यौम-ए-मबअस, जो 27 रजब को मनाया जाता है, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) की आख़िरी और सबसे अज़ीम इलाही रसूल के तौर पर रस्मी तक़र्रुरी का दिन है। वह ज़ात जिनका नूर अल्लाह तआला ने तमाम मख़लूक़ात से पहले उस वक़्त पैदा किया जब अभी कुछ भी वजूद में नहीं आया था।
यह वह मुबारक मौक़ा है जो रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) की उस अज़ीम रिसालत की इब्तिदा की याद दिलाता है जिसके ज़रिये उन्होंने अल्लाह तआला के दीन-ए-हक़ को आम किया।
इसी दिन रसूल-ए-अकरम (दुरूद व सलाम हों आप और आपके अहले-बैत पर) को अल्लाह तआला की इलाही रिसालत पहुँचाने के लिये मबऊस किया गया, जब पहली मर्तबा हज़रत जिब्रईल (अ.स.) वही-ए-इलाही लेकर नाज़िल हुए।
उस वक़्त नबी की रूहानी कैफ़ियत
कुछ मुसलमान इस दिन को
शब-ए-मे‘राज (आसमानी उरूज)
के तौर पर भी याद करते हैं।
इस दिन ग़ुस्ल (नहाना) करना और रोज़ा रखना मुस्तहब क़रार दिया गया है। यह उन चार दिनों में से एक है जिनमें पूरे साल में खास तौर पर रोज़ा रखने की बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है। बयान किया गया है कि इस दिन रोज़ा रखने का सवाब सत्तर साल के रोज़ों के बराबर है।
इस दिन कसरत से सलवात पढ़ना भी मुस्तहब है, यानी हज़रत मुहम्मद और उनके अहले-बैत पर दुरूद भेजना।
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ.
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन वा आले मुहम्मदिन
ऐ अल्लाह! हज़रत मुहम्मद और उनके अहले-बैत पर अपनी रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमा।
यह वह मुबारक मौक़ा है जो रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) की उस अज़ीम रिसालत की इब्तिदा की याद दिलाता है जिसके ज़रिये उन्होंने अल्लाह तआला के दीन-ए-हक़ को आम किया।
इसी दिन रसूल-ए-अकरम (दुरूद व सलाम हों आप और आपके अहले-बैत पर) को अल्लाह तआला की इलाही रिसालत पहुँचाने के लिये मबऊस किया गया, जब पहली मर्तबा हज़रत जिब्रईल (अ.स.) वही-ए-इलाही लेकर नाज़िल हुए।
उस वक़्त नबी की रूहानी कैफ़ियत
कुछ मुसलमान इस दिन को
शब-ए-मे‘राज (आसमानी उरूज)
के तौर पर भी याद करते हैं।
इस दिन ग़ुस्ल (नहाना) करना और रोज़ा रखना मुस्तहब क़रार दिया गया है। यह उन चार दिनों में से एक है जिनमें पूरे साल में खास तौर पर रोज़ा रखने की बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है। बयान किया गया है कि इस दिन रोज़ा रखने का सवाब सत्तर साल के रोज़ों के बराबर है।
इस दिन कसरत से सलवात पढ़ना भी मुस्तहब है, यानी हज़रत मुहम्मद और उनके अहले-बैत पर दुरूद भेजना।
27 रजब की रात और दिन की अज़मत को समझें। स्रोत www.al-mubin.org
यौम-ए-मबअस, जो 27 रजब को मनाया जाता है, दरहक़ीक़त उस शख़्स की आख़िरी और सबसे अज़ीम इलाही रसूल के तौर पर रस्मी तक़र्रुरी का दिन है जिनका नूर अल्लाह तआला ने तमाम मख़लूक़ात से पहले उस वक़्त पैदा किया जब अभी कुछ भी वजूद में नहीं आया था।
यह वह मुबारक मौक़ा है जो रसूल-ए-अकरम की इस अज़ीम रिसालत की इब्तिदा की निशानी है जिसके ज़रिये उन्होंने अल्लाह तआला के दीन-ए-हक़ को आम किया। इसी दिन रसूल-ए-अकरम (दुरूद व सलाम हों आप और आपके अहले-बैत पर) को अल्लाह तआला की इलाही रिसालत पहुँचाने के लिये मबऊस किया गया, जब पहली मर्तबा हज़रत जिब्रईल (अ.स.) वही-ए-इलाही लेकर नाज़िल हुए।
इस दिन जो सबसे अहम काम किया जा सकता है वह यह है कि 27 रजब की रात और दिन की अज़मत को समझा जाए।
अल्लाह के रसूल (दुरूद व सलाम हों आप और आपकी आल पर) से बढ़कर कोई शख़्स न ज़्यादा अज़ीम है और न दर्जे में बुलंद। वह तमाम मख़लूक़ात के सरदार हैं और अल्लाह (सुबहानहु व तआला) के सबसे मुक़र्रब, सबसे शरीफ़ और सबसे महबूब हैं!
हज़रत मुहम्मद (दुरूद व सलाम हों आप और आपकी आल पर) ही वह हस्ती हैं जो: पहला नूर, सबसे क़रीबी हिजाब (अल्लाह की तरफ़), अल्लाह का सबसे अज़ीम नाम हैं—और कोई भी नबी या फ़रिश्ता इस मक़ाम के क़रीब भी नहीं पहुँच सकता। आप तमाम आलमों के लिये रहमत भी हैं। लिहाज़ा जब हम किसी शख़्स की अज़मत और शराफ़त को देखते हैं तो उनके रस्मी तक़र्रुर के दिन की अहमियत भी समझ में आती है।
इसी वजह से उम्मत और ख़ास तौर पर शिया के लिये नबी (दुरूद व सलाम हों आप और आपकी आल पर) का हक़ अदा करना और भी ज़्यादा अहम बन जाता है, जैसा कि हमारी अक़्ल भी यही हुक्म करती है।
ज़रा गौर करें कि जो कुछ कहा गया है—क्या हम इसे क़बूल करते हैं? अगर हम इसे क़बूल करते हैं तो हमें इस दिन को संजीदगी से लेना चाहिये और फिर इस दिन की तरغ़ीब के लिये और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं रहती। क्योंकि भलाई—अपने आप में—इंसान को उसी तरफ़ खींचती और आकर्षित करती है जो इस दिन अंजाम देने के लिये मुस्तहब है। अगर जो कुछ कहा गया क़बूल न किया जाए तो या तो हम दायरा-ए-इस्लाम से बाहर हो जाते हैं या फिर हमारे दिलों की इस्लाह ज़रूरी है ताकि ईमान (सच्ची आस्था) उसमें दाख़िल हो सके।
खुलासा यह कि सालिक (जो रूहानी सफ़र में अल्लाह की तरफ़ बढ़ रहा हो) को दिल से कोशिश करनी चाहिये कि इस दिन को अज़ीम समझे और रस्मी तक़र्रुर की नेमत, इलाही नूर (नूर) की बरकत, और वह तमाम बरकात जिनका पैग़म्बर-ए-इस्लाम (दुरूद व सलाम हों आप और आपकी आल पर) ने तोहफ़ा दिया—ख़ुशी और भलाई समेत—उन्हें उसी तरह समझे और सराहे जैसे उनका हक़ है।
हमें सबको अपने अंदर झांक कर देखना चाहिये और इस दिन अपनी ख़ुशी को परखना चाहिये। अगर हम देखें कि हमारी ख़ुशी और लज़्ज़त इस दिन दुनिया की दूसरे दिनों वाली ख़ुशियों और लज़्ज़तों के बराबर या उससे ज़्यादा नहीं है, तो हमें मालूम हो जाता है कि हमारी रूह आलूदा है और हमें इसकी इस्लाह की कोशिश करनी चाहिये और अपने अंदर की हैवानियत वाली सिफ़ात को दूर करने की जद्दोजहद करनी चाहिये—हमें दुनिया और उसकी लज़्ज़तों से फासला बढ़ाना चाहिये और रूहानी आलम और उसके इलाही नूर (नूर) के क़रीब होना चाहिये।
हमें पीछे हटकर नबी की बिअसत से पहले के जिहालत वाले दिनों पर भी सोचना चाहिये और देखना चाहिये कि इंसानियत किस हालत तक पहुँच गई थी।
एक गिरोह यहूदी थे; दूसरा गिरोह ईसाई; और कुछ बुत-परस्त। इस्लाम के अहकाम भुला दिये गये थे; लोगों ने इंसानियत के आदाब खो दिये थे और वहशी जानवरों की तरह बर्ताव करते थे। लोग इतनी पस्ती तक पहुँच चुके थे कि अपनी नवजात बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर देते थे। बेकार की बातों और कामों पर फ़ख़्र करते थे; कम से कम भी इंसाफ़ नहीं करते थे और अपने आसपास के लोगों के हक़ छीन लेते थे। ताक़तवर, कमज़ोरों पर इस तरह ज़ुल्म करते थे कि इंसान की क़दर और इज़्ज़त मिट जाती थी। आलिमों से नफ़रत करते थे और समझदार लोगों से उकताए रहते थे। ग़ुलाम रखने पर घमंड करते थे। रिश्तेदारियों को तोड़ देते थे, जुआ और शराब में मशग़ूल रहते थे और आपस में लगातार जंग करते रहते थे। ख़ुद-परस्ती और घमंड उनकी पहचान थी और वह अपनी जल्दबाज़ी पर डींग मारते थे! गालियाँ और बुरी बातें आम थीं और बेकार की बातें, झूठ, ग़ीबत वग़ैरह ही मामूल बन गई थीं। उन्होंने नबियों और उनके औलिया, जांनशीनों और मददगारों को क़त्ल किया, और उनकी जगह अपने में से घटिया लोगों को समाज की क़यादत देने लगे!
ऐसे माहौल में अल्लाह ने एक नबी को इस काम के लिये उठाया जैसा कि क़ुरआन में ज़िक्र है: वही है जिसने उम्मियों में उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उन्हें उसकी आयात पढ़कर सुनाता है, उन्हें पाक करता है, और उन्हें किताब व हिकमत सिखाता है—हालाँकि इससे पहले वे खुली गुमराही में थे।
इमाम मुहम्मद तक़ी (`a) से रिवायत है, "बेशक रजब के महीने में एक रात है जो सूरज की रौशनी से भी बढ़कर है; वह रजब की 26वीं रात है जिसके (आने वाले) सवेरे में हज़रत मुहम्मद (s) को नबूवत की बिअसत दी गई। बेशक हमारा हर शिया (हमारा पैरवीकार) जो इस रात के आमाल अदा करे, उसे साठ साल की इबादत के बराबर सवाब दिया जाएगा।"
इस रात में सबसे बेहतरीन अमल यह है कि इमाम अली इब्न अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) की मुक़द्दस क़ब्र की ज़ियारत की जाए और उनकी ज़ियारत पढ़ी जाए:
27 रजब की तारीख़ के लिए ज़ियारत की तीन सूरतें बयान की गई हैं:
1. 27 रजब की रात और दिन के लिए ख़ास ज़ियारत
2. 27 रजब की रात के लिए ज़ियारत-ए-रजबिया
3. 27 रजब के दिन के लिए इमाम अली (अलैहिस्सलाम) की ज़ियारत की चौथी सूरत
अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद इब्न बतूता, मशहूर अरब लेखक और सैर-ओ-सफ़र करने वाले, जो आज से लगभग छह सदियाँ पहले गुज़रे और जिन्हें सुन्नी उलमा में गिना जाता है, अपनी मशहूर किताब “अर-रिहला” में हमारे मौला इमाम अली अमीरुल मोमिनीन (अलैहिस्सलाम) के मुक़द्दस मज़ार का ज़िक्र करते हैं।
इस किताब में वह बयान करते हैं कि मक्का मुक़र्रमा से वापसी पर वह नजफ़ अशरफ़ के मुक़द्दस शहर से गुज़रे। वह आगे लिखते हैं: “इस शहर के तमाम रहने वाले राफ़िज़ी हैं।” यह मज़ार (इमाम अली का) बहुत से करामाती निशानात दिखाता रहा है। इन करामात में से एक यह है कि रजब की सत्ताईसवीं रात, जिसे वे ‘लैलतुल मह्या’ (जागने की रात) कहते हैं, इराक़, ख़ुरासान, फ़ारस बल्कि रोम तक से अपाहिज लोग इस मुक़द्दस मज़ार के पास जमा होते हैं।
जब उनकी तादाद तीस या चालीस तक पहुँच जाती है तो उन्हें इशा की नमाज़ के बाद मुक़द्दस क़ब्र के ऊपर रखा जाता है और लोग इंतज़ार करते हैं कि वे किस तरह से सेहतमंद होकर खड़े होंगे। जब वे दुआ, ज़िक्र, मुनाजात और क़ुरआन की तिलावत में मशग़ूल होते हैं तो आधी रात के क़रीब वे तमाम अपाहिज लोग सेहतमंद होकर खड़े हो जाते हैं और बुलंद आवाज़ से कहते हैं: ‘अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और अली अल्लाह के वली हैं।’
इस रात ग़ुस्ल करना मुस्तहब (अफ़ज़ल) है।
शैख़ अत-तूसी ने अपनी किताब ‘मिस्बाह अल-मुतहज्जिद’ में इमाम मुहम्मद अल-जवाद (अलैहिस्सलाम) से रिवायत नक़्ल की है कि आपने फ़रमाया: “रजब में एक रात है जिसमें लोगों के लिये ऐसी बरकत है जो सूरज की रौशनी के तले आने वाली हर चीज़ से बेहतर है। वह रजब की सत्ताईसवीं रात है। और उसकी सुबह रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) की नबूवत की इब्तिदा का दिन है। बेशक जो शख़्स इस रात इबादत करे, उसे साठ साल अल्लाह की इबादत करने वाले के बराबर सवाब मिलेगा।”
जब इमाम (अलैहिस्सलाम) से इस रात के आमाल के बारे में पूछा गया तो आपने जवाब दिया, “जब तुम नमाज़-ए-ईशा अदा कर लो और सो जाओ, तो आधी रात से पहले जागकर नीचे दी गई नमाज़ पढ़ो।”
बारह रकअत (6x2) नमाज़ पढ़ो, और हर रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा और सूरह 47 से 114 तक में से कोई भी एक सूरह—हर एक को एक-एक बार—पढ़ो।
नमाज़ के बाद नीचे दी गई सूरतें/आयात 7-7 बार पढ़ो:
अल फ़ातिहा
अल इख़लास
अल फ़लक़
अन नास
अल काफ़िरून
अल क़द्र
आयतुल कुर्सी (2: 255 – 257)
फिर नीचे दी गई दुआ पढ़ो:
الْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَداً
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी लम यत्तख़िज़ वलदन
तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिये हैं जिसने अपने लिये कोई औलाद नहीं बनाई,
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ شَرِيكٌ فِي ٱلْمُلْكِ
व लम यकुन लहू शरीकुन फ़िल मुल्क
और बादशाहत में उसका कोई शरीक नहीं है,
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ وَلِيٌّ مِنَ ٱلذُّلِّ
व लम यकुन लहू वलिय्युन मिनज़्ज़ुल्लि
और न उसे किसी कमज़ोरी की वजह से किसी हिमायती की ज़रूरत है,
وَكَبِّرْهُ تَكْبِيراً
व कabbirहु तकबीरा
और उसकी अज़मत को पूरी अज़मत के साथ बयान करो।
اَللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِمَعَاقِدِ عِزِّكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बि-मआक़िदि इज़्ज़िका
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी इज़्ज़त के मक़ामात के वासिते से सवाल करता हूँ,
عَلَىٰ أَرْكَانِ عَرْشِكَ
अला अर्कानِ अर्शिका
जो तेरे अर्श के स्तम्भों पर क़ायम हैं,
وَمُنْتَهَىٰ ٱلرَّحْمَةِ مِنْ كِتَابِكَ
व मुन्तहअर्रह्मति मिन किताबिका
और तेरी किताब में मौजूद तेरी रहमत की इंतिहा के वासिते से,
وَبِٱسْمِكَ ٱلأَعْظَمِ ٱلأَعْظَمِ ٱلأَعْظَمِ
व बिस्मिकाल अअज़मिल अअज़मिल अअज़म
और तेरे इस्म-ए-अअज़म, सबसे बड़े, सबसे बड़े, सबसे बड़े नाम के वासिते से,
وَذِكْرِكَ ٱلأَعْلَىٰ ٱلأَعْلَىٰ ٱلأَعْلَىٰ
व ज़िक्रिकाल अअलाल अअलाल अअला
और तेरे ज़िक्र-ए-अअला, सबसे बुलंद, सबसे बुलंद, सबसे बुलंद के वासिते से,
وَبِكَلِمَاتِكَ ٱلتَّامَّاتِ
व बिकलिमातिकत्ताम्माति
और तेरे कामिल कलिमात के वासिते से,
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिन व आलिही
कि तू हज़रत मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेजे,
وَأَنْ تَفْعَلَ بِي مَا أَنْتَ أَهْلُهُ
व अन तफ़अला बी मा अन्ता अहलुहू
और मेरे साथ वही सुलूक फ़रमाए जो तेरी शान के लायक़ है।
27 रजब की रात के लिये एक और नमाज़:
एक 12 रकअत नमाज़ अदा करें: 6×2, और हर रकअत में सूरह फ़ातिहा और कोई दूसरी सूरह तिलावत करें
नमाज़ मुकम्मल करने के बाद, सूरह फ़ातिहा, सूरह इख़लास, सूरह फ़लक़, सूरह काफ़िरून, सूरह नास, सूरह क़द्र और आयतुल कुर्सी हर एक को 4-4 मर्तबा पढ़ें।
फिर नीचे दिये गये कलिमात 4 मर्तबा पढ़ें:
سُبْحَانَ ٱللَّهِ
وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ
सुब्हानल्लाहि वल्हम्दु लिल्लाहि
अल्लाह पाक है, और तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिये हैं,
وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ
وَٱللَّهُ اكْبَرُ
व ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है।
इसके बाद नीचे दिया गया ज़िक्र पढ़ें:
اللَّهُ اللَّهُ رَبِّي
अल्लाहु अल्लाहु रब्बी
अल्लाह, अल्लाह ही मेरा रब है।
لاَ اُشْرِكُ بِهِ شَيْئاً
ला उश्रिकु बिही शैअन
मैं उसके साथ किसी को शरीक नहीं ठहराता।
وَمَا شَاءَ ٱللَّهُ
व मा शा-अल्लाहु
जो कुछ अल्लाह चाहता है वही होता है।
لاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلعَلِيِّ ٱلْعَظِيمِ
ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम
अल्लाह के सिवा कोई ताक़त नहीं, जो सबसे बुलंद और सबसे अज़ीम है।
नमाज़ मुकम्मल करने के बाद, सूरह फ़ातिहा, सूरह इख़लास, सूरह फ़लक़, सूरह काफ़िरून, सूरह नास, सूरह क़द्र और आयतुल कुर्सी हर एक को 4-4 मर्तबा पढ़ें।
फिर नीचे दिये गये कलिमात 4 मर्तबा पढ़ें:
سُبْحَانَ ٱللَّهِ وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِसुब्हानल्लाहि वल्हम्दु लिल्लाहि
अल्लाह पाक है, और तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिये हैं,
وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ
وَٱللَّهُ اكْبَرُ
व ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है।
इसके बाद नीचे दिया गया ज़िक्र पढ़ें:
اللَّهُ اللَّهُ رَبِّيअल्लाहु अल्लाहु रब्बी
अल्लाह, अल्लाह ही मेरा रब है।
لاَ اُشْرِكُ بِهِ شَيْئاً
ला उश्रिकु बिही शैअन
मैं उसके साथ किसी को शरीक नहीं ठहराता।
وَمَا شَاءَ ٱللَّهُ
व मा शा-अल्लाहु
जो कुछ अल्लाह चाहता है वही होता है।
لاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ ٱلعَلِيِّ ٱلْعَظِيمِ
ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम
अल्लाह के सिवा कोई ताक़त नहीं, जो सबसे बुलंद और सबसे अज़ीम है।
अल-बलदुल अमीन में अल-कफ़अमी ने, और सय्यिद इब्न ताऊस ने भी बयान किया है कि यह दुआ शब/रोज़-ए-बिअसत (यानी 27 रजब) में पढ़ी जाती है:
27 रजब की दुआ - अलग पेज
اللّهُمَّ إنِّي أَسْأَلُك بِالتَّجَلِّي الأَعْظَمِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका बित्तजल्लीयिल अ’अज़मि
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे “सबसे अज़ीम तजल्ल़ी” के वासिते से सवाल करता हूँ
فِي هذِهِ اللَّيْلَةِ مِنَ الشَّهْرِ الْمُعَظَّمِ،
फ़ी हाज़िहिल्लैलति मिनश्शह्रिल मुअज़्ज़मि
इस मुअज़्ज़म महीने की इस रात में,
وَالْمُرْسَلِ الْمُكَرَّمِ،
वल-मुरसलिल मुक़र्रमी
और मुक़र्रम रसूल के वासिते से,
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिन वा आलिही
कि तू मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेजे
وَأَنْ تَغْفِرَ لَنَا مَا أَنْتَ بِهِ مِنَّا أَعْلَمُ،
वा अन तग़्फ़िर लना मा अन्त बिही मिन्ना अ’लमु
और हमारे लिये उसे बख़्श दे जिसे तू हमसे ज़्यादा जानता है,
يَا مَنْ يَعْلَمُ وَلا نَعْلَمُ.
या मन् यअलमु व ला नअलमु
ऐ वह ज़ात जो जानती है और हम नहीं जानते।
اللّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِي لَيْلَتِنَا هذِهِ
अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ी लैलतिना हाज़िही
ऐ अल्लाह! हमारी इस रात में बरकत अता फ़रमा
الَّتِي بِشَرَفِ الرِّسَالَةِ فَضَّلْتَهَا،
अल्लती बिशरफ़िर्रिसालति फ़ज़्ज़ल्तहा
जिसे तूने रिसालत की शरफ़त के ज़रिये फ़ज़ीलत अता की है,
وَبِكَرَامَتِكَ أَجْلَلْتَهَا،
व बि-करामतिक अजलल्तहा
और तूने अपनी करामत (इज़्ज़त-बख़्शी) से उसे बुज़ुर्गी अता की,
وَبِالْمَحَلِّ الشَّرِيفِ أَحْلَلْتَهَا.
व बिल-महलिश्शरीफ़ि अहलल्तहा
और तूने उसे मक़ाम-ए-शरीफ़ में ठहराया।
اللّهُمَّ فَإنَّا نَسْأَلُكَ بِالْمَبْعَثِ الشَّرِيفِ،
अल्लाहुम्मा फ़इन्ना नसलुका बिल-मब’अथिश्शरीफ़ि
ऐ अल्लाह! हम तुझसे मब’अस-ए-शरीफ़ के वासिते से सवाल करते हैं,
وَالسَّيِّدِ اللَّطِيفِ،
वस्सय्यिदिल्लतीफ़ि
और उस लतीफ़ सरदार के वासिते से,
وَالْعُنْصُرِ الْعَفِيفِ،
वल-उन्सुरिल अ’फ़ीफ़ि
और पाकीज़ा नस्ल/ख़ानदान के वासिते से,
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिन वा आलिही
कि तू मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेजे,
وَأَنْ تَجْعَلَ أَعْمَالَنَا فِي هذِهِ اللَّيْلَةِ
व अन तज’अला अ’मालना फ़ी हाज़िहिल्लैलति
और हमारे आमाल को इस रात में
وَفِي سَائِرِ اللَّيَالِي مَقْبُولَةً،
व फ़ी सायरिल्लयाली मक़बूलतन
और दूसरी तमाम रातों में भी क़बूल फ़रमाए,
وَذُنُوبَنَا مَغْفُورَةً،
व धुनूबना मग़फ़ूरतन
और हमारे गुनाहों को बख़्शा हुआ क़रार दे,
وَحَسَنَاتِنَا مَشْكُورَةً،
व हसनातिना मश्कूरतन
और हमारी नेकीयों को क़ाबिले-क़द्र (क़ुबूल व सराहे हुए) ठहराए,
وَسَيِّئَاتِنَا مَسْتُورَةً،
व सय्यिआतिना मस्तूरतन
और हमारी बुराइयों को पोशीदा फ़रमाए,
وَقُلُوبَنَا بِحُسْنِ الْقَوْلِ مَسْرُورَةً،
व क़ुलूबना बि-हुस्निल-क़ौली मस्रूरतन
और हमारे दिलों को अच्छे कलाम से शादमान रखे,
وَأَرْزَاقَنَا مِنْ لَدُنْكَ بِالْيُسْرِ مَدْرُورَةً.
व अरज़ाक़ना मिन लदुनका बिल-युस्रि मद्रूरतन
और हमारे रिज़्क़ को अपनी तरफ़ से आसानी के साथ फ़रावान (बहता हुआ) फ़रमाए।
اللّهُمَّ إنَّكَ تَرَى وَلا تُرَى،
अल्लाहुम्मा इन्नका तरा व ला तुरा
ऐ अल्लाह! बेशक तू देखता है, और तुझे कोई नहीं देख सकता,
وَأَنْتَ بِالْمَنْظَرِ الأَعْلَى،
व अन्त बिल-मन्ज़रिल-अ’ला
और तू आला तरीन मन्ज़र (मक़ाम) पर है,
وَإنَّ إلَيْكَ الرُّجْعَى وَالْمُنْتَهَى،
व इन्न इलैकर-रुज’आ वल-मुन्तहा
और बेशक तेरी ही तरफ़ रुजू’ (वापसी) और आख़िरी मंज़िल है,
وَإنَّ لَكَ الْمَمَاتَ وَالْمَحْيَا،
व इन्न लकल-ममात वल-मह्या
और बेशक मौत देना और ज़िन्दगी अता करना तेरे ही इख़्तियार में है।
وَإنَّ لَكَ الآخِرَةَ وَالأُولَى.
व इन्न लकल-आख़िरता वल-ऊला
और तेरे ही लिये आख़िरत और ऊला (पहला) है।
اللّهُمَّ إنَّا نَعُوذُ بِكَ أَنْ نَذِلَّ وَنَخْزَى،
अल्लाहुम्मा इन्ना न’ऊज़ु बिका अन नज़िल्ला व नक़ज़ा
ऐ अल्लाह! हम तेरी पनाह चाहते हैं कि हम ज़लील हों और रुस्वा हों,
وَأَنْ نَأْتِيَ مَا عَنْهُ تَنْهَى.
व अन नातिया मा अन्हु तनहा
और (इससे भी कि) हम वह काम करें जिससे तूने हमें मना फ़रमाया है।
اللّهُمَّ إنَّا نَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ بِرَحْمَتِكَ،
अल्लाहुम्मा इन्ना नसलुका अल-जन्नता बि-रहमतिका
ऐ अल्लाह! हम तेरी रहमत के वासिते से तुझसे जन्नत मांगते हैं,
وَنَسْتَعِيذُ بِكَ مِنَ النَّارِ
व नस्त’ईज़ु बिका मिनन-नारि
और हम जहन्नम की आग से तेरी पनाह चाहते हैं।
فَأَعِذْنَا مِنْهَا بِقُدْرَتِكَ،
फ़-अ’इज़ना मिन्हा बि-क़ुदरतिका
तो (ऐ अल्लाह!) अपनी क़ुदरत के वासिते से हमें उससे बचा ले,
وَنَسْأَلُكَ مِنَ الْحُورِ الْعِينِ
व नसलुका मिनल-हूरिल-’ईनि
और हम तुझसे हूर-ए-’ईन मांगते हैं,
فَارْزُقْنَا بِعِزَّتِكَ،
फ़-अरज़ुक़ना बि-’इज़्ज़तिका
तो अपनी इज़्ज़त के वासिते से हमें अता फ़रमा,
وَاجْعَلْ أَوْسَعَ أَرْزَاقِنَا عِنْدَ كِبَرِ سِنِّنَا،
वज्’अल औसअ अरज़ाक़िना ’इन्दा किबारि सिनّिना
और हमारे रिज़्क़ में सबसे ज़्यादा वुसअत (फ़रावानी) हमारे बुढ़ापे के वक़्त रख,
وَأَحْسَنَ أَعْمَالِنَا عِنْدَ اقْتِرَابِ آجَالِنَا،
व अहसना अ’मालिना ’इन्दा इक़्तिराबि आजालिना
और हमारे सबसे बेहतरीन आमाल हमारे अजल के क़रीब होने के वक़्त क़रार दे,
وَأَطِلْ فِي طَاعَتِكَ،
व अतिल फ़ी ता’अतिका
और (हमारी उम्र/वक़्त को) अपनी इताअत में दराज़ कर दे,
وَمَا يُقَرِّبُ إلَيْكَ،
व मा युक़र्रिबु इलैका
और हर उस अमल में (भी) जो हमें तेरे क़रीब करे,
وَيُحْظِي عِنْدَكَ،
व युहज़ी ’इन्दका
और जो तेरे यहाँ हमें मक़बूलियत और इज़्ज़त दे,
وَيُزْلِفُ لَدَيْكَ أَعْمَارَنَا،
व युज़लिफु लदैका अ’मारना
और जो हमारी उमरों को तेरे क़रीब लाए (और उन्हें तेरे यहाँ क़बूलियत दे),
وَأَحْسِنْ فِي جَمِيعِ أَحْوَالِنَا وَأُمُورِنَا مَعْرِفَتَنَا،
व अहसिन फ़ी जमी’इ अहवालिना व उमूरिना मा’रिफ़तना
और हमारे तमाम हालात व उमूर में अपनी म’अरिफ़त (पहचान) को हमारे लिये बेहतर बना दे,
وَلا تَكِلْنَا إلَى أَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَيَمُنَّ عَلَيْنَا،
व ला तकिलना इला अहदिम मिन ख़ल्क़िका फ़यमुन्न ’अलैना
और हमें अपनी मख़लूक़ में से किसी के हवाले न कर, कि वह हम पर एहसान जता कर हमें नीचा करे,
وَتَفَضَّلْ عَلَيْنَا بِجَمِيعِ حَوَائِجِنَا لِلدُّنْيَا وَالآخِرَةِ،
व तफ़ज़्ज़ल ’अलैना बि-जमी’इ हवाईजिना लिद्दुन्या वल-आख़िरति
और दुनिया व आख़िरत की हमारी तमाम ज़रूरतें पूरी फ़रमा कर हम पर फ़ज़्ल कर,
وَابْدَأْ بِآبَائِنَا وَأَبْنَائِنَا
वब्दा बि-आबाइना व अबनाइना
और हमारे आबा (बाप-दादा) और हमारी औलाद से शुरुआत कर,
وَجَمِيعِ إخْوَانِنَا الْمُؤْمِنِينَ
व जमी’इ इख़वानिनल-मुअमिनीन
और हमारे तमाम मोमिन भाइयों (भाई-बहनों) पर भी,
فِي جَمِيعِ مَا سَأَلْنَاكَ لأنْفُسِنَا
फ़ी जमी’इ मा सअल्नाका लिअनफ़ुसिना
उन तमाम चीज़ों के सिलसिले में जो हमने अपने लिये तुझसे माँगी हैं,
يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
लि-अनफ़ुसिना या अरहमर-राहिमीन
ऐ सब रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
اللّهُمَّ إنَّا نَسْأَلُكَ بِاسْمِكَ الْعَظِيمِ،
अल्लाहुम्मा इन्ना नसलुका बिस्मिक अल-’अज़ीम
ऐ अल्लाह! हम तुझसे तेरे अज़ीम नाम के वासिते से मांगते हैं,
وَمُلْكِكَ الْقَدِيمِ،
व मुल्किकल-क़दीम
और तेरे क़दीम (अबदी) बादशाही के वासिते से,
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अन तुसल्लिया ’अला मुहम्मदिन व आले मुहम्मद
कि तू मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दुरूद भेजे,
وَأَنْ تَغْفِرَ لَنَا الذَّنْبَ الْعَظِيمَ،
व अन तग़फ़िर लना अज़-ज़नबल-’अज़ीम
और हमारे अज़ीम (बड़े) गुनाहों को बख़्श दे,
إنَّهُ لا يَغْفِرُ الْعَظِيمَ إلاّ الْعَظِيمُ.
इन्नहू ला यग़फ़िरुल-’अज़ीम इल्लल-’अज़ीम
क्योंकि बड़े (गुनाह) को बख़्शने वाला सिवा बड़े (अल्लाह) के कोई नहीं।
اللّهُمَّ وَهذَا رَجَبٌ الْمُكَرَّمُ
अल्लाहुम्मा व हाज़ा रजबुनल-मुकर्रम
ऐ अल्लाह! ये रजब है—इज़्ज़त वाला महीना,
الَّذِي أَكْرَمْتَنَا بِهِ أَوَّلُ أَشْهُرِ الْحُرُمِ،
अल्लज़ी अकरम्तना बिही अव्वलु अश्हुरिल-हुरुम
जिसके ज़रिये तूने हमें इकराम बख़्शा—यह हराम महीनों में पहला है,
أَكْرَمْتَنَا بِهِ مِنْ بَيْنِ الأُمَمِ،
अकरम्तना बिही मिन बैनि अल-उमम
और तूने हमें इस इकराम के लिये तमाम उम्मतों में से चुना,
فَلَكَ الْحَمْدُ يَا ذَا الْجُودِ وَالْكَرَمِ،
फ़-लक अल-हम्दु या ज़ल-जूदि वल-करम
तो तेरे लिये हम्द है, ऐ जूद और करम वाले,
فَأَسْأَلُكَ بِهِ وَبِاسْمِكَ
फ़-असअलुका बिही व बिस्मिका
तो मैं तुझसे इसी के वासिते से और तेरे नाम के वासिते से मांगता हूँ,
الأَعْظَمِ الأَعْظَمِ الأَعْظَمِ،
अल-अ’ज़म अल-अ’ज़म अल-अ’ज़म
जो सबसे अ’ज़म, सबसे अ’ज़म, सबसे अ’ज़म है,
الأَجَلِّ الأَكْرَمِ
अल-अजल अल-अकरम
जो सबसे अजल (बुलंद-ओ-बरतर) और सबसे अकरम है,
الَّذِي خَلَقْتَهُ فَاسْتَقَرَّ فِي ظِلِّكَ
अल्लज़ी ख़लक़्तहू फ़-स्तक़र्र फ़ी ज़िल्लिका
जिसे तूने पैदा किया, तो वह तेरे साये में ठहर गया,
فَلا يَخْرُجُ مِنْكَ إلَى غَيْرِكَ
फ़-ला यख़रुजु मिंका इला ग़ैरिका
और फिर वह तुझसे निकल कर किसी और की तरफ़ नहीं जाता,
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَأَهْلِ بَيْتِهِ الطَّاهِرِينَ،
अन तुसल्लिया ’अला मुहम्मदिन व अहलि बैतिहित-ताहिरीन
कि तू मुहम्मद और उनके अहले-बैत—जो पाक हैं—पर दुरूद भेजे,
وَأَنْ تَجْعَلَنَا مِنَ الْعَامِلِينَ فِيهِ بِطَاعَتِكَ،
व अन तज्’अलना मिनल-’आमिलीन फ़ीही बिता’अतिका
और हमें इस महीने में अपनी इताअत करने वालों में शामिल कर दे,
وَالآمِلِينَ فِيهِ لِشَفَاعَتِكَ.
वल-आमिलीन फ़ीही लि-शफ़ा’अतिका
और उन लोगों में (भी) जो इस (महीने) में तेरी शफ़ा’अत/क़ुबूलियत की उम्मीद रखते हैं।
اللّهُمَّ اهْدِنَا إلَى سَوَاءِ السَّبِيلِ،
अल्लाहुम्मा अह्दिना इला सवाइ’स-सबील
ऐ अल्लाह! हमें सीधी राह की तरफ़ हिदायत दे,
وَاجْعَلْ مَقِيلَنَا عِنْدَكَ خَيْرَ مَقِيلٍ،
वज्’अल मक़ीलना ’इन्दका ख़ैरा मक़ील
और हमारे लिये तेरे पास सबसे बेहतरीन ठहरने की जगह मुक़र्रर कर,
فِي ظِلٍّ ظَلِيلٍ،
फ़ी ज़िल्लिन ज़लील
घने साये में,
وَمُلْكٍ جَزِيلٍ،
व मुल्किन जज़ील
और बहुत बड़ी नेमतों/सल्तनत में,
فَإنَّكَ حَسْبُنَا وَنِعْمَ الْوَكِيلُ.
फ़-इन्नका हस्बुना व नि’मल-वकील
बेशक तू हमारे लिये काफ़ी है, और तू बेहतरीन कारसाज़ है।
اللّهُمَّ اقْلِبْنَا مُفْلِحِينَ مُنْجِحِينَ
अल्लाहुम्मा अक़्लिबना मुफ़लिहीन मुनजिहीन
ऐ अल्लाह! (मेहरबानी करके) हमें कामयाबी और नजात के साथ (तेरी तरफ़) पलटा दे;
غَيْرَ مَغْضُوبٍ عَلَيْنَا وَلا ضَالّينَ
ग़ैरा मग़ज़ूबिन ‘अलैना व ला ज़ाल्लीन
न हम पर तेरा ग़ज़ब हो, और न हम गुमराह हों,
بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
बि-रहमतिका या अरहमर-राहिमीन
तेरी रहमत के वासिते से; ऐ सब रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
اللّهُمَّ إنِّي أَسْأَلُك بِعَزَائِمِ مَغْفِرَتِكَ،
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बि-‘अज़ाइ़मि मग़फ़िरतिक
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी मग़फिरत के पक्के वासिलों/सामानों के वासिते से इल्तिजा करता हूँ,
وَبِوَاجِبِ رَحْمَتِكَ،
व बि-वाजिबि रहमतिका
और तेरी रहमत को (लाज़िम तौर पर) हासिल करने वाले उमूर के वासिते से,
السَّلامَةَ مِنْ كُلِّ إثْمٍ،
अस्सलामता मिन कुल्लि इस्मिन
कि मुझे हर गुनाह से सलामती अता फ़रमा,
وَالْغَنِيمَةَ مِنْ كُلِّ بِرٍّ،
वल-ग़नीमता मिन कुल्लि बिर्रिन
और हर नेकी का फ़ायदा/नसीब अता कर,
وَالْفَوْزَ بِالْجَنَّةِ،
वल-फ़ौज़ा बिल-जन्नति
और जन्नत की कामयाबी अता फ़रमा,
وَالنَّجَاةَ مِنَ النَّارِ.
वन्नजाता मिनन्नार
और आग (जहन्नम) से नजात दे।
اللّهُمَّ دَعَاكَ الدَّاعُونَ وَدَعَوْتُكَ،
अल्लाहुम्मा द‘आकद्दा‘ऊन व द‘औतुका
ऐ अल्लाह! जैसे दुआ करने वालों ने तुझसे दुआ की, वैसे ही मैं भी तुझसे दुआ करता हूँ,
وَسَأَلَكَ السَّائِلُونَ وَسَأَلْتُكَ،
व सअलकस्साइलून व सअल्तुका
और जैसे मांगने वालों ने तुझसे मांगा, वैसे ही मैं भी तुझसे मांगता हूँ,
وَطَلَبَ إلَيْكَ الطَّالِبُونَ وَطَلَبْتُ إلَيْكَ.
व तलबा इलैकत्तालिबून व तलब्तु इलैक
और जैसे चाहने वालों ने तेरी तरफ़ रुख़ किया, वैसे ही मैं भी तेरी तरफ़ रुख़ करता हूँ।
اللّهُمَّ أَنْتَ الثِّقَةُ وَالرَّجَاءُ،
अल्लाहुम्मा अन्तस्सिक़तु वर्रजा’उ
ऐ अल्लाह! तू ही मेरा भरोसा और मेरी उम्मीद है;
وَإلَيْكَ مُنْتَهَى الرَّغْبَةِ فِي الدُّعَاءِ.
व इलैका मुन्तहार-रग़्बति फ़िद्दु‘आ’
और दुआ में मेरी आख़िरी चाहत भी तेरी ही तरफ़ है।
اللّهُمَّ فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अल्लाहुम्मा फ़-सल्लि ‘अला मुहम्मदिन व आलिहि
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनके अहले-बैत पर दुरूद भेज,
وَاجْعَلِ الْيَقِينَ فِي قَلْبِي،
वज्‘अलिल-यक़ीना फ़ी क़ल्बी
और मेरे दिल में यक़ीन क़ायम कर दे,
وَالنُّورَ فِي بَصَرِي
वन्नूरा फ़ी बसरि
और मेरी नज़र में नूर अता कर,
وَالنَّصِيحَةَ فِي صَدْرِي،
वन्नसीहता फ़ी सद्री
और मेरे सीने में ख़ैरख़्वाही/नसीहत का जज़्बा रख दे,
وَذِكْرَكَ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ عَلَى لِسَانِي،
व ज़िक्रका बिल्लैलि वन्नहारि ‘अला लिसानी
और रात-दिन मेरी ज़बान पर अपना ज़िक्र जारी कर दे,
وَرِزْقاً وَاسِعاً غَيْرَ مَمْنُونٍ وَلا مَحْظُورٍ فَارْزُقْنِي،
व रिज़्क़न वासिअन ग़ैरा मम्नूनिन व ला महज़ूरिन फ़रज़ुक़नी
और मुझे वसीअ रिज़्क़ अता फ़रमा—जो न कभी कम हो और न रोका जाए। पस (मेहरबानी करके) मुझे रिज़्क़ अता कर।
وَبَارِكْ لِي فِيمَا رَزَقْتَنِي،
व बारिक ली फीमा रज़क़तनी
और जो कुछ तूने मुझे अता किया है उसमें मेरे लिए बरकत रख,
وَاجْعَلْ غِنَايَ فِي نَفْسِي،
वज्‘अल ग़िनाया फी नफ़्सी
और मेरी बेनियाज़ी को मेरे नफ़्स में रख दे,
وَرَغْبَتِي فِيمَا عِنْدَكَ
व रग़बती फीमा ‘इंदक
और मेरी रग़बत (चाहत) को उसी चीज़ में रख जो तेरे पास है,
بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
बि-रहमतिका या अरहमर-राहिमीन
तेरी रहमत के वासिते से, ऐ सब रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
फिर आप सज्दा करें और निम्न दुआ को सौ (100) मर्तबा दोहराएँ:
الْحَمْدُ لِلّهِ الَّذِي هَدَانَا لِمَعْرِفَتِهِ،अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी हदाना लि-म‘रिफ़तिहि
हर हम्द अल्लाह के लिए है जिसने हमें अपनी म‘रिफ़त (पहचान) की तरफ़ हिदायत दी,
وَخَصَّنَا بِوِلايَتِهِ،
व खस्सना बि-विलायतिहि
और हमें अपनी विलायत (सरपरस्ती) के साथ ख़ास किया,
وَوَفَّقَنَا لِطَاعَتِهِ،
व वफ़्फ़क़ना लि-ता‘अतिहि
और हमें अपनी इताअत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाई।
شُكْراً شُكْراً.
शुक्रन शुक्रन
शुक्र, शुक्र।
जब आप अपना सर उठाएँ (यानी सज्दा मुकम्मल करें), तो यह पढ़ें:
اللّهُمَّ إنِّي قَصَدْتُكَ بِحَاجَتِي،अल्लाहुम्मा इन्नी क़सद्तुका बि-हाजती
ऐ अल्लाह! मैं अपनी हाजत (ज़रूरत) लेकर तेरी तरफ़ रुजू करता हूँ,
وَاعْتَمَدْتُ عَلَيْكَ بِمَسْأَلَتِي،
व‘तमद्तु ‘अलैका बि-मसअलती
और अपनी दरख़्वास्त में तुझ पर ही भरोसा करता हूँ,
وَتَوَجَّهْتُ إلَيْكَ بِأَئِمَّتِي وَسَادَتِي.
व तवज्जह्तु इलैका बि-अइम्मती व सादती
और मैं अपने इमामों और अपने सरदारों के वसीले से तेरी तरफ़ मुतवज्जेह होता हूँ।
اللّهُمَّ انْفَعْنَا بِحُبِّهِمْ،
अल्लाहुम्मा अनफ़‘ना बि-हुब्बिहिम
ऐ अल्लाह! उनके मुहब्बत के ज़रिये हमें नफ़ा (फ़ायदा) पहुँचा,
وَأَوْرِدْنَا مَوْرِدَهُمْ،
व अउरिद्ना मौव्रिदहुम
और हमें उनके रास्ते/मक़ाम तक पहुँचा,
وَارْزُقْنَا مُرَافَقَتَهُمْ،
वर्ज़ुक़ना मुराफ़क़तहुम
और हमें उनकी रिफ़ाक़त (संगत) अता फ़रमा,
وَأَدْخِلْنَا الْجَنَّةَ فِي زُمْرَتِهِمْ
व अदख़िल्ना अल्जन्नता फी ज़ुम्रतिहिम
और हमें जन्नत में उनके गिरोह के साथ दाख़िल फ़रमा,
بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
बि-रहमतिका या अरहमर-राहिमीन
तेरी रहमत के वासिते से, ऐ सब रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
ग़ुस्ल (इबादती नहाना) अदा करें
यह भी मुस्तहब है कि कसरत से सलवात पढ़ी जाए यानी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि) और उनके अहले-बैत पर दुरूद भेजा जाए।
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अल्लाहुम्मा सल्लि ‘अला मुहम्मदिन व आले मुहम्मदिन
ऐ अल्लाह! (मेहरबानी फरमा कर) मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दुरूद नाज़िल फ़रमा।
ज़ियारत पढ़ें:
ज़ियारत-ए-रसूलुल्लाह (स.अ.व.स.)
और
27 रजब को इमाम अली (अ.स.) की ख़ास ज़ियारत
(दिन में ज़ुहर से पहले) 12 रकअत नमाज़ (2x6) अदा करें; हर रकअत में सूरह-ए-फ़ातिहा के बाद कोई भी सूरह पढ़ें।
आख़िरी सलाम (यानी 12 रकअत की तकमील) के बाद, निम्न सूरहें 4 मर्तबा पढ़ें
अल फ़ातिहा
अल इख़लास
अल फ़लक़
अन नास
फिर निम्न दुआ 4 मर्तबा पढ़ें
لا إلهَ إلاَّ اللّهُ. وَاللّهُ أَكْبَرُ. وَسُبْحَانَ اللّهِ، وَالْحَمْدُ لِلّهِ، وَلا حَوْلَ وَلا قُوَّةَ إلاَّ بِاللّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ.ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर व सुब्हानल्लाहि वल्हम्दु लिल्लाहि व ला हौल व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल ‘अलिय्यिल ‘अज़ीम
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह पाक है। अल्लाह के लिए हर हम्द है। और अल्लाह के सिवा (किसी में) न ताक़त है न क़ुव्वत—जो सबसे बुलंद, सबसे अज़ीम है।
اللّهُ اللّهُ رَبِّي لا أُشْرِكُ بِهِ شَيْئاً.
अल्लाहु अल्लाहु रब्बी ला उश्रिकु बिही शै’आ
अल्लाह! अल्लाह! मेरा रब है; मैं उसके साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं ठहराता।
لا أُشْرِكُ بِرَبِّي أَحَداً.
ला उश्रिकु बिरब्बी अहदा
मैं अपने रब के साथ किसी को भी शरीक नहीं ठहराता।
शैख़ अल-तूसी ने इसी तरह की एक और नमाज़ भी रिवायत की है: अबूल-क़ासिम हुसैन इब्न रूḥ (रह.) से रिवायत है कि “इस दिन आप 12 रकअत की नमाज़ अदा करें; हर रकअत में सूरह-ए-फ़ातिहा और कोई दूसरी सूरह पढ़ें।”
हर दो रकअत के बाद आप यह पढ़ें
الْحَمْدُ لِلّهِ الَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَداً،अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी लम यत्तख़िज़ वलदा
तमाम तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है जिसने न किसी को बेटा बनाया
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ شَرِيكٌ فِي الْمُلْكِ،
व लम यकुन लहू शरीकुन फ़िल-मुल्कि
और न ही उसकी बादशाहत में कोई शरीक है
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ وَلِيٌّ مِنَ الذُّلِّ،
व लम यकुन लहू वलिय्युं मिनज़्-ज़ुल्लि
और न उसे किसी ज़िल्लत से बचाने वाला कोई मददगार है
وَكَبِّرْهُ تَكْبِيراً.
व कब्बिरहू तकबीरा
और उसकी अज़मत को पूरी तरह बयान करो
يَا عُدَّتِي فِي مُدَّتِي،
या ‘उद्दती फ़ी मुद्दती
ऐ मेरी पूरी ज़िंदगी में मेरा सहारा!
يَاصَاحِبِي فِي شِدَّتِي،
या साहिबी फ़ी शिद्दती
ऐ मेरी सख़्तियों में मेरे साथी!
يَا وَلِيِّي فِي نِعْمَتِي،
या वलिय्यी फ़ी नि‘मती
ऐ मेरी हर नेमत में मेरे सरपरस्त!
يَا غِيَاثِي فِي رَغْبَتِي،
या ग़ियासी फ़ी रग़बती
ऐ मेरी ख्वाहिशों में मेरे फ़रियाद-रस!
يَانَجَاحِي فِي حَاجَتِي،
या नजाही फ़ी हाजती
ऐ मेरी ज़रूरतों में मेरी कामयाबी का ज़रिया!
يَا حَافِظِي فِي غَيْبَتِي،
या हाफ़िज़ी फ़ी ग़ैबती
ऐ मेरी गैरहाज़िरी में मेरे निगहबान!
يَا كَافِيِّ فِي وَحْدَتِي،
या काफ़िय्यी फ़ी वहदती
ऐ मेरी तन्हाई में मेरे लिए काफ़ी!
يَا أُنْسِي فِي وَحْشَتِي،
या उन्सी फ़ी वहशती
ऐ मेरी तन्हाई में मेरे दिल का सुकून!
أَنْتَ السَّاتِرُ عَوْرَتِي،
अन्तस्सातिरु ‘औरती
तू ही मेरे ऐबों को छुपाने वाला है
فَلَكَ الْحَمْدُ،
फ़लकَل-हम्दु
तो सारी हम्द तेरे ही लिए है
وَأَنْتَ الْمُقِيلُ عَثْرَتِي،
व अन्तल-मुक़ीलु ‘अथ्रती
और तू ही मेरी لغزشों को दरगुज़र करने वाला है
فَلَكَ الْحَمْدُ،
फ़लकَل-हम्दु
तो सारी हम्द तेरे ही लिए है
وَأَنْتَ الْمُنْعِشُ صَرْعَتِي،
व अन्तल-मुन‘इशु सर‘अती
और तू ही मेरी गिरावट के बाद मुझे सँभालने वाला है
فَلَكَ الْحَمْدُ،
फ़लकَل-हम्दु
तो सारी हम्द तेरे ही लिए है
صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
सल्लि ‘अला मुहम्मदिन व आले मुहम्मदिन
मुहम्मद और उनके अहले-बैत पर दुरूद नाज़िल फ़रमा
وَاسْتُرْ عَوْرَتِي،
वस्तुर ‘औरती
और मेरे ऐबों को ढाँप दे,
وَآمِنْ رَوْعَتِي،
वा आमिन रौ‘अती
और मेरे ख़ौफ़ व दहशत को अमन में बदल दे,
وَأَقِلْنِي عَثْرَتِي،
वा अक़िल्नी ‘अथ्रती
और मेरी لغزشों को माफ़ फ़रमा दे,
وَاصْفَحْ عَنْ جُرْمِي،
वस्फ़ह ‘अन जुर्मी
और मेरे गुनाहों से दरगुज़र फ़रमा,
وَتَجَاوَزْ عَنْ سَيِّئَاتِي
व तजावज़ ‘अन सय्यिआती
और मेरी बुराइयों को नज़रअंदाज़ फ़रमा,
فِي أَصْحَابِ الْجَنَّةِ
फ़ी अस्हाबिल-जन्नति
और मुझे जन्नत वालों में शामिल फ़रमा,
وَعْدَ الصِّدْقِ الَّذِي كَانُوَا يُوعَدُونَ.
व‘दस्सिद्क़िल्लज़ी कानू यू‘अदून
उस सच्चे वादे के अनुसार जिसका उनसे वादा किया गया था।
नमाज़ से फ़ारिग़ होने के बाद सूरह अल-फ़ातिहा, अल-तौहीद, अल-फ़लक़, अन-नास, अल-काफ़िरून, अल-क़द्र और आयतुल-कुर्सी सात-सात मर्तबा पढ़ें। इसके बाद नीचे दी गई तस्बीह सात मर्तबा दोहराएँ:
لا إلهَ إلاَّ اللّهُ،ला इलाहा इल्लल्लाहु
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं,
وَاللّهُ أَكْبَرُ،
वल्लाहु अकबर
और अल्लाह सबसे बड़ा है,
وَسُبْحَانَ اللّهِ،
व सुब्हानल्लाहि
और अल्लाह हर ऐब से पाक है,
وَلاحَوْلَ وَلا قُوَّةَ إلاَّ بِاللّهِ
व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि
और अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है और न कोई क़ुदरत।
इसके बाद नीचे दिया गया कलिमा सात मर्तबा कहें:
اللّهُ اللّهُ رَبِّي لا أُشْرِكُ بِهِ شَيْئاً.अल्लाहु अल्लाहु रब्बी ला उश्रिकु बिही शय’आ
अल्लाह, अल्लाह ही मेरा रब है, मैं उसके साथ किसी को शरीक नहीं ठहराता।
इसके बाद अपनी हाजतें और दुआएँ पेश करें।
जैसा कि ‘इक़बाल अल-आ‘माल’ और ‘मिस्बाह अल-मुतहज्जिद’ के कुछ नुस्ख़ों में ज़िक्र हुआ है, इस दिन यह दुआ पढ़ना मुस्तहब है। यह दुआ रजब की बेहतरीन दुआओं में से है। इमाम मूसा बिन जा‘फ़र अल-काज़िम (अ.स.) ने उस दिन यह दुआ पढ़ी थी जब हुकूमती अहलकार उन्हें बग़दाद ले गए थे। वह दिन 27 रजब था।
पावरपॉइंट
يَا مَنْ أَمَرَ بِالْعَفْوِ وَالتَّجَاوُزِ،