शाबान की रोज़ाना सलवात
शजरतुन नबूवत
दोपहर के समय रोज़ाना पढ़ी जाती है
महत्व

اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिं व आले मुहम्मदिं
ऐ अल्लाह, मुहम्मद और उनके अहले बैत पर रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमा

شَجَرَةِ ٱلنُّبُوَّةِ
शजरतिन नुबूवत
नुबूवत का दरख़्त

وَمَوضِعِ ٱلرِّسَالَةِ
व मौज़िअर रिसालत
और रिसालत का मरकज़

وَمُخْتَلَفِ ٱلْمَلاَئِكَةِ
व मुख्तलफिल मलाइकति
और फ़रिश्तों की आमद की जगह

وَمَعْدِنِ ٱلْعِلْمِ
व मअदिनिल इल्म
और इल्म का ख़ज़ाना

وَأَهْلِ بَيْتِ ٱلْوَحْيِ
व अह्ले बैतिल वह्य
और वह्य के अहले बैत

ٱلْفُلْكِ ٱلْجَارِيَةِ فِي ٱللُّجَجِ ٱلْغَامِرَةِ
अल फुल्किल जारियति फ़िल्लुजजिल ग़ामिरह
गहरी मौजों में चलने वाली कश्ती

يَأْمَنُ مَنْ رَكِبَهَا
या’मनु मन रकिबहा
जो इसमें सवार हुआ वह महफ़ूज़ रहा

وَيَغْرَقُ مَنْ تَرَكَهَا
व यग़रकु मन तरकहा
और जिसने छोड़ा वह डूब गया

ٱلْمُتَقَدِّمُ لَهُمْ مَارِقٌ
अल मुतक़द्दिमु लहुम मारिक़
जो उनसे आगे बढ़ा वह गुमराह हुआ

وَٱلْمُتَأَخِّرُ عَنْهُمْ زَاهِقٌ
वल मुतअख़्खिरु अन्हुम ज़ाहिक़
और जो पीछे रह गया वह हलाक हुआ

وَٱللاَّزِمُ لَهُمْ لاَحِقٌ
वल लाज़िमु लहुम लाहिक़
और जो उनसे जुड़ा रहा वह कामयाब हुआ

وَٱعْمُرْ قَلْبِي بِطَاعَتِكَ
वअ’मुर क़ल्बी बि ताअतिक
मेरे दिल को अपनी इताअत से भर दे

وَلاَ تُخْزِنِي بِمَعْصِيَتِكَ
वला तुख़ज़िनी बि मअसियतक
और मुझे अपनी नाफ़रमानी से रुस्वा न कर

فِي لَيَالِيهِ وَأَيَّامِهِ
फ़ी लयालीहि व अय्यामिहि
उसकी तमाम रातों और दिनों में

بُخُوعاً لَكَ فِي إِكْرَامِهِ وَإِعْظَامِهِ
बुख़ूअन लक फ़ी इकरामिहि व इज़ामिहि
तेरे लिए पूरी आज़िज़ी के साथ, उसके एहतराम और अज़मत में

إِلَىٰ مَحَلِّ حِمَامِهِ
इला महल्लि हिमामिहि
यहाँ तक कि उनकी वफ़ात की मंज़िल तक

اَللَّهُمَّ فَأَعِنَّا عَلَىٰ ٱلإِسْتِنَانِ بِسُنَّتِهِ فِيهِ
अल्लाहुम्मा फ़-अइनना अलल इस्तिनानि बि सुन्नतिहि फ़ीहि
ऐ अल्लाह, हमें इस महीने में उनकी सुन्नत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा

وَنَيْلِ ٱلشَّفَاعَةِ لَدَيْهِ
व नयलिश्शफ़ाअति लदैहि
और उनकी शफ़ाअत हासिल होने की तौफ़ीक़ दे

اَللَّهُمَّ وَٱجْعَلْهُ لِي شَفِيعاً مُشَفَّعاً
अल्लाहुम्मा वज्अल्हु ली शफ़ीअन मुशफ़फ़अन
ऐ अल्लाह, उन्हें मेरे लिए ऐसा सिफ़ारिश करने वाला बना जिसकी सिफ़ारिश क़ुबूल हो

وَطَرِيقاً إِلَيْكَ مَهْيَعاً
व तरीक़न इलैका महयअन
और तेरी तरफ़ जाने का वाज़ेह रास्ता बना

وَٱجْعَلْنِي لَهُ مُتَّبِعاً
वज्अल्नी लहू मुत्तबिअन
और मुझे उनका फ़रमाबरदार बना

حَتَّىٰ أَلْقَاكَ يَوْمَ ٱلْقِيَامَةِ عَنِّي رَاضِياً
हत्ता अलक़ाका यौमल क़ियामति अन्नी राज़ियन
यहाँ तक कि क़ियामत के दिन मैं तुझसे इस हाल में मिलूँ कि तू मुझसे राज़ी हो

وَعَنْ ذُنُوبِي غَاضِياً
व अन ज़ुनूबी ग़ाज़ियन
और मेरे गुनाहों से दरगुज़र फ़रमाए

قَدْ أَوْجَبْتَ لِي مِنْكَ ٱلرَّحْمَةَ وَٱلرِّضْوَانَ
क़द औज्बता ली मिंका अर्रहमता वर रिज़वान
और अपनी तरफ़ से मेरे लिए रहमत और रज़ामंदी वाजिब कर दे

وَأَنْزَلْتَنِي دَارَ ٱلْقَرَارِ وَمَحَلِّ ٱلأَخْيَارِ
व अंज़ल्तनी दारल क़रारि व महल्लिल अख़्यार
और मुझे हमेशा रहने वाले घर और नेक लोगों की जगह में उतार दे



हवाले

यह दुआ हदीस की कई अहम किताबों में बयान की गई है, जिनमें से कुछ यह हैं:
1. इक़बालुल आमाल – सैयद इब्न ताऊस 688
2. अल-बलदुल अमीन – अल्लामा काफ़ामी 186
3. अल-मिस्बाह – अल्लामा काफ़ामी 544
4. मिस्बाहुल मुज्तहिद – शैख़ तूस्सी 45, 838
5. जमालुल उस्बू – सैयद इब्न ताऊस 405
6. वसाइलुश शिया – शैख़ हुर आमिली 10/492
7. बिहारुल अनवार – अल्लामा मजलिसी 87/20
हमारे इमाम इस दुआ को बार-बार पढ़ते थे। शैख़ तूस्सी के अल्फ़ाज़ में:

"کان علي بن الحسين عليه السلام يدعو عند کل زوال من ايام شعبان وفي ليله النصف منه ويصلي علي النبي صلي الله عليه واله بهذه الصلوات" शाबान के महीने में हज़रत अली बिन हुसैन ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम हर दिन ज़वाल के वक़्त और पंद्रहवीं रात को यह दुआ पढ़ते थे और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि पर इसी सलवात के साथ दरूद भेजते थे।