालिद के पीछे-पीछे चलतीं और इमाम हुसैन (अ.स) को नर्मी से उन्हें बीबी ज़ैनब (अ.स) या बीबी रुबाब (अ.स) (बीबी सकीना की वालिदा) के पास ले जाना पड़ता। कर्बला में जब मुहर्रम की 7 तारीख़ से पानी कम होने लगा, तो बीबी सकीना (अ.स) के पास जो थोड़ा-बहुत पानी होता, वह उसे दूसरे बच्चों के साथ बाँट देतीं। जब फिर बिल्कुल पानी न रहा, तो प्यासे बच्चे उम्मीद भरी नज़रों से बीबी सकीना (अ.स) की तरफ़ देखते, और वह उनकी मदद न कर पाने पर आँखों में आँसू लिए रहतीं। बीबी सकीना (अ.स) के होंठ प्यास से सूख चुके थे।
कई बार हज़रत अब्बास (अ.स) ने इमाम हुसैन (अ.स) से इजाज़त मांगी कि उन्हें यज़ीद (ल.अ) की फौजों से लड़ने दिया जाए। हर बार इमाम हुसैन (अ.स) जवाब देते: “अब्बास, तुम मेरी फौज के सरदार हो; तुम मेरे आलमदार हो (झंडा उठाने वाले)।” हज़रत अब्बास (अ.स) कभी इमाम हुसैन (अ.स) से बहस न करते। उसी वक़्त बीबी सकीना (अ.स) बाहर आईं, हाथ में सूखा हुआ मश्क (पानी की थैली) लिए हुए। सख़ावत वाले इमाम की नन्ही शहज़ादी 42 बच्चों की रहनुमाई कर रही थीं—हर एक के हाथ में सूखी पानी की थैली। बच्चे जैसे कोरस में पुकार रहे थे: प्यास, जलाती प्यास, हमें मार रही है। वह हज़रत अब्बास (अ.स) के पास पहुँचीं और कहा कि सारे बच्चे उनके पास पानी मांगने आए हैं। वह देख रहे थे कि रेगिस्तान की तपती गर्मी के साथ बढ़ी हुई प्यास उनकी नन्ही जानों को निचोड़ रही है। हज़रत अब्बास (अ.स) इमाम हुसैन (अ.स) के पास गए और बीबी सकीना (अ.स) और बच्चों के लिए पानी लाने की इजाज़त मांगी। इमाम हुसैन (अ.स) ने उन्हें इजाज़त दे दी। हज़रत अब्बास (अ.स) ने बीबी सकीना (अ.स) की मश्क को आलम (झंडे) पर रखा, घोड़े पर सवार हुए और इमाम हुसैन (अ.स) के पास आए।
हज़रत अब्बास (अ.स) ने कहा: “मैं रुख़्सत होने आया हूँ।” इमाम हुसैन (अ.स) ने कहा: “भाई, आओ मुझे गले लगाओ।” हज़रत अब्बास (अ.स) घोड़े से उतरे। इमाम (अ.स) की आँखों में आँसू थे। जब हज़रत अब्बास (अ.स) फिर घोड़े पर चढ़ने लगे, तो इमाम हुसैन (अ.स) ने कहा: “भाई, मुझे तुमसे एक तोहफ़ा चाहिए—मुझे तुम्हारी तलवार चाहिए।” हज़रत अब्बास (अ.स) ने बिना कुछ कहे अपनी तलवार इमाम हुसैन (अ.स) को दे दी और मैदान-ए-जंग की तरफ़ बढ़ गए—हाथ में केवल नेज़ा और आलम। इमाम (अ.स) के हर अमल से यह ज़ाहिर था कि वह उन्हें लड़ने के लिए नहीं भेज रहे थे। जब हज़रत अब्बास (अ.स) पानी लेने गए, तो बच्चे अपने छोटे-छोटे प्यालों के साथ बीबी सकीना (अ.स) के इर्द-गिर्द जमा हो गए, जानते थे कि जैसे ही हज़रत अब्बास (अ.स) पानी लाएँगे, बीबी सकीना (अ.स) पहले यह यक़ीन करेंगी कि बच्चों को मिल जाए, फिर खुद लेंगी।
बीबी सकीना (अ.स) इमाम हुसैन (अ.स) के क़रीब खड़ी थीं और उनकी नज़रें भी हज़रत अब्बास (अ.स) के आलम पर जमी थीं। हज़रत अब्बास (अ.स) दरिया के किनारे पहुँचे—यज़ीद (ल.अ) के लोगों से लड़ते हुए जो रास्ता रोक रहे थे—और नेज़े से बहुतों को गिरा दिया। अरबों में हज़रत अब्बास (अ.स) की बहादुरी मशहूर थी, इसलिए यज़ीदी लश्कर इधर-उधर भागने लगे। जब वह मश्क भरने के लिए झुके, तो आलम नज़र से ओझल हो गया। बीबी सकीना (अ.स) घबरा गईं और अपने वालिद की तरफ़ देखा। इमाम हुसैन (अ.स) ने कहा: “सकीना (अ.स), तुम्हारे चचा दरिया के किनारे हैं।” बीबी सकीना (अ.स) मुस्कुराईं और कहा: अलहम्दुलिल्लाह (तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं) और बच्चों को बुलाया कि हज़रत अब्बास (अ.स) का इस्तिक़बाल करें।
मश्क भरकर हज़रत अब्बास (अ.स) चाहते थे कि पानी जितनी जल्दी हो सके, बेचैन बच्चों तक पहुँचा दें। जब यज़ीदी लश्कर ने देखा कि वह इमाम हुसैन (अ.स) के ख़ेमों की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहे हैं, तो एक यज़ीदी सरदार (ल.अ) ने पुकारा कि अगर पानी की एक बूँद भी हुसैन (अ.स) के ख़ेमे तक पहुँची, तो मैदान में उनसे लड़ना नामुमकिन हो जाएगा। हर तरफ़ से तीर चल रहे थे और हज़रत अब्बास (अ.स) के ज़ेहन में बस एक ही बात थी—जान से ज़्यादा मश्क की हिफ़ाज़त। हमले में, मश्क बचाते हुए, हज़रत अब्बास (अ.स) के दोनों बाज़ू कट गए। आलम ज़मीन पर गिर पड़ा। बीबी सकीना (अ.स) उसे फिर न देख सकीं। उन्होंने इमाम हुसैन (अ.स) की तरफ़ देखा—उनकी आँखें आँसुओं से भरी थीं।
बीबी सकीना (अ.स) डर से काँपने लगीं और उनकी आँखें भी आँसुओं से भर गईं। उन्होंने हाथ उठाकर दुआ की: “या अल्लाह! मेरे चचा अब्बास (अ.स) को शहीद न होने देना; मैं फिर कभी पानी नहीं मांगूँगी।” वह अपनी माँ (अ.स) के पास भागीं। जब बीबी सकीना (अ.स) ने इमाम हुसैन (अ.स) को ख़ून में भीगा हुआ आलम (झंडा) लाते देखा, तो उन्हें यक़ीन हो गया कि उनके चचा अब्बास (अ.स) शहीद हो चुके हैं।
फिर वह वक़्त आया जब ज़मीन काँप उठी और बीबी सकीना (अ.स) यतीम हो गईं। यज़ीद (ल.अ) की ज़ालिम फौजें ख़ेमों में घुस आईं। उन्होंने अहले-बैत (अ.स) की मुक़द्दस ख़वातीन का सारा सामान लूट लिया। यहाँ तक कि मुक़द्दस ख़वातीन (अ.स) के हिजाब भी छीन लिए। बीबी फातिमा (अ.स) की बेटियाँ बे-सर हो गईं। शिम्र (ल.अ), यज़ीद के सबसे बदतरीन लोगों में से, वह भी आया। बीबी सकीना (अ.स) अपने वालिद के लिए रो रही थीं। तसल्ली के बजाय शिम्र (ल.अ) ने बीबी सकीना (अ.स) के चेहरे पर थप्पड़ मारा और उनके कानों के कुण्डल खींच लिए। नन्ही सकीना के कानों से ख़ून बह निकला। लगा कि अब रुकेंगे—मगर नहीं। एक-एक करके उन्होंने ख़ेमों को आग लगा दी। बेबस ख़वातीन और बच्चे एक ख़ेमे से दूसरे ख़ेमे की तरफ़ भागते रहे। छोटी बीबी सकीना (अ.स) का लिबास आग पकड़ चुका था, कानों से ख़ून बह रहा था। बीबी सकीना (अ.स) को बस अपने प्यारे वालिद चाहिए थे। वह मैदान-ए-जंग की तरफ़ भागीं और चीख़ीं: “बाबा, आप कहाँ हैं? बाबा, बाबा, मुझसे बात कीजिए बाबा।”
जब रात उतरी, और चूँकि इमाम अली बिन हुसैन (अ.स) जिन्हें ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) भी कहा जाता है, बीमारी की वजह से नाज़ुक थे, तो बीबी ज़ैनब (अ.स) बिन्त-ए-अली (अ.स) ने ख़ुद अहल-ए-हरम और बच्चों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ले ली। उन्होंने तमाम ख़वातीन और बच्चों को जले हुए ख़ेमों के बीच एक छोटे से हिस्से में जमा कर दिया। इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) ज़मीन पर लेटे थे और उनके इर्द-गिर्द ये बेवा और यतीम थे। न आग थी, न रौशनी—बस चाँद की हल्की रौशनी। आशूरा की रात (शाम-ए-ग़रीबाँ) जब इमाम हुसैन (अ.स) और उनके अस्हाब मैदान में बे-सर पड़े थे, ख़ेमों में बीबी ज़ैनब (अ.स) बच्चों और ख़वातीन को समेट रही थीं। उन्होंने देखा कि छोटी बीबी सकीना (अ.स) ग़ायब हैं। उन्होंने बीबी रुबाब (अ.स) से पूछा, मगर उन्हें भी मालूम न था कि बीबी सकीना (अ.स) कहाँ हैं। दोनों मुक़द्दस ख़वातीन घबरा गईं और बाहर निकलकर उन्हें तलाश करने लगीं।
दोनों ख़वातीन ने हर जगह ढूँढा मगर बे-सूद। आखिरकार बे-इंतिहा बे-क़रारी में बीबी ज़ैनब (अ.स) उस जगह पहुँचीं जहाँ उनके भाई इमाम हुसैन (अ.स) का जिस्म पड़ा था और रोकर कहा: “ऐ मेरे भाई! सकीना, जिसे आपने मेरी अमानत बनाया था, कहीं नहीं मिल रही। इस वीराने में मैं उसे कहाँ ढूँढूँ?” उसी लम्हे बादल के पीछे से चाँद निकला और बीबी ज़ैनब (अ.स) ने देखा कि छोटी सकीना (अ.स) अपने वालिद पर लेटी हुई हैं, उनके सीने पर सो रही हैं, जैसे वह हमेशा सोती थीं।
उन्होंने बच्ची को जगाया और कहा: “ऐ सकीना! तुमने अपने वालिद को कैसे पहचाना? इंसान चेहरा या कपड़ों से पहचाना जाता है; तुम्हारे वालिद के पास न चेहरा है, न कपड़े।” बीबी सकीना (अ.स) ने मासूमियत से कहा: “मैं अपने वालिद को बताना चाहती थी कि लोगों ने मेरे साथ क्या किया। मैं बताना चाहती थी कि शिम्र (ल.अ) ने वे झुमके छीन लिए जो मेरे वालिद ने मुहब्बत से मुझे दिए थे। मैं बताना चाहती थी कि उसने उन्हें मेरे कानों से नोच लिया और कान फट गए और ख़ून बहने लगा। मैं बताना चाहती थी कि जब मैं दर्द से रोई तो उस दरिंदे ने बेरहमी से मुझे थप्पड़ मारा। जब मैं रेगिस्तान में भटक रही थी तो मुझे लगा मैंने अपने वालिद की आवाज़ सुनी कि वह यहाँ हैं। मैं आवाज़ के पीछे गई और उन्हें यहाँ पड़ा पाया। मैंने उन्हें सब कुछ बताया और फिर मुझे लगा कि आख़िरी बार, जैसे मैं हमेशा करती थी, उनके सीने पर सर रखकर सो जाऊँ। इसलिए मैंने अपना सर उनके सीने पर रखा और आप के आने तक सोती रही।”
उमर सअद (ल.अ) ने हुर की बेवा से कहा कि ख़वातीन और बच्चों के लिए कुछ खाना और पानी ले जाए। जब वह उनके क़रीब पहुँचीं, बीबी ज़ैनब (अ.स) ने उन्हें पहचान लिया। वह खड़ी हुईं, हुर की बेवा की तरफ़ गईं और हुर की शहादत पर तअज़ियत पेश की। बीबी ज़ैनब (अ.स) का यह अमल—जबकि उन्होंने इतना सहा, इतने अज़ीज़ खोए, और दिल में इतना ग़म था—हक़ीक़ी इस्लामी अख़लाक़ का एक बड़ा दर्स है जिसे दुनिया को कभी नहीं भूलने देना चाहिए। हुर बिन रियाही (र.अ) यज़ीद (ल.अ) के लश्कर का जनरल था, मगर उसने शैतानी लश्कर छोड़कर इमाम हुसैन (अ.स) का साथ दिया। हुर (र.अ) ने रसूल (स.अ.व.व) के नवासे के मुक़द्दस मक़ाम को समझा और मान लिया था।
बीबी ज़ैनब (अ.स) ने पानी का जग लिया। वह बीबी सकीना (अ.स) के पास गईं जो बेचैन नींद में थीं। नर्मी से उन्होंने बीबी सकीना (अ.स) के बिखरे बालों पर हाथ फेरा। बीबी सकीना (अ.स) ने आँखें खोलीं। बीबी ज़ैनब (अ.स) ने कहा: “यह पानी है सकीना, थोड़ा सा पी लो। तुम बहुत देर से प्यास में हो।” “पानी” का लफ़्ज़ सुनते ही सकीना ने उम्मीद से पुकारा: “क्या मेरे चचा अब्बास वापस आ गए?” जब बताया गया कि हुर की बेवा पानी लाई है, तो वह उठीं, हुर की बेवा के पास गईं, शुक्रिया अदा किया, फिर बीबी ज़ैनब (अ.स) से पूछा: “क्या आप सब ने पानी पिया?” बीबी ज़ैनब (अ.स) ने सर हिला कर इंकार किया। बीबी सकीना (अ.स) ने कहा: “तो फिर आप मुझे पानी पीने को क्यों कहती हैं?” बीबी ज़ैनब (अ.स) ने कहा: “क्योंकि मेरी बच्ची, तुम सबसे छोटी हो।” बीबी सकीना (अ.स) ने जवाब दिया: “नहीं, असग़र सबसे छोटा है।” बीबी सकीना (अ.स) ने पानी का जग लिया, उस जगह की तरफ़ दौड़ी जहाँ असग़र (अ.स) दफ़न थे, और रोती हुई पुकारने लगीं: “ऐ असग़र, ऐ असग़र।” अली असग़र (अ.स) बीबी सकीना के नन्हे भाई थे। यज़ीदी (ल.अ) ने छः महीने के बच्चे को तीर मारकर शहीद कर दिया, जब इमाम हुसैन (अ.स) ने पानी माँगा था क्योंकि वह प्यास से तड़प रहे थे।
यही था वह हाल कि बे-घर लोगों ने कर्बला में रात गुज़ारी। यही थी शाम-ए-ग़रीबाँ—बे-सर-ओ-सामान लोगों की रात। उन्होंने सब कुछ खो दिया था। मर्द शहीद हो चुके थे। बच्चे क़त्ल कर दिए गए थे। इस वीराने में चौथे इमाम, इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स), ख़वातीन और बाक़ी बच्चे उस जगह सिमटे थे जहाँ कुछ घंटे पहले उनके ख़ेमे थे। हज़रत अब्बास (अ.स), क़ासिम (अ.स) और अली अकबर (अ.स) बारी-बारी से ख़ेमों की पहरेदारी करते रहे थे। अब इमाम अली (अ.स) और बीबी फातिमा (अ.स) की बेटियाँ—बीबी ज़ैनब (अ.स) और बीबी कुलसूम (अ.स)—जागती रहीं ताकि इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) और बच्चों पर हमला न हो।
अगले दिन, बदनसीब क़ाफ़िले को कूफ़ा की तरफ़ रवाना किया गया। इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स), बीमारी से कमज़ोर, भारी ज़ंजीरों में जकड़े गए और नंगे पाँव चलने पर मजबूर किए गए, जबकि ख़वातीन—रसूल (स.अ.व) की नवासियाँ भी—रस्सियों से गर्दनें और हाथ कसकर बाँधकर ऊँटों की नंगी पीठ पर बिठाई गईं। क़ाफ़िला सफ़र की यातनाओं से गुज़रा, और जब वे कूफ़ा पहुँचे तो उन्हें आम रास्तों और गलियों से गुज़ारा गया। अचानक वह ऊँट, जिस पर इमाम हुसैन (अ.स) की मुक़द्दस बेटी बीबी सकीना (अ.स) और इमाम हुसैन (अ.स) की मुक़द्दस बहन बीबी ज़ैनब (अ.स) बैठी थीं, एक घर के क़रीब रुक गया। बीबी ज़ैनब (अ.स) की नज़र बीबी सकीना (अ.स) पर पड़ी और फ़ौरन समझ गईं कि वह कुछ कहना चाहती हैं। उन्होंने पूछा, तो बीबी सकीना (अ.स) ने कहा: “मैं कुछ कहना चाहती हूँ; ऐ मेरी प्यारी फूफी, मुझे मालूम है कि इस वक़्त आप इसे पूरा नहीं कर सकतीं।” जब बीबी ज़ैनब (अ.स) ने ज़िद की, तो बीबी सकीना (अ.स) ने कहा: “ऐ मेरी प्यारी फूफी, मेरा गला इतना सूखा है कि मुझे लगता है मैं अब प्यास बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी।” बीबी सकीना (अ.स) की बात उन औरतों ने भी सुन ली जो घरों की छतों पर खड़ी थीं ताकि मुक़द्दस क़ाफ़िले को साफ़ देख सकें। उनमें से एक नेकदिल खातून फ़ौरन भीड़ से निकली और बीबी सकीना (अ.स) के लिए पानी लाने घर दौड़ गई।
लेकिन जब वह ऊँट के क़रीब और बीबी ज़ैनब (अ.स) के पास पहुँची, तो उसने बदले में एक इल्तिजा की और कहा कि “जब यह प्यासा बच्चा इस पानी को चख ले, तो मैं चाहती हूँ कि यह मेरे लिए दुआ करे।” यह सुनकर बीबी ज़ैनब (अ.स) ने बीबी सकीना (अ.स) को पानी पीने से रोक दिया और कहा: “मेरी प्यारी सकीना, पहले इस खातून की दरख़्वास्त पूरी करो।” बीबी ज़ैनब (अ.स) ने उस खातून से पूछा कि बीबी सकीना (अ.स) किस बात की दुआ करें, तो उसने कहा: “मेरी पहली ख़्वाहिश यह है कि मेरे बच्चे कभी तुम्हारी तरह यतीम न हों। मेरे लिए दुआ करो, ऐ मेरी प्यारी बच्ची; मैं देख रही हूँ कि तुम यतीम हो और मुझे मालूम है कि ख़ुदा यतीम की दुआ ज़रूर सुनता है।” बीबी सकीना (अ.स) ने अपने नन्हे हाथ उठाए और उस खातून के लिए दुआ की।
फिर बीबी ज़ैनब (अ.स) ने दूसरी ख़्वाहिश के बारे में पूछा। खातून ने कहा: “मेरी दूसरी आरज़ू यह है कि मैं मदीना की ज़ियारत करूँ; मेरे लिए दुआ करो कि ख़ुदा मुझे मुक़द्दस शहर की ज़ियारत का मौक़ा दे।” मदीना का नाम सुनकर बीबी ज़ैनब (अ.स) ने पूछा कि वह मदीना क्यों जाना चाहती है। उसने कहा: “क्योंकि मेरी ख़्वाहिश है कि मैं नबी (स.अ.व.व) की क़ब्र की ज़ियारत करूँ और अपनी मुक़द्दस खातून बीबी फातिमा (अ.स) से भी मुलाक़ात करूँ।” बीबी ज़ैनब (अ.स) ने कहा: “मगर क्या तुम्हें मालूम नहीं कि बीबी फातिमा (अ.स) अब दुनिया में नहीं रहीं?” खातून ने कहा: “तो क्या हुआ; मैंने उनकी मुक़द्दस बेटियों बीबी ज़ैनब (अ.स) और बीबी उम्मे कुलसूम (अ.स) की भी ख़िदमत की है। मैं मदीना जाऊँगी ताकि आख़िरी बार उनसे मिलने का शरफ़ हासिल कर सकूँ।” अब बीबी ज़ैनब (अ.स) ने आख़िरी सवाल किया: “ऐ मोमिना, अगर तुम अपनी सय्यदा ज़ैनब (अ.स) को देखो तो क्या पहचान लोगी?” उसने फ़ौरन कहा: “जी हाँ, बिल्कुल।” बीबी ज़ैनब (अ.स) ने चेहरे से बाल हटाए और रो पड़ीं: “तो तुम्हारी दुआ क़बूल हो गई—देखो उम्मे हबीबा, मैं ही ज़ैनब (अ.स) हूँ; फिर तुम मुझे क्यों नहीं पहचानतीं, क्या तुम हम सबको नहीं पहचानतीं?”
उम्मे हबीबा रोने लगीं और कहा: “ऐ ख़ुदा, उन्होंने ऐसा कौन सा गुनाह किया कि उन्हें इतनी बेरहमी से सताया जा रहा है?” बीबी ज़ैनब (अ.स) ने कहा: “हम रसूल (स.अ.व.व) की औलाद हैं; तुम्हारे सरदार इमाम हुसैन (अ.स) अपने साथियों समेत शहीद कर दिए गए और कर्बला की तपती रेत पर बे-दफ़न छोड़ दिए गए। उनके सर काटकर नेज़ों पर बुलंद कर दिए गए। आगे देखो उम्मे हबीबा—तुम्हारे सरदार का सर तुम्हारे सामने है—वह सर जिसके होंठ क़ुरआन-ए-मजीद की तिलावत कर रहे हैं।” जब से इमाम हुसैन (अ.स) मैदान-ए-जंग में गिरे, बीबी सकीना (अ.स) मुस्कुराना भूल गईं। कूफ़ा ने उन्हें एक संजीदा-सी बच्ची की तरह देखा जो गहरी सोच में खोई रहती। अक्सर वह रात में उठ बैठतीं। जब उनसे पूछा जाता कि क्या चाहिए, तो कहतीं: “मैंने अभी एक बच्चे के रोने की आवाज़ सुनी? क्या वह असग़र है? वह मुझे पुकार रहा होगा।
कूफ़ा से मुक़द्दस कैदियों के सफ़र का अगला मरहला शुरू हुआ—यह सफ़र उन्हें दमिश्क, शाम (सीरिया) ले जाना था, जो यज़ीद (ल.अ) की राजधानी थी। बीबी सकीना (अ.स) को रस्सी से बाँधकर नंगे ऊँट पर बिठाया गया। सफ़र में एक जगह बीबी सकीना (अ.स) अपने ऊँट से गिर पड़ीं। क़ाफ़िला नहीं रुका। मुक़द्दस कैदियों (अ.स) के सिवा किसी ने इस नन्ही शहज़ादी (अ.स) के गिरने पर ध्यान नहीं दिया। इस वाक़ेआ के बाद बदबख़्त फौज ने मुक़द्दस कैदियों (अ.स) की तरतीब बदल दी। इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) पहले ही गर्दन और पैरों में ज़ंजीरों से बँधे थे; ज़ालिमों ने उनके बेटे, इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स)—पाँचवें इमाम—को इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) की पीठ पर बाँध दिया, और वही रस्सी उनकी बहन बीबी सकीना (अ.स) की गर्दन में भी बाँध दी, ताकि इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) सीधे खड़े न हो सकें। अगर वह सीधे होते, तो रस्सी तंग हो जाती और बीबी सकीना (अ.स) का गला घुटने लगता।
इन सख़्तियों और मुसीबतों के बावजूद, इमाम हुसैन (अ.स) की नन्ही शहज़ादी हमेशा पहले दूसरों का ख़याल करती थीं। अली असग़र (अ.स) की शहादत पर वह अपनी माँ को तसल्ली देतीं और जब किसी और औरत या बच्चे को रोते देखतीं तो बीबी सकीना (अ.स) अपने नन्हे बाज़ू उनके गिर्द डाल देतीं। उन दिनों ऊँट पर दमिश्क पहुँचने में बत्तीस दिन लगते थे, मगर इस मुक़द्दस ख़ानदान (अ.स) को ऐसे ले जाया गया कि सिर्फ़ सोलह दिन में दमिश्क पहुँचा दिया गया। कर्बला के हादसे के बाद—सोलह दिन की तकलीफ़ें, यातनाएँ और आफ़तें अहले-बैत (अ.स)—नबी (स.अ.व.व) के ख़ानदान—पर गुज़रीं, और वे दमिश्क पहुँचे। जब यज़ीद (ल.अ) को ख़बर मिली कि क़ाफ़िला दमिश्क के बाहरी हिस्से तक पहुँच गया है, तो उसने हुक्म दिया कि उन्हें रोक दिया जाए, जबकि वह और दमिश्क के लोग जश्न और ख़ुशी की तैयारियाँ करें। मुक़द्दस कैदियों के इस क़ाफ़िले को चार दिन तक दमिश्क के बाहर रोका गया।
किसी ने इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) से पूछा—जब अहले-बैत (अ.स) को ज़िंदान-ए-शाम से रिहा किया गया—कि उस पूरे दौर में सबसे सख़्त हिस्सा कौन सा था? इमाम (अ.स) ने जवाब दिया कि सबसे सख़्त वक़्त वह था जब अहले-बैत (अ.स) को चार दिन दमिश्क के बाहर रोका गया। उनके हाथ बँधे थे और उन्हें जानवरों की तरह रखा गया; न खाना दिया गया, न पानी। फिर उन्हें शहर में दाख़िल किया गया; मुक़द्दस ख़वातीन (अ.स) को बग़ैर हिजाब (चादर) के बाज़ार से गुज़रना पड़ा, लोग शोर-ओ-ग़ुल और गीत गा रहे थे; आखिरकार उन्हें यज़ीद (ल.अ) के दरबार में लाया गया।
इमाम हुसैन (अ.स) का मुक़द्दस ख़ानदान अब यज़ीद (ल.अ) के सामने था। वे सब्र से उसके कामों को सह रहे थे, क्योंकि इमाम हुसैन (अ.स) की वसीयत यही थी कि वे ऐसा करें। हर खातून, हर बच्चा रस्सियों में बँधा, बग़ैर पर्दे के, यज़ीद (ल.अ) के सामने खड़ा था, और इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) भारी ज़ंजीरों में जकड़े हुए थे। दिल दहला देने वाला मंज़र यह था कि बदतरीन यज़ीद (ल.अ) शराब पी रहा था और उसके सामने एक थाल में इमाम हुसैन (अ.स) का कटा हुआ सर रखा था, और यज़ीद (ल.अ) एक छड़ी से मुक़द्दस इमाम के होंठों और दाँतों पर मार रहा था। अचानक यज़ीद की नज़र चार साल की बच्ची पर पड़ी जो एक हाथ चेहरे पर और दूसरा हाथ गर्दन पर रखे खड़ी थी। यज़ीद (ल.अ) ने पूछा यह बच्ची कौन है और जवाब मिला कि यह इमाम हुसैन (अ.स) की सबसे महबूब बेटी बीबी सकीना (अ.स) है, और यह मशहूर है कि बीबी सकीना (अ.स) तब तक नहीं सोती थीं जब तक अपना सर अपने वालिद के सीने पर न रख लें। “क्या यह सच है?” यज़ीद (ल.अ) ने कहा और हुक्म दिया कि उससे बात की जाए। जब बीबी सकीना (अ.स) यज़ीद (ल.अ) के पास पहुँचीं, तो उसने सैकड़ों दरबारियों के सामने उनके वालिद इमाम हुसैन (अ.स) से मुहब्बत को परखना चाहा।
यज़ीद (ल.अ) ने कहा: “अगर यह बात सच है जो मैंने अभी सुनी है, तो अपने वालिद को पुकारो—देखते हैं क्या तुम्हारे वालिद का सर तुम्हारी गोद में आ जाता है।” बीबी सकीना (अ.स) ने अपने नन्हे हाथ उठाए और ख़ुदा से दुआ की, फिर अपने मुक़द्दस वालिद (अ.स) के सर की तरफ़ मुड़कर आँसुओं के साथ कहा: “ऐ मेरे प्यारे बाबा, अपनी बेटी के पास आ जाइए। यह बदबख़्त यज़ीद (ल.अ) हमारी मुहब्बत को इम्तिहान में डाल रहा है।” उसी वक़्त इमाम हुसैन (अ.स) का कटा हुआ सर थाल से उठकर करामत से बीबी सकीना (अ.स) की तरफ़ आया, और वह अपने वालिद के मुक़द्दस सर को चूमने लगीं और अपना चेहरा अपने वालिद के चेहरे से लगाती रहीं।
यज़ीद (ल.अ) के ख़ादिमों ने अपने आका के हुक्म से मुक़द्दस कैदियों को एक अँधेरे और गंदे क़ैदख़ाने में डाल दिया। बाद में जब इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) मदीना पहुँचे तो लोगों ने उस क़ैदख़ाने के बारे में पूछा। इमाम (अ.स) ने कहा: वह बहुत पुराना और गंदा घर था, यहाँ तक कि उसकी छत भी गिर चुकी थी। और चूँकि उसकी छत नहीं थी, अहले-बैत (अ.स) गर्मी और सर्दी के लिए खुला छोड़ दिए गए। अहले-बैत (अ.स) पर इतने इम्तिहान और रुस्वाइयों के बाद भी यज़ीद अपना ज़ुल्म जारी रखता रहा और फिर अहले-बैत (अ.स) को अँधेरे ज़ेरे-ज़मीन कोठरी में डाल दिया और इतना कम खाना दिया कि सबके लिए मुश्किल से काफ़ी होता। इस क़ैदख़ाने में नन्ही शहज़ादी सकीना (अ.स) को हर रात सोने में दिक़्क़त होती, क्योंकि उन्हें अपने वालिद इमाम हुसैन (अ.स) की याद आती। बीबी ज़ैनब (अ.स) उन्हें तसल्ली देतीं कि वह जल्द अपने वालिद से मिलेंगी, और इन्हीं बातों से उन्हें सुलाने की कोशिश करतीं।
यह जानते हुए कि उनका रोना उनकी माँ को दुखी करता है, बीबी सकीना (अ.स) चुपचाप रोतीं और फ़ौरन अपने आँसू पोंछ लेतीं। शाम (सीरिया) की क़ैद में वह सूरज ढलते वक़्त अपने घोंसलों की तरफ़ उड़ते परिंदों को देखतीं और मासूमियत से बीबी ज़ैनब (अ.स) से पूछतीं: “सकीना कब उन परिंदों की तरह अपने घर जाएगी?” एक रात बीबी सकीना (अ.स) सो रही थीं कि अचानक रोती हुई जागीं और हर तरफ़ अपने वालिद को ढूँढने लगीं। तमाम मुक़द्दस ख़वातीन ने उन्हें तसल्ली देने की कोशिश की ताकि वह रोना बंद करें, मगर उन्हें चैन न मिला और वह रोती रहीं: “ऐ मेरी प्यारी फूफी, मेरे बाबा कहाँ हैं? कुछ देर पहले मैं अपने बाबा के पास थी, उन्होंने मुझे चूमा और कहा: ‘ऐ मेरी प्यारी सकीना, तुम जल्द मेरे पास आ जाओगी।’ मगर अब मेरे बाबा कहाँ हैं?”
जब बीबी सकीना (अ.स) ने अपना ख़्वाब बयान किया, तो तमाम मुक़द्दस ख़वातीन (अ.स) रोने लगीं। रोने की यह आवाज़ यज़ीद (ल.अ) के दरबार तक पहुँची। यज़ीद (ल.अ) ने एक ख़ादिम भेजा कि पूछा जाए छोटी शहज़ादी (अ.स) क्यों रो रही है। ख़ादिम को बताया गया कि बीबी सकीना (अ.स) को अपने वालिद की याद आ रही है इसलिए वह रो रही है। उन्होंने यज़ीद (ल.अ) को हालात बताए, और यज़ीद (ल.अ) ने अपनी सादी (मज़ा लेने वाली) ख़ुशी के लिए इमाम हुसैन (अ.स) का कटा हुआ सर क़ैदख़ाने में भिजवा दिया। जब बीबी सकीना (अ.स) ने अपने वालिद का सर पाया, तो वह और ज़्यादा रोईं, उसे बहुत मज़बूती से सीने से लगाया और अपने वालिद से पूछा: “मेरे बाबा का सर किसने काटा? मेरे बाबा को किसने शहीद किया? हमें क़ैदी क्यों बनाया गया?” इन ग़मगीन अल्फ़ाज़ के साथ ही बीबी सकीना (अ.s) ख़ामोश हो गईं और कोठरी में सन्नाटा छा गया। सबने समझा कि बीबी सकीना (अ.स) फिर सो गई हैं, मगर यह अस्थायी नींद नहीं थी—बीबी सकीना (अ.स) अब हमेशा की नींद सो गई थीं ताकि अपने मुक़द्दस वालिद से मिल जाएँ। बीबी ज़ैनब (अ.स) ने इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) को बुलाया कि बीबी सकीना (अ.स) की हालत देखें, क्योंकि उन्हें लगा वह बेहोश हो गई हैं। जब इमाम (अ.स) अपनी बहन (अ.स) को देखने गए, तो उन्होंने देखा कि वह (अ.स) की साँस रुक चुकी है। तमाम बीबियाँ (अ.स) बीबी सकीना (अ.स) के इर्द-गिर्द खड़ी रो रही थीं।
बीबी सकीना (अ.स) को उसी क़ैदख़ाने में दफ़न किया गया। बीबी ज़ैनब (अ.स.) ने उस बे-हरकत बच्ची को थामे रखा, जबकि इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) ने क़ैदख़ाने में ही अपनी बहन के लिए क़ब्र खोदी। उनके कपड़े कर्बला में जल चुके थे, और ज़ख़्मों की वजह से गोश्त से चिपक गए थे। इसलिए उन्हें उन्हीं जले-फटे कपड़ों के साथ वहीं ज़िंदान-ए-शाम (सीरिया) में दफ़न किया गया। दफ़न के बाद जब क़ब्र मिट्टी से भरी जा रही थी, माँ की चीख निकल गई। तमाम ख़वातीन उनके इर्द-गिर्द सिमट गईं, और जेल की दीवारें इस नारे से काँप उठीं: या बीबी सकीना (अ.स), या मज़लूमा। (ऐ सकीना! ऐ मज़लूम!) जब रिहाई का वक़्त आया और वे जेल से निकले, तो बीबी रुबाब (अ.स) अपनी प्यारी बेटी (अ.स) की क़ब्र पर आईं, अपना गाल बीबी सकीना (अ.स) की क़ब्र पर रखा और पुकारा: “मुझसे बात करो सकीना। बस एक लफ़्ज़, मेरी बच्ची—मुझसे बात करो।”
बीबी सकीना (अ.स) का जिस्म कुछ सदियाँ बाद उनके असली मदार (ज़िंदान-ए-शाम) से निकाला गया, जब दमिश्क के एक नेक आदमी को ख़्वाब में बताया गया कि इस नन्ही हाशमी शहज़ादी (अ.स) की क़ब्र में पानी भर रहा है। जब तस्दीक़ हुई कि वाक़ई ज़मीन का पानी क़ब्र में जा रहा है, तो बीबी सकीना (अ.स) को यज़ीद के महल के क़रीब एक नए रौज़े में दफ़न किया गया, जहाँ वह (अ.स) आज तक आराम फरमा रही हैं। उनका (अ.स) जिस्म उस हालत में था जैसे उसी दिन दफ़न किया गया हो।
उनके वालिद इमाम हुसैन (अ.स) को कर्बला में बेरहमी से शहीद किया गया। उनके नन्हे भाई अली असग़र (अ.स) की गर्दन में तीर मारा गया। उनके महबूब चचा अब्बास (अ.स) के दोनों बाज़ू कट गए। वही थीं जिन्होंने अपनी आख़िरी रातें एक ज़िंदान में गुज़ारीं। इमाम हुसैन (अ.स) की नन्ही शहज़ादी—वह अकेली शख़्सियत जो उस वीरान ज़िंदान से बाहर न आ सकीं। वह थीं बीबी सकीना (अ.स), नन्ही हाशमी शहज़ादी।