अल-मज़ार अल-कबीर के मुसन्निफ़ लिखते हैं कि यह ज़ियारत रबीउल अव्वल की सत्रहवीं तारीख़ की सुबह के लिए मख़सूस है। इस ज़ियारत पर तब्सिरा करते हुए अल्लामा मजलिसी फ़रमाते हैं कि यह उन बेहतरीन ज़ियारतों में से है जो भरोसेमंद रावियों की सनदों से नक़्ल हुई हैं और मोअतबर किताबों में दर्ज हैं। कुछ रिवायतों के मुताबिक़ यह ज़ियारत सिर्फ़ इसी दिन तक महदूद नहीं है, बल्कि किसी भी वक़्त इमाम अली (अ०स०) की ज़ियारत इस ज़ियारत के साथ करना मुस्तहब है।
इस सिलसिले में यह सवाल पैदा होता है कि जिन मौक़ों का ताल्लुक़ रसूलुल्लाह ﷺ से है, जैसे उनकी विलादत या बिअसत का दिन, उन मौक़ों पर ज़ियारत तो रसूलुल्लाह ﷺ के रौज़े की होनी चाहिए, न कि इमाम अली (अ०स०) के रौज़े की। लेकिन हम देखते हैं कि इन मौक़ों पर इमाम अली (अ०स०) की ज़ियारत की बहुत ज़्यादा तकीद की गई है।
इसका जवाब यह है कि इन दोनों अज़ीम शख़्सियतों के दरमियान बहुत मज़बूत रिश्ता और मुकम्मल वहदत मौजूद है। इसी वजह से इमाम अली (अ०स०) की ज़ियारत, रसूलुल्लाह ﷺ की ज़ियारत के बराबर है। इस हक़ीक़त की तरफ़ क़ुरआन-ए-मजीद में इशारा किया गया है, जहाँ अल्लाह तआला फ़रमाता है:
तो जो कोई इल्म आ जाने के बाद तुमसे इस बारे में झगड़ा करे, उससे कह दो: आओ हम अपने बेटों को बुलाएँ और तुम अपने बेटों को, हम अपनी औरतों को बुलाएँ और तुम अपनी औरतों को, और हम अपने नफ़्सों को और तुम अपने नफ़्सों को, फिर दुआ करें और झूठों पर अल्लाह की लानत करें। (3:61)
इस आयत में अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह ﷺ और इमाम अली (अ०स०) को “हमारे नफ़्स” कह कर एक साथ बयान फ़रमाया है।
इसके अलावा यह हक़ीक़त बहुत सी रिवायतों से भी साबित होती है। शैख़ मुहम्मद इब्ने मशहदी ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ०स०) से यह वाक़िआ नक़्ल किया है:
एक बद्दू रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया: “मेरा घर आपसे बहुत दूर है। जब मैं आपसे मिलने का इरादा करता हूँ तो अक्सर मुमकिन नहीं होता, इसलिए मैं अली इब्ने अबी तालिब के पास चला जाता हूँ, उनकी बातों और नसीहतों से मुझे सुकून मिलता है। लेकिन जब उनसे जुदा होता हूँ तो फिर ग़म और उदासी मुझे घेर लेती है क्योंकि मैं आपको नहीं देख पाता।”
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “जिसने अली की ज़ियारत की, उसने हक़ीक़त में मेरी ज़ियारत की। जिसने अली से मोहब्बत की, उसने मुझसे मोहब्बत की। और जिसने अली से दुश्मनी की, उसने मुझसे दुश्मनी की। यह बात अपनी क़ौम तक पहुँचा दो। और जो अली की ज़ियारत का इरादा करे, उसने हक़ीक़त में मेरी ज़ियारत की और क़यामत के दिन मैं उसे इसका सवाब दूँगा। जिब्रईल और नेक मोमिन भी ऐसा ही करेंगे।”
एक दूसरी मोअतबर रिवायत में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ०स०) फ़रमाते हैं: “जब तुम नजफ़ पहुँचो तो वहाँ आदम (अ०स०) की हड्डियों, नूह (अ०स०) के जिस्म और अली इब्ने अबी तालिब (अ०स०) की ज़ियारत करो। इस तरह तुम पहले आबा-ओ-अजदाद, मुहम्मद ﷺ ख़ातमुल अंबिया और अली (अ०स०) अफ़ज़लुल औसिया की ज़ियारत करोगे।”
रसूलुल्लाह ﷺ से मुताल्लिक़ मौक़ों जैसे उनकी विलादत और बिअसत के दिन इमाम अली (अ०स०) की ज़ियारत की बहुत ज़्यादा तकीद की गई है। इसकी वजह इन दोनों अज़ीम हस्तियों के दरमियान मज़बूत ताल्लुक़ और मुकम्मल वहदत है।
अश-शहीद, शैख़ मुफ़ीद और सैयद इब्ने ताऊस नक़्ल करते हैं कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ०स०) ने सत्रह रबीउल अव्वल, जो रसूलुल्लाह ﷺ की विलादत का दिन है, इमाम अली अमीरुल मोमिनीन (अ०स०) की ज़ियारत इस ज़ियारत के साथ की।
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ०स०) ने बुज़ुर्ग और मोअतबर आलिम मुहम्मद इब्ने मुस्लिम सक़फ़ी को तालीम देते हुए फ़रमाया:
जब तुम अमीरुल मोमिनीन (अ०स०) के रौज़े के क़रीब पहुँचो तो पहले ग़ुस्ल करो, पाक साफ़ कपड़े पहनो, ख़ुशबू लगाओ और इत्मीनान और सुकून के साथ हरम की तरफ़ बढ़ो।
रसूलुल्लाह ﷺ से मुताल्लिक़ मौक़ों जैसे उनकी विलादत और बिअसत के दिन इमाम अली (अ०स०) के रौज़ा-ए-मुबारक़ की ज़ियारत की बहुत ज़्यादा तकीद की गई है। इसकी वजह इन दोनों अज़ीम शख़्सियतों के दरमियान मज़बूत ताल्लुक़ और मुकम्मल वहदत है।
अश-शहीद, शैख़ मुफ़ीद और सैयद इब्ने ताऊस—इन तमाम बुज़ुर्गों ने नक़्ल किया है कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ०स०) ने सत्रह रबीउल अव्वल, जो रसूलुल्लाह ﷺ की विलादत का दिन है, इमाम अली अमीरुल मोमिनीन (अ०स०) के रौज़ा-ए-मुबारक़ की ज़ियारत इस ज़ियारत के साथ की:
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ०स०) ने आला दर्जे के भरोसेमंद आलिम मुहम्मद इब्ने मुस्लिम सक़फ़ी को तालीम देते हुए फ़रमाया:
जब तुम अमीरुल मोमिनीन (अ०स०) के हरम के क़रीब पहुँचो तो ज़ियारत से पहले ग़ुस्ल करो, सबसे पाक साफ़ कपड़े पहनो, ख़ुशबू लगाओ और इत्मीनान व सुकून के साथ हरम की तरफ़ बढ़ो।
जब तुम बाबुस्सलाम (दरवाज़ा-ए-सलाम) पर ठहरो, जो हरम का दरवाज़ा है, तो क़िब्ला रुख़ होकर तीन मर्तबा कहो:
अब ज़ियारत की छह रकअत नमाज़ पढ़ो: दो अमीरुल मोमिनीन की, दो हज़रत आदम की और दो हज़रत नूह की। फिर दिल से दुआ माँगो, क्योंकि यहाँ दुआ क़बूल होती है, इंशाअल्लाह।
अल्लाह की सलामती, रहमत और बरकत तुम पर हो। मैं तुम्हें अल्लाह के सुपुर्द करता हूँ और तुम पर सलाम पढ़ता हूँ। हम अल्लाह पर, रसूल पर और उस दीन पर ईमान रखते हैं जो वह लाए, जिसकी दावत दी और जिसकी रहनुमाई की। ऐ मेरे अल्लाह! इसे मेरी आख़िरी ज़ियारत न बना। ऐ मेरे अल्लाह! हमें इस मज़ार की ज़ियारत के सवाब से महरूम न कर और हमें दोबारा आने की तौफ़ीक़ दे। और अगर इससे पहले मेरी मौत आ जाए, तो मैं अपनी मौत में वही गवाही देता हूँ जो अपनी ज़िंदगी में देता रहा हूँ। मैं गवाही देता हूँ कि ये हिदायत की निशानियाँ हैं, बुलंद सितारे हैं और तेरे और तेरी मख़लूक़ के दरमियान वसीला हैं। और जो इसे न माने, वह जहन्नम की गहराई में होगा। ऐ मेरे अल्लाह! मैं तुझसे दुआ करता हूँ कि मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दरूद भेज।
फिर एक-एक करके इमामों का नाम लो और यूँ कहो: ऐ अल्लाह! इसे मेरी आख़िरी हाज़िरी न बना। मेरी दुनिया और आख़िरत की हाजतें पूरी करने के लिए सिफ़ारिश क़बूल फ़रमा। मुझे हिदायत देने वाले इन इमामों के साथ रख।
ऐ मेरे अल्लाह! मेरे दिल को इताअत, सच्ची नसीहत, दोस्ती, मोहब्बत और तस्लीम से नरम कर दे, ताकि मैं तेरी पूरी फरमाबरदारी कर सकूँ, तेरी रज़ा हासिल करूँ और तेरे अज्र व रहमत का हक़दार बनूँ। ऐ मेरे अल्लाह! मैं उस वलायत की गवाही देता हूँ जिसकी गवाही तेरे नबी, रसूल और फ़रिश्ते देते हैं। और मैं उनसे बरी हूँ जिनसे तू बरी है। ऐ मेरे अल्लाह! मुझे हर मक़ाम-ए-महमूद में कामयाबी दे और मुझे यहाँ से बेहतरीन फ़ायदे के साथ लौटने की तौफ़ीक़ दे। ऐ जलाल और इकराम वाले रब!
सलाम हो तुम पर, ऐ औसिया के ताज! सलाम हो तुम पर, ऐ सच्चों के सरदार! सलाम हो तुम पर, ऐ अहकाम के वारिस! सलाम हो तुम पर, ऐ रुक्न और मक़ाम के मालिक! ऐ मेरे अल्लाह! मुझे उनके मुबारक ज़ायरीनों, सच्चे चाहने वालों, नेक साथियों और मददगारों में शामिल कर। मुझे इस पाक हरम में आने वालों में सबसे बेहतर बना, जहाँ तूने अपनी मग़फिरत और रहमत वादा की है। मैं अल्लाह और यहाँ मौजूद फ़रिश्तों को गवाह बनाता हूँ कि यहाँ दफ़्न होने वाले पाक, मुक़द्दस, सच्चे और चुने हुए वसी हैं। अफ़सोस उस मिट्टी पर जिसने इतना नूर, हिकमत का चश्मा और रहमत का सरचश्मा अपने अंदर लिया। मैं अल्लाह के सामने तुम्हारे क़ातिलों, ज़ालिमों और दुश्मनों से बरी हूँ। ऐ मेरे मौला, ऐ अमीरुल मोमिनीन! मैं तुमसे विदा लेता हूँ, उस दिल के साथ जो जुदाई में ग़मगीन है। अल्लाह इसे मेरी आख़िरी ज़ियारत न बनाए। बेशक वह सुनने वाला और दुआ क़बूल करने वाला है।