जंगे तबूक

ग़ज़वा-ए-तबूक

शाम से आने वाले एक तिजारती क़ाफ़िले ने अल-मदीना में यह अफ़वाह फैलाई कि रोम का क़ैसर, हिरक़ल (हेराक्लियस), अल-मदीना पर हमला करने की तैयारी कर रहा है और ईसाई क़बीले बनू-ग़स्सान, बनू-लख़्म, बनू-क़ज़्म और बनू-आमिला उसके झंडे तले इकट्ठा हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि बनू-ग़स्सान ने अपने इलाक़े, शाम, को रोम और शाम की फ़ौजों को जुटाने के लिए एक फ़ौजी छावनी बना दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि टोही दस्ते बल्क़ा के इलाक़े तक पहुँच चुके हैं।

इन रिपोर्टों की बुनियाद पर नबी (अ.स.) ने दुश्मन का मुक़ाबला करने की तैयारियाँ शुरू कर दीं। आपने मुसलमानों को हुक्म दिया कि वे आगे बढ़ते हुए दुश्मन को रोकने के लिए तैयार हो जाएँ।

अब तक मुसलमानों ने जितनी भी जंगें लड़ी थीं वे सब अपने ही मुल्क के अंदर थीं और उन्होंने कभी किसी बाहरी दुश्मन का सामना नहीं किया था। यह मुहिम पराए इलाक़े में लड़ी जाने वाली थी और एक ऐसे बादशाह के ख़िलाफ़ थी जिसकी फ़तहें फ़ारस और उससे आगे तक फैली हुई थीं।

नबी (अ.स.) के हुक्म को सुनकर लोगों में आने वाली जंग का जोश पैदा होने के बजाय मायूसी छा गई। इसकी वजह यह थी कि कुछ अरसे से सख़्त क़हत पड़ा हुआ था और मौजूदा मौसम में फसल अच्छी हुई थी और कटाई के क़रीब थी। लोग तैयार फसलों को छोड़कर सफ़र करना नहीं चाहते थे।

इसके अलावा गर्मी का मौसम बहुत सख़्त था और रेगिस्तान में सफ़र बेहद मुश्किल था। इन हालात में मुसलमान इस मुहिम से बचने के लिए बहाने बनाने लगे।

पाक़ क़ुरआन फ़रमाता है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا مَا لَكُمْ إِذَا قِيلَ لَكُمْ انفِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ اثَّاقَلْتُمْ إِلَى الْأَرْضِ أَرَضِيتُمْ بِالْحَيَاةِ الدُّنْيَا مِنْ الْآخِرَةِ

“ऐ ईमान लाने वालों! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि अल्लाह की राह में निकलो, तो तुम ज़मीन से चिपक जाते हो? क्या तुम आख़िरत के मुक़ाबले दुनिया की ज़िंदगी से राज़ी हो गए हो?” (9:38)

नसीहत भरी आयतों के बाद कुछ लोग ख़ुशी से और कुछ मजबूरी में तैयार हुए, जबकि कुछ बीमारी का बहाना बनाकर घरों में रह गए।

नबी (अ.स.) ने अल-मदीना और आसपास के इलाक़ों से मदद लेकर तीस हज़ार लोगों का लश्कर तैयार किया और रजब 9 हिजरी में अल-मदीना से रवाना हुए। पहला पड़ाव सनीय्यत-उल-विदा था।

अब्दुल्लाह इब्न उबै अपने लोगों के साथ लश्कर में शामिल था, लेकिन आगे चलकर वह अपने आदमियों के साथ अल-मदीना वापस लौट गया।

मुनाफ़िक़ों ने योजना बनाई कि अगर मुस्लिम फ़ौज हार गई तो वे नबी (अ.स.) के घर पर हमला करेंगे, लूट करेंगे और आपके घर वालों को अल-मदीना से निकाल देंगे।

इन हालात में नबी (अ.स.) ने हज़रत अली (अ.स.) को अल-मदीना में छोड़ा ताकि शहर का इंतज़ाम मज़बूती से संभाला जा सके। मुनाफ़िक़ों ने कहा:

“नबी (अ.स.) ने उन्हें बोझ समझकर पीछे छोड़ दिया है!”

हज़रत अली (अ.स.) को यह बात नागवार गुज़री। वे हथियार पहनकर फ़ौज के पीछे पहुँचे। नबी (अ.स.) ने फ़रमाया कि वे झूठे हैं और अली (अ.स.) को इसलिए छोड़ा गया है क्योंकि अल-मदीना का इंतज़ाम या तो नबी (अ.स.) के हाथ में होगा या अली (अ.स.) के।

फिर आपने फ़रमाया:

“क्या तुम इस पर राज़ी नहीं कि तुम्हारा मेरे साथ वही रिश्ता है जो हारून (अ.स.) का मूसा (अ.स.) के साथ था? बस फर्क़ यह है कि मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा।”

हज़रत अली (अ.स.) ख़ुशी से अल-मदीना लौट गए और नबी (अ.स.) फ़ौज के साथ तबूक की तरफ़ बढ़े।

सफ़र बहुत कठिन था। पानी कम था, सवारियाँ साझा करनी पड़ती थीं। कुछ लोग रास्ते से लौट गए। नबी (अ.स.) फ़रमाते: “अगर उनमें भलाई होगी तो लौट आएँगे, वरना हमारे लिए बोझ कम होगा।”

अबू-ज़र पीछे रह गए लेकिन पैदल चलते हुए फ़ौज से आ मिले। नबी (अ.स.) ने फ़रमाया:

“अल्लाह अबू-ज़र पर रहम करे, वह अकेले चलेगा, अकेले मरेगा और क़यामत में अकेला उठाया जाएगा।”

तबूक पहुँचकर बीस दिन तक क़याम किया गया। रोमी फ़ौज का कोई निशान नहीं मिला। क़बीलों से जज़िया पर समझौते हुए।

वापसी में मुनाफ़िक़ों ने नबी (अ.स.) के ऊँट को खाई में गिराने की साज़िश की, लेकिन अल्लाह ने हिफ़ाज़त फ़रमाई।

अल-मदीना लौटकर “मस्जिद-ए-दिरार” का मामला सामने आया।

وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مَسْجِدًا ضِرَارًا وَكُفْرًا وَتَفْرِيقًا بَيْنَ الْمُؤْمِنِينَ وَإِرْصَادًا لِمَنْ حَارَبَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ مِنْ قَبْلُ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَا إِلَّا الْحُسْنَى وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ

“और जिन लोगों ने नुकसान पहुँचाने, कुफ़्र फैलाने और मोमिनों में फूट डालने के लिए मस्जिद बनाई…” (9:107)

नबी (अ.स.) ने उस मस्जिद को ढहा देने का हुक्म दिया।

ग़ज़वा-ए-तबूक मुनाफ़िक़ों को बेनक़ाब करने वाली मुहिम थी। जो आख़िरत को दुनिया पर तरजीह देते थे वही साबित-क़दम रहे।

यह वही ग़ज़वा है जिसमें हज़रत अली (अ.स.) शरीक नहीं हुए, लेकिन यह नबी (अ.स.) का फ़ैसला था। अल-मदीना की हिफ़ाज़त भी जिहाद ही थी और अली (अ.स.) ने उसे बख़ूबी अंजाम दिया।

जिस तरह हारून (अ.स.) मूसा (अ.स.) के वज़ीर और जानशीन थे, उसी तरह अली (अ.स.) नबी (अ.स.) के वली और जानशीन थे।

وَاجْعَلْ لِي وَزِيرًا مِنْ أَهْلِي هَارُونَ أَخِي اشْدُدْ بِهِ أَزْرِي وَأَشْرِكْهُ فِي أَمْرِي

“और मेरे लिए मेरे घर वालों में से एक वज़ीर बना दे — हारून, मेरे भाई — उसके ज़रिये मेरी कमर मज़बूत कर और उसे मेरे काम में शामिल कर।” (20:29–32)

इस तरह ग़ज़वा-ए-तबूक ने यह हक़ीक़त वाज़ेह कर दी कि अली (अ.स.) नबी (अ.स.) के सबसे अफ़ज़ल और सबसे योग्य जानशीन थे।