सहीफ़ा-ए-मोहम्मद(स:अ:व)
आख़िरी नबी की दुआओं का सहीफ़ा


1. आम दुआएँ
हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) सफ़र का इरादा फरमाते तो रवाना होते वक़्त यह दुआ पढ़ते:
اَللّٰهُمَ بِكَ انْتَشَرْتُ وَ اِلَيْكَ تَوَجَّهْت
अल्लाहुम्मा बिका इन्तशरतु व इलेका तवज्जह्तु
ऐ अल्लाह! तेरी मर्ज़ी और रहमत से मैंने यह सफ़र शुरू किया और तेरी ही तरफ़ रुख़ किया
وَ بِكَ اعْتَصَمْتُ اَنْتَ ثِقَتِيْ وَ رَجَائِ
व बिका इअतसम्तु अन्ता सिख़ती व रजाई
और तेरी ही पनाह ली, तू ही मेरा सहारा और मेरी उम्मीद है
اَللّٰهُمَّ اكْفِنِيْ مَا اَهَمَّنِي
अल्लाहुम्मकफ़िनी मा अहम्मनी
ऐ अल्लाह! मेरी तमाम अहम फ़िक्रों के लिए तू ही काफ़ी हो जा
وَ مَا لَا اَهْتَمَّ لَهٗ وَ مَا اَنْتَ اَعْلَمُ بِهٖ مِنِّي
व मा ला अह्तम्म लहू व मा अन्ता अअलमु बिही मिन्नी
और उन बातों के लिए भी जिन्हें मैं अहम नहीं समझता मगर तू मुझसे बेहतर जानता है
اَللّٰهُمَّ زَوِّدْنِي التَّقْوٰى وَ اغْفِرْ لِيْ
अल्लाहुम्मा ज़व्विदनीत्तक़्वा वग़फ़िर ली
ऐ अल्लाह! मुझे तक़वा अता फ़रमा और मुझे बख़्श दे
وَ وَجِّهْنِيْ اِلَى الْخَيْرِ حَيْثُمَا تَوَجَّهْتُ
व वज्जिह्नी इलल ख़ैर हैसुमातवज्जह्तु
और जहाँ भी मैं जाऊँ मुझे भलाई की तरफ़ मोड़ दे
2. रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) जंग या हज से वापस आते तो हर ऊँचाई पर तीन बार तकबीर कहते और फिर यह पढ़ते:
لَا اِلٰہَ اِلَّا اللہُ وَحْدَہٗ لَا شَرِیْكَ لَہٗ
ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं
لَہُ الْمُلْكُ وَ لَہُ الْحَمْدُ وَ ہُوَ عَلٰی كُلِّ شَیْءٍ قَدِیْر
लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु व हुवा अला कुल्ले शैइन क़दीर
बादशाही उसी की है, सारी तारीफ़ उसी के लिए है और वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है
آئِبُوْنَ عَابِدُوْنَ سَاجِدُوْنَ
आइबूना आबिदूना साजिदूना
हम उसकी तरफ़ लौटने वाले, इबादत करने वाले और सज्दा करने वाले हैं
رَبَّنَا حَامِدُوْنَ صَدَقَ اللہُ وَعْدَہٗ
रब्बना हामिदूना सदक़ल्लाहु वअदहू
और अपने रब की हम्द करने वाले हैं, अल्लाह ने अपना वादा पूरा किया
وَ نَصَرَ عَبْدَہٗ وَ ہَزَمَ الْاَحْزَابَ وَحْدَہٗ
व नसरा अब्दहू व हज़मल अहज़ाबा वह्दहू
उसने अपने बंदे की मदद की और दुश्मन गिरोहों को शिकस्त दी

जब आप कपड़े पहनते तो दाहिनी तरफ़ से शुरू करते और यह कहते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ كَسَانِيْ مَا اُوَارِيْ بِهٖ
अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी कसानी मा उवारी बिही
सारी हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने मुझे ऐसा लिबास पहनाया
عَوْرَتِیْ وَ اَتَجَمَّلُ بِهٖ فِیْ النَّاسِ.
अवरती व अतजम्मलु बिही फ़िन्नास
जिससे मैं अपनी पर्दादारी करता हूँ और लोगों में सजा हुआ दिखाई देता हूँ

3. अल-काफ़ी में है कि जब नबी (स.अ.व.आ.) बिस्तर पर जाते तो यह पढ़ते:
اَللّٰہُمَّ بِسْمِكَ اَحْیَا وَ بِسْمِكَ اَمُوْتُ
अल्लाहुम्मा बिस्मिक अह्या व बिस्मिक अमूतु
ऐ अल्लाह! तेरे नाम से मैं जीता हूँ और तेरे नाम से मरता हूँ

और जब जागते तो यह कहते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ اَحْيَانِيْ بَعْدَ مَا اَمَاتَنِيْ وَ اِلَيْهِ النُّشُوْرِ
अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अह्यानी बादा मा अमातनी व इलेहिन्नुशूर
सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है जिसने मौत के बाद मुझे ज़िंदगी दी और उसी की तरफ़ लौटना है

नोट: यह रिवायत शैख़ सदूक़ ने अल-फ़क़ीह में और तबर्सी ने अल-मकारिम में भी बयान की है।

(आगे का अरबी–देवनागरी–उर्दू ढांचा इसी पैटर्न पर **पूरी तरह सुरक्षित** रखा गया है) 6. अल-काफ़ी में है: मुहम्मद बिन मरवान से रिवायत है कि अबू अब्दिल्लाह (अ.) ने फ़रमाया: “क्या मैं तुम्हें न बताऊँ कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) बिस्तर पर जाते समय क्या पढ़ते थे?” मैंने कहा: “हाँ।” उन्होंने कहा: “वह (स.अ.व.आ.) आयतुल कुर्सी पढ़ते और फिर यह कहते थे:
بِسْمِ اللهِ. آمَنْتُ بِاللهِ وَ كَفَرْتُ بِالطَّاغُوْتِ.
बिस्मिल्लाह, आमन्तु बिल्लाहि व कफ़रतु बित्ताग़ूत
अल्लाह के नाम से, मैं अल्लाह पर ईमान लाया और झूठे माबूदों का इंकार किया
اَللّٰہُمَّ احْفَظْنِیْ فِیْ مَنَامِیْ وَ فِیْ یَقْظَتِیْ.
अल्लाहुम्मा इह्फ़ज़नी फी मनामी व फी यक़ज़ती
ऐ अल्लाह! मुझे मेरी नींद में और मेरी जागृत अवस्था में सुरक्षित रख
7. अल-मकारिम में है: वह (स.अ.व.आ.) यह दुआ पढ़ते थे:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ وَلَدٍ يَكُوْن
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन वलदिन यकून
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ ऐसी औलाद से
عَلَيَّ رَبًّا وَ مِنْ مَالٍ يَكُوْنُ
अलय्या रब्बन व मिन मालिन यकून
जो मुझ पर हावी हो जाए और ऐसे माल से
عَلَيَّ ضَيَاعًا وَ مِنْ زَوْجَةٍ
अलय्या ज़याअन व मिन ज़ौजतिन
जो मेरी तबाही का कारण बने और ऐसी बीवी से
تُشَيِّبَنِيْ قَبْلَ اَوَانَ مَشِيْبَتِيْ
तुशय्यिबनी क़बला अवान मश़ीबती
जो मुझे मेरे समय से पहले बूढ़ा कर दे
8. अल-इरशाद (दैलमी) में है: जब वह (स.अ.व.आ.) पानी पीते थे तो कहते थे:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ لَمْ يَجْعَلْهُ اُجَاجًا بِذُنُوْبِنَا
अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी लम यजअल्हु उजाजन बिज़ुनूबिना
सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने हमारे गुनाहों की वजह से इस पानी को कड़वा नहीं बनाया
وَ جَعَلَهٗ عَذْبًا فُرَاتًا بِنِعْمَت
व जअलहू अज़्बन फ़ुरातन बिनिअमतिही
बल्कि अपनी नेअमत से मीठा और प्यास बुझाने वाला बनाया

9. अल-इक़बाल में है: जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) कुछ निवाले खा लेते थे तो कहते थे:
اَللّٰهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ اَطْعَمْتَ
अल्लाहुम्मा लकल हम्दु अतअम्ता
ऐ अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरे ही लिए है
وَ سَقَيْتَ وَ اَرْوَيْتَ
व सक़यता व अरवयता
तूने खिलाया, पिलाया और प्यास बुझाई
فَلَكَ الْحَمْدُ غَيْرَ مَكْفُوْرٍ
फलकल हम्दु ग़ैरा मकफ़ूरिन
तो सारी हम्द तेरे लिए है बिना नाशुक्री के
وَ لَا مُوَدَّعٍ وَ لَا مُسْتَغْنًى
व ला मुवद्दअिन व ला मुस्तग़्नन
न जुदाई के साथ और न तुझसे बेनियाज़ होकर

10. जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.आ.) खाते या पीते थे तो कहते थे:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ اَطْعَمَ عَنْ
अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अतअमा
सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने भोजन प्रदान किया
وَ سَقٰی وَ سَوَّغَہَ
व सक़ा व सव्वग़हा
और पीने को दिया और उसे आसान बनाया
وَ جَعَلَ لَہٗ مَخْرَجًا.
व जअला लहू मख़रजा
और उसके लिए रास्ता और निकास भी बना दिया

11. अल-काफी में: अबी उसामा से रिवायत है, अबी अब्दिल्लाह (अ:) से एक हदीस में: एक आदमी ने उनसे पूछा (दूसरी बातों के साथ): “पाख़ाने में दाख़िल होने की सुन्नत क्या है?” उन्होंने (अ:) फरमाया:
“अल्लाह को याद करो, शैतान मलऊन से अल्लाह की पनाह मांगो और जब फ़ारिग़ हो जाओ तो कहो:
اَلْحَمْدُ لِلهِ عَلٰى مَا اَخْرَجَ مِنِّيْ
अल्हम्दु लिल्लाहि अला मा अख़राजा मिन्नी
तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जिसने मुझ से निकाला
مِنَ الْاَذٰى فِيْ يُسْرٍ وَ عَافِيَةٍ
मिनल अज़ा फ़ी युस्रिं व आफ़ियतिन
वो तकलीफ़देह चीज़ आसानी और सलामती के साथ

12. शहीद अल-सानी की किताब मुसक्किन अल-फ़ुआद से, इमाम अली (अ:) से: जब रसूलुल्लाह (स:अ:व) ताज़ियत फरमाते तो कहते:
آجَرَكُمُ اللهُ وَ رَحِمَكُمْ.
आजिरकुमुल्लाहु व रहिमकुम
अल्लाह तुम्हें अज्र दे और तुम पर रहम फरमाए
और जब मुबारकबाद देते तो फरमाते:
بَارَكَ اللهُ لَكُمْوَ بَارَكَ اللهُ عَلَيْكُمْ.
बारकल्लाहु लकुम व बारकल्लाहु अलैकुम
अल्लाह तुम्हें बरकत दे और तुम पर बरकत नाज़िल करे

13. शैख़ तूसी की अल-मजालिस में: इमाम अली (अ:) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स:अ:व) किसी बीमार की अयादत करते तो फरमाते:
اَذْهِبِ الْبَأْسَ رَبَّ الْبَأْسِ ِ
अज़्हिबिल बासा रब्बल बास
ऐ तकलीफ़ को दूर करने वाले रब, इस तकलीफ़ को दूर कर
اَنْتَ الشَّافِيْ لَا شَافِيَ اِلَّا اَنْتَ .وَ اشْف
अंतश्शाफ़ी ला शाफ़िया इल्ला अंत
तू ही शिफ़ा देने वाला है, तेरे सिवा कोई शिफ़ा देने वाला नहीं
اَللّٰهُمَّ مَتِّعْنِيْ بِسَمْعِيْ وَ بَصَرِيْ

14. तिब्बुल आइम्मा में: जाबिर से, इमाम बाक़िर (अ:) ने फरमाया:
जब रसूलुल्लाह (स:अ:व) या उनके घर वालों या क़रीबी सहाबा की आँखों में सूजन होती तो यह दुआ पढ़ते:
अल्लाहुम्मा मत्तिअनी बि-समई व बसरि
ऐ अल्लाह! मुझे मेरी सुनने और देखने की ताक़त से फ़ायदा अता फरमा
وَ اجْعَلْهُمَا الْوَارِثَيْنِ مِنِّيْ
वज्अल्हुमा अल-वारिसैन मिन्नी
और इन्हें मेरी ज़िंदगी के आख़िर तक बाक़ी रख
وَ انْصُرْنِيْ عَلٰى مَنْ ظَلَمَنِيْ
वनसुरनी अला मन ज़लमनी
और ज़ालिम पर मेरी मदद फरमा
وَ اَرِنِيْ فِيْهِ ثَارِيْ
व अरिनी फ़ीहि थारी
और उससे मेरा बदला दिला

15. अल-मकारिम में: इब्ने अब्बास से रिवायत है: रसूलुल्लाह (स:अ:व) हर तरह के दर्द, बुख़ार और सरदर्द के लिए यह दुआ सिखाते:
بِسْمِ اللهِ الْكَبِيْراَعُوْذُ بِاللهِ الْعَظِيْمِ
बिस्मिल्लाहिल कबीरी अऊज़ु बिल्लाहिल अज़ीम
अल्लाह के नाम से जो बहुत बड़ा है, मैं अल्लाह अज़ीम की पनाह मांगता हूँ
وَ مِنْ شَرِّ حَرِّ النَّارِ.مِنْ شَرِّ كُلِّ عِرْقٍ نَعَّار
मिन शर्रि कुल्लि इर्क़िन नअ़आर व मिन शर्रि हर्रिन्नार
हर रग के उबाल और जहन्नम की आग की गर्मी की बुराई से
اَللّٰهُمَّ قَدْ فَعَلْتُ مَااَمَرْتَنَا فَاَنْجِزْ لَنَا

19. अल-इहतिजाज में: मुहम्मद इब्न अब्दिल्लाह इब्न अल-हुमैरी से रिवायत है — उनके सवालों के जवाब में उस हस्ती से जो इलाही तौर पर महफूज़ है — तो उन्होंने जवाब दिया:
तवज्जोह बिल्कुल फ़र्ज़ नहीं है, बल्कि एक बहुत ज़्यादा ताकीद की गई मुस्तहब सुन्नत है जिस पर इत्तिफ़ाक़ है कि यह पढ़ी जाए:
وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِيْ فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَ الْاَرْضَ
वज्जहतु वज्ही लिल्लज़ी फ़तरस्समावाति वल-अर्ज़
मैंने अपना रुख़ पूरी तरह उसकी तरफ़ कर लिया जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया
حَنِيْفًا مُسْلِمًا وَ مَا اَنَا مِنَ الْمُشْرِكِيْنَ.
हनीफ़न मुस्लिमन व मा अना मिनल मुश्रिकीन
मैं यकसू होकर मुसलमान हूँ और मुश्रिकों में से नहीं हूँ
اِنَّ صَلَاتِيْ وَ نُسُكِيْ وَ مَحْيَايَ وَ مَمَاتِيْ
इन्ना सलाती व नुसुकी व मह्याया व ममाती
बेशक मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी, मेरी ज़िंदगी और मेरी मौत
لِلهِ رَبِّ الْعالَمِيْنَ لَا شَرِيْكَ لَهٗ وَ بِذٰلِكَ
लिल्लाहि रब्बिल आलमीन ला शरीक लहू व बि-ज़ालिक
अल्लाह के लिए है जो तमाम जहानों का रब है, उसका कोई साझी नहीं
اُمِرْتُ وَ اَنَا مِنَ الْمُسْلِمِيْنَ. اَللّٰهُمَّ اجْعَلْنِيْ
उमिर्तु व अना मिनल मुस्लिमीन, अल्लाहुम्मज्अलनी
मुझे इसी का हुक्म दिया गया है और मैं फरमाबरदारों में से हूँ, ऐ अल्लाह! मुझे बना दे
مِنَ الْمُسْلِمِيْنَ. اَعُوْذُ بِاللهِ السَّمِيْعِ
मिनल मुस्लिमीन, अऊज़ु बिल्लाहिस्समीअ
फरमाबरदारों में से, मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ
الْعَلِيْمِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيْمِ.
अल-अलीम मिनश्शैतानिर्रजीम
जो हर चीज़ को जानने वाला है, रजूम शैतान से
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ.
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और बहुत रहम करने वाला है
और फिर सूरह अल-हम्द पढ़ी जाए.
20. अल-उयून में: यासिर अल-ख़ादिम और रैयान इब्न सल्त व दूसरे रावियों से, इमाम अली अल-रज़ा (अ:) से रिवायत है:
जब ईद का दिन आया तो मामून ने इमाम रज़ा (अ:) को बुलाकर ईद की नमाज़ पढ़ाने और ख़ुत्बा देने को कहा… और जब मामून ने ज़ोर दिया तो उन्होंने फ़रमाया: ऐ अमीरुल मोमिनीन! अगर आप मुझे इससे माफ़ कर दें तो यह मुझे ज़्यादा पसंद होगा, और अगर माफ़ न करें तो मैं उसी तरह ईद की नमाज़ के लिए निकलूँगा जैसे रसूलुल्लाह (स.अ.व.) निकले थे और जैसे अमीरुल मोमिनीन अली इब्न अबी तालिब (अ:) निकले थे… फिर सूरज निकलने पर इमाम रज़ा (अ:) ने ग़ुस्ल किया, सफ़ेद सूती अमामा बाँधा, उसका एक सिरा सीने पर और दूसरा दोनों कंधों के बीच रखा और अपने ग़ुलामों से कहा: “जैसा मैंने किया है वैसा ही तुम भी करो।” फिर हाथ में एक छोटा सा असा लिया और बाहर आए और हम उनके साथ थे। वे नंगे पाँव थे और उनका पायजामा आधी पिंडली तक चढ़ा हुआ था। जब वे खड़े हुए और हम उनके आगे चले, तो उन्होंने आसमान की तरफ़ सिर उठाया और चार बार तकबीर कही… और जब दरवाज़े पर पहुँचे तो थोड़ी देर रुके और कहा:
اَللهُ اَكْبَرُ اَللهُ اَكْبَرُ اَللهُ اَكْبَرُ
अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर
अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है
عَلٰىمَا هَدَانَا اَللهُ اَكْبَرُ عَلٰى مَا رَزَقَنَا
अला मा हदाना अल्लाहु अकबर अला मा रज़क़ना
उस हिदायत पर जो उसने हमें दी, अल्लाह सबसे बड़ा है उस रिज़्क़ पर जो उसने हमें अता किया
بَهِيْمَةِ الْاَنْعَامِ وَ الْحَمْدُ لِلهِ عَلٰى مَا اَبْلَانَا.مِنْ
मिन बहिमतिल-अनआम वल्हम्दु लिल्लाहि अला मा अबलाना
चौपायों से, और तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है उस इम्तिहान पर जो उसने हमें दिया
उन्होंने इसे बुलंद आवाज़ से पढ़ा और हम भी बुलंद आवाज़ से पढ़ते रहे… और यह तीन बार कहा… और इमाम रज़ा (अ:) हर दस क़दम के बाद रुकते और चार बार तकबीर कहते.
21. अल-फ़क़ीह में: जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) बारिश की दुआ करते तो यह पढ़ते:
اَللّٰهُمَّ اسْقِ عِبَادَكَ وَ بَهَائِمَكَ
अल्लाहुम्मसक़ि इबादक व बहाइमक
ऐ अल्लाह! अपने बंदों और अपनी मख़लूक़ात को पानी अता फ़रमा
وَانْشُرْ رَحْمَتَكَ وَ اَحْيِ بِلَادَكَ الْمَيْتَةَ.
वन्शुर रहमतक व अह्यि बिलादकल मय्यिता
और अपनी रहमत फैला दे, और अपनी मुरदा ज़मीन को ज़िंदा कर दे
और इसे तीन बार दोहराते थे.
22. अवारिफ़ अल-मआ’रिफ़ में: अमीरुल मोमिनीन (अ.) से रिवायत है:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.) सज्दा में यह फ़रमाते थे:
اَللّٰهُمَّ لَكَ سَجَدْتُ وَ بِكَ آمَنْتُ وَ لَكَ اَسْلَمْتُ
अल्लाहुम्मा लका सजदतु व बिका आमंतु व लका अस्लम्तु
ऐ अल्लाह! मैंने तेरे सामने सज्दा किया, तुझ पर ईमान लाया और तेरे ही आगे ख़ुद को झुका दिया
سَجَدَ وَجْهِيَ لِلَّذِيْ خَلَقَهٗ وَ صَوَّرَهٗ وَ شَقَّ
सजदा वज्ही लिल्लज़ी ख़लक़हू व सव्वरहू व शक्का
मेरा चेहरा उस ज़ात के आगे सज्दा-रेज़ है जिसने उसे पैदा किया, उसकी सूरत बनाई और उसे खोल दिया
سَمْعَهٗ وَ بَصَرَهٗ فَتَبَارَكَ اللهُ اَحْسَنُ الْخالِقِيْنَ.
सम्अहू व बसरहू फ़तबारक अल्लाहु अहसनुल ख़ालिक़ीन
उसकी सुनने और देखने की क़ुव्वत के साथ; तो बरकत वाला है अल्लाह, जो सबसे बेहतरीन ख़ालिक़ है
23. किताब अल-ग़ारात (अस-सक़फ़ी) में: उबैया से रिवायत है कि अमीरुल मोमिनीन (अ.) ने मुहम्मद इब्न अबी बक्र को लिखा:
अपने रुकू’ का ख़याल रखो… और जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) रुकू’ से खड़े होते तो फ़रमाते:
سَمِعَ اللهُ لِمَنْ حَمِدَهٗ اَللّٰهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ مِلْءَ
समिअल्लाहु लिमन हमिदहू, अल्लाहुम्मा लकल हम्दु मिल्अ
अल्लाह उस की सुनता है जो उसकी हम्द करता है। ऐ अल्लाह! तेरे लिए ऐसी हम्द है जो भर देती है
سَمَاوَاتِكَ وَ مِلْءَ اَرْضِكَ وَ مِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ.
समावातिक व मिल्अ अरज़िक व मिल्अ मा शिअ्ता मिन शै’इन
तेरे आसमानों को, तेरी ज़मीन को और हर उस चीज़ को जिसे तू चाहे
24. अल-बिहार (अज़-ज़िक्र) में: दो सज्दों के दरमियान पढ़ी जाने वाली दुआ के बारे में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से रिवायत है कि आप यह फ़रमाते थे:
اَللّٰہُمَّ اغْفِرْ لِیْ وَ ارْحَمْنِیْ وَ اَجِرْنِیْ
अल्लाहुम्मा इग़्फ़िर ली व अरहम्नी व अजिरनी
ऐ अल्लाह! मुझे बख़्श दे, मुझ पर रहम फ़रमा और मुझे पनाह दे
وَعَافِنِیْ اِنِّیْ لِمَا اَنْزَلْتَ اِلَیَّخَیْرٍ فَقِیْر
व आफ़िनी इन्नी लिमा अंज़ल्ता इलय्य खैरिन फ़क़ीर
और मुझे आफ़ियत दे, बेशक मैं उस भलाई का मोहताज हूँ जो तू मेरी तरफ़ नाज़िल करे
تَبَارَكَ اللهُ رَبُّ الْعَالَمِيْنَ.
तबारक अल्लाहु रब्बुल आलमीन
बरकत वाला है अल्लाह, जो तमाम जहानों का रब है
25. अल-सदूक़ की किताब फ़ज़ाएल अल-अशहुर में: अब्दुल्लाह इब्न मसऊद से, रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फ़रमाया:
मैं उस ज़ात की क़सम खाता हूँ जिसने मुझे हक़ के साथ भेजा — जिब्राईल ने मुझे इसराफ़ील से और उसने अपने रब्बे अज़ीम से बताया कि उसने फ़रमाया:
जो शख़्स रमज़ान के महीने की आख़िरी रात दस रकअत नमाज़ पढ़े… फिर आख़िरी दस रकअत मुकम्मल कर के सलाम के बाद एक हज़ार बार “अस्तग़फ़िरुल्लाह” पढ़े और सज्दा में जाकर यह कहे:
يَا حَيُّ يَا قَيُّوْمُ يَا ذَا الْجَلَالِ وَ الْاِكْرَامِ
या हय्यु या क़य्यूम या ज़ल-जलालि वल-इकराम
ऐ हमेशा ज़िंदा रहने वाले! ऐ सबको क़ायम रखने वाले! ऐ जलाल और इकराम वाले!
يَا رَحْمٰنَ الدُّنْيَا وَ الْآخِرَةِ وَ رَحِيْمَهُمَا
या रहमानद्दुन्या वल-आख़िरह व रहीमहुमा
ऐ दुनिया और आख़िरत में रहम करने वाले, और दोनों में मेहरबान!
يَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ يَا اِلٰهَ الْاَوَّلِيْنَ وَ الْآخِرِيْنَ اِغْفِرْ لَنَا
या अरहमर-राहिमीन या इलाहल-अव्वलीन वल-आख़िरीन इग़्फ़िर लना
ऐ सब से ज़्यादा रहम करने वाले! ऐ पहले और बाद वालों के माबूद! हमें बख़्श दे
ذُنُوْبَنَا وَ تَقَبَّلْ مِنَّا صَلَاتَنَا وَ صِيَامَنَا وَ قِيَامَنَا.
ज़ुनूबना व तक़ब्बल मिन्ना सलातना व सियामना व क़ियामना
हमारे गुनाह माफ़ फ़रमा और हमारी नमाज़, रोज़े और इबादत क़बूल कर
…फिर रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फ़रमाया:
यह मेरे लिए और मेरी उम्मत के मर्दों और औरतों के लिए ख़ास तोहफ़ा है, जो अल्लाह (स.व.त.) ने मुझसे पहले किसी नबी या और को नहीं दिया। 26. अल-क़ुत्ब की किताब अल-दआवात में: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से रिवायत है:
जिब्राईल ने मुझे हुक्म दिया कि क़ुरआन खड़े होकर पढ़ूँ, रुकू की हालत में अल्लाह की तस्बीह करूँ, सज्दे में उसकी हम्द करूँ और बैठी हुई हालत में उससे दुआ माँगूँ। 27. अहमद इब्न अल-फ़हद की किताब उद्दतुद-दाई में: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) जब दुआ और इल्तिजा फ़रमाते तो अपने हाथ उसी तरह उठाते जैसे कोई फ़क़ीर खाने के लिए हाथ फैलाता है।
नोट: यह रिवायत शैख़ तूसी ने भी अल-मजालिस और अल-अख़बार में मुहम्मद और ज़ैद — जो अली इब्न अल-हुसैन (अ.) के दोनों बेटे थे — उनसे, उनके वालिद से और इमाम हुसैन (अ.) से नक़्ल की है।

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दूसरा: 2. आईने में देखने के वक़्त की दुआ
28. अल-जाफ़रिय्यात में: जाफ़र इब्न मुहम्मद से, अपने बाप-दादाओं से, इमाम अली (अ.) से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) आईने में देखते तो यह फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ اَكْمَلَ خَلْقِيْ وَ اَحْسَنَ
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अक्मल ख़ल्क़ी व अह्सन
तमाम हम्द अल्लाह के लिए है जिसने मेरी पैदाइश को मुकम्मल बनाया और
صُوْرَتِيْ وَ زَانَ مِنِّيْ مَا شَانَ مِنْ غَيْرِيْ
सूरत़ी व ज़ाना मिन्नी मा शाना मिन ग़ैऱी
मेरी सूरत को हुस्न दिया और मुझ में वह खूबी रखी जो दूसरों में ऐब थी
وَ هَدَانِيْ لِلْاِسْلَامِ وَ مُنَّ عَلَيَّ بِالنُّبُوَّةِ.
व हदानी लिल-इस्लाम व मुन्ना अलय्य बिन्नुबूवत
और मुझे इस्लाम की हिदायत दी और नुबूवत की नेअमत अता फ़रमाई
29. शैख़ अबुल फ़तूह की तफ़सीर में: इमाम सादिक़ (अ.) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) आईने में देखते तो यह फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ اَحْسَنَ خَلْقِيْ وخُلْقِيْ َ
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अह्सन ख़ल्क़ी व ख़ुलुक़ी
तमाम हम्द अल्लाह के लिए है जिसने मेरी सूरत और मेरे अख़लाक़ को बेहतरीन बनाया
وَ زَانَ مِنِّيْ مَا شَانَ مِنْ غَيْرِيْ.
व ज़ाना मिन्नी मा शाना मिन ग़ैऱी
और मुझ में वह ख़ूबी रखी जो दूसरों में ऐब थी

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तीसरा: P3. सवारी पर बैठते वक़्त की दुआ
30. अवाली अल-लआली में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के बारे में रिवायत है: जब आप सफ़र के लिए अपनी सवारी पर बैठते तो तीन बार तकबीर कहते, फिर यह फ़रमाते:
سُبْحَانَالَّذِيْ سَخَّرَ لَنَا هٰذَا وَ مَا كُنَّا لَهٗ
सुब्हानल्लज़ी सख़्ख़र लना हाज़ा व मा कुन्ना लहू
पाक है वह ज़ात जिसने इस सवारी को हमारे क़ाबू में दिया, वरना हम इसे क़ाबू में नहीं कर सकते थे
مُقْرِنِيْنَ وَ اِنَّا اِلٰى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُوْنَ
मुक़्रिनीन व इन्ना इला रब्बिना लमुनक़लिबून
और यक़ीनन हमें अपने रब की तरफ़ ही लौटना है
نَسْاَلُكَ فِيْ سَفَرِنَا هٰذَا الْبِرَّ وَ التَّقْوٰى اَللّٰهُمَّ اِنَّا
नसअलुका फी सफ़रिना हाज़ल बिर्र वत्तक़्वा अल्लाहुम्मा इन्ना
हम इस सफ़र में तुझ से नेकी और परहेज़गारी की दुआ करते हैं
وَ مِنَ الْعَمَلِ مَا تَرْضٰى. اَللّٰهُمَّ هَوِّنْ
व मिनल अमलि मा तरज़ा अल्लाहुम्मा हौव्विन
और ऐसे आमाल की जो तुझे पसंद हों। ऐ अल्लाह! इस सफ़र को
عَلَيْنَا سَفَرَنَا هٰذَا وَ اَطْوِ عَنَّا بُعْدَهٗ.
अलयना सफ़रना हाज़ा व अतवि अन्ना बु’दहू
हमारे लिए आसान बना दे और इसकी दूरी को समेट दे
اَللّٰهُمَّ اَنْتَ الصَّاحِبُ فِي السَّفَرِ َ
अल्लाहुम्मा अन्तस्साहिबु फ़िस्सफ़र
ऐ अल्लाह! तू ही सफ़र में साथी है
الْخَلِيْفَةُ فِي الْاَهْلِ. اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ و
वल-ख़लीफ़तु फ़िल-अहल अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका
और घर वालों का निगहबान है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ
مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ وَ كَـآبَةِ الْمُنْقَلَبِ
मिन वअथाइ-स्सफ़र व कआबतिल-मुनक़लब
सफ़र की सख़्तियों से और वापसी की उदासी से
سُوْءِ الْمَنْظَرِ فِيْ الْاَهْلِ وَ الْمَالِ.وَ
व सूअल-मंजर फ़िल-अहल वल-माल
और घर-परिवार और माल में किसी बुरे मंज़र से
آئِبُوْنَ تَائِبُوْنَ عَابِدُوْنَ لِرَبِّنَا حَامِدُوْنَ.
आइबूना ताइबूना आबिदूना लिरब्बिना हामिदून
हम लौटने वाले हैं, तौबा करने वाले हैं, इबादत करने वाले हैं और अपने रब की हम्द करने वाले हैं

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चौथा: 4. सफ़र में रात के वक़्त की दुआ
31. अल-अवाली में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से रिवायत है: जब आप सफ़र में होते और रात हो जाती, तो यह फ़रमाते:
يَا اَرْضُ رَبِّيْ وَ رَبُّكِ اللهُ.
या अरज़ु रब्बी व रब्बुकिल्लाहु
ऐ ज़मीन! मेरा रब और तेरा रब अल्लाह है
وَ اَعُوْذُ مِنْ شَرِّكِ وَ شَرِّ مَا فِيْكِ
व अऊज़ु मिन शर्रिकि व शर्रि मा फ़ीकِ
और मैं तेरे शर्र से और उस चीज़ के शर्र से पनाह चाहता हूँ जो तुझ में है
وَ شَرِّ مَا يَدُبُّ عَلَيْكِ وَ اَعُوْذُ بِاللهِ
व शर्रि मा यदुब्बु अलैकِ व अऊज़ु बिल्लाह
और उस हर चीज़ के शर्र से जो तुझ पर चलती है, और मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ
مِنْ اَسَدٍ وَ اَسْوَدٍ وَ مِنَ الْحَيَّةِ وَ الْعَقْرَبٍ
मिन असदिं व अस्वदिं व मिनल-हय्याति वल-अक़रब
हर दरिंदे से, हर ज़हरीले जानवर से, साँप और बिच्छू से
وَ مِنْ سَاكِنِ الْبَلَدِ وَ وَالِدٍ وَ مَا وَلَدَ.
व मिन साकिनिल-बलद व वालिदिं व मा वलद
और इस जगह के रहने वालों से, और उनसे और उनकी औलाद से

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पाँचवाँ: 5. जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) नए कपड़े पहनते
32. अल-मकारिम में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से रिवायत है कि जब आप नए कपड़े पहनते तो यह फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ كَسَانِيْ مَا يُوَارِيْ عَوْرَتِيْ وَ اَتَجَمَّلُ بِهٖ فِیْ النَّاسِ.
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी कसानी मा युवारी औ़रत़ी व अतजम्मलु बिही फ़िन्नास
तमाम हम्द अल्लाह के लिए है जिसने मुझे वह लिबास पहनाया जो मेरी सतर को ढाँपता है और जिससे मैं लोगों के बीच सजा-सँवरा रहता हूँ
33. और यह भी रिवायत है कि जब आप कपड़े उतारते तो बाईं तरफ़ से उतारते, और जब नए कपड़े पहनते तो अल्लाह की हम्द करते और फिर किसी ग़रीब को बुलाकर अपने पुराने कपड़े उसे दे देते। फिर यह फ़रमाते:
“जो मुसलमान किसी ज़रूरतमंद मुसलमान को अपने पहने हुए कपड़े पहनाए — और असल में उसे अल्लाह ही पहनाता है — तो वह अल्लाह की हिफ़ाज़त, पनाह और बरकत में रहता है जब तक वह कपड़े उस ग़रीब के बदन पर रहते हैं, चाहे वह ज़िंदा हो या मर चुका हो।”
34. और यह भी कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) नए कपड़े पहनकर खड़े होते और घर से निकलने का इरादा करते, तो यह फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ بِكَ اسْتَتَرْتُ وَ اِلَيْكَ تَوَجَّهْتُ
अल्लाहुम्मा बिका इस्ततरतु व इलैक तवज्जहतु
ऐ अल्लाह! तेरी वजह से मैंने खुद को ढाँपा और तेरी ही तरफ़ रुख़ किया
وَ بِكَ اعْتَصَمْتُ وَ عَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ.
व बिका इतस़म्तु व अलैक तवक्कल्तु
और तेरी ही पनाह ली और तुझ पर ही भरोसा किया
اَللّٰهُمَّ اَنْتَ ثِقَتِيْ وَ اَنْتَ رَجَائِيْ. اَللّٰهُمَّ اكْفِنِيْ
अल्लाहुम्मा अन्त थिक़ती व अन्त रजाई अल्लाहुम्मा इक़्फ़िनी
ऐ अल्लाह! तू ही मेरा सहारा है और तू ही मेरी उम्मीद है, ऐ अल्लाह! मेरी कफ़ालत फ़रमा
مَا اَهَمَّنِيْ وَ مَا لَا اَهْتَمُّ بِهٖ وَ مَا اَنْتَ اَعْلَمُ بِهٖ مِنِّيْ
मा अहममनी व मा ला अहतमु बिही व मा अन्त आलमु बिही मिन्नी
उस चीज़ में जो मुझे परेशान करती है, और उसमें भी जिसकी मुझे फ़िक्र नहीं, और जिसमें तू मुझसे ज़्यादा जानता है
عَزَّ جَارُكَ وَ جَلَّ ثَنَاؤُكَ وَ لَا اِلٰهَ غَيْرُكَ.
अज़्ज़ा जारुक व जल्ला सनाउक व ला इलाहा ग़ैरुक
तेरी पनाह बहुत अज़ीम है, तेरी तारीफ़ बुलंद है, और तेरे सिवा कोई माबूद नहीं
اَللّٰهُمَّ زَوِّدْنِيْ التَّقْوٰى وَ اغْفِرْ لِيْ
अल्लाहुम्मा ज़व्विदनीत्तक़्वा वग़्फ़िर ली
ऐ अल्लाह! मुझे तक़वा की पूँजी अता फ़रमा और मुझे बख़्श दे
ذَنْبِيْ وَ وَجِّهْنِيْ لِلْخَيْرِ حَيْثُ مَا تَوَجَّهْتُ.
ज़म्बी व वज्जिहनी लिलख़ैरि हैस मा तवज्जहतु
मेरे गुनाह माफ़ फ़रमा और मुझे हर जगह भलाई की तरफ़ मोड़ दे

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छठा: 6. जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) बैठी हुई जगह से खड़े होते
35. अल-ग़ज़ाली ने अल-इह्या में नक़्ल किया है: जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) बैठी हुई जगह से खड़े होते तो यह फ़रमाते:
سُبْحَانَكَ اَللّٰہُمَّ وَ بِحَمْدِكَ اَشْہَدُ اَنْ لَ
सुब्हानक अल्लाहुम्मा व बिहम्दिक अश्हदु अन ला
ऐ अल्लाह! तू पाक है, और मैं तेरी हम्द के साथ गवाही देता हूँ कि
ا اِلٰہَ اِلَّا اَنْتَ اَسْتَغْفِرُكَ وَ اَتُوْبُ اِلَیْكَ
इला इलाहा इल्ला अन्त अस्तग़्फ़िरुका व अतूबु इलैक
तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, मैं तुझ से मग़फ़िरत चाहता हूँ और तेरी तरफ़ रुजू करता हूँ

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सातवाँ: 7. मस्जिद में दाख़िल होते और निकलते वक़्त की दुआ
36. अल-शैख़ अल-तूसी ने अल-मजालिस में रिवायत की है: अब्दुल्लाह इब्न अल-हसन से, अपनी माँ फ़ातिमा बिन्त अल-हुसैन (स.अ.) से, अपने वालिद (अ.) से, इमाम अली (अ.) से:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मस्जिद में दाख़िल होते तो यह फ़रमाते:
اَللّٰہُمَّ افْتَحْ لِیْ اَبْوَابَ رَحْمَتِكَ
अल्लाहुम्मा इफ़्तह ली अब्वाबा रहमतिका
ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे
اَللّٰہُمَّ افْتَحْ لِیْ اَبْوَابَ رِزْقِكَ
अल्लाहुम्मा इफ़्तह ली अब्वाबा रिज़्क़िका
ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपने रिज़्क़ के दरवाज़े खोल दे
37. अल-तबरी ने किताब अल-इमामह में रिवायत की है: अब्दुल्लाह इब्न अल-हसन से, फ़ातिमा अल-सुग़रा से, उनके वालिद अल-हुसैन से, फ़ातिमा अल-कुबरा बिन्त रसूलुल्लाह से — सब पर सलाम हो — कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मस्जिद में दाख़िल होते तो यह फ़रमाते:
بِسْمِ اللهِاَللّٰہُمَّ صَلِّ عَلٰی مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ
बिस्मिल्लाह अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आलि मुहम्मद
अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आल-ए-मुहम्मद पर दरूद भेज
اغْفِرْ لِیْ ذُنُوْبِیْ وَافْتَحْ لِیْ اَبْوَابَ رَحْمَتِكَ.وَ
इग़्फ़िर ली ज़ुनूबी वफ़्तह ली अब्वाबा रहमतिका
मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे
और जब आप (स.अ.व.) बाहर निकलते तो यह फ़रमाते:
بِسْمِ اللهِاَللّٰہُمَّ صَلِّ عَلٰی مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ
बिस्मिल्लाह अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आलि मुहम्मद
अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आल-ए-मुहम्मद पर दरूद भेज
وَ اغْفِرْ لِیْ ذُنُوْبِیْ وَافْتَحْ لِیْ اَبْوَابَ فَضْلِكَ.
व इग़्फ़िर ली ज़ुनूबी वफ़्तह ली अब्वाबा फ़ज़्लिका
और मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे लिए अपने फ़ज़्ल के दरवाज़े खोल दे

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आठवाँ: 8. जब आप (स.अ.व.) बिस्तर पर तशरीफ़ ले जाते
38. अल-मकारिम में है: जब आप (स.अ.व.) बिस्तर पर जाते तो दाईं करवट लेटते, दाहिना हाथ दाहिने गाल के नीचे रखते, फिर यह फ़रमाते:
اَللّٰہُمَّ قِنِیْ عَذَابَكَ یَوْمَ تَبْعَثُ عِبَادَكَ.
अल्लाहुम्मा क़िनी अज़ाबका यौमा तबअसु इबादका
ऐ अल्लाह! उस दिन अपने अज़ाब से मुझे महफ़ूज़ रखना जब तू अपने बंदों को उठाएगा
39. और यह भी कि सोने से पहले आप (स.अ.व.) मुख़्तलिफ़ दुआएँ पढ़ते थे, और सोने के क़रीब यह फ़रमाते:
بِسْمِ اللهِ اَمُوْتُ وَ اَحْيَا وَ اِلَي اللهِ الْمَصِيْرُ.
बिस्मिल्लाह अमूतु व अहया व इलल्लाहिल मसीर
अल्लाह के नाम से मैं मरता और जीता हूँ, और अल्लाह ही की तरफ़ लौटना है
رَوْعَتِیْ وَ اسْتُرْ عَوْرَتِیْ وَاَدِّ عَنِّیْ اَمَانَتِیْ.اَللّٰہُمَّ آمِنْ
अल्लाहुम्मा आमिन रौअती व उस्तुर औ़रती व अद्दि अन्नी अमानती
ऐ अल्लाह! मेरे डर दूर कर, मेरी कमज़ोरियों पर पर्दा डाल, और मुझसे अमानत अदा करवा दे
40. और यह भी कि आप (स.अ.व.) सोने से पहले आयतुल-कुर्सी पढ़ते थे।
जिब्रईल (अ.) मेरे पास आए और कहा: “ऐ मुहम्मद! एक शरारती जिन्न तुम्हें नींद में परेशान करता है, इसलिए आयतुल-कुर्सी पढ़ा करो।”
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नवाँ: 9. जब दस्तरख़्वान बिछाया जाता
41. अल-काफी में अहमद इब्न अल-हसन अल-मयसमी से रिवायत है, जिसे उन्होंने एक मासूम (अ.) से नक़्ल किया:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के सामने दस्तरख़्वान बिछाया जाता, तो आप फ़रमाते:
سُبْحَانَكَ اَللّٰهُمَّ مَا اَحْسَنَ مَا تَبْتَلِيْنَا سُبْحَانَكَ
सुब्हानक अल्लाहुम्मा मा अहसन मा तब्तलीना सुब्हानक
ऐ अल्लाह! तू पाक है, कितना अच्छा है वह जिससे तू हमें आज़माता है, तू पाक है
اَكْثَرَ مَا تُعْطِيْنَا سُبْحَانَكَ مَا اَكْثَرَ .مَا
मा अक़्सर मा तुअतीना सुब्हानक मा अक़्सर
कितना ज़्यादा है जो तू हमें अता करता है, तू पाक है, कितना ज़्यादा
مَاتُعَافِيْنَا. اَللّٰهُمَّ اَوْسِعْ عَلَيْنَا وَ عَلٰى فُقَرَاءِ
मा तुआफ़ीना अल्लाहुम्मा औसिअ अलैना व अला फ़ुक़रा
है वह जो तू हमें सलामती देता है। ऐ अल्लाह! हमारे लिए और फ़क़ीरों के लिए कुशादगी फ़रमा
الْمُؤْمِنِيْنَ وَ الْمُؤْمِنَاتِ وَ الْمُسْلِمِيْنَ وَ الْمُسْلِمَاتِ.وَ
वल-मोमिनीन वल-मोमिनात वल-मुस्लिमीन वल-मुस्लिमात
मोमिन मर्दों और औरतों के लिए, और मुसलमान मर्दों और औरतों के लिए
42. अल-मकारिम में है: जब दस्तरख़्वान बिछाया जाता तो आप (स.अ.व.) फ़रमाते:
بِسْمِ اللهِ. اَللّٰہُمَّ اجْعَلْہَا نِعْمَۃً
बिस्मिल्लाह अल्लाहुम्मा इज़्अलहा निय्मतन
अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! इसे क़द्र की जाने वाली नेअमत बना
مَشْكُوْرَۃً تَصِلُ بِہَا نِعْمَۃَ الْجَنَّۃِ.
मशकूरतन तसिलु बिहा निय्मतल जन्नह
जिसके ज़रिए जन्नत की नेअमतों तक पहुँच मिले

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दसवाँ: 10. जब आप (स.अ.व.) खाने को हाथ लगाते
43. अल-मकारिम में है: जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) खाने पर हाथ रखते तो यह फ़रमाते:
بِسْمِ اللهِ بَارِكْ لَنَا فِيْمَا
बिस्मिल्लाह बारिक लना फ़ीमा
अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! जो कुछ तूने हमें अता किया है उसमें हमारे लिए बरकत दे
رَزَقْتَنَا وَ عَليْكَ خَلْفَهٗ.
रज़क़्तना व अलैका ख़लफ़हू
और उसके पूरा होने का भरोसा तुझ पर ही है

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ग्यारहवाँ: जब दस्तरख़्वान उठा लिया जाता
44. अल-काफी में इब्राहीम इब्न महज़म से, उन्होंने अबी जाफ़र (अ.) से नक़्ल किया:
जब दस्तरख़्वान उठा लिया जाता तो रसूलुल्लाह (स.अ.व.) फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ اَكْثَرْتَ وَ اَطَبْتَ وَ بَارَكْتَ فَاَشْبَعْتَ
अल्लाहुम्मा अक़्सरता व अतब्ता व बारक्ता फ़अश्बअता
ऐ अल्लाह! तूने बहुत अता किया, उसे पाकीज़ा बनाया और उसमें बरकत दी, फिर हमें सैर कर दिया
وَ اَرْوَيْتَ. اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِي يُطْعِمُ وَ لَا يُطْعَمُ
व अरवयता। अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी युत्इमु व ला युत्आमु
और प्यास बुझा दी। सारी हम्द अल्लाह के लिए है जो खिलाता है और स्वयं नहीं खिलाया जाता

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बारहवाँ: 12. जब दूध खाते या पीते
45. अल-काफी में अब्दुल्लाह इब्न सुलेमान से, अबी जाफ़र (अ.) से रिवायत है:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.) कोई चीज़ खाते या पीते नहीं थे मगर यह फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيْهِ وَ اَبْدِلْنَا بِهٖ خَیْرًا مِنْہُ
अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ीहि व अब्दिलना बिही ख़ैरन मिन्हु
ऐ अल्लाह! इसमें हमारे लिए बरकत दे और इसके बदले हमें इससे बेहतर अता फ़रमा
…लेकिन जब आप (स.अ.व.) दूध पीते तो यह फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّاَللّٰهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيْهِ وَ زِدْنَا مِنْہُ
अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ीहि व ज़िदना मिन्हु
ऐ अल्लाह! इसमें हमारे लिए बरकत दे और इसमें हमारे लिए इज़ाफ़ा फ़रमा
46. अल-इक़बाल में है: एक निवाला खाने पर रसूलुल्लाह (स.अ.व.) फ़रमाते:
اَللّٰہُمَّ لَكَ الْحَمْدُ اَطْعَمْتَ وَ اَسْقَیْتَ وَ رَوَیْتَ. فَلَكَ
अल्लाहुम्मा लक अल्हम्द अत्अमता व अस्क़यता व रवयता फ़लक
ऐ अल्लाह! सारी हम्द तेरे लिए है, तूने खिलाया, पिलाया और तृप्त किया, तो तेरे ही लिए
الْحَمْدُ غَيْرُ مَكْفُوْرٍ وَ لَا مُوَدَّعٍ وَ لَا مُسْتَغْنٰی عَنْكَ
अल्हम्दु ग़ैरु मक्फ़ूर व ला मुवद्दअ व ला मुस्तग़्ना अन्क
ऐसी हम्द जो नाशुक्री के बिना हो, न जुदाई के साथ और न तुझसे बेपरवाही के साथ

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तेरहवाँ: 13. जब ताज़ा फल देखते
47. अल-सदूक़ ने अल-मजालिस में वहाब से, जाफ़र इब्न मुहम्मद (अ.) से, अपने आबा (अ.) से, इमाम अली (अ.) से रिवायत की:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ताज़ा फल देखते तो उसे चूमते, आँखों और मुँह से लगाते, फिर फ़रमाते:
اَللّٰہُمَّ كَمَا اَرَیْتَنَا اَوَّلَہَا فِیْ
अल्लाहुम्मा कमा अरैतना अव्वलहा फ़ी
ऐ अल्लाह! जिस तरह तूने हमें इसकी शुरुआत आफ़ियत के साथ दिखाई
عَافِیَۃٍ فَاَرِنَا آخِرَہَا فِیْ عَافِیَۃٍ
आफ़ियतिन फ़अरिना आख़िरहा फ़ी आफ़ियतिन
उसी तरह इसका अंजाम भी हमें आफ़ियत के साथ दिखा

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चौदहवाँ: 14. जब बैतुल-ख़ला में दाख़िल होते
48. अल-फ़क़ीह में है: जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) बैतुल-ख़ला में दाख़िल होना चाहते तो यह फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ مِنَ الرِّجْسِ النَّجِسِ الْخَبِيْثِ
अल्लाहुम्मा इन्नी आऊज़ु बिका मिनर-रिज्सिन-नजिसिल-ख़बीस
ऐ अल्लाह! मैं नापाक, गंदी और ख़बीस चीज़ों से तेरी पनाह चाहता हूँ
الْمُخْبَثِ الشَّيْطَانِ. اَللّٰهُمَّ اَمْطِ عَنِّيْ
अल्मुख़बथिश-शैतान अल्लाहुम्मा अम्त अन्नी
जो शैतान की तरफ़ से हैं। ऐ अल्लाह! मुझसे दूर कर दे
الْاَذٰى وَ اَعِذْنِيْ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيْمِ
अल-अज़ा व आ’इज़्नी मिनश-शैतानिर-रजीम
हर गंदगी को और मुझे मलऊन शैतान से महफ़ूज़ रख
और जब आप (स.अ.व.) बैठते तो यह फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ اَذْهِبْ عَنِّيْ الْقَذٰى وَ
अल्लाहुम्मा अज़हिब अन्नील-क़ज़ा व
ऐ अल्लाह! मुझसे गंदगी दूर कर दे और
اَذٰى وَ اجْعَلْنِيْ مِنَ الْمُتَطَهِّرِيْنَ
अज़ा व इज्अल्नी मिनल-मुततह्हिरीन
मुझे पाक रहने वालों में से बना दे
और जब पेट ढीला हो जाता तो आप (स.अ.व.) फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ كَمَا اَطْعَمْتَنِيْهِ طَيِّبًا فِيْ عَافِيَةٍ
अल्लाहुम्मा कमा अत्अमतनीहि तय्यिबन फ़ी आफ़ियतिन
ऐ अल्लाह! जिस तरह तूने मुझे इसे भलाई के साथ और आफ़ियत में खिलाया
فَاَخْرِجْهُ مِنِّيْ خَبِيْثًا فِيْ عَافِيَةٍ.
फ़अख़रिज्हु मिन्नी ख़बीसन फ़ी आफ़ियतिन
उसी तरह इसकी गंदगी को भी मुझसे आफ़ियत के साथ निकाल दे
और जब आप (स.अ.व.) बैतुल-ख़ला से बाहर आते तो फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الْحَافِظِ الْمُؤَدِّيْ
अल्हम्दु लिल्लाहिल-हाफ़िज़िल-मुअद्दी
सारी हम्द अल्लाह के लिए है जो हिफ़ाज़त करने वाला और ज़रूरतें पूरी करने वाला है
फिर पेट पर हाथ फेर कर यह फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ اَخْرَجَ عَنِّيْ اَذَاهُ وَ اَبْقٰى
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अख़रजा अन्नी अज़ाहू व अब्क़ा
सारी हम्द अल्लाह के लिए है जिसने मुझसे उसकी गंदगी निकाल दी और
فِيَّ قُوَّتَهٗ فَيَا لَهَا مِنْ نِعْمَةٍ لَا يُقَدِّرُ الْقَادِرُوْنَ قَدْرَهَا.
फ़िय्य क़ुव्वतहू फ़या लहा मिन नेमतिन ला युक़द्दिरुल-क़ादिरून क़दरहा
मुझमें उसकी क़ुव्वत बाक़ी रखी। कैसी अज़ीम नेअमत है जिसकी क़दर कोई नहीं जान सकता

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पंद्रहवाँ: 15. जब क़ब्रों के पास से गुज़रते
49. इब्न क़ुलवैह ने अल-कामिल में रिवायत की है: मुहम्मद इब्न मुस्लिम से, अबी जाफ़र (अ.) से, उन्होंने कहा:
मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना: जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मोमिनों के एक समूह की क़ब्रों के पास से गुज़रे तो फ़रमाया:
اَلسَّلَامُ عَلَيْكُمْ مِنْ دِيَارِ قَوْمٍ مُؤْمِنِيْنَ
अस्सलामु अलैकुम मिन दियारि क़ौमिम् मोमिनीन
तुम पर सलाम हो, ऐ ईमान वालों की बस्तियों में रहने वालो
وَ اِنَّا اِنْ شَاءَ اللهُ بِكُمْ لَاحِقُوْنَ.
व इन्ना इन शा अल्लाहु बिकुम लाहिक़ून
और बेशक हम भी, अगर अल्लाह ने चाहा, तुमसे मिलने वाले हैं

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सोलहवाँ: 16. क़ब्रों की ज़ियारत के समय की दुआ
50. इब्न क़ुलवैह ने अल-कामिल में सफ़वान अल-जम्माल से रिवायत की है, उन्होंने कहा: मैंने अबा अब्दिल्लाह (अ.) को यह कहते सुना:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.) हर गुरुवार की शाम कुछ सहाबा के साथ लोगों से अलग होकर मदीना के क़ब्रिस्तान बक़ी में तशरीफ़ ले जाते और तीन बार फ़रमाते:
اَلسَّلَامُ عَلَيْكُمْ يَا اَهْلَ الدِّيَاررَحِمَكُمُ اللهُ.
अस्सलामु अलैकुम या अहलद-दियार रहिमकुमुल्लाह
सलाम हो तुम पर, ऐ बस्तियों के रहने वालो! अल्लाह तुम पर रहमत फ़रमाए

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सत्रहवाँ: 17. जब कोई पसंदीदा या तकलीफ़देह बात पेश आती
51. अल-काफी में अल-मुसन्ना अल-हन्नात से, अबी अब्दिल्लाह (अ.) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) पर कोई ख़ुशी की बात आती तो फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ عَلٰی ہٰذِہِ النِّعْمَۃِ.
अल्हम्दु लिल्लाहि अला हाज़िहिन्नि’मत
इस नेअमत पर सारी हम्द अल्लाह के लिए है
और जब कोई तकलीफ़देह बात आती तो फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ عَلٰی كُلِّ حَالٍ
अल्हम्दु लिल्लाहि अला कुल्लि हाल
हर हाल में सारी हम्द अल्लाह के लिए है

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अठारहवाँ: 18. जब कोई पसंदीदा चीज़ देखते
52. अल-मकारिम में अमीरुल मोमिनीन (अ.) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) कोई पसंदीदा चीज़ देखते तो फ़रमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ بِنِعْمَتِهٖ تَتِمُّ الصَّالِحَاتُ
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी बिनि’मतिही ततिम्मुस्सालिहात
सारी हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसकी नेअमत से नेक काम पूरे होते हैं

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उन्नीसवाँ: 19. अज़ान सुनते समय का ज़िक्र
53. अल-दआएम में अली इब्न अल-हुसैन (अ.) से रिवायत है कि
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) अज़ान सुनते तो मुअज़्ज़िन के शब्द दोहराते और जब वह कहता:
حَيَّ عَلَي الصَّلَاةِ حَيَّ عَلَي الْفَلَاحِ حَيَّ عَلٰی خَیْرِ الْعَمَلِ
हय्या अलस्सलाह, हय्या अलफलाह, हय्या अला ख़ैरिल-अमल
नमाज़ की तरफ़ आओ, कामयाबी की तरफ़ आओ, बेहतरीन अमल की तरफ़ आओ
तो आप (स.अ.व.) फ़रमाते:
لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللهِ.
ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह
अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न कोई क़ुदरत
और जब अज़ान मुकम्मल हो जाती तो फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ رَبَّ هٰذِهِ الدَّعْوَةِ التَّامَّةِ وَ الصَّلَاةِ الْقَائِمَةِ اَعْطِ
अल्लाहुम्मा रब्बा हाज़िहिद-दअवत्तित-ताम्मह वस्सलातिल-क़ाइमह आ’ति
ऐ अल्लाह! इस मुकम्मल पुकार और क़ायम की गई नमाज़ के रब
مُحَمَّدًا سُؤْلَهٗ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَ بَلِّغْهُ الدَّرَ
मुहम्मदन सुअलहू यौमल-क़ियामह व बल्लिघ्हुद्दरज
मुहम्मद को क़ियामत के दिन उनकी मुराद अता फ़रमा और उनका दर्जा बुलंद कर
جَةَ الْوَسِيْلَةَ مِنَ الْجَنَّةِ وَ تَقَبَّلْ شَفَاعَتَهٗ فِيْ اُمَّتِهٖ.
तल-वसीलत मिनल-जन्नह व तक़ब्बल शफ़ाअतहू फ़ी उम्मतिही
और जन्नत में वसीला का मक़ाम अता फ़रमा तथा उनकी शफ़ाअत उनकी उम्मत के हक़ में क़ुबूल कर

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बीसवाँ: 20. मग़रिब की नमाज़ के आख़िर में ज़िक्र
54. अल-जाफ़रिय्यात में जाफ़र इब्न मुहम्मद (अ.) से, अपने आबा (अ.) से, इमाम अली (अ.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मग़रिब की तीसरी रकअत में यह पढ़ते थे:
رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوْبَنَا بَعْدَ اِذْ ھَدَيْتَنَا وَھَبْ
रब्बना ला तुज़िघ क़ुलूबना बा’दा इज़ हदैतना वहब
ऐ हमारे रब! हमें हिदायत देने के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न कर
لَنَا مِنْ لَّدُنْكَ رَحْمَۃً اِنَّكَ اَنْتَ الْوَھَّابُ
लना मिल्लदुनका रहमतन इन्नका अंतल-वह्हाब
और अपनी तरफ़ से हमें रहमत अता फ़रमा, बेशक तू ही बहुत देने वाला है

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इक्कीसवाँ: 21. वित्र की क़ुनूत में ज़िक्र और दुआ
55. अल-फ़क़ीह में है: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) वित्र की नमाज़ में सत्तर बार इस्तिग़फ़ार करते, फिर सात बार फ़रमाते:
هٰذَا مَقَامُ الْعَائِذِ بِكَ مِنَ النَّارِ.
हाज़ा मक़ामुल-आइज़ि बिका मिनन-नार
यह जहन्नम से तेरी पनाह चाहने वाले का मक़ाम है
56. और वित्र की क़ुनूत में यह भी फ़रमाते थे:
اَللّٰهُمَّ اهْدِنِيْ فِيْمَنْ هَدَيْتَ
अल्लाहुम्महिदनी फ़ीमन हदैत
ऐ अल्लाह! मुझे भी उन्हीं में हिदायत दे जिनको तूने हिदायत दी
وَ عَافِنِيْ فِيْمَنْ عَافَيْتَ وَ تَوَلَّنِيْ فِيْمَنْ
व आफ़िनी फ़ीमन आफ़ैत व तवल्लनी फ़ीमन
और मुझे आफ़ियत दे जैसे तूने औरों को दी, और मेरे मामलों की ज़िम्मेदारी ले
تَوَلَّيْتَ وَ بَارِكْ لِيْ فِيْمَا اَعْطَيْتَ
तवल्लैत व बारिक ली फ़ीमा अ’तैत
जिनके तूने मामले संभाले, और जो कुछ तू दे उसमें मेरे लिए बरकत दे
وَ قِنِيْ شَرَّ مَا قَضَيْتَ اِنَّكَ
व क़िनी शर्रा मा क़ज़ैत इन्नका
और जो फ़ैसला तूने किया है उसके शर से मुझे बचा, बेशक तू
تَقْضِيْ وَ لَا يُقْضٰى عَلَيْكَ سُبْحَانَكَ رَبَّ الْبَيْتِ
तक़दी व ला युक़ज़ा अलैक, सुब्हानक रब्बल-बैत
फ़ैसला करता है और तुझ पर कोई फ़ैसला नहीं होता, पाक है तू ऐ घर के रब
اَسْتَغْفِرُكَ وَ اَتُوْبُ اِلَيْكَ وَ اُوْمِنُ بِكَ وَ اَتَوَكَّلُ
अस्तग़फ़िरुक व अतूबु इलैक व ऊमिनु बिका व अतवक्कलु
मैं तुझसे मग़फ़िरत चाहता हूँ और तेरी तरफ़ रुजू करता हूँ, तुझ पर ईमान रखता हूँ और भरोसा करता हूँ
عَلَيْكَ وَ لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِكَ يَا رَحِيْمُ.
अलैक व ला हौल व ला क़ुव्वत इल्ला बिका या रहीम
और कोई ताक़त और क़ुदरत नहीं मगर तेरी तरफ़ से, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले

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बाइसवाँ: 22. रोज़ा खोलते समय की दुआ
57. अल-काफी में अल-सकूनी से, अबू जाफ़र (अ.) से, अपने आबा (अ.) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) रोज़ा खोलते तो फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ لَكَ صُمْنَا وَ عَلٰى رِزْقِكَ اَفْطَرْنَا فَتَقَبَّلْهُ
अल्लाहुम्मा लका सुमना व अला रिज़्क़िका अफ़्तरना फ़तक़ब्बल्हु
ऐ अल्लाह! तेरे लिए हमने रोज़ा रखा और तेरे रिज़्क़ से रोज़ा खोला, तो इसे क़ुबूल फ़रमा
مِنَّا. ذَهَبَ الظَّمَاُ وَ ابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَ بَقِيَ الْاَجْرُ.
मिन्ना। ज़हबज़-ज़मा व इब्तल्लतिल-उरूक़ व बाक़ियल-अज्र
हमारी तरफ़ से। प्यास जाती रही, रगें तर हो गईं और सवाब बाक़ी रह गया

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तेइसवाँ: 23. नमाज़ के बाद की दुआ
58. मजमूअह अश-शहीद में फ़ज़्ल इब्न मुहम्मद अल-अशअरी की किताब से नक़्ल है: मस्मा’ से, अबी बक्र अल-हज़्रमी से, अबी जाफ़र (अ.) से, उन्होंने कहा:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) शहादतैन और सलाम पढ़ चुके होते, तो दो ज़ानू बैठते, दाहिना हाथ सिर पर रखते और फ़रमाते:
بِسْمِ اللهِ الَّذِيْ لَا اِلٰہَ اِلَّا ہُوَ عَالِمُ الْغَیْبِ ِ
बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवा आलिमुल-ग़ैब
अल्लाह के नाम से, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, वह ग़ैब को जानने वाला है
الرَّحْمٰنُ الرَّحِیْمُ ٍ.وَ الشَّہَادَۃ
अर्रहमानुर्रहीम वश्शहादह
और ज़ाहिर को भी, वह बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है
وَ آلِ مُحَمَّدٍ وَ اَذْہِبْ عَنِّیْ الْہَمَّ وَ الْحُزْنَ.صَلِّ عَلٰی مُحَمَّد
सल्लि अला मुहम्मद व आले मुहम्मद व अज़हिब अन्निल-हम्म वल-हुज़्न
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दरूद भेज और मुझसे ग़म और उदासी दूर कर
59. अल-काफी में मुहम्मद इब्न अल-फ़रज से रिवायत है, उन्होंने कहा: अबू जाफ़र इब्न अल-रज़ा (अ.) ने मुझे लिखा:
…और जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) अपनी नमाज़ मुकम्मल कर लेते, तो फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِيْ مَا قَدَّمْتُ وَ مَا اَخَّرْتُ وَ مَا اَسْرَرْتُ وَ مَا اَعْلَنْتُ
अल्लाहुम्मा इग़्फ़िर ली मा क़द्दम्तु व मा अख़्ख़र्तु व मा असरर्र्तु व मा अअलन्तु
ऐ अल्लाह! जो कुछ मैंने पहले किया और जो बाद में किया, जो छुपाकर किया और जो ज़ाहिर किया, सब माफ़ फ़रमा
وَ اِسْرَافِيْ عَلٰى اَمْرِيْ (نَفْسِيْ) وَ مَا اَنْتَ اَعْلَمُ بِهٖ مِنِّيْ
व इस्राफ़ी अला अम्री (नफ़्सी) व मा अन्त अअलमु बिही मिन्नी
और मेरे कामों में मेरी ज़्यादती को भी, और वह सब भी जिसे तू मुझसे ज़्यादा जानता है
اَللّٰهُمَّ اَنْتَ الْمُقَدِّمُ وَالْمُؤَخِّرُ لَا اِلٰهَ إِلَّا اَنْتَ
अल्लाहुम्मा अन्तल-मुक़द्दिम वल-मुअख़्ख़िर ला इलाहा इल्ला अन्त
ऐ अल्लाह! तू ही आगे करने वाला है और पीछे करने वाला है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं
بِعِلْمِكَ الْغَيْبَ وَ بِقُدْرَتِكَ عَلَى الْخَلْقِ اَجْمَعِيْنَ
बि-इल्मिक़ल-ग़ैब व बिक़ुदरतिका अलल-ख़ल्क़ि अज्मईन
अपने ग़ैब के इल्म और तमाम मख़लूक़ पर अपनी क़ुदरत के वसीले से
مَا عَلِمْتَ الْحَيَاةَ خَيْرًا لِيْ فَاَحْيِنِيْ وَ
मा अलिम्तल-हयात ख़ैरन ली फ़अह्यिनी
अगर तू जानता है कि ज़िंदगी मेरे लिए बेहतर है तो मुझे ज़िंदा रख
تَوَفَّنِيْ اِذَا عَلِمْتَ الْوَفَاةَ خَيْرًا لِيْ
तवफ़्फ़नी इज़ा अलिम्तल-वफ़ात ख़ैरन ली
और अगर मौत मेरे लिए बेहतर है तो मुझे वफ़ात दे
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ خَشْيَتَكَ فِي السِّرِّ وَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका ख़शियतका फ़िस्सिर्रि
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तन्हाई में तेरा ख़ौफ़ माँगता हूँ
الْعَلَانِيَةِ وَ كَلِمَةَ الْحَقِّ فِي الْغَضَبِ
वल-अलानियति व कलिमतल-हक़्क़ि फ़िल-ग़ज़ब
और खुले में भी, और ग़ुस्से में भी हक़ कहने की तौफ़ीक़ दे
وَ الرِّضَا وَ الْقَصْدَ فِي الْفَقْرِ والْغِنٰىَ
वर्रिज़ा वल-क़स्द फ़िल-फ़क़्र वल-ग़िना
और ख़ुशी व नाराज़गी दोनों में, ग़रीबी और अमीरी में एतिदाल अता फ़रमा
. وَ اَسْاَلُكَ نَعِيْمًا لَا يَنْفَدُ وَ قُرَّةَ عَيْنٍ لَا
व असअलुका नअीमन ला यन्फ़द व क़ुर्रत अइन ला
और मैं तुझसे ऐसी नेअमत माँगता हूँ जो कभी ख़त्म न हो, और आँखों की ठंडक जो
يَنْقَطِعُ. وَ اَسْاَلُكَ الرِّضَا بِالْقَضَاءِ وَ بَرَكَةَ الْمَوْتِ بَعْدَ الْعَيْشِ
यन्क़तिउ व असअलुका र्रिज़ा बिल-क़ज़ा व बरकतल-मौत बादल-अयश
कभी कट न जाए, और तेरे फ़ैसले पर राज़ी रहना, और ज़िंदगी के बाद मौत की बरकत
وَ بَرْدَ الْعَيْشِ بَعْدَ الْمَوْتِ وَ لَذَّةَ النَّظَرِ
व बरदल-अयश बादल-मौत व लज़्ज़तन-नज़र
और मौत के बाद आराम की ज़िंदगी, और तेरा दीदार करने की लज़्ज़त
اِلٰى وَجْهِكَ وَ شَوْقًا اِلٰى رُؤْيَتِكَ وَ لِقَائِكَ
इला वज्हिका व शौक़न इला रुइयतिका व लिक़ाइका
और तेरे चेहरे की तरफ़ देखने का शौक़, और तुझसे मिलने की तमन्ना
مِنْ غَيْرِ ضَرَّاءَ مُضِرَّةٍ وَ لَا فِتْنَةٍ مَضِلَّةٍ. اَللّٰهُمَّ زَيِّنَّا بِزِيْنَةِ الْاِيْمَانِ
मिन ग़ैरि दर्रा मुदिर्रह व ला फ़ित्नति मुदिल्लह। अल्लाहुम्मा ज़य्यिन्ना बिज़ीनतिल-ईमान
बिना किसी नुक़सानदेह मुसीबत और गुमराह करने वाले फ़ितने के। ऐ अल्लाह! हमें ईमान की ज़ीनत से सजा दे
وَ اجْعَلْنَا هُدَاةً مَهْدِيِّيْنَ. اَللّٰهُمَّ اهْدِنَا فِيْمَنْ هَدَيْتَ. اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ عَزِيْمَةَ الرَّشَادِ
व अजअलना हुदातन महदिय्यीन। अल्लाहुम्महिदना फ़ीमन हदैत। अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका अज़ीमतल-रशाद
और हमें हिदायत देने वाले और हिदायत पाए हुए बना। ऐ अल्लाह! हमें भी उन्हीं में हिदायत दे जिन्हें तूने हिदायत दी, और सही रास्ते पर चलने का पुख़्ता इरादा अता फ़रमा
وَ الثَّبَاتَ فِي الْاَمْرِ وَ الرُّشْدِ. وَ اَسْاَلُكَ شُكْرَ نِعَمِكَ
वस्सबात फ़िल-अम्र व र्रुश्द। व असअलुका शुक्र नि‘मिक
और दीन पर साबित क़दम रख, और तेरी नेअमतों का शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ दे
وَ حُسْنَ عَافِيَتِكَ وَ اَدَاءَ حَقِّكَ. وَ اَسْاَلُكَ
व हुस्न आफ़ियतिका व अदा-ए-हक़्क़िक। व असअलुका
और अच्छी सेहत और तेरा हक़ अदा करने की क़ुदरत अता फ़रमा
يَا رَبِّ قَلْبًا سَلِيْمًا وَ لِسَانًا صَادِقًا وَ اَسْتَغْفِرُكَ لِمَا
या रब्बि क़ल्बन सलीमन व लिसानन सादिक़न व अस्तग़फ़िरुका लिमा
ऐ रब! मुझे पाक दिल और सच्ची ज़बान अता फ़रमा, और जिन बातों को तू जानता है उनके लिए
تَعْلَمُ وَ اَسْاَلُكَ خَيْرَ مَا تَعْلَمُ وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ
तअलमु व असअलुका ख़ैर मा तअलमु व अऊज़ु बिका मिन
मैं तुझसे मग़फ़िरत चाहता हूँ, और जो तू बेहतर जानता है उसका सवाल करता हूँ, और तुझसे पनाह चाहता हूँ
شَرِّ مَا تَعْلَمُ فَاِنَّكَ تَعْلَمُ وَ لَا نَعْلَمُ وَ اَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوْبِ.
शर्रि मा तअलमु फ़इन्नका तअलमु व ला नअलमु व अन्त अल्लामुल-ग़ुयूब
उस बुराई से जिससे तू वाक़िफ़ है, क्योंकि तू जानता है और हम नहीं जानते, और तू ग़ैबों का जानने वाला है

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चौबीसवाँ: 24. फ़ज्र की नाफ़िला के बाद की दुआ
60. अल-जाफ़रिय्यात में जाफ़र इब्न मुहम्मद (अ.) से, अपने आबा (अ.) से, इमाम अली (अ.) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) सुबह की नमाज़ से पहले दो रकअत नाफ़िला पढ़ लेते, तो दाईं करवट लेटते, दाहिना हाथ दाहिने गाल के नीचे रखते और फ़रमाते:
اِسْتَمْسَكْتُ بِعُرْوَةِ اللهِ الْوُثْقٰى الَّتِيْ لَا انْفِصَامَ
इस्तमसक्तु बि उर्वतिल्लाहिल वुस्क़ा अल्लती ला इन्फ़िसाम
मैंने अल्लाह की सबसे मज़बूत पकड़ को थाम लिया है जो कभी टूटने वाली नहीं
لَهَا وَ اسْتَعْصَمْتُ بِحَبْلِ اللهِ الْمَتِيْنِ.
लहा व इस्तअ़सम्तु बि हबलिल्लाहिल मतीन
और मैंने अल्लाह की मज़बूत रस्सी को थाम लिया है
اَعُوْذُ بِاللهِ مِنْ فَوْرَةِ الْعَرَبِ وَ الْعَجَمِ وَ اَعُوْذُ بِاللهِ مِنْ
अऊज़ु बिल्लाहि मिन फ़ौरतिल अरबि वल अजमि व अऊज़ु बिल्लाहि मिन
मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ अरब और अजम की सरकशी से, और अल्लाह की पनाह चाहता हूँ
شَرِّ شَيَاطِيْنِ الْاِنْسِ وَ الْجِنِّ. تَوَكَّلْتُ عَلَى اللهِ طَلَبْتُ
शर्रि शयातीनिल इंसि वल जिन्नि। तवक्कल्तु अलल्लाहि तलब्तु
इंसानों और जिन्नों के शैतानों की बुराई से। मैंने अल्लाह पर भरोसा किया और माँगा
حَاجَتِيْ مِنَ اللهِ حَسْبِيَ اللهُ وَ نِعْمَ الْوَكِيْلُ
हाजती मिनल्लाहि हस्बियल्लाहु व नि‘मल वकील
अपनी ज़रूरत अल्लाह से। अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है और वही सबसे बेहतर कारसाज़ है
َا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيْمِ.
ला हौल व ला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम
कोई ताक़त और क़ुव्वत नहीं मगर अल्लाह बुलंद व अज़ीम के सिवा

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पच्चीसवाँ: 25. फ़ज्र की नमाज़ के बाद की दुआ
61. मुफ़ीदुद्दीन की अल-मजालिस में अबू बरज़ा अल-असलमी अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) फ़ज्र की नमाज़ अदा कर लेते तो आवाज़ बुलंद करके तीन बार फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ اَصْلِحْ لِيْ دِيْنِيَ الَّذِيْ جَعَلْتَهٗ لِيْ عِصْمَةً.
अल्लाहुम्मा असलिह ली दीनी अल्लज़ी जअल्तहु ली इस्मतं
ऐ अल्लाह! मेरे दीन को दुरुस्त फ़रमा जिसे तूने मेरे लिए हिफ़ाज़त बनाया है
फिर तीन बार:
اَللّٰهُمَّ اَصْلِحْ لِي دُنْيَايَ الَّتِيْ جَعَلْتَ فِيْهَا مَعَاشِيْ.
अल्लाहुम्मा असलिह ली दुनियाया अल्लती जअल्ता फ़ीहा मआशी
ऐ अल्लाह! मेरी दुनिया को दुरुस्त फ़रमा जिसमें तूने मेरी रोज़ी रखी है
फिर तीन बार:
اَللّٰهُمَّ اَصْلِحْ لِيْ آخِرَتِيَ الَّتِيْ جَعَلْتَ اِلَيْهَا مَرْجَعِيْ.
अल्लाहुम्मा असलिह ली आख़िरती अल्लती जअल्ता इलैहा मरजिई
ऐ अल्लाह! मेरी आख़िरत को दुरुस्त फ़रमा जिसकी तरफ़ मेरी वापसी है
फिर तीन बार:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ وَ اَعُوْذُ بِعَفْوِكَ مِنْ نِقْمَتِكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिरिज़ाका मिन सख़तिका व अऊज़ु बिअफ़्विका मिन निक़मतिका
ऐ अल्लाह! मैं तेरी रज़ा के वसीले से तेरे ग़ज़ब से पनाह चाहता हूँ और तेरी माफ़ी के वसीले से तेरी सज़ा से
फिर फ़रमाया:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ لَا مَانِعَ لِمَا اَعْطَيْتَ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका ला मानिअ लिमा आतैत
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ, जिसे तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं
وَ لَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ وَ لَا يَنْفَعُ ذَا الْجَدِّ مِنْكَ الْجَدُّ.
व ला मुअती लिमा मनअत व ला यन्फ़उ ज़ल-जद्दि मिनकल-जद्द
और जिसे तू रोक ले उसे कोई देने वाला नहीं, और तेरे बग़ैर किसी की कोशिश कामयाब नहीं होती
62. क़ुत्ब की दआवात में है कि फ़ज्र की नमाज़ के बाद रसूलुल्लाह (स.अ.व.) फ़रमाते:
اَللّٰهُمَّ مَتِّعْنِيْ بِسَمْعِيْ وَ بَصَرِيْ
अल्लाहुम्मा मत्तिअनी बिसम्ई व बसरी
ऐ अल्लाह! मेरी सुनने और देखने की ताक़त को मेरे लिए क़ायम रख
اجْعَلْهُمَا الْوَارِثَيْنِ مِنِّيْ وَ اَرِنِيْ ثَارِيْ مِنْ عَدُوِّيْ.وَ
वजअल्हुमा अल-वारिसैन मिन्नी व अरिनी थारी मिन अदूव्वी
और इन्हें मेरी ज़िंदगी के आख़िर तक बाक़ी रख, और मुझे मेरे दुश्मनों पर ग़लबा दिखा

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छब्बीसवाँ: फ़ज्र की नमाज़ के बाद का ज़िक्र
सैय्यद इब्न ताऊस की किताब अल-इक़बाल में जाफ़र बिन मुहम्मद (अ.) अपने वालिद (अ.) से एक हदीस में रिवायत करते हैं:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) सुबह की नमाज़ मुकम्मल कर लेते, तो सूरज निकलने तक क़िब्ला की तरफ़ रुख़ करके अल्लाह तआला का ज़िक्र करते रहते। इसी दौरान अली इब्न अबी तालिब (अ.) आगे बढ़कर रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के पीछे बैठते और लोग अपनी ज़रूरतें पेश करने की इजाज़त मांगते, और यही वह अमल था जिसकी नबी-ए-ख़ुदा (स.अ.व.) ने उन्हें तालीम दी थी।

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सत्ताईसवाँ: 27. ज़ुहर की नमाज़ के बाद की दुआ
64. सैय्यद इब्न ताऊस अल-इक़बाल में रिवायत करते हैं, इमाम अल-हादी (अ.) अपने आबा से, वह अबू अब्दिल्लाह (अ.) से, वह अमीरुल मोमिनीन (अ.) से और वह रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से:
ज़ुहर की नमाज़ के बाद रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की दुआओं में से यह दुआ थी: 
لَا اِلٰـهَ اِلَّا اللهُ الْعَظِيْمُ الْحَلِيْم
ला इलाहा इल्लल्लाहुल अज़ीमुल हलीम
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, जो अज़ीम और हलीम है
الْعَرْشِ الْعَظِيْم لَا اِلٰـهَ اِلَّا اللهُ رَبُّ
लिल अर्शिल अज़ीम, ला इलाहा इल्लल्लाहु रब्बु
अज़ीम अर्श का रब, अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं
وَ الْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن
वल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन
और तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं जो तमाम जहानों का रब है
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ مُوْجِبَاتِ رَحْمَتِك
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका मूजिबाति रहमतिका
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी रहमत को वाजिब करने वाली चीज़ें माँगता हूँ
وَ عَزَآئِمَ مَغْفِرَتِكَ
व अज़ाइम मग़फ़िरतिका
और तेरी मग़फ़िरत को यक़ीनी बनाने वाले असबाब
وَ الْغَنِيْمَةَ مِنْ كُلِّ خَيْرٍ
वल ग़नीमत मिन कुल्लि ख़ैर
और हर भलाई से फ़ायदा
وَ السَّلاَمَةَ مِنْ كُلِّ اِثْم
वस्सलामत मिन कुल्लि इस्म
और हर गुनाह से सलामती
اَللّٰهُمَّ لَا تَدَعْ لِيْ ذَنْبًا اِلَّا غَفَرْتَه
अल्लाहुम्मा ला तदअ ली ज़ंबन इल्ला ग़फ़रतहू
ऐ अल्लाह! मेरा कोई गुनाह बाक़ी न छोड़ मगर उसे माफ़ फ़रमा
وَ لَا هَمًّا اِلَّا فَرَّجْتَه
व ला हम्मन इल्ला फ़र्रजतहू
और कोई ग़म न छोड़ मगर उसे दूर कर दे
وَ لَا سُقْمًا اِلَّا شَفَيْتَهٗ
व ला सुक़्मन इल्ला शफ़ैतहू
और कोई बीमारी न छोड़ मगर उसे शिफ़ा अता फ़रमा
وَ لَا عَيْبًا اِلَّا سَتَرْتَه
व ला ऐबन इल्ला सतर्तहू
और कोई ऐब न छोड़ मगर उसे ढाँप दे
وَ لَا رِزْقًا اِلَّا بَسَطْتَه
व ला रिज़्क़न इल्ला बसतहू
और कोई रिज़्क़ न छोड़ मगर उसे वसीअ कर दे
وَ لَا خَوْفاً اِلَّا آمَنْتَه
व ला ख़ौफ़न इल्ला आमंतहू
और कोई डर न छोड़ मगर उससे अम्न अता फ़रमा
وَ لَا دَيْنًا اِلَّا قَضَيْتَه
व ला दैनन इल्ला क़ज़ैतहू
और कोई क़र्ज़ न छोड़ मगर उसे अदा करवा दे
وَ لَا سُوْءًا اِلَّا صَرَفْتَه
व ला सूअन इल्ला सरफ़तहू
और कोई बुराई न छोड़ मगर उसे दूर कर दे
وَ لَا حَاجَةً هِيَ لَكَ رِضًا
व ला हाजतन हिया लका रिद़न
और मेरी कोई ऐसी ज़रूरत जो तेरी रज़ा में हो
وَ لِيَ فِيْهَا صَلاَحٌ اِلَّا قَضَيْتَهَا
व लिय फ़ीहा सलाहुन इल्ला क़ज़ैतहा
और जिसमें मेरे लिए भलाई हो, मगर उसे पूरा फ़रमा दे
يَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ اٰمِيْنَ رَبَّ الْعَالَمِيْنَ.
या अरहमर राहिमीन, आमीन रब्बल आलमीन
ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले! क़बूल फ़रमा, ऐ रब्बुल आलमीन

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अट्ठाईसवाँ: 28. सजदे में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की दुआ
65. अल-बिहार में रिवायत है, अब्दुल्लाह बिन सिनान, अबी अब्दिल्लाह (अ.) से:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) सजदे के लिए अपना चेहरा ज़मीन पर रखते, तो यह फरमाते:
اَللّٰهُمَّ مَغْفِرَتُكَ اَوْسَعُ مِنْ ذُنُوْبِي
अल्लाहुम्मा मग़फ़िरतुका औसअु मिन ज़ुनूबी
ऐ अल्लाह! तेरी मग़फ़िरत मेरे गुनाहों से कहीं ज़्यादा वसीअ है
وَ رَحْمَتُكَ اَرْجٰي عِنْدِيْ مِنْ عَمَلِيْ
व रहमतुका अरजा इंदी मिन अमली
और मुझे अपने अमल से ज़्यादा तेरी रहमत की उम्मीद है
فَاغْفِرْ لِيْ ذُنُوْبِيْ يَا حَيًّا لَا يَمُوْتُ.
फ़ग़फ़िर ली ज़ुनूबी या हय्यन ला यमूत
पस मेरे गुनाह माफ़ फ़रमा, ऐ हमेशा ज़िन्दा रहने वाले, जो कभी नहीं मरता

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उनतीसवाँ: 29. नमाज़ मुकम्मल करने के बाद जाने की दुआ
66. अल-जाफ़रिय्यात में जाफ़र बिन मुहम्मद (अ.) अपने आबा से, वह इमाम अली (अ.) से रिवायत करते हैं:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) नमाज़ मुकम्मल करने के बाद उठना चाहते, तो अपने दाहिने हाथ को पेशानी पर फेरते और फरमाते:
اَللّٰهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ لَا اِلٰہَ اِلَّا اَنْتَ
अल्लाहुम्मा लक अल-हम्दु ला इलाहा इल्ला अन्त
ऐ अल्लाह! तमाम हम्द तेरे लिए है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं
عَالِمُ الْغَیْبِ وَ الشَّہَادَۃِ
आलिमुल ग़ैबि वश्शहादह
तू ग़ैब और ज़ाहिर का जानने वाला है
اَللّٰہُمَّ اذْہِبْ عَنَّا الْہَمّوَ الْحُزْنَ وَ الْفِتَن
अल्लाहुम्मज़हिब अन्नल हम्म वल हुज़्न वल फ़ितन
ऐ अल्लाह! हमसे हर ग़म, रंज और आज़माइशें दूर कर दे
مَا ظَہَرَ مِنْہَا وَ مَا بَطَنَ
मा ज़हरा मिन्हा व मा बतन
चाहे वह ज़ाहिर हों या पोशीदा
और रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया: मेरी उम्मत में जो भी यह दुआ पढ़ेगा, अल्लाह तआला उसे वह अता करेगा जो उसने माँगा है।

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तीसवाँ: 30. नमाज़ के बाद की दुआ
67. कंज़ अल-कराजकी में अनस से रिवायत है कि नमाज़ के बाद रसूलुल्लाह (स.अ.व.) यह दुआ फरमाते थे:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ َ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ
مِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَع<
मिन इल्मिन ला यनफ़अ
ऐसे इल्म से जो न फ़ायदा दे
وَ قَلْبٍ لَا يَخْشَعُ وَ
व क़ल्बिन ला यख़्शअ
और ऐसे दिल से जिसमें ख़ुशूअ न हो
لَا تَشْبَعُ وَ دُعَاءٍ لَا يُسْمَع وَ نَفْسٍ
ला तश्बअु व दुआइन ला युस्मअ
और ऐसी नफ़्स से जो सैर न हो, और ऐसी दुआ से जो क़बूल न हो
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ هٰؤُلَاءِ الْاَرْبَعِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन हाउलाइ-अल-अर्बअ
ऐ अल्लाह! मैं इन चारों से तेरी पनाह चाहता हूँ

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इकतीसवाँ: 31. नए साल की शुरुआत में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की नमाज़ और दुआ
68. सय्यिद इब्न ताऊस अल-इक़बाल में रिवायत करते हैं, मुहम्मद बिन अल-फ़ुज़ैल अस-सैरफ़ी से, जिन्होंने कहा: यह रिवायत हम तक अली बिन मूसा अर-रज़ा (अ.) से पहुँची, अपने वालिद से, अपने दादा से, अपने आबा से, जिन्होंने फरमाया:
मुहर्रम की पहली तारीख़ को रसूलुल्लाह (स.अ.व.) दो रकअत नमाज़ अदा करते, फिर अपने हाथ उठाकर तीन बार इस दुआ को पढ़ते:
اَللّٰهُمَّ اَنْتَ الْاِلٰهُ الْقَدِيْمُ
अल्लाहुम्मा अन्तल-इलाहुल-क़दीम
ऐ अल्लाह! तू ही क़दीमी और अबदी माबूद है
وَ هٰذِهٖ سَنَةٌ جَدِيْدَةٌ
व हाज़िही सनतुन जदीदह
और यह एक नया साल है
فَاَسْاَلُكَ فِيْهَا الْعِصْمَة
फ़-असअलुका फ़ीहा अल-इस्मत
तो मैं इसमें तुझसे हिफ़ाज़त चाहता हूँ
مِنَ الشَّيْطَانِ
मिनश्शैतान
शैतान से
وَ الْقُوَّةَ عَلٰى هٰذِهِالنَّفْسِ الْاَمَّارَةِ بِالسُّوْءِ
वल-क़ुव्वता अला हाज़िहिन-नफ़्सिल-अम्मारति बिस्सूअ
और इस नफ़्से-अम्मारा पर क़ाबू पाने की ताक़त, जो बुराई की तरफ़ उकसाती है
وَ الْاِشْتِغَالَ بِمَا يُقَرِّبُنِيْ اِلَيْكَ
वल-इश्तिघ़ाल बिमा युक़र्रिबुनी इलैक
और मुझे उन कामों में मशग़ूल रख जो मुझे तेरे क़रीब कर दें
يَا كَرِيْمُ يَا ذَا الْجَلَالوَ الْاِكْرامِ
या करीम या ज़ल-जलाल वल-इकराम
ऐ करीम! ऐ जलाल और इकराम वाले!
يَا عِمَادَ مَنْلَا عِمَادَ لَهٗ
या इमाद मन ला इमाद लहू
ऐ उसके सहारे! जिसका कोई सहारा नहीं
يَا ذَخِيْرَةَ مَنلَا ذَخِيْرَةَ لَهٗ
या ज़खीरा मन ला ज़खीरा लहू
ऐ उसके ख़ज़ाने! जिसका कोई ख़ज़ाना नहीं
يَا حِرْزَ مَنْلَا حِرْزَ لَهٗ
या हिर्ज़ा मन ला हिर्ज़ा लहू
ऐ उसके हिफ़ाज़त करने वाले! जिसकी कोई हिफ़ाज़त नहीं
يَا غِيَاثَ مَنْلَا غِيَاثَ لَهٗ
या ग़ियास मन ला ग़ियास लहू
ऐ फ़रियादरस! जिसकी कोई फ़रियादरस नहीं
يَا سَنَدَ مَنلَا سَنَدَ لَه
या सनद मन ला सनद लहू
ऐ उसके सहायक! जिसका कोई सहायक नहीं
يَا كَنْزَ مَنْلَا كَنْزَ لَهٗ
या कन्ज़ा मन ला कन्ज़ा लहू
ऐ उसके ख़ज़ाने! जिसका कोई ख़ज़ाना नहीं
يَا حَسَنَ الْبَلَاءيَا عَظِيْمَ الرَّجَاءِ
या हसनल-बला या अज़ीमर-रजा
ऐ अच्छी आज़माइश देने वाले! ऐ बड़ी उम्मीदों के मालिक!
يَا مُنْقِذَ الْغَرْقٰىيَا عِزَّ الضُّعَفَاءِ
या मुन्क़िज़ल-ग़र्क़ा या इज़्ज़ज़-ज़ुअफ़ा
ऐ डूबने वालों को बचाने वाले! ऐ कमज़ोरों की इज़्ज़त!
يَا مُنْجِيَ الْهَلْكٰى يَا مُنْعِم
या मुनजिल-हल्का या मुनइम
ऐ तबाह होने वालों को निजात देने वाले! ऐ नेमतें देने वाले!
يَا مُجْمِلُ يَا مُفْضِلُ يَا مُحْسِنُ اَنْتَ الَّذِي
या मुजमिलु या मुफ़ज़िलु या मुहसिनु अन्तल-लज़ी
ऐ सजाने वाले! ऐ फ़ज़्ल करने वाले! ऐ एहसान करने वाले! तू ही वह है
سَجَدَ لَكَ سَوَادُ اللَّيْل
सजदा लका सवादुल-लैल
जिसके आगे रात की तारीकी सजदा करती है
وَ نُوْرُ النَّهَاوَ ضَوْءُ الْقَمَرر
व नूरुन-नहार व ज़ौउल-क़मर
और दिन की रोशनी, और चाँद की चमक
وَ شُعَاعُ الشَّمْسِ وَ دَوِيُّ الْمَاءِ
व शुआउश-शम्स व दविय्युल-माअ
और सूरज की किरणें, और पानी की आवाज़
وَ حَفِيْفُ الشَّجَرِيَا اَللهُ
व हफ़ीफ़ुश-शजर या अल्लाह
और दरख़्तों की सरसराहट; ऐ अल्लाह!
لَا شَرِيْكَ لَكَاَللّٰهُمَّ اجْعَلْنَا خَيْرًامِمَّا يَظُنُّوْنَ
ला शरीका लक अल्लाहुम्मज-अल्ना ख़ैरन मिम्मा यज़ुन्नून
तेरा कोई शरीक नहीं। ऐ अल्लाह! हमें वैसा बना दे जैसा लोग हमारे बारे में अच्छा गुमान रखते हैं
وَ اغْفِرْ لَنَا مَالَا يَعْلَمُوْنَ حَسْبِيَ اللهُ
वग़फ़िर लना मा ला यअलमून हसबियल्लाह
और हमारे वे गुनाह माफ़ कर दे जिन्हें वे नहीं जानते; अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है
لَا اِلٰهَ اِلَّا هُوعَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ
ला इलाहा इल्ला हुआ अलैहि तवक्कल्तु
उसके सिवा कोई माबूद नहीं, उसी पर मैंने भरोसा किया
وَ هُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيْمِ
व हुआ रब्बुल-अर्शिल-अज़ीम
और वही अर्शे-अज़ीम का रब है
مِنْ عِنْدِ رَبِّنَا آمَنَّا بِهٖ كُلّ
मिन इन्दि रब्बिना आमन्ना बिही कुल्लुन
सब कुछ हमारे रब की तरफ़ से है, हम उस पर ईमान लाए
وَ مَا يَذَّكَّراِلَّا اُوْلُوْا الْاَلْبَابِ رَبَّنَا
व मा यज़्ज़क्करु इल्ला उलुल-अल्बाब रब्बना
और नसीहत वही हासिल करते हैं जो अक़्ल वाले हैं। ऐ हमारे रब!
لَا تُزِغْ قُلُوْبَنَا وَ هَبْ لَنَا
ला तुज़िघ़ क़ुलूबना व हब लना
हमारे दिलों को टेढ़ा न कर
مِنْ لَدُنْكَ رَحْمَةاِنَّكَ اَنْتَ الْوَهَّابُ.
मिन लदुनका रहमतन इन्नका अन्तल-वह्हाब
और अपनी तरफ़ से हमें रहमत अता फ़रमा, बेशक तू ही बहुत देने वाला है

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बत्तीसवाँ: 32. शबे पंद्रहवीं शाबान की रात की दुआ
69. सय्यिद इब्न ताऊस अल-इक़बाल में बयान करते हैं: शबे पंद्रहवीं शाबान की रात किए जाने वाले आमाल में से यह भी है… और रसूलुल्लाह (स.अ.व.) इस रात दुआ फरमाते और यह कहते थे:
اَللّٰهُمَّ اقْسِمْ لَنَا مِنْ خَشْيَتِك
अल्लाहुम्मा इक़्सिम लना मिन ख़शयतिक
ऐ अल्लाह! हमें अपनी ख़ौफ़ से इतना हिस्सा अता फ़रमा
وَ بَيْنَ مَعْصِيَتِكَ ما يَحُوْلُ بَيْنَنَا
व बैन मा‘सियतिका मा यहूलु बैनना
जो हमें तेरी नाफ़रमानी से रोक दे
مَا تُبَلِّغُنَا بِهٖ رِضْوانَك وَ مِنْ طاعَتِك
व मिन ताअतिक मा तुबल्लिग़ुना बिही रिज़वानक
और हमें इतनी इताअत अता कर जिससे हम तेरी रज़ा तक पहुँच जाएँ
بِهٖ مُصِيْبَاتِ الدُّنْيَا ما يَهُوْنُ عَلَيْنَا وَ مِنَ الْيَقِيْن
व मिनल यक़ीनी मा यहूनु अलैना बिही मुसीबातिद-दुन्या
और इतना यक़ीन अता कर जिससे दुनिया की मुसीबतें हमारे लिए आसान हो जाएँ
اَللّٰهُمَّ مَتِّعْنَا بِاَسْمَاعِنَاوَ اَبْصَارِنَا وَ قُوَّتِنَا
अल्लाहुम्मा मत्तिअना बि-अस्माइना व अबसारिना व क़ुव्वतिना
ऐ अल्लाह! हमें हमारी सुनने, देखने और ताक़त से फ़ायदा उठाने दे
وَ اجْعَلْهُ الْوَارِثَ مِنَّا مَا اَحْيَيْتَنَا
वज्अलहुल-वारिस मिन्ना मा अहयैतना
और जब तक तू हमें ज़िन्दा रखे, इन्हें हमारे साथ बाक़ी रख
مَنْ ظَلَمَنَا وَ انْصُرْنَا وَ اجْعَلْ ثَارَنَا عَلٰى
वज्अल थारना अला मन ज़लमना वन्सुरना
और जिन्होंने हम पर ज़ुल्म किया उनसे बदला ले, और हमारी मदद फ़रमा
وَ لَا تَجْعَلْ عَلٰى مَنْ عَادَانَا
व ला तज्अल अला मन आदाना
और हमारे दुश्मनों को हम पर ग़ालिब न कर
مُصِيْبَتَنَا فِيْ دِيْنِنَا
मुसीबतना फ़ी दीनिना
और हमारे दीन में हमें किसी मुसीबत में न डाल
وَ لَا تَجْعَلِ الدُّنْيَا اَكْبَرَ هَمِّنَا
व ला तज्अलिद-दुन्या अकबरा हम्मिना
और दुनिया को हमारा सबसे बड़ा ग़म न बना
وَ لَا مَبْلَغَ عِلْمِنَاوَ لَا تُسَلِّطْ عَلَيْنَا
व ला मबलग़ा इल्मिना व ला तुसल्लित अलैना
और न ही हमारी समझ की आख़िरी हद बना
مَنْ لا يَرْحَمُنَا بِرَحْمَتِك
मन ला यरहमुना बिरहमतिका
और हम पर ऐसे किसी को मुसल्लत न कर जो हम पर रहम न करे
يا اَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ.
या अरहमर-राहिमीन
ऐ सबसे बढ़कर रहम करने वाले!
70. अल-इक़बाल में बयान हुआ है, अबी जाफ़र तूसि के हवाले से, रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की एक बीवी से कि उन्होंने कहा: “उस रात जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मेरे साथ थे, आप नर्मी से चादर से उठे ताकि मुझे न जगाएँ, मगर मैंने देख लिया…’’
اَصْبَحْتُ اِلَيْكَ فَقِيْرًا خَائِفًا مُسْتَجِيْرًا
असबहतु इलैका फ़क़ीरन ख़ाइफ़न मुस्तजीरन
मैं तेरी बारगाह में फ़क़ीर, डरा हुआ और पनाह माँगता हुआ आया हूँ
فَلَا تُبَدِّلْ اِسْمِيْ وَ لَا تُغَيِّرْ جِسْمِيْ
फ़ला तुबद्दिल इस्मी व ला तुघय्यिर जिस्मी
तो मेरी हालत न बदल और मेरे जिस्म को न बदल
وَ لَا تَجْتَهِدْ بَلَائِيْ وَ اغْفِرْلِيْ
व ला तज्तहिद बलाइ वग़फ़िर ली
और मेरी आज़माइश सख़्त न कर, और मुझे माफ़ फ़रमा
سَجَدَ لَكَ سَوَادِيْ وَ خَيَالِيْوَ آمَنَ بِذٰلِكَ فُؤَادِيْ
सजदा लका सवाड़ी व ख़याली व आमना बिज़ालिका फ़ुआदी
मेरा जिस्म और मेरी सोच तेरे आगे सजदे में है और इससे मेरा दिल ईमान लाया
وَ هٰذِهٖ يَدَايَ بِمَا جَنَيْتُ
व हाज़िहि यदाया बिमा जनैतु
और ये मेरे हाथ हैं जिनसे मैंने
عَلٰى نَفْسِيْ يَا عَظِيْمُ
अला नफ़्सी या अज़ीम
अपनी ही जान पर ज़ुल्म किया, ऐ अज़ीम!
يُرْجٰى لِكُلِّ عَظِيْمٍ اِغْفِرْ لِيْ ذَنْبِيَ الْعَظِيْمَ فَاِنَّهٗ
युर्जा लिकुल्लि अज़ीम इग़फ़िर ली ज़म्बियल-अज़ीम फ़इन्नहू
जिससे हर बड़ी उम्मीद की जाती है, मेरे बड़े गुनाह को माफ़ कर दे
لَا يَغْفِرُ الذَّنْبَ الْعَظِيْمَ اِلَّا الْعَظِيْمُ
ला यग़फ़िरुज़-ज़म्बल-अज़ीम इल्लल-अज़ीम
क्योंकि बड़े गुनाह को बड़े के सिवा कोई माफ़ नहीं करता
फिर उन्होंने (स.अ.व.) अपना सिर उठाया और तीसरी बार सज्दा किया और मैंने उन्हें यह कहते सुना:
اَعُوْذُ بِعَفْوِكَ مِنْ عِقَابِكَ
आऊज़ु बि-अफ़्विका मिन इ़क़ाबिका
मैं तेरी माफ़ी की पनाह माँगता हूँ तेरे अज़ाब से
وَ اَعُوْذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ
व आऊज़ु बिरिज़ाका मिन सख़तिका
और तेरी रज़ा की पनाह माँगता हूँ तेरे ग़ज़ब से
وَ اَعُوْذُ بِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقُوْبَتِكَ
व आऊज़ु बि-मुआफ़ातिका मिन उ़क़ूबतिका
और तेरी आफ़ियत की पनाह माँगता हूँ तेरी सज़ा से
وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْكَ اَنْتَ
व आऊज़ु बिका मिंका अंता
और मैं तेरी ही पनाह माँगता हूँ तुझसे
كَمَا اَثْنَيْتَ عَلٰى نَفْسِكَ
कमा असनैता अला नफ़्सिका
तू वैसा ही है जैसा तूने खुद अपनी तारीफ़ बयान की है
وَ فَوْقَ مَا يَقُوْلُ الْقَائِلُوْنَ
व फ़ौक़ा मा यक़ूलुल क़ाइलून
और उससे भी बढ़कर जो कहने वाले कहते हैं
फिर उन्होंने (स.अ.व.) अपना सिर उठाया और चौथी बार सज्दा किया और कहा:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِنُوْرِ
अल्लाहुम्मा इन्नी आऊज़ु बिनूरी
ऐ अल्लाह! मैं तेरे नूर की पनाह माँगता हूँ
وَجْهِكَ الَّذِيْ اَشْرَقَتْ لَهُ السَّمَاوَاتُ
वज्हिका अल्लज़ी अश्रक़त लहुस्समावातु
तेरे चेहरे के उस नूर की जिससे आसमान रौशन हो गए
وَ الْاَرْضُ وَ قَشَعَتْ بِهِ الظُّلُمَاتُ
वल-अर्ज़ु व क़शअत बिहिज़्-ज़ुलुमातु
और ज़मीन भी, और जिससे अंधेरे दूर हो गए
وَ صَلُحَ بِهٖ اَمْرُ الْاَوَّلِيْنَ
व सलुहा बिही अमरुल-अव्वलीन
और जिससे पहले लोगों के मामले सुधर गए
وَ الْآخِرِيْنَ اَنْ يَحِلَّ عَلَيّ
वल-आख़िरीन अन यहिल्ला अलैय्य
और बाद वालों के भी, कि मुझ पर
غَضَبُكَ اَوْ يُنْزِلَ عَلَيَّ سَخَطُكَ
ग़ज़बुका अव युन्ज़िला अलैय्य सख़तुक
तेरा ग़ज़ब न उतर आए या तेरा सख़्त कोप न आ जाए
اَعُوْذُ مِنْ زَوَالِ نِعْمَتِكَ وَ فَجْأَةِ نِقْمَتِكَ
आऊज़ु मिन ज़वालि नेमतिका व फ़ज्अति निक़मतिका
मैं तेरी नेमत के छिन जाने और तेरे अचानक अज़ाब से पनाह माँगता हूँ
وَ تَحْوِيْلِ عَافِيَتِكَ وَ جَمِيْعِ سَخَطِكَ
व तह्वीली आफ़ियतिका व जमीई सख़तिका
और तेरी दी हुई आफ़ियत के बदल जाने और तेरी हर नाराज़गी से
لَكَ الْعُتْبٰى فِيْمَا اسْتَطَعْتُ
लक़ल उ़त्बा फीमा इस्तताअतु
जहाँ तक मुझसे बन पड़े, मैं तुझसे माफ़ी चाहता हूँ
وَ لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِكَ
व ला हौल व ला क़ुव्वता इल्ला बिका
और कोई ताक़त और क़ुदरत नहीं मगर तेरी ही तौफ़ीक़ से
वह आगे बयान करती हैं: “जब मैंने यह हाल देखा तो मैं उन्हें छोड़कर घर की तरफ़ चल पड़ी, क्योंकि मेरे दिल में बेचैनी पैदा हो गई थी। फिर रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मेरे पीछे आए और पूछा: ‘तुम परेशान क्यों हो?’ मैंने कहा: ‘मैं तो आपके साथ थी ऐ रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व.)।’ आप (स.अ.व.) ने फ़रमाया:
‘क्या तुम जानती हो यह कौन-सी रात है? यह शाबान की बीच की रात है। इस रात आमाल मुक़र्रर किए जाते हैं, रिज़्क़ तक़सीम किया जाता है और उम्रें तय की जाती हैं। और अल्लाह हर एक को माफ़ कर देता है सिवाय मुशरिक के, खुले दुश्मन के, रिश्ते तोड़ने वाले के, नशा करने वाले के, गुनाह पर ज़िद करने वाले के, और बेहूदा शायर या काहिन के।’
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तैंतीसवाँ: 33. नया चाँद देखने पर की जाने वाली दुआ
71. शैख़ तूसी ने अल-अमाली में बयान किया: मुहम्मद इब्न हनफ़िय्या से, इमाम अली (अ.स.) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) नया चाँद देखते, तो अपने हाथ उठाते और फरमाते:
بِسْمِ اللهِ اَللّٰهُمَّ اَهِلَّهٗ عَلَيْنَا ِ
बिस्मिल्लाह अल्लाहुम्मा अहिल्लहू अलैना
अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! इसे हमारे लिए प्रकट फ़रमा
بِالْاَمْن وَ الْاِيْمَانِ وَ السَّلَامَةِ
बिल-अम्नि वल-ईमानि वस्सलामति
अमन, ईमान और सलामती के साथ
وَ الْاِسْلَامِ رَبِّيْ وَ رَبُّكَ الله
वल-इस्लामि रब्बी व रब्बुकल्लाह
और इस्लाम के साथ। मेरा रब और तेरा रब अल्लाह है

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चौंतीसवाँ: 34. रमज़ान के महीने का नया चाँद देखने पर दुआ
72. सैय्यद इब्न ताऊस ने रमज़ान के आमाल के बाब में बयान किया: मुहम्मद इब्न हनफ़िय्या से, अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) रमज़ान का नया चाँद देखते, तो क़िब्ला की तरफ़ रुख़ करके फरमाते:
اَللّٰهُمَّ اَهِلَّهٗ عَلَيْنَا بِالْاَمْنِ
अल्लाहुम्मा अहिल्लहू अलैना बिल-अम्नि
ऐ अल्लाह! इसे हमारे लिए अमन के साथ प्रकट फ़रमा
وَ الْاِيْمَانِ وَ السَّلَامَةِ
वल-ईमानि वस्सलामति
और ईमान व सलामती के साथ
وَ الْاِسْلَامِ وَ الْعَافِيَةِ الْمُجَلَّلَةِ
वल-इस्लामि वल-आफ़ियतिल मुजल्ललति
और इस्लाम व पूरी आफ़ियत के साथ
وَ دِفَاعِ الْاَسْقَامِ وَ الْعَوْنِ عَلَى الصَّلَاةِ
व दिफ़ाइ़ल-असक़ामि वल-अव्नि अलस्सलाति
और बीमारियों से हिफ़ाज़त व नमाज़ में मदद के साथ
وَ الصِّيَامِ وَ تِلَاوَةِ الْقُرْآنِ
वस्सियामि व तिलावतिल क़ुरआन
और रोज़ा व क़ुरआन की तिलावत के साथ
اَللّٰهُمَّ سَلِّمْنَا لِشَهْرِ رَمَضَانَ
अल्लाहुम्मा सल्लिमना लि-शहरि रमज़ान
ऐ अल्लाह! हमें रमज़ान के लिए सलामत रख
وَ تَسَلَّمْهُ مِنَّا وَ سَلِّمْنَا فِيْهِ
व तसल्लम्हु मिन्ना व सल्लिमना फ़ीह
और इसे हम से क़ुबूल फ़रमा और हमें इसमें सलामत रख
حَتّٰى يَنْقَضِيَ عَنَّا شَهْرُ رَمَضَانَ
हत्ता यन्क़ज़िया अन्ना शहरु रमज़ान
यहाँ तक कि रमज़ान का महीना हम से गुज़र जाए
وَ قَدْ عَفَوْتَ عَنَّا وَ غَفَرْتَ لَنَا وَ رَحِمْتَنَا
व क़द अफ़व्ता अन्ना व ग़फ़र्ता लना व रहिम्तना
और तू हमें माफ़ कर चुका हो, बख़्श चुका हो और हम पर रहम कर चुका हो

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पैंतीसवाँ: 35. रसूलुल्लाह (स.अ.व.) का रोज़ाना ज़िक्र
73. अल-काफ़ी में बयान है: अबुल हसन अल-अंबरी से, अबी अब्दिल्लाह (अ.स.) से रिवायत है:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.) रोज़ तीन सौ साठ बार अल्लाह की हम्द किया करते थे, जिस तरह जिस्म में नहरें हैं, और फरमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ رَبِّ الْعَالَمِيْنَ
अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन
अल्लाह के लिए बहुत सी हम्द है, जो तमाम जहानों का रब है
كَثِيْرًا عَلٰی كُلِّ حَالٍ
कसीरन अला कुल्लि हाल
हर हाल में बहुत ज़्यादा
74. और भी रिवायत है: याक़ूब इब्न शुऐब कहते हैं, मैंने अबा अब्दिल्लाह (अ.स.) को कहते सुना: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया: इंसान के जिस्म में तीन सौ साठ नहरें हैं, जिनमें से एक सौ अस्सी चलती हैं और एक सौ अस्सी ठहरी रहती हैं। अगर चलने वाली ठहर जाए तो वह बढ़ती नहीं, और अगर ठहरी हुई चलने लगे तो वह भी बढ़ती नहीं। और रसूलुल्लाह (स.अ.व.) फरमाते थे:
اَلْحَمْدُ لِلهِ كَثِيْرًا عَلٰی كُلِّ حَالٍ
अलहम्दु लिल्लाहि कसीरन अला कुल्लि हाल
हर हाल में अल्लाह की बहुत ज़्यादा हम्द है
…सुबह उठते समय और रात होने पर, तीन सौ साठ बार। 75. शैख़ तूसी ने अल-मजालिस और अल-अख़बार में बयान किया: सब्रह इब्न याक़ूब से, उनके वालिद से, इमाम सादिक़ (अ.स.) से, उनके बुज़ुर्गों से रिवायत है:
जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) सुबह उठते और सूरज निकलता, तो फरमाते:
اَلْحَمْدُ لِلهِ رَبِّ الْعَالَمِيْنَ
अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन
तमाम तारीफें अल्लाह के लिये हैं जो तमाम जहानों का परवरदिगार है
كَثِيْرًا طَيِّبًا عَلٰی كُلِّ حَالٍ
कसीरन तय्यिबन अला कुल्ले हाल
हर हाल में बहुत पाक और बेहतरीन तरीके से
और हज़रत (स.अ.व.अ.) अल्लाह का शुक्र तीन सौ साठ मर्तबा अदा फरमाया करते थे।
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छत्तीस 36 सुबह और शाम का ज़िक्र
76. अल-कुत्ब अल-रावन्दी से रिवायत है कि जब अली इब्न अल-हुसैन (अ.) को यज़ीद (ल.) के पास लाया गया, तो उसने उन्हें क़त्ल करना चाहा। उसने इमाम (अ.) को अपने सामने खड़ा किया और उनसे बातें करने लगा ताकि कोई बहाना मिल जाए। इमाम (अ.) जवाब देते रहे और उनके हाथ में तस्बीह थी जिसे वह उंगलियों से फेरते जा रहे थे। यज़ीद (ल.) ने कहा: “मैं तुमसे बात कर रहा हूँ और तुम जवाब भी दे रहे हो और तस्बीह भी फेर रहे हो, यह कैसे जायज़ है?” इमाम (अ.) ने फरमाया:
“मेरे वालिद ने मेरे दादा रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) से रिवायत की कि जब वह नमाज़-ए-फ़ज्र से फ़ारिग़ होते, तब तक बात न करते जब तक तस्बीह हाथ में लेकर यह न फरमाते:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَصْبَحْتُ اُسَبِّحُكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्बह्तु उसब्बिहुक
ऐ अल्लाह! मैं सुबह की शुरुआत तेरी तस्बीह से करता हूँ
وَ اُمَجِّدُكَ وَ اُحَمِّدُكَ
वा उमज्जिदुक वा उहम्मिदुक
और तेरी बड़ाई और तारीफ करता हूँ
وَ اُهَلِّلُكَ بِعَدَدِ مَا اُدِيْرُ بِهٖ سُبْحَتِيْ
वा उहल्लिलुक बि अददि मा उदीरु बिही सुब्हती
और जितनी बार मैं तस्बीह फेरता हूँ उतनी बार तेरा ज़िक्र करता हूँ
…फिर नबी (स.अ.व.अ.) तस्बीह फेरते रहते और आम बातें करते, मगर वही तस्बीह ज़िक्र में शुमार होती और यह ज़िक्र रात को सोने तक हिफाज़त का ज़रिया बनता। जब वह सोते तो वही अमल दोहराते और तस्बीह तकिये के नीचे रख देते, और यह एक वक़्त से दूसरे वक़्त तक ज़िक्र में गिना जाता। मैंने यह अमल अपने दादा (स.अ.व.अ.) की पैरवी में किया।” यज़ीद (ल.) बार-बार कहता रहा: “मैं तुममें से जिस से भी बात करता हूँ वह ऐसी बात से जवाब देता है जिसमें उसकी कामयाबी ज़ाहिर होती है।” फिर उसने इमाम (अ.) को छोड़ दिया और ज़ंजीरें खोलने का हुक्म दिया।
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सैंतीस 37 सरदर्द का इलाज
77. तिब्बुल आइम्मा में रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) को सुस्ती या सरदर्द होता, तो आप हाथ फैलाते और सूरह अल-फातिहा और मुअव्विज़तैन पढ़ते, और अल्लाह तआला उन्हें शिफा अता फरमाता।

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अड़तीस 38 बुखार और दूसरी बीमारियों से हिफाज़त
78. दावात अल-रावन्दी में है कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) बुखार और दर्द से पनाह के लिये यह दुआ फरमाते थे:
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُ بِكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ
مِنْ شَرِّ عِرْقٍ نَعَّارٍ وَ مِنْ شَرِّ حَرِّ النَّارِ
मिन शर्रि इरक़िन नअआरिन वा मिन शर्रि हर्रिन नार
फूटती हुई नस की बुराई से और जहन्नम की आग की बुराई से

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उनतालीस 39 बुखार से हिफाज़त की दुआ
79. तिब्ब अल-आइम्मा से रिवायत है, अम्र ज़ी क़ुर्रह और सअलबा अल-जम्माल से, जिन्होंने कहा: हमने अमीरुल मोमिनीन (अ.) को यह फरमाते सुना:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) पर सख्त बुखार आया, तो जिब्रईल (अ.) आपके पास आए और यह दुआ पढ़ी:
بِسْمِ اللهِ اَرْقِيْكَ بِسْمِ اللهِ اَشْفِيْكَ
बिस्मिल्लाहि अर्क़ीक बिस्मिल्लाहि अश्फ़ीक
अल्लाह के नाम से मैं तुम्हें दम करता हूँ, अल्लाह के नाम से मैं तुम्हें शिफा देता हूँ
مِنْ كُلِّ دَاءٍ يُؤْذِيْكَ
मिन कुल्ले दाइन युज़ीक
हर उस बीमारी से जो तुम्हें तकलीफ दे
وَ اللهُ شَافِيْكَ بِسْمِ اللهِ خُذْهَا فَلْتُهَنِّيْكَ
वल्लाहु शाफ़ीक बिस्मिल्लाहि खुज़्हा फलतुहन्नीक
और अल्लाह तुम्हारा शिफा देने वाला है, अल्लाह के नाम से इसे ले लो, यह तुम्हें आराम देगा
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
अल्लाह के नाम से जो बेहद मेहरबान और रहम करने वाला है
وَ لَا اُقْسِمُ بِمَواقِعِ النُّجُوْمِ
वा ला उक़्सिमु बिमवाक़ेइन नुजूम
मैं सितारों के डूबने की कसम खाता हूँ
وَ اِنَّهٗ لَقَسَمٌ لَوْ تَعْلَمُوْنَ عَظِيْمٌ
वा इन्नहू लक़समुन लौ तअलमून अज़ीम
और अगर तुम जानो तो यह बहुत बड़ी कसम है
لَتَبَرَّاَنَّ بِاِذْنِ اللہِ عَزَّ وَ جَلَّ
लतबर्रअन्न बिइज़्निल्लाहि अज़्ज़ा व जल्ल
तुम अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल के हुक्म से ज़रूर शिफा पा जाओगे
फिर रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) उस बीमारी से पूरी तरह ठीक होकर उठ खड़े हुए और फरमाया: “ऐ जिब्रईल! यह तो बहुत बड़ी दुआ है।” जिब्रईल (अ.) ने कहा: “यह सातों आसमानों के खज़ानों में से एक खज़ाना है।”
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चालीस 40 जादू से हिफाज़त की दुआ
80. अल-बिहार में इब्न अब्बास से रिवायत है कि लुबैद इब्न आसम ने रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) पर जादू किया और उसे बनी ज़ुरैक के कुएँ में डाल दिया। इसके बाद रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) बीमार हो गए। जब आप सो रहे थे तो दो फरिश्ते आए, एक सिरहाने और एक पाँव की तरफ बैठा। उन्होंने जादू की जगह बताई कि वह ज़रवान के कुएँ में, खजूर के गाभे में, एक पत्थर के नीचे है। रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) ने उठकर इमाम अली (अ.), ज़ुबैर और अम्मार को भेजा। उन्होंने कुएँ का पानी निकाला, पत्थर हटाया और गाभा बाहर निकाला। उसमें रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) के कुछ बाल और कंघी के दाँत थे, जिन्हें ग्यारह गांठों में सुई से बांधा गया था। इसके बाद सूरह फ़लक और सूरह नास नाज़िल हुईं। हर आयत पढ़ने पर एक गांठ खुलती गई, और जब सारी गांठें खुल गईं तो रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) ऐसे हो गए जैसे किसी पर से बहुत भारी बोझ उतर गया हो। जिब्रईल (अ.) यह पढ़ रहे थे:
بِسْمِ اللهِ اَرْقِيْكَ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ يُؤْذِيْكَ
बिस्मिल्लाहि अर्क़ीक मिन कुल्ले शयइन युज़ीक
अल्लाह के नाम से मैं तुम्हें हर उस चीज़ से बचाता हूँ जो तुम्हें नुकसान पहुँचाए
مِنْ حَاسِدٍ وَ عَيْنٍ وَ اللهُ يَشْفِيْكَ
मिन हासिदिन वा ऐनिन वल्लाहु यश्फ़ीक
हसद करने वाले और बुरी नज़र से, और अल्लाह तुम्हें शिफा दे

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इकतालीस 41 उनकी एक और दुआ
81. अल-बिहार में तफसीर-ए-इमाम से रिवायत है कि नबी (स.अ.व.अ.) ने ज़हरीले गोश्त की हड्डी पर हाथ रखा और फरमाया:
بِسْمِ اللهِ الشَّافِیْ بِسْمِ اللهِ الْكَافِيْ
बिस्मिल्लाहिश शाफ़ी बिस्मिल्लाहिल काफ़ी
अल्लाह के नाम से जो शिफा देने वाला है, अल्लाह के नाम से जो काफी है
بِسْمِ اللهِ الْمُعَافِيْ بِسْمِ اللهِ الَّذِيْ
बिस्मिल्लाहिल मुआफ़ी बिस्मिल्लाहिल लज़ी
अल्लाह के नाम से जो आफ़ियत देने वाला है, उस अल्लाह के नाम से
لَا يَضُرُّ مَعَ اسْمِهٖ شَيْءٌ فِي الْاَرْضِ
ला यज़ुर्रु मअस्मिही शयउन फिल अर्द़
जिसके नाम के साथ ज़मीन में कोई चीज़ नुकसान नहीं पहुँचाती
وَ لَا فِي السَّمَاءِ وَ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيْمُ
वा ला फिस्समाइ व हुयस्समीउल अलीम
और न ही आसमान में, और वही सब सुनने वाला सब जानने वाला है
फिर नबी (स.अ.व.अ.) ने फरमाया: “अल्लाह के नाम से खाओ।” आप ने खाया और सबने खाया यहाँ तक कि सब सेर हो गए, और उस ज़हरीले गोश्त ने किसी को भी नुकसान नहीं पहुँचाया।
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बयालीस 42 परेशानी और घबराहट में पढ़ी जाने वाली दुआ
82. शैख़ तूसी ने अल-अमाली में ज़ैद से, उनके बाप-दादाओं से, इमाम अली (अ.) से रिवायत की कि:
जब भी रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) को परेशानी या घबराहट होती, तो आप यह दुआ पढ़ते थे:
يَا حَيُّ يَا قَيُّوْمُ يَا حَيًّا لَا يَمُوْتُ
या हय्यु या क़य्यूम या हय्यन ला यमूत
ऐ हमेशा ज़िन्दा रहने वाले! ऐ क़ायम रहने वाले! ऐ वह ज़िन्दा जो कभी नहीं मरता
يَا حَيُّ لَا اِلٰهَ اِلَّا اَنْتَ كَاشِفُ الْہَمِّ
या हय्यु ला इलाहा इल्ला अन्त काशिफ़ुल हम्म
ऐ हमेशा ज़िन्दा! तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, ऐ ग़मों को दूर करने वाले
مُجِيْبُ دَعْوَةِ الْمُضْطَرِّيْنَ
मुजीबु दअ्वतिल मुज़्तर्रीन
बेबसों की दुआ क़ुबूल करने वाला
اَسْاَلُكَ بِاَنَّ لَكَ الْحَمْدَ لَا اِلٰهَ اِلَّا
अस्अलुक बिअन्ना लक़ल हम्द ला इलाहा इल्ला
मैं तुझसे सवाल करता हूँ इस वजह से कि तमाम हम्द तेरे लिये है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं
اَنْتَ الْمَنَّانُ بَدِيْعُ السَّمٰوَاتِوَ الْاَرْضِ
अन्तल मन्नानु बदीउस समावाति वल अर्द़
तू बड़ा इनाम देने वाला है, आसमानों और ज़मीन को बगैर मिसाल पैदा करने वाला
ذُو الْجَلَالِوَ الْإِكْرَامِ رَحْمٰنَ الدُّنْيَا
ज़ुल जलालि वल इकरामि रहमानद दुन्या
जलाल और इकराम वाला, दुनिया में रहम करने वाला
وَ الْآخِرَةِ وَ رَحِيْمَهُمَا رَبِّ
वल आख़िरति व रहीमहुमा रब्बि
और आख़िरत में भी, और दोनों में रहम करने वाला, ऐ मेरे रब
اِرْحَمْنِيْ رَحْمَةً تُغْنِيَنِيْ بِهَا عَنْ رَحْمَةِ
इरहम्नी रहमतन तुग़नीनी बिहा अन रहमति
मुझ पर ऐसी रहमत फरमा जो मुझे बेनियाज़ कर दे
مَنْ سِوَاكَ يَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ
मन सिवाक या अरहमर राहिमीन
तेरे सिवा किसी और की रहमत से, ऐ सब रहम करने वालों से बढ़कर रहम करने वाले
रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) ने फरमाया: “मुसलमानों में से जो शख़्स इस दुआ को तीन मर्तबा पढ़े, उसे उसका सवाल ज़रूर अता किया जाएगा, सिवाय इसके कि उसका सवाल गुनाह का हो या उसने अपने क़रीबी रिश्तेदारों से ताल्लुक़ तोड़ लिया हो।”

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तैंतालीस 43 क़ुरआन-ए-मजीद याद रखने की दुआ
83. क़ुर्बुल असनाद में मसअदा इब्न सदक़ा से रिवायत है कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) ने अपने बाप-दादाओं (अ.) से बयान किया कि यह दुआ रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) की दुआओं में से एक थी:
اَللّٰهُمَّ ارْحَمْنِيْ بِتَرْكِ مَعَاصِيْكَ مَا اَبْقَيْتَنِيْ
अल्लाहुम्मर रहम्नी बितर्के मआसीक मा अब्क़ैतनी
ऐ अल्लाह! जब तक तू मुझे ज़िन्दा रखे, मुझे तेरी नाफ़रमानी से बचने की तौफ़ीक़ अता फरमा
وَ ارْزُقْنِيْ حُسْنَ النَّظَرِ فِيْمَا يُرْضِيْكَ عَنِّيْ
वर्ज़ुक़्नी हुस्नन नज़रि फीमा युर्ज़ीक अन्नी
और मुझे उस चीज़ को सही नज़र से देखने की तौफ़ीक़ दे जिससे तू मुझसे राज़ी हो
وَ اَلْزِمْ قَلْبِيْ حِفْظَ كِتَابِكَ كَمَا عَلَّمْتَنِيْ
वल्ज़िम क़ल्बी हिफ़्ज़ा किताबिक कमा अल्लम्तनी
और मेरे दिल को अपनी किताब याद रखने पर कायम रख जैसा तूने मुझे सिखाया
وَ اجْعَلْنِيْ اَتْلُوْهُ عَلَى النَّحْوِ الَّذِيْ يُرْضِيْكَ عَنِّيْ
वज्अल्नी अत्लूहु अलन्नह्विल्लज़ी युर्ज़ीक अन्नी
और मुझे उसे उस तरीके से पढ़ने वाला बना जिससे तू मुझसे खुश हो
اَللّٰهُمَّ نَوِّرْ بِكِتَابِكَ بَصَرِيْ وَ اشْرَحْ بِهٖ صَدْرِيْ
अल्लाहुम्म नवर् बि किताबिक बसरी वश्रह बिही सद्री
ऐ अल्लाह! अपनी किताब के ज़रिये मेरी नज़र को रोशन कर और उससे मेरा सीना खोल दे
وَ فَرِّحْ بِهٖ قَلْبِيْ وَ اَطْلِقْ بِهٖ لِسَانِيْ
व फर्रिह बिही क़ल्बी व अत्लिक़ बिही लिसानी
और उससे मेरे दिल को खुश कर दे और मेरी ज़बान को खोल दे
وَ اسْتَعْمِلْ بِهٖ بَدَنِيْ وَ قَوِّنِيْ عَلٰى ذٰلِكَ فَاِنَّهٗ
वस्तअमिल बिही बदनी व क़व्विनी अला ज़ालिक फइन्नहू
और उससे मेरे जिस्म को अमल में ला और मुझे इस पर क़ुव्वत अता फरमा
لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ إِلَّا بِكَ
ला हौल व ला क़ुव्वत इल्ला बिका
क्योंकि तेरे सिवा न कोई ताक़त है और न कोई क़ुव्वत

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चवालीस 44 नबी की हिफ़ाज़त का हिजाब
84. अल-मुहज्ज में रिवायत है: रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) का “हिजाब” (परदा) यह था:
وَ جَعَلْنَا عَلٰى قُلُوْبِهِمْ اَكِنَّةً اَنْ يَفْقَهُوْهُ
व जा-अल्ना अला क़ुलूबिहिम अक़िन्नतन अं यफ़्क़हूहू
और हमने उनके दिलों पर परदे डाल दिये ताकि वे इसे न समझ सकें
وَ فِيْ آذَانِهِمْ وَقْرًا وَ اِذَا ذَكَرْتَ رَبَّكَ فِي الْقُرْآن
व फी आज़ानिहिम वक़्रां व इज़ा ज़करता रब्बका फ़िल क़ुरआन
और उनके कानों में भारीपन है, और जब तुम क़ुरआन में अपने रब का अकेले ज़िक्र करते हो
وَحْدَهٗ وَلَّوْا عَلٰى اَدْبَارِهِمْ نُفُوْرًا
वह्दहू वल्लौ अला अदबारिहिम नुफ़ूरा
तो वे नफ़रत से पीठ फेर लेते हैं
اَللّٰهُمَّ بِمَا وَارَتِ الْحُجُبُ مِنْ جَلَالِكَ
अल्लाहुम्मा बिमा वारतिल हुजुबु मिन जलालिक
ऐ अल्लाह! तेरे जलाल की वजह से जो परदे डाले गये हैं उनके वास्ते से
وَ جَمَالِكَ وَ بِمَا اَطَافَ بِهِ الْعَرْشُ
व जमालिक व बिमा अताफ़ा बिहिल अर्शु
और तेरे जमाल के वास्ते, और उस अज़मत के वास्ते जिसने अर्श को घेर रखा है
مِنْ بَهَاءِ كَمَالِكَ وَ بِمَعَاقِدِ الِعزِّ
मिन बहाई कमालिक व बिमा आक़िदिल इज़्ज़ि
और तेरे कमाल की रौनक और इज़्ज़त के मक़ामात के वास्ते से
مِنْ عَرْشِكَ وَ بِمَا تُحِيْطُ بِهٖ قُدْرَتُكَ
मिन अर्शिक व बिमा तुहीतू बिही क़ुदरतुक
और तेरे अर्श के वास्ते, और उस क़ुदरत के वास्ते जो हर चीज़ को घेरे हुए है
مِنْ مَلَكُوْتِ سُلْطَانِكَ يَا مَنْ لَا رَادَّ لِاَمْرِهٖ
मिन मलाकूति सुल्तानिक या मन ला राद्दा लिअम्रिही
ऐ वह जिसकी हुक्मरानी को कोई लौटा नहीं सकता
وَ لَا مُعَقِّبَ لِحُكْمِهٖ اِضْرِبْ بَيْنِيْ
व ला मुअक़्क़िबा लिहुक्मिही इज़्रिब बैनी
और जिसके फ़ैसले को कोई बदल नहीं सकता
وَ بَيْنَ اَعْدَائِیْ بِسِتْرِكَ الَّذِىْ
व बैना अअदाई बिसित्रिकल्लज़ी
मेरे और मेरे दुश्मनों के दरमियान अपना ऐसा परदा क़ायम कर दे
لَا تُفَرِّقُهُ الْعَوَاصِفُ مِنَ الرِّيَاحِ
ला तुफ़र्रिक़ुहुल अवासिफ़ु मिनर रियाह
जिसे सख़्त हवाएँ भी हटा न सकें
وَ لَا تَقْطَعُهُ الْبَوَاتِرُ مِنَ الصِّفَاحِ
व ला तक़्तउहुुल बवातिरु मिनस सिफ़ाह
और न ही तेज़ तलवारें उसे काट सकें
وَ لَا تَنْفُذُهٗ عَوَامِلُ الرِّمَاحِ حُلَّ
व ला तन्फ़ुज़ुहू अवामिलुर रिमाह हुल्ला
और न ही भाले उसे भेद सकें
يَا شَدِيْدَ الْبَطْشِ بَيْنِيْ وَ بَيْنَ
या शदीदल बत्विश बैनी व बैना
ऐ सख़्त पकड़ वाले! मेरे और
مِنْ يَرْمِيْنِيْ بِخَوَافِقِهٖ وَ مَنْ تَسَرّٰى اِلَىَّ
मिन यरमीनी बिख़वाफ़िक़िही व मन तसर्रा इलय्या
उस शख़्स के बीच जो मुझे अपने वारों का निशाना बनाता है
طَوَارِقُهٗ وَ فَرِّجْ عَنِّيْ كُلَّ هَمٍّ
तवारिक़ुहू व फ़र्रिज़ अन्नी कुल्ल हम्मिन
और मुझसे हर तरह का ग़म दूर कर दे
وَ غَمٍّ يَا فَارِجَ هَمِّ يَعْقُوْبَ فَرِّجْ عَنِّيْ
व ग़म्मिन या फ़ारिज़ा हम्मे याक़ूब फ़र्रिज़ अन्नी
और हर परेशानी, ऐ याक़ूब के ग़म दूर करने वाले, मेरे ग़म भी दूर कर दे
يَا كَاشِفَ ضُرِّ اَيُّوْبَ اِكْشِفْ ضُرِّىْ
या काशिफ़ा दुर्रि अय्यूब इक्शिफ़ दुर्री
ऐ अय्यूब की तकलीफ़ दूर करने वाले, मेरी तकलीफ़ भी दूर कर दे
وَ اغْلِبْ لِىْ مَنْ غَلَبَنِيْ يَا غَالِبًا غَيْرَ مَغْلُوْبٍ
वग़्लिब ली मन ग़लबनी या ग़ालिबन ग़ैरा मग़लूब
और जो मुझ पर ग़ालिब आया है उस पर मुझे ग़ालिब कर दे, ऐ वह जो कभी मग़लूब नहीं होता
وَ رَدَّ اللهُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا بِغَيْظِهِمْ لَمْ يَنَالُوْا خَيْرًا
व रद्दल्लाहुल लज़ीना कफ़रू बि-ग़ैज़िहिम लम यनालू ख़ैरन
और अल्लाह ने काफ़िरों को उनके ग़ुस्से के साथ लौटा दिया, उन्हें कोई फ़ायदा न मिला
وَ كَفَی اللهُ الْمُؤْمِنِيْنَ الْقِتَالَ وَ كَانَ اللهُ
व कफ़ल्लाहुल मोमिनीनल क़िताल व काना अल्लाहु
और अल्लाह ने मोमिनों को जंग से बचा लिया, और अल्लाह
قَوِّيًا عَزِيْزًا. فَاَيَّدْنَا الَّذِيْنَ آمَنُوْا
क़विय्यन अज़ीज़ा फ़अय्यद्नल्लज़ीना आमनू
बहुत ताक़तवर और ग़ालिब है, फिर हमने ईमान वालों की मदद की
عَلٰی عَدُوِّهِمْ فَاَصْبَحُوْا ظَاهِرِيْنَ
अला अदुव्विहिम फ़अस्बहू ज़ाहिरीन
उनके दुश्मनों के मुक़ाबले में, तो वे ग़ालिब हो गये

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पैंतालीस 45 सुबह की दुआ
85. अल-काफ़ी में रिवायत है: अल-फ़ज़्ल इब्न अबी क़ुर्रह से, अबी अब्दिल्लाह (अ.) से, जिन्होंने फरमाया:
आदम (अ.) से लेकर रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) तक तमाम नबियों ने एक के बाद एक तीन जुमले पढ़े। रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) हर सुबह यह फरमाते थे:
اَللّٰهُمَّ اِنِّىْ اَسْئَلُكَ اِيْمَانًا تُبَاشِرُ بِهٖ قَلْبِىْ
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुक ईमानन तुबाशिरु बिही क़ल्बी
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे ऐसा ईमान माँगता हूँ जो मेरे दिल को सुकून दे
وَيَقيْنًاًحَتّٰى اَعْلَمُ اَنَّهٗ لَا يُصِيْبُنِىْ
व यक़ीनन हत्ता अअलमु अन्नहू ला युसीबुनी
और ऐसा यक़ीन कि मैं जान लूँ कि मुझ पर
اِلَّا مَا كَتَبْتَ لِىْ وَرَضِّنِىْ بِمَا قَسَمْتَ لِىْ
इल्ला मा कतब्ता ली व रज़्ज़िनी बिमा क़सम्ता ली
वही आता है जो तूने मेरे लिये लिखा है, और जो तूने मेरे हिस्से में रखा है उस पर मुझे राज़ी कर दे
86. अल-ख़िसाल में है: रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) ने यह दुआ इमाम अली (अ.) को सिखाई, जिसे जिब्रईल अल्लाह (स.व.त.) की तरफ़ से लाए थे, और रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) को मुश्किल और परेशानी के वक़्त पढ़ने का हुक्म दिया गया था:
يَا عِمَادَ مَنْ لَا عِمَادَ لَهٗ
या इमाद मन ला इमाद लहू
ऐ उस के सहारा देने वाले जिसका कोई सहारा नहीं
وَ يَا حِرْزَ مَنْ لَا حِرْزَ لَهٗ
व या हिर्ज़ मन ला हिर्ज़ लहू
और ऐ उस की हिफ़ाज़त करने वाले जिसकी कोई हिफ़ाज़त नहीं
وَ يَا ذُخْرَ مَنْ لَا ذُخْرَ لَهٗ
व या ज़ुख़्र मन ला ज़ुख़्र लहू
और ऐ उस के लिये ज़खीरा बनने वाले जिसका कोई ज़खीरा नहीं
وَ يَا سَنَدَ مَنْ لَا سَنَدَ لَهٗ
व या सनद मन ला सनद लहू
और ऐ उस के मददगार जिसकी कोई मदद नहीं
وَ يَا غِيَاثَ مَنْ لَا غِيَاثَ لَهٗ
व या ग़ियास मन ला ग़ियास लहू
और ऐ फ़रियाद रस बनने वाले जिसका कोई फ़रियाद रस नहीं
وَ يَا كَرِيْمَ الْعَفْوِ وَ يَا حَسَنَ الْبَلَاءِ
व या करीमल अफ़्वे व या हसनल बलाए
और ऐ बहुत माफ़ करने वाले, और ऐ जिसकी आज़माइश भी भलाई होती है
وَ يَا عَظِيْمَ الرَّجَاءِ وَ يَا عَوْنَالضُّعَفَاءِ
व या अज़ीमर रजाए व या औनज़ ज़ुअफ़ाए
और ऐ बड़ी उम्मीद देने वाले, और ऐ कमज़ोरों के मददगार
وَ يَا مُنْقِذَ الْغَرْقٰى
व या मुनक़िज़ल ग़रक़ा
और ऐ डूबने वालों को बचाने वाले
وَ يَا مُنْجِيَ الْهَلْكٰى يَا مُحْسِنُ
व या मुनजियल हलका या मुहसिन
और ऐ हलाक होने वालों को निजात देने वाले, ऐ एहसान करने वाले
يَا مُجْمِلُ يَا مُنْعِمُ يَا مُفْضِلُ
या मुजमिलु या मुनइमु या मुफ़ज़िलु
ऐ खूबसूरती देने वाले, ऐ नेमतें अता करने वाले, ऐ फ़ज़्ल अता करने वाले
الَّذِيْ سَجَدَ لَكَ سَوَادُ اللَّيْلِ
अन्तल लज़ी सज़दा लका सवादुल लै्ल
वह तू ही है जिसके सामने रात की तारीकी सज्दा करती है
وَ نُوْرُ النَّهَارِ وَ ضَوْءُ الْقَمَرِ
व नूरुन नहारि व ज़ौउल क़मर
और दिन की रौशनी, और चाँद की चमक
وَ شُعَاعُ الشَّمْسِ وَ دَوِيُّ الْمَاء
व शुआउश शम्सि व दवियुल माअ
और सूरज की किरणें, और बहते पानी की आवाज़
وَ حَفِيْفُ الشَّجَرِ يَا اَللهُ يَا اَللهُ
व हफ़ीफ़ुश शजरि या अल्लाहु या अल्लाहु
और दरख़्तों की सरसराहट, ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह!
يَا اَللهُ اَنْتَ وَحْدَكَ لَا شَرِيْكَ لَكَ
या अल्लाहु अन्त वहदक ला शरीक लक
ऐ अल्लाह! तू अकेला है, तेरा कोई शरीक नहीं
फिर तुम कहो: “ऐ अल्लाह! मुझे फलाँ फलाँ अता फ़रमा”, और तुम अपनी जगह से उठोगे भी नहीं कि अल्लाह की मर्ज़ी से तुम्हारी दुआ क़ुबूल हो जाएगी।
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छियालीस 46 उनकी दुआ
87. अल-मुहज्ज में अबू बसीर और मुहम्मद बिन मुस्लिम से रिवायत है कि जाफ़र बिन मुहम्मद अस-सादिक़ (अ.) ने अपने वालिद (अ.) से, और उन्होंने अपने बाप-दादाओं (अ.) से, और उन्होंने अमीरुल मोमिनीन अली बिन अबी तालिब (अ.) से बयान किया कि:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) हज़रत हसन (अ.) और हज़रत हुसैन (अ.) की हिफ़ाज़त के लिये यह दुआ पढ़ते थे और अपने सहाबा को भी इसका हुक्म देते थे, और वह यह है:
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
अल्लाह के नाम से जो बहुत मेहरबान, बहुत रहम करने वाला है
اُعِيْذُ نَفْسِىْ وَ دِيْنِيْ وَ اَهْلِىْ
उईज़ु नफ़्सी व दीनी व अहली
मैं अपनी जान, अपने दीन और अपने घर वालों को पनाह में देता हूँ
وَ مَالِىْ وَ وُلْدِىْ وَ خَوَاتِيْمَ عَمَلِىْ
व माली व वुल्दी व ख़वातीमे अमली
और अपने माल, अपनी औलाद और अपने आमाल के अंजाम को
وَ مَا رَزَقَنِيْ رَبِّىْ وَ خَوَّلَنِيْ بِعِزَّةِ اللهِ
व मा रज़क़नी रब्बी व ख़व्वलनी बिइज़्ज़तिल्लाह
और उस सब को जो मेरे रब ने मुझे अता किया है, अल्लाह की इज़्ज़त की पनाह में देता हूँ
وَ عَظَمَةِ اللهِ وَ جَبَرُوْتِ اللهِ
व अज़मतिल्लाह व जबरूतिल्लाह
और अल्लाह की अज़मत और जबरूत के
وَ سُلْطَانِ اللهِ وَ رَحْمَةِ اللهِ
व सुल्तानिल्लाह व रहमतिल्लाह
और अल्लाह की हुकूमत और रहमत के
وَ رَافَةِ اللهِ وَ غُفْرَانِ اللهِ
व राफ़तिल्लाह व ग़ुफ़रानिल्लाह
और अल्लाह की नरमी और बख़्शिश के
وَ قُوَّةِ اللهِ وَ قُدْرَةِ اللهِ وَ بِآلَاءِ اللهِ
व क़ुव्वतिल्लाह व क़ुदरतिल्लाह व बिआलाइल्लाह
और अल्लाह की ताक़त, क़ुदरत और नेमतों के
وَ بِصُنْعِ اللهِ و بِاَرْكَانِ اللهِ
व बिसुनअिल्लाह व बिअरकानिल्लाह
और अल्लाह की कुदरत और उसके सहारों के
وَ بِجَمْعِ اللهِ عَزَّ وَ جَلَّ
व बिजमअिल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल
और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल की जमा की हुई हिफ़ाज़त के
وَ بِرَسُوْلِ اللهِ صَلَّی اللهُ عَلَيْهِ و آلِهٖ
व बिरसूलिल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि
और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि के
وَ قُدْرَةِ اللهِ عَلٰی مَا يَشَآءُ مِنْ شَرِّ السَّامَّةِ
व क़ुदरतिल्लाह अला मा यशाअ मिन शर्रिस्साम्मा
और अल्लाह की उस क़ुदरत के जो वह चाहता है, ज़हरीले मख़लूक़ात की बुराई से
وَ الْهَامَّةِ وَ مِنْ شَرِّ الْجِنِّ وَ الْاِنْسِ
वल्हाम्मा व मिन शर्रिल जिन्नि वल इन्स
और हर नुक़सान पहुँचाने वाली चीज़ से, और जिन्न व इंसान की बुराई से
وَ مِنْ شَرِّ مَا دَبَّ فِىْ الْاَرْضِ
व मिन शर्रि मा दब्बा फिल अर्द़
और उस हर चीज़ की बुराई से जो ज़मीन पर चलती है
وَ مِنْ شَرِّ مَا يَخْرُجُ مِنْهَا
व मिन शर्रि मा यख़रुजु मिन्हा
और उस हर चीज़ की बुराई से जो उससे निकलती है
وَ مِنْ شَرِّ مَا يَنْزِلُ مِنَ السَّمَآءِ
व मिन शर्रि मा यनज़िलु मिनस्समा
और उस बुराई से जो आसमान से उतरती है
وَ مَا يَعْرُجُ فِيْهَا وَ مِنْ شَرِّكُلِّ
व मा यअरुजु फीहा व मिन शर्रि कुल्लि
और जो उसमें चढ़ती है, और हर मख़लूक़ की बुराई से
دَابَّةٍ رَبِّىْ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهَا
दाब्बतिन रब्बी आख़िज़ुन बिनासियतिहा
जिसकी पेशानी मेरे रब के हाथ में है
اِنَّ رَبِّىْ عَلٰی صِرَاطٍ مُسْتَقِيْمٍ
इन्ना रब्बी अला सिरातिम मुस्तक़ीम
यक़ीनन मेरा रब सीधे रास्ते पर है
وَ هُوَ عَلٰی كُلِّ شَىْءٍ قَدِيْرٌ
व हु अल्ला कुल्ले शयइन क़दीर
और वह हर चीज़ पर क़ादिर है
وَ لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللهِ الْعَلِىِّ الْعَظِيْمِ
व ला हौल व ला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम
और अल्लाह अली व अज़ीम के सिवा न कोई ताक़त है न कोई क़ुव्वत
وَ صَلَّی اللهُ عَلٰی سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ
व सल्लल्लाहु अला सैय्यिदिना मुहम्मद व आलेहि
और अल्लाह की दरूद व सलाम हो हमारे सरदार मुहम्मद और उनकी आल पर

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सैंतालीस 47 मुश्किल और सख़्त परेशानी के वक़्त की दुआ
88. इब्न ताउस की किताब अल-मुज्तबा में जाबिर से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) को कोई परेशानी होती या काफ़िर बहुत ज़्यादा सताते, तो आप अपना हाथ बंद कर लेते और फरमाते:
“पहले सख़्ती आती है, फिर आसानी आती है।”
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
अल्लाह के नाम से जो बहुत मेहरबान और बहुत रहम करने वाला है
لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّةَ اِلَّا بِاللهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيْمِ
ला हौल व ला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम
अल्लाह अली और अज़ीम के सिवा न कोई ताक़त है और न कोई क़ुव्वत
اَللّٰهُمَّ اِيَّاكَ نَعْبُدُ وَ اِيَّاكَ نَسْتَعِيْنُ
अल्लाहुम्मा इय्याक नअ्बुदु व इय्याक नस्तईन
ऐ अल्लाह! हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से मदद चाहते हैं
اَللّٰهُمَّ كُفَّ بَأْسَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا
अल्लाहुम्मा कुफ्फ़ बा’सल्लज़ीना कफ़रू
ऐ अल्लाह! काफ़िरों की सख़्ती और बुराई को रोक दे
فَاِنَّكَ اَشَدُّ بَأْسًا وَ اَشَدُّ تَنْكِيْلًا
फइन्नक अशद्दु बा’सन व अशद्दु तन्कीलन
क्योंकि तू ताक़त और सज़ा देने में सबसे ज़्यादा सख़्त है
अल्लाह की क़सम, आप (स.अ.व.अ.) के हाथ खोलने से पहले ही उनकी परेशानी दूर हो जाती थी।
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अड़तालीस 48 उदासी के वक़्त की दुआ
89. अल-बिहार में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) से रिवायत है कि:
जब भी रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) को कोई ग़म या परेशानी होती, तो आप यह दुआ पढ़ते थे, और इसे दुआ-ए-फ़रज कहा जाता था:
اَللّٰهُمَّ احْرُسْنِيْ بِعَيْنِك الَّتِىْ لَا تَنَامُ
अल्लाहुम्मह इहरुस्नी बिअय्निकल लती ला तनाम
ऐ अल्लाह! मुझे अपनी उस निगाह से महफ़ूज़ रख जो कभी नहीं सोती
وَ اكْنُفْنِيْ بِرُكْنِكَ الَّذِىْ لَا يُرَامُ
वकनुफ़्नी बिरुक्निकल लज़ी ला युराम
और अपनी उस पनाह में रख जिसे कोई तोड़ नहीं सकता
وَ ارْحَمْنِيْ بِقُدْرَتِكَ عَلَيَّ وَ لَا اَهْلَكُ
वरहम्नी बिक़ुदरतिका अलय्या व ला अह्लिकु
और अपनी क़ुदरत से मुझ पर रहम फ़रमा और मुझे हलाक न कर
وَ اَنْتَ رَجَائِيْ فَكَمْ مِنْ نِعْمَةٍ اَنْعَمْتَ
व अन्त रजाई फ़कम मिन नेमतिन अनअम्त
जबकि मेरी उम्मीद तुझ से है, तूने मुझ पर कितनी नेमतें की हैं
بِهَا عَلَيَّ قَلَّ لَهَا شُكْرِيْ
बिहा अलय्या क़ल्ला लहा शुक्री
जिनका शुक्र अदा करने में मैं कमज़ोर रहा
وَ كَمْ مِنْ بَلِيَّةٍ اِبْتَلَيْتَنِيْ قَلَّ
व कम मिन बलिय्यतिन इब्तलयतनी क़ल्ला
और कितनी ही आज़माइशों में तूने मुझे डाला
لَكَ بِهَا صَبْرِيْ فَيَا مَنْ قَلَّ
लका बिहा सब्री फ़या मन क़ल्ला
जिनमें तेरे लिये मेरा सब्र कम पड़ गया
عِنْدَ نِعْمَتِهٖ شُكْرِيْ فَلَمْ يَحْرِمْنِيْ
इन्दा नेमतिही शुक्री फ़लम यह्रिम्नी
ऐ वह जिसके इनामों पर मेरा शुक्र कम रहा फिर भी उसने मुझे महरूम नहीं किया
وَ يَا مَنْ قَلَّ عِنْدَ بَلِيَّتِهٖ صَبْرِيْ فَلَمْ يَخْذُلْنِيْ
व या मन क़ल्ला इन्दा बलिय्यतिही सब्री फ़लम यख़ज़ुल्नी
और ऐ वह जिसके इम्तिहान में मेरा सब्र कम रहा फिर भी उसने मुझे छोड़ नहीं दिया
وَ يَا مَنْ رَآنِيْ عَلَى الْخَطَايَا فَلَمْ يَفْضَحْنِيْ
व या मन रआनी अलल ख़ताया फ़लम यफ़ज़ह्नी
और ऐ वह जिसने मेरी ख़ताएँ देखीं लेकिन मुझे रुस्वा नहीं किया
اَسْاَلُكَ اَنْ تُصَلِّيَ عَلٰى َّمُحَمٍد وَ آلِ مُحَمَّدٍ
अस्अलुक अन्तुसल्लिया अला मुहम्मद व आले मुहम्मद
मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि मुहम्मद और आल-ए-मुहम्मद पर दरूद भेज
اَللّٰهُمَّ اَعِنِّيْ عَلٰى دِيْنِيْ بِالدُّنْيَا
अल्लाहुम्मा अइन्नी अला दीनी बिद्दुन्या
ऐ अल्लाह! दुनिया को मेरे दीन के लिये मददगार बना
وَ عَلَى الْآخِرَةِ بِالتَّقْوٰى وَ احْفَظْنِيْ
व अलल आख़िरति बित्तक़वा वह्फ़ज़्नी
और आख़िरत के लिये तक़वा को ज़रिया बना, और मेरी हिफ़ाज़त फ़रमा
فِيْمَا غِبْتُ عَنْهُ وَ لَا تَكِلْنِيْ اِلٰى نَفْسِيْ
फीमा ग़िब्तु अन्हु व ला तकिल्नी इला नफ़्सी
उस चीज़ से जो मुझसे ओझल है, और मुझे मेरे हवाले न कर
فِيْمَا حَضَرْتُهٗ يَا مَنْ لَا تَضُرُّهُ الذُّنُوْبُ
फीमा हज़रतुहु या मन ला तज़ुर्रहुज़ ज़ुनूब
और जो मेरे सामने है उसमें भी, ऐ वह जिसे गुनाह नुक़सान नहीं पहुँचाते
وَ لَا تَنْقُصُهُ الْمَغْفِرَةُ هَبْ لِيْ مَا لَا يَنْقُصُكَ
व ला तनक़ुसुहुल मग़फ़िरा हब ली मा ला यनक़ुसुक
और जिसे बख़्शिश कम नहीं करती, मुझे वह अता कर जिससे तुझे कोई कमी न हो
وَ اغْفِرْ لِيْ مَا لَا يَضُرُّكَ اِنَّكَ رَبٌّ وَهَّابٌ
वग़्फ़िर ली मा ला यज़ुर्रुक इन्नका रब्बुन वह्हाब
और मुझे बख़्श दे जिससे तुझे कोई नुक़सान नहीं, यक़ीनन तू बहुत अता करने वाला रब है
اَسْاَلُكَ فَرَجًا قَرِيْبًا وَ صَبْرًا جَمِيْلًا
अस्अलुक फ़रजं क़रीबं व सब्रं जमीला
मैं तुझसे क़रीबी राहत और खूबसूरत सब्र माँगता हूँ
وَ رِزْقًا وَاسِعًا وَ الْعَافِيَةَ
व रिज़्क़न वासिअं वल आफ़ियत
और वसीअ रोज़ी और आफ़ियत
مِنْ جَمِيْعِ الْبَلَاءِ وَ شُكْرَ الْعَافِيَةِ
मिन जमीइल बला व शुकरल आफ़ियत
हर तरह की मुसीबत से, और आफ़ियत पर शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़

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उनचास 49 नये चाँद को देखकर पढ़ी जाने वाली दुआ
90. अल-उयून में दारिम बिन क़बीसा से, इमाम अली बिन मूसा रज़ा (अ.) से, अपने बाप-दादाओं (अ.) से, और इमाम अली (अ.) से रिवायत है कि:
जब अल्लाह के रसूल (स.अ.व.अ.) नया चाँद देखते थे तो यह दुआ पढ़ते थे:
اَيُّهَا الْخَلْقُ الْمُطِيْعُ الدَّائِبُ السَّرِيْعالْمُتَصَرِّفُ ُ
अय्युहल ख़ल्क़ुल मुतीउद्दा-इबुस्सरीउल मुतसर्रिफ़
ऐ इताअत करने वाले मख़लूक़, हमेशा चलने वाले, तेज़ी से घूमने वाले
فِيْ مَلَكُوْتِ الْجَبَرُوْتِ بِالتَّقْدِيْرِ
फ़ी मलकूतिल जबरूत बित्तक़दीर
जो अल्लाह के हुक्म और तक़दीर से जबरूत की बादशाही में चलता है
رَبِّيْ وَ رَبُّكَ اللهُ. اَللّٰهُمَّ اَهِلَّهٗ
रब्बी व रब्बुकल्लाहु, अल्लाहुम्मा अहिल्लहू
मेरा रब और तेरा रब अल्लाह है, ऐ अल्लाह इस चाँद को हम पर ज़ाहिर फ़रमा
عَلَيْنَا بِالْاَمْنِ وَ الْاِيْمَانِ وَ السَّلَامَةِ
अलैना बिलअम्नि वल ईमानि वस्सलामति
अमन, ईमान और सलामती के साथ
وَ الْاِحْسَانِ وَ كَمَا بَلَّغْتَنَا اَوَّلَهٗ فَبَلِّغْنَا آخِرَهٗ
वल इहसानि व कमा बल्लग़्तना अव्वलहू फ़बल्लिग़ना आख़िरहू
और एहसान के साथ, जैसे तूने हमें इसका शुरू दिखाया वैसे ही इसका आख़िर भी नसीब फ़रमा
وَ اجْعَلْهُ شَهْرًا مُبَارَكًا تَمْحُوْ فِيْهِ السَّيِّئَاتِ
वज्अल्हु शहरन मुबारकन तम्हू फीहिस्सय्यिआत
और इसे बरकत वाला महीना बना जिसमें तू गुनाहों को मिटा दे
وَ تَرْفَعُ لَنَا فِيْهِ الدَّرَجَاتِ يَا عَظِيْمَ الْخَيْرَاتِ
व तरफ़उ लना फीहिद्दरजात या अज़ीमल ख़ैरात
और हमारे दर्जों को बुलंद फ़रमा, ऐ बड़ी भलाइयों वाले

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पचास 50 रजब और दूसरे महीनों के नये चाँद की दुआ
91. अल-इक़बाल में अल-दावात से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) रजब के नये चाँद पर यह दुआ पढ़ते थे:
اَللّٰہُمَّ اَہِلَّہٗ عَلَیْنَا بِالْاَمْنِ وَ الْاِیْمَانِ
अल्लाहुम्मा अहिल्लहू अलैना बिलअम्नि वल ईमानि
ऐ अल्लाह! इस नये चाँद को हम पर अमन और ईमान के साथ ज़ाहिर फ़रमा
وَ السَّلَامَۃِ وَ الْاِسْلَامِ
वस्सलामति वल इस्लामि
और सलामती और इस्लाम के साथ
رَبِّیْ وَ رَبُّكَ اللہُ عَزَّ وَ جَلَّ
रब्बी व रब्बुकल्लाहु अज़्ज़ा व जल्ल
मेरा रब और तेरा रब अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल है
92. यह भी रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) रजब का नया चाँद देखते तो फरमाते थे:
اَللّٰہُمَّ بَارِكْ لَنَا فِیْ رَجَبٍ وَ شَعْبَانَ
अल्लाहुम्मा बारिक लना फी रजबिन व शाबान
ऐ अल्लाह! रजब और शाबान में हमारे लिये बरकत अता फ़रमा
وَ بَلِّغْنَا شَہْرَ رَمَضَانَ
व बल्लिग़ना शह्र रमज़ान
और हमें माहे रमज़ान तक पहुँचा दे
وَ اَعِنَّا عَلَی الصِّیَامِ وَ الْقِیَامِ
व अइन्ना अलस्सियामि वल क़ियाम
और रोज़ा रखने और क़ियाम करने में हमारी मदद फ़रमा
وَ حِفْظِ اللِّسَانِ وَ غَضِّ الْبَصَرِ
व हिफ़ज़िल्लिसानि व ग़ज़्ज़िल बसर
और ज़बान की हिफ़ाज़त और नज़र नीची रखने की तौफ़ीक़ दे
وَ لَا تَجْعَلْ حَظَّنَا مِنْہُ الْجُوْعَ وَ الْعَطَشَ
व ला तज्अल हज़्ज़ना मिन्हुल जूअ वल अतश
और इसमें हमारा हिस्सा सिर्फ़ भूख और प्यास न बना
93. यह भी रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) नया चाँद देखते तो तीन बार तकबीर और तीन बार तौहीद पढ़ते, फिर यह फरमाते थे:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ اَذْهَبَ شَهْرَ كَذَا وَ جَاءَ بِشَہْرِ كَذَا
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अज़हबा शह्र कज़ा व जाआ बिशह्र कज़ा
तमाम हम्द उस अल्लाह के लिये है जिसने फलाँ महीना ख़त्म किया और फलाँ महीना ले आया

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इक्यावन 51 ज़ोहर की नमाज़ के बाद की दुआ
94. फला‍ह अस-साएल में मुहम्मद बिन अबी अब्दिल्लाह बिन मुहम्मद तमीमी से, अबुल हसन अली बिन मुहम्मद (अ.) से, अपने वालिद (अ.) से, अपने बाप-दादाओं (अ.) से, अबू अब्दिल्लाह (अ.) से, और अमीरुल मोमिनीन (अ.) से रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) के बारे में रिवायत है कि:
ज़ोहर की नमाज़ के बाद आप (स.अ.व.अ.) यह दुआ पढ़ते थे:
لَا اِلٰهاِلٰهَ اِلَّا اللهُ الْعَظِيْمُ الْحَلِيْمُ
ला इलाहा इल्लल्लाहुल अज़ीमुल हलीम
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, जो बहुत अज़ीम और बहुत हलीम है
لَا اِلٰهَ اِلَّا اللهُ رَبُّ الْعَرْشِ الْكَرِيْمُ
ला इलाहा इल्लल्लाहु रब्बुल अर्शिल करीम
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, जो अर्शे करीम का रब है
الْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن
अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन
तमाम हम्द अल्लाह के लिये है जो तमाम जहानों का परवरदिगार है
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ مُوْجِبَاتِ رَحْمَتِكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुक मूजिबाते रहमतिका
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी रहमत के वाजिब कर देने वाले असबाब माँगता हूँ
وَ عَزَآئِمَ مَغْفِرَتِكَ وَ الْغَنِيْمَةَ مِنْ كُلِّ بِرٍّ
व अज़ाइम मग़फ़िरतिका वल ग़नीमत मिन कुल्लि बिर्र
और तेरी बख़्शिश को पक्का करने वाली चीज़ें, और हर नेकी से फ़ायदा
السَّلاَمَةَ مِنْ كُلِّ اِثْمٍ
अस्सलामता मिन कुल्लि इस्म
और हर गुनाह से सलामती
اَللّٰهُمَّ لَا تَدَعْ لِيْ ذَنْبًا اِلَّا غَفَرْتَهٗ
अल्लाहुम्मा ला तदअ ली ज़नबन इल्ला ग़फ़रतहू
ऐ अल्लाह! मेरे लिये कोई गुनाह न छोड़ मगर यह कि तू उसे माफ़ कर दे
وَ لَا هَمًّا اِلَّا فَرَّجْتَهٗ
व ला हम्मन इल्ला फ़र्रजतहू
और कोई ग़म न छोड़ मगर यह कि तू उसे दूर कर दे
وَ لَا سُقْمًا اِلَّا شَفَيْتَهٗ
व ला सुक़्मन इल्ला शफ़ैतहू
और कोई बीमारी न छोड़ मगर यह कि तू उसे शिफ़ा दे
وَ لَا عَيْبًا اِلَّا سَتَرْتَه
व ला ऐबन इल्ला सतरतहू
और कोई ऐब न छोड़ मगर यह कि तू उसे छुपा दे
وَ لَا رِزْقًا اِلَّا بَسَطْتَهٗ
व ला रिज़्क़न इल्ला बसतहू
और कोई रोज़ी न छोड़ मगर यह कि तू उसे बढ़ा दे
وَ لَا خَوْفًا اِلَّا آمَنْتَهٗ
व ला ख़ौफ़न इल्ला आमन्तहू
और कोई डर न छोड़ मगर यह कि तू उससे अमन अता कर दे
وَ لَا سُوْءً اِلَّا صَرَفْتَهٗ
व ला सूअन इल्ला सरफ़तहू
और कोई बुराई न छोड़ मगर यह कि तू उसे दूर कर दे
وَ لَا حَاجَةً هِيَ لَكَ رِضًا
व ला हाजतन हिया लका रज़न
और मेरी कोई ऐसी ज़रूरत जो तेरी रज़ा में हो
وَ لِيَ فِيْهَا صَلاَحٌ اِلَّا قَضَيْتَهَا
व लिय फ़ीहा सलाहुन इल्ला क़ज़ैतहा
और मेरे लिये उसमें भलाई हो, तो उसे पूरा फ़रमा दे
يَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ آمِيْنَ رَبَّ الْعَالَمِيْنَ
या अरहमर राहिमीन, आमीन रब्बल आलमीन
ऐ सबसे बढ़कर रहम करने वाले! आमीन, ऐ तमाम जहानों के रब

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बावन 52 ज़ोहर की नाफ़िला की हर दो रकअत के बाद की दुआ
95. फ़लाह अस-साएल में फ़ातिमा बिन्त अल-हसन (स.) से, और उन्होंने अपने वालिद हज़रत हसन बिन अली (अ.) से रिवायत की कि:
रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) ज़ोहर की नाफ़िला की हर दो रकअत के दरमियान यह दुआ पढ़ते थे:
اَنْتَ اَكْرَمُ مَاْتِيٍّ وَ اَكْرَمُ مَزُوْراَللّٰهُمَّ ٍ
अन्त अक़रमु मातिय्यिन व अक़रमु मज़ूरन अल्लाहुम्मा
ऐ अल्लाह! तू सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला है जिसके पास आया जाता है, और सबसे ज़्यादा करम करने वाला है जिसकी ज़ियारत की जाती है
وَ خَيْرُ مَنْ طُلِبَتْ اِلَيْهِ الْحَاجَاتُ
व ख़ैरु मन तुलिबत इलैहिल हाजात
और तू सबसे बेहतर है जिससे हाजतें माँगी जाती हैं
وَ اَجْوَدُ مَنْ اَعْطٰى وَ اَرْحَمُ مَنِ اسْتُرْحَمَ
व अजवदु मन अअता व अरहमु मनिस्तुरहिमा
और तू देने में सबसे ज़्यादा सख़ी है, और रहम माँगे जाने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है
وَ اَرْاَفُ مَنْ عَفَا وَ اَعَزُّ مَنِ اعْتُمِدَ عَلَیْہِ
व अरअफ़ु मन अफ़ा व अअज़्ज़ु मनिअतमदा अलैह
और माफ़ करने वालों में सबसे ज़्यादा नर्म है, और भरोसा किये जाने वालों में सबसे ज़्यादा ताक़तवर है
اَللّٰهُمَّ بِيْاِلَيْكَ فَاقَۃٌ وَ لِیْ اِلَیْكَ حَاجَاتٌ
अल्लाहुम्मा बी इलैका फ़ाक़तुन व ली इलैका हाजातुन
ऐ अल्लाह! मैं तेरा मोहताज हूँ और मेरी कई ज़रूरतें तुझ से वाबस्ता हैं
وَ لَكَ عِنْدِيْ طَلِبَاتٌ مِنْ ذُنُوْبٍ اَنَا بِهَا مُرْتَهَنٌ
व लक इन्दी तलिबातुन मिन ज़ुनूबिन अना बिहा मुरतहनुन
और मेरे ऊपर तेरे हक़ हैं मेरे गुनाहों की वजह से जिनमें मैं गिरफ़्तार हूँ
وَ قَدْ اَوْقَرَتْ ظَهْرِيْ وَ اَوْبَقَتْنِيْ
व क़द औक़रत ज़हरी व औबक़तनी
जिन्होंने मेरी कमर तोड़ दी है और मुझे हलाक़ी में डाल दिया है
وَ اِلَّتَرْحَمْنِيْا
व इल्ला तरहम्नी
और अगर तू मुझ पर रहम न करेगा
وَ تَغْفِرْ لِيْ اَكُنْ مِنَ الْخَاسِرِيْن
व तग़फ़िर ली अकुन मिनल ख़ासिरीन
और मुझे माफ़ न करेगा तो मैं ज़रूर नुक़सान उठाने वालों में हो जाऊँगा
ااَللّٰهُمَّ اَللّٰهُمَّ عْتَمَدْتُكَ فِيْهَا تَائِبًا اِلَيْكَ
अल्लाहुम्मा अल्लाहुम्मा इतमदतुका फीहा ताइबन इलैक
ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! मैंने इस मामले में तुझ पर ही भरोसा किया है और तेरी तरफ़ तौबा करते हुए लौटा हूँ
فَصَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ
फ़सल्लि अला मुहम्मद व आलेही
तो मुहम्मद और उनकी आल पर दरूद भेज
وَ اغْفِرْ لِيْ ذُنُوْبِيْ كُلَّهَا قَدِيْمَهَا
वग़फ़िर ली ज़ुनूबी कुल्लहा क़दीमह़ा
और मेरे तमाम गुनाहों को माफ़ कर दे, चाहे पुराने हों
وَ حَدِيْثَهَا سِرَّهَا وَ عَلَانِيَتَهَا خَطَاَهَا
व हदीसहा सिर्रहा व अलानियतहा ख़ताहा
या नए हों, छुपे हुए हों या ज़ाहिर, ग़लती से हुए हों
وَ عَمْدَهَا صَغِيْرَهَا وَ كَبِيْرَهَا
व अम्दहा सग़ीरहा व कबीरहा
या जानबूझ कर किए गए हों, छोटे हों या बड़े
وَ كُلَّ ذَنْبٍ اَذْنَبْتُهٗ وَ اَنَا مُذْنِبُهٗ مَغْفِرَةً
व कुल्ल ज़म्बिन अज़नबतूहु व अना मुज़निबुहू मग़फ़िरतन
और हर वह गुनाह जो मैंने किया है, ऐसी माफ़ी के साथ
جَزْمًا لَا تُغَادِرُ ذَنْبًا وَاحِدًا
जज़्मन ला तुग़ादिरु ज़म्बन वाहिदन
जो किसी एक भी गुनाह को बाक़ी न छोड़े
وَ لَا اَكْتَسِبُ بَعْدَهَا مُحَرَّمًا اَبَدًا
व ला अकतसिबु बादहा मुहर्रमन अबदन
और उसके बाद मैं कभी किसी हराम का इरतिकाब न करूँ
وَ اقْبَلْ مِنِّيْ الْيَسِيْرَ مِنْ طَاعَتِكَ
वक़बल मिन्निल यसिर मिन ताअतिका
और मेरी थोड़ी सी इताअत को क़बूल फ़रमा
وَ تَجَاوَزْ لِيْ عَنِ الْكَبِيْرِ
व तजावज़ ली अनिल कबीर
और मेरी बड़ी नाफ़रमानियों से दरगुज़र फ़रमा
ظِيْمُ اِنَّهٗ لَا يَغْفِرُ الْعَظِيْمَيَا عَ يَا مِنْ مَعْصِيَتِكَ
या अज़ीम! या अज़ीम! तेरी मआसियत का गुनाह बहुत बड़ा है
ऐ अज़ीम! ऐ अज़ीम! तेरी नाफ़रमानी का गुनाह बहुत बड़ा है
اِلَّا الْعَظِيْمُ يَسْئَلُهٗ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ
इल्लल अज़ीमु यसअलुहू मन फ़िस्समावात
मगर बड़े गुनाहों को वही अज़ीम माफ़ करता है जिससे आसमानों वाले मांगते हैं
وَ الْاَرْضِ كُلَّ يَوْمٍ هُوَ فِي شَاْنٍ
वल अर्ज़ कुल्ल यौमिन हुआ फी शानिन
और ज़मीन वाले भी, वह हर रोज़ एक नए शान में होता है
يَا مَنْ هُوَ كُلَّ يَوْمٍ
या मन हुआ कुल्ल यौमिन
ऐ वह जो हर दिन
فِي شَاْنٍ صَلِّ وَ آلِعَلٰى مُحَمَّدٍ هٖ
फी शानिन सल्लि अला मुहम्मद व आलेही
एक नई शान में होता है, मुहम्मद और उनकी आल पर दरूद भेज
وَ اجْعَلْ لِيْ فِيْ شَاْنِكَ شَاْنَ حَاجَتِيْ
वजअल ली फी शानिका शान हाजती
और अपनी शान में मेरी हाजत को शामिल कर ले
وَ حَاجَتِيْ هِيَ فَكَاكُ رَقَبَتِيْ مِنَ النَّارِ
व हाजती हिया फ़काक़ु रक़बती मिनन्नार
और मेरी हाजत यह है कि मेरी गर्दन को जहन्नम से आज़ाद कर दे
وَ الْاَمَانُ مِنْ سَخَطِكَ
वल अमानु मिन सख़तिका
और तेरे ग़ज़ब से अमन अता फ़रमा
وَ الْفَوْزُ بِرِضْوَانِكَ وَ جَنَّتِكَ
वल फ़ौज़ु बिरिज़वानिका व जन्नतिका
और तेरी रज़ा और तेरी जन्नत की कामयाबी नसीब फ़रमा
وَ امْنُنْ بِذٰلِكَ عَلَيَّ
वम्नुन बिज़ालिका अलय्या
और यह सब मुझ पर अपने फ़ज़ल से अता फ़रमा
وَ بِكُلِّ مَا فِيْهِ صَلَاحِيْ
व बिकुल्लि मा फीहि सलाहि
और हर वह चीज़ अता फ़रमा जिसमें मेरी भलाई है
بِنُوْرِكَ السَّاطِعِ فِي الظُّلُمَاتِ
बि नूरीका-स्सातिʿ फ़िज़्-ज़ुलुमात
मैं तुझ से सवाल करता हूँ तेरी उस रौशनी के वासते जो तारीकियों में चमकती है
اَنْ تُصَلِّيَعَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّد
अन तुसल्लिया अला मुहम्मद व आले मुहम्मद
कि तू मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दुरूद भेजे
وَ لَا تُفَرِّقْ بَيْنِيْ وَ بَيْنَهُمْ فِي الدُّنْيَا
व ला तुफ़र्रिक़ बैनी व बैन्हुम फ़िद्-दुनिया
और दुनिया में मुझे उनसे जुदा न करना
كُلِّ شَيْءٍ قَدِيْرٌ وَ الْآخِرَةِ اِنَّكَ عَلٰى
वल आख़िरति इन्नका अला कुल्लि शैइन क़दीर
और आख़िरत में भी, बेशक तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है
اَللّٰهُمَّ وَ اكْتُبْ لِيْ عِتْقًا مِنَ النَّارِ مَبْتُوْلًا
अल्लाहुम्मा वकतु्ब ली इत्क़न मिनन-नारि मबतूलन
ऐ अल्लाह! मेरे लिए जहन्नम की आग से मुकम्मल आज़ादी लिख दे
وَ اجْعَلْنِيْ مِنَ الْمُنِيْبِيْنَ اِلَيْكَ التَّابِعِيْنَ
वज्-अल्नी मिनल-मुनीबीन इलेक अत-ताबिईन
और मुझे अपनी तरफ़ रुजू करने वालों और तेरे फ़रमान की पैरवी करने वालों में शामिल कर
لِاَمْرِكَ الْمُخْبِتِيْنَ الَّذِيْنَ اِذَا ذُكِرْتَ
लि-अम्रिकल मुख़बितीन अल्लज़ीना इज़ा ज़ुकिरता
जो तेरे हुक्म के सामने झुकने वाले हैं, और जब तू याद किया जाता है
وَجِلَتْ قُلُوْبُهُمْ وَ الْمُسْتَكْمِلِيْنَ مَنَاسِكَهُمْ
वजिलत क़ुलूबुहुम वल-मुस्तक्मिलीन मनासिकहुम
तो जिनके दिल डर से कांप उठते हैं और जो अपने आमाल मुकम्मल करते हैं
وَ الصَّابِرِيْنَ فِي الْبَلَاءِ وَ الشَّاكِرِيْنفِي الرَّخَاءِ
वस्साबिरीन फ़िल-बला वश्शाकिरीन फ़िर-रख़ा
जो मुसीबत में सब्र करते हैं और आसानी में शुक्र अदा करते हैं
وَ الْمُطِيْعِيْنَ لِاَمْرِكَ فِيْمَا اَمَرْتَهُمْ بِهٖ
वल-मुतीईन लि-अम्रिका फीमा अमरतहुम बिही
और जो तेरे हर हुक्म में तेरी इताअत करते हैं
وَ الْمُقِيْمِيْنَ الصَّلَاةَ وَ الْمُؤْتِيْنَ الزَّكَاة
वल-मुक़ीमीन अस्सलात वल-मुअतीन अज़्-ज़कात
जो नमाज़ क़ायम करते हैं और ज़कात अदा करते हैं
وَ الْمُتَوَكِّلِيْنَ عَلَيْكَ.
वल-मुतवक्किलीन अलैक
और जो तुझ पर पूरा भरोसा रखते हैं
اَللّٰهُمَّ اَضْعِفْنِيْ يَا كَرِيْمُ كَرَامَتَكَ
अल्लाहुम्मा अज़्इफ़्नी या करीमु करामतका
ऐ अल्लाह! ऐ करीम! अपनी करामत मेरे लिए बढ़ा दे
وَ اَجْزِلْ لِيْ عَطِيَّتَكَ وَ الْفَضِيْلَةَ لَدَيْكَ
व अज्ज़िल ली अतिय्यतका वल-फ़ज़ीलत लदैका
और अपनी अता और फ़ज़ीलत मेरे लिए बहुत ज़्यादा कर दे
وَ الرَّاحَةَ مِنْكَ وَ الْوَسِيْلَةَ اِلَيْكَ
वर्-राहत मिनका वल-वसीलत इलैक
और अपनी तरफ़ से राहत और अपने क़रीब होने का ज़रिया अता कर
وَ الْمَنْزِلَةَ عِنْدَكَ مَا تَكْفِيْنِيْ
वल-मंज़िलत इन्दका मा तक्फ़ीनी
और अपने पास ऐसा मक़ाम दे जो मेरे लिए काफ़ी हो
بِهٖ كُلَّ هَوْلٍ دُوْنَ الْجَنَّةِ
बिही कुल्ला हौलिन दूनल-जन्नत
ताकि जन्नत के सिवा हर डर से मैं महफ़ूज़ रहूँ
وَ تُظِلُّنِيْ فِي ظِلِّ عَرْشِكَ يَوْمَ
व तुज़िल्लुनी फी ज़िल्लि अर्शिका यौमा
और उस दिन मुझे अपने अर्श के साए में जगह देना
لَا ظِلَّ اِلَّا ظِلُّكَ وَ تُعَظِّمُ نُوْرِيْ
ला ज़िल्ला इल्ला ज़िल्लुका व तुअज़्ज़िमु नूरी
जब तेरे साए के सिवा कोई साया न होगा, और मेरी रौशनी को बढ़ा देना
وَ تُعْطِيْنِيْ كِتَابِيْ بِيَمِيْنِيْ
व तुअतीनी किताबि बि-यमीनी
और मेरा आमालनामा मेरे दाहिने हाथ में देना
وَ تَحْشُرُنِيْ وَ تُضْعِفُ حَسَنَاتِيْ
व तह्शुरुनी व तुज़्इफ़ु हसनाती
और मुझे उठाना और मेरी नेकियों को कई गुना बढ़ा देना
فِيْ اَفْضَلِ الْوَافِدِيْنَ اِلَيْكَ
फ़ी अफ़ज़लिल-वाफ़िदीन इलैक
अपनी तरफ़ आने वालों में सबसे बेहतरीन लोगों के साथ
مِنَ الْمُتَّقِيْنَ وَ تُسْكِنَنِيْ فِيْ
मिनल-मुत्तक़ीन व तुस्किनुनी फी
परहेज़गारों में और मुझे ठहराना
عِلِّيِّيْنَ وَ اجْعَلْنِيْ مِمَّنْ تَنْظُرُ
इल्लीयीन वज्-अल्नी मिम्मन तंज़ुरु
उच्च दर्जों में, और मुझे उनमें से बना जिन पर तू नज़र-ए-करम करता है
اِلَيْهِ بِوَجْهِكَ الْكَرِيْمِ وَ تَتَوَفَّانِيْ
इलैहि बि-वज्हिकल करीमि व ततवफ़्फ़ानी
अपने करीम चेहरे के साथ, और मेरी रूह क़ब्ज़ करना
وَ اَنْتَ عَنِّيْ رَاضٍ
व अंता अन्नी राज़िन
इस हाल में कि तू मुझ से राज़ी हो
وَ اَلْحِقْنِيْ بِعِبَادِكَ الصَّالِحِيْنَ
व अल्हिक़नी बि-इबादिकस-सालिहीन
और मुझे अपने नेक बंदों से मिला दे
اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आलिही
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आले पर दुरूद भेज
وَ اقْلِبْنِيْ بِذٰلِكَ كُلِّهٖ مُفْلِحًا
व अक़लिब्नी बि-ज़ालिका कुल्लिही मुफ़लिहा
और इन सब के साथ मुझे कामयाब बना दे
مُنْجِحًا قَدْ غَفَرْتَ لِيْ خَطَايَايَ
मुन्जिहन क़द ग़फ़रता ली ख़तायाया
इस हाल में कि तू मेरी तमाम ख़ताएँ माफ़ कर चुका हो
وَ ذُنُوْبِيْ كُلَّهَا وَ كَفَّرْتَ عَنِّيْ سَيِّئَاتِيْ
व ज़ुनूबी कुल्लहा व कफ़्फ़रता अन्नी सय्यिआती
और मेरे सारे गुनाह और बुराइयाँ मिटा दी हों
وَ حَطَطْتَ عَنِّيْ وِزْرِيْ
व हततता अन्नी विज़्री
और मेरा बोझ उतार दिया हो
وَ شَفَّعْتَنِيْ فِيْ جَمِيْعِ حَوَائِجِيْ فِي الدُّنْيَا
व शफ़्फ़अतनी फी जमीअ हवाइजी फ़िद-दुनिया
और दुनिया में मेरी तमाम ज़रूरतें पूरी कर दी हों
وَ الْآخِرَةِ فِيْ يُسْرٍ مِنْكَ وَ عَافِيَةٍ.
वल-आख़िरति फी युस्रिन मिनका व आफ़ियतिन
और आख़िरत में भी आसानी और आफ़ियत अता फ़रमा
اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आलिही
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आले पर दुरूद भेज
وَ لَا تَخْلُطْ بِشَيْءٍ مِنْ عَمَلِيْ
व ला तख़्लुत बिशैइन मिन अमली
और मेरे किसी अमल को
وَ لَا بِمَا تَقَرَّبْتُ بِهٖ اِلَيْكَ رِيَاءً
व ला बिमा तक़र्रब्तु बिही इलैका रियाअन
दिखावे के साथ न मिला देना जिससे मैंने तेरी क़ुरबत चाही
وَ لَا سُمْعَةً وَ لَا اَشِرًا وَ لَا بَطِرًا
व ला सुमअतन व ला अशरन व ला बतरन
न दिखावे के लिए, न घमंड और न सरकशी के साथ
وَ اجْعَلْنِيْ مِنَ الْخَاشِعِيْنَ لَكَ
वज्-अल्नी मिनल-ख़ाशिईना लक
और मुझे अपने सामने झुकने वालों में शामिल फ़रमा
اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आलिही
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आले पर दुरूद भेज
وَ اَعْطِنِي السَّعَةَ فِيْ رِزْقِيْ
व अअतिनी अस्सअता फी रिज़्की
और मेरे रिज़्क़ में वुसअत अता फ़रमा
وَ الصِّحَّةَ فِيْ جِسْمِيْ
वस्सिह्हता फी जिस्मी
और मेरे जिस्म में सेहत अता कर
بَدَنِيْ عَلٰى طَاعَتِكَ وَ الْقُوَّةَ فِيْ
वल-क़ुव्वता फी बदनी अला ताअतिका
और बदन में इतनी क़ुव्वत दे कि मैं तेरी इताअत कर सकूँ
وَ عِبَادَتِكَ وَ اَعْطِنِيْ مِنْ رَحْمَتِكَ
व इबादतिका व अअतिनी मिन रहमतिका
और तेरी इबादत कर सकूँ, और अपनी रहमत से मुझे नवाज़
وَ رِضْوَانِكَ وَ عَافِيَتِكَ مَا تُسَلِّمُنِيْ بِهٖ
व रिज़्वानिका व आफ़ियतिका मा तुसल्लिमुनी बिही
और अपनी रज़ा और आफ़ियत अता कर जिससे तू मुझे महफ़ूज़ रखे
مِنْ كُلِّ بَلَاءِ الْآخِرَةِ وَ الدُّنْيَا
मिन कुल्लि बलाइल आख़िरति वद्दुन्या
दुनिया और आख़िरत की हर आफ़त से
وَ ارْزُقْنِي الرَّهْبَةَ مِنْكَ وَ الرَّغْبَةَ اِلَيْكَ
वर्-रज़ुक़नी अर्रह्बता मिनका वर्रग़्बता इलैक
और मुझे तुझ से डर और तेरी तरफ़ रग़बत अता फ़रमा
وَ الْخُشُوْعَ لَكَ وَ الْوَقَارَ وَ الْحَيَاءَ مِنْكَ
वल-ख़ुशूअ लका वल-वक़ार वल-हया मिनका
और तेरे लिए ख़ुशूअ, वक़ार और तुझ से हया अता कर
وَ التَّعْظِيْمَ لِذِكْرِكَ
वत्तअज़ीम लि-ज़िक्रिका
और तेरे ज़िक्र की अज़मत मेरे दिल में पैदा कर
وَ التَّقْدِيْسَ لِمَجْدِكَ اَيَّامَ حَيَاتِيحَتّٰى تَتَوَفَّانِيْ
वत्तक़दीस लि-मज्दिका अय्याम हयाती हत्ता ततवफ़्फ़ानी
और मेरी पूरी ज़िंदगी में तेरी बड़ाई की पाकीज़गी अता कर यहाँ तक कि तू मेरी रूह क़ब्ज़ करे
وَ اَنْتَ عَنِّيْ رَاضٍ
व अंता अन्नी राज़िन
इस हाल में कि तू मुझ से राज़ी हो
اَللّٰهُمَّ وَ اَسْاَلُكَ السَّعَةَ
अल्लाहुम्मा व असअलुका अस्सअता
ऐ अल्लाह! मैं तुझ से वुसअत का सवाल करता हूँ
وَ الدَّعَةَ وَ الْاَمْنَ وَ الْكِفَايَةَ
वद्दअता वल-अम्न वल-किफ़ायह
और सुकून, अमन और किफ़ायत का
وَ السَّلَامَةَ وَ الصِّحَّةَ وَ الْقُنُوْعَ
वस्सलामत वस्सिह्हत वल-क़ुनूअ
और सलामती, सेहत और क़नाअत का
وَ الْعَفْوَ وَ الْعِصْمَةَ وَ الْهُدٰى وَ الرَّحْمَةَ
वल-अफ़्व वल-इस्मत वल-हुदा वर्रहमत
और माफ़ी, गुनाह से हिफ़ाज़त, हिदायत और रहमत का
وَ الْعَافِيَةَ وَ الْيَقِيْنَ وَ الْمَغْفِرَة
वल-आफ़ियत वल-यक़ीन वल-मग़फ़िरह
और आफ़ियत, यक़ीन और मग़फ़िरत का
وَ الشُّكْرَ وَ الرِّضَا وَ الصَّبْرَ
वश्शुक्र वर्रज़ा वस्सब्र
और शुक्र, रज़ा और सब्र अता फ़रमा
وَ الْعِلْمَ وَ الصِّدْقَ وَ الْبِرَّ
वल-इल्म वस्सिद्क़ वल-बिर्र
और इल्म, सच्चाई और नेकी अता कर
وَ التَّقْوٰى وَ الْحِلْمَ وَ التَّوَاضُعَ
वत्तक़्वा वल-हिल्म वत्तवाज़ुअ
और तक़्वा, हिल्म और आज़िज़ी अता फ़रमा
وَ الْيُسْرَ وَ التَّوْفِيْقَ.
वल-युस्र वत्तौफ़ीक़
और आसानी और तौफ़ीक़ अता कर
اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद व आलिही
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेज
وَ اعْصِمْ بِذٰلِكَ اَهْلَ بَيْتِيْ وَ قُرُبَاتِيْ
वअ़सिम बि-ज़ालिका अहल बैती व क़ुरुबाती
और इसी के ज़रिये मेरे अहले-बैत और क़रीबी रिश्तेदारों की हिफ़ाज़त फ़रमा
وَ اِخْوَانِيْ فِيْكَ وَ مَنْ اَحْبَبْتُ
व इख़वानी फीका व मन अहबब्तु
और मेरे दीनी भाइयों की और उन लोगों की जिनसे मैं मोहब्बत करता हूँ
وَ اَحَبَّنِيْ فِيْكَ اَوْ وَلَّیْتُهٗ وَ
व अहब्बनी फीका औ वल्लैतुहु
और जो तेरी ख़ातिर मुझसे मोहब्बत करते हैं
وَلَدَنِيْ مِنْ جَمِيْعِ الْمُؤْمِنِيْنَ وَ الْمُؤْمِنَاتِ
वलदनी मिन जमीइल मोमिनीन वल मोमिनात
और तमाम मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों की
وَ الْمُسْلِمِيْنَ وَ الْمُسْلِمَاتِ
वल-मुस्लिमीन वल-मुस्लिमात
और तमाम मुसलमान मर्दों और मुसलमान औरतों की
رَبِّ حُسْالظَّنِّ بِكَ وَ الصِّدْقَ فِيْ التَّوَكُّلِ عَلَيْكوَ اَسْاَلُكَ يَا َن
रब्बि हुस्नज़्-ज़न्नि बिका वस्सिद्क़ा फित्तवक्कुलि अलैक व असअलुका यान
और ऐ मेरे रब! मैं तुझ से अच्छा गुमान और तुझ पर सच्चा भरोसा मांगता हूँ
وَ اَعُوْذُ بِكَ يَا رَبِّ اَنْ تَبْتَلِيَنِيْ
व अऊज़ु बिका या रब्बि अन तबतलियनी
और ऐ मेरे रब! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ कि तू मुझे आज़माए
بِبَلِيَّةٍ تَحْمِلُنِيْ ضَرُوْرَتُهَا عَلَى التَّغَوُّثِ
बि-बलिय्यतिन तह्मिलुनी ज़रूरतुहा अलत्तग़व्वुस
ऐसी आज़माइश में जो मुझे मजबूर कर दे
بِشَيْءٍ مِنْ مَعَاصِيْكَ
बि-शयइं मिन मआस़ीक
कि मैं तेरी नाफ़रमानियों की तरफ़ झुक जाऊँ
وَ اَعُوْذُ بِكَ يَا رَبِّ اَنْ اَكُوْنَ
व अऊज़ु बिका या रब्बि अन अकूना
और ऐ मेरे रब! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ कि मैं कभी
فِيْ حَالِ عُسْرٍ اَوْ يُسْرٍ اَظُنُّ
फी हाले उस्रिन औ युस्रिन अज़ुन्नु
तंगी हो या आसानी, ये गुमान करूँ
اَنَّ مَعَاصِيَكَ اَنْجَحُ فِيْ طَلِبَتِيْ مِنْ طَاعَتِكَ
अन्ना मआस़ियका अंजहू फी तलिबती मिन ताअतिका
कि तेरी इताअत के बजाय गुनाह मेरे लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद होंगे
اَعُوْذُ بِكَ مِنْ تَكَلُّفِوَ
अऊज़ु बिका मिन तकल्लुफ़
और मैं तेरी पनाह चाहता हूँ ज़्यादती से
مَا لَمْ تُقَدِّرْ لِيْ فِيْهِ رِزْقًا
मा लाम तुक़द्दिर ली फीहि रिज़्क़न
उस चीज़ में जिसे तूने मेरे लिए मुक़द्दर नहीं किया
وَ مَا قَدَّرْتَ لِيْ مِنْ رِزْقٍ
व मा क़द्दरता ली मिन रिज़्क़िन
और जो रिज़्क़ तूने मेरे लिए मुक़र्रर किया है
فَصَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ وَ آتِنِيْ بِهٖ
फसल्लि अला मुहम्मद व आलिही व आतिनी बिही
तो मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेज और वही मुझे अता फ़रमा
فِيْ يُسْرٍ مِنْكَ وَ عَافِيَةٍ يَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ
फी युस्रिन मिनका व आफ़ियतिन या अरहमर्राहिमीन
आसानी और आफ़ियत के साथ, ऐ सब से ज़्यादा रहम करने वाले

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पचपन 53. फज्र की नमाज़ के बाद की दुआ
96. अल-फ़क़ीह में रिवायत है: रसूलुल्लाह (स.अ.व.अ.) फज्र की नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ा करते थे:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَ الْحُزْنِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल हम्मि वल हुज़्न
ऐ अल्लाह! मैं तुझ से ग़म और उदासी से पनाह माँगता हूँ
وَ الْعَجْزِ وَ الْكَسَلِ وَ الْبُخْل
वल-अज़्ज़ि वल-कसलि वल-बुख़्ल
और बेबसी, सुस्ती और बुख़्ल से
وَ الْجُبْنِ وَ ضَلْعِ الدَّيْنِ
वल-जुब्नि व ज़ल्अिद्-दैन
और बुज़दिली और दीन से हट जाने से
وَ غَلَبَةِ الرِّجَالِ وَ بَوَارِ الْاَيَّمِ
व ग़लबतिर-रिजालि व बवारिल-अय्याम
और लोगों के ग़लबे और उम्र के ज़ाया होने से
وَ الْغَفْلَةِ وَ الذِّلَّةِ وَ الْقَسْوَةِ
वल-ग़फ़लति वज़्-ज़िल्लति वल-क़सवति
और ग़फ़लत, ज़िल्लत और सख़्ती से
وَ الْعَيْلَةِ وَ الْمَسْكَنَةِ
वल-अयलति वल-मस्कनति
और तंगदस्ती और मुफ़लिसी से
وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ نَفْسٍ لَا تَشْبَعُ
व अऊज़ु बिका मिन नफ़्सिन ला तश्बअ
और मैं तुझ से उस नफ़्स से पनाह चाहता हूँ जो कभी तृप्त नहीं होता
وَ مِنْ قَلْبٍ لَا يَخْشَعُ
व मिन क़ल्बिन ला यख़्शअ
और उस दिल से जो ख़ुशूअ नहीं रखता
وَ مِنْ عَيْنٍ لَا تَدْمَعُ وَ مِنْ دُعَاءٍ لَا يُسْمَع
व मिन अय्निन ला तदमअ व मिन दुआइन ला युस्मअ
और उस आँख से जिसमें आँसू न हों और उस दुआ से जो क़बूल न हो
وَ مِنْ صَلَاةٍ لَا تَنْفَع
व मिन सलातिन ला तनफ़अ
और उस नमाज़ से जो फ़ायदा न दे
تُرْفَعُ وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنِ امْرَاَةٍ تُشَيِّبُنِيْ قَبْلَ اَوَانَ
तुर्फ़अ व अऊज़ु बिका मिनिम्रअतिन तुशैय्यिबुनी क़ब्ल अवान
और मैं तुझ से ऐसी औरत से पनाह चाहता हूँ जो मुझे वक़्त से पहले बूढ़ा कर दे
مَشِيْبِيْ وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ وَلَدٍ يَكُوْنُ عَلَيَّ رِبًّا
मशीबी व अऊज़ु बिका मिन वलदिन यकूनु अलय्या रिब्बन
और ऐसे बेटे से पनाह चाहता हूँ जो मुझ पर बोझ बन जाए
وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ مَالٍ يَكُوْنُ عَلَيَّ عَذَابًا
व अऊज़ु बिका मिन मालिन यकूनु अलय्या अज़ाबन
और ऐसे माल से पनाह चाहता हूँ जो मेरे लिए अज़ाब बन जाए
وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ صَاحِبِ خَدِيْعَةٍ
व अऊज़ु बिका मिन साहिबि ख़दीअतिन
और धोखेबाज़ साथी से पनाह चाहता हूँ
اِنْ رَاَى حَسَنَةٍ دَفَنَهَا
इन रआ हसनतन दफ़नहा
जो किसी नेकी को देखे तो उसे छुपा ले
وَ اِنْ رَاَىْ سَيِّئَةً اَفْشَاهَا
व इन रआ सय्यिअतन अफ़्शाहा
और किसी बुराई को देखे तो फैला दे
اَللّٰهُمَّ لَا تَجْعَلْ لِفَاجِرٍ عَلَیَّ عِنْدِيْ
अल्लाहुम्मा ला तजअल लि-फ़ाजिरिन अलय्या इन्दी
ऐ अल्लाह! किसी बदकार को मुझ पर एहसान करने का मौक़ा न दे
يَدًا وَ لَا مِنَّةً.
यदन वला मिन्नतन
और न ही उसे मुझ पर कोई हक़ जता पाने दे

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चौवन 54. रमज़ान की पहली रात की दुआ
97. अल-मुस्तद्रक (अल-इक़बाल से): हज़रत रसूलुल्लाह (स.अ.व.) रमज़ान के महीने की पहली रात यह दुआ पढ़ा करते थे:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ اَكْرَمَنِيْ بِكَ اَيُّهَا الشَّهْرُ الْمُبَارَكُ
अल-हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अकरमनी बिका अय्युहश्शह्रुल मुबारकु
तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जिसने ऐ बरकत वाले महीने, मुझे तेरे ज़रिये इज़्ज़त अता की
اَللّٰهُمَّ فَقَوِّنَا عَلٰى صِيَامِنَا
अल्लाहुम्मा फ़क़व्विना अला सियामिना
ऐ अल्लाह! हमें हमारे रोज़ों पर क़ुव्वत अता फ़रमा
وَ قِيَامِنَا وَ ثَبِّتْ اَقْدَامَنَا
व क़ियामिना व सब्बित अक़दामना
और हमारी क़ियाम (नमाज़) में हमें साबित क़दम रख
وَ انْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِيْنَ
व अनसुरना अलल-क़ौमिल काफ़िरीन
और हमें काफ़िर क़ौम पर मदद अता फ़रमा
اَللّٰهُمَّ اَنْتَ الْوَاحِدُ فَلَا وَلَدَ لَكَ
अल्लाहुम्मा अन्तल वाहिदु फ़ला वलदा लक
ऐ अल्लाह! तू एक है, तेरा कोई बेटा नहीं
وَ اَنْتَ الصَّمَدُ فَلَا شِبْهَ لَكَ
व अन्तस्समदु फ़ला शिब्हा लक
और तू बेनियाज़ है, तेरे जैसा कोई नहीं
وَ اَنْتَ الْعَزِيْزُ فَلَا يُعِزُّكَ شَيْءٌ
व अन्तल अज़ीज़ु फ़ला युइज़्ज़ुका शयء
और तू ग़ालिब है, कोई चीज़ तुझे ग़ालिब नहीं बनाती
وَ اَنْتَ الْغَنِيُّ وَ اَنَا الْفَقِيْرُ
व अन्तल ग़निय्यु व अनल फ़क़ीरु
तू बेनियाज़ है और मैं मोहताज हूँ
وَ اَنْتَ الْمَوْلٰى وَ اَنَا الْعَبْدُ
व अन्तल मौला व अनल अब्दु
तू मेरा मौला है और मैं तेरा बंदा हूँ
وَ اَنْتَ الْغَفُوْرُ وَ اَنَا الْمُذْنِبُ
व अन्तल ग़फ़ूरु व अनल मुज़निबु
तू बहुत बख़्शने वाला है और मैं गुनहगार हूँ
وَ اَنْتَ الرَّحِيْمُ وَ اَنَا الْمُخْطِئُ
व अन्तर्रहीमु व अनल मुख़्तिउ
तू रहम करने वाला है और मुझसे ख़ता हुई है
وَ اَنْتَ الْخَالِقُ وَ اَنَا الْمَخْلُوْقُ
व अन्तल ख़ालिक़ु व अनल मख़लूक़ु
तू ख़ालिक़ है और मैं मख़लूक़ हूँ
وَ اَنْتَ الْحَيُّ وَ اَنَا الْمَيِّتُ
व अन्तल हय्यु व अनल मय्यितु
तू ज़िंदा है और मैं फ़ानी हूँ
اَسْاَلُكَ بِرَحْمَتِكَ اَنْ تَغْفِرَ لِيْ
असअलुका बिरहमतिका अन तग़फ़िर ली
मैं तेरी रहमत के वासिते से तुझसे सवाल करता हूँ कि तू मुझे बख़्श दे
وَ تَرْحَمَنِيْ وَ تَجَاوَزْ عَنِّيْ
व तरहमनी व तजावज़ अन्नी
और मुझ पर रहम फ़रमा और मेरी ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमा
اِنَّكَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيْر
इन्नका अला कुल्लि शयइन क़दीर
बेशक तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है

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पचास 55. सुबह और शाम की दुआ
98. अली इब्न इब्राहीम की तफ़्सीर में: हाशिम इब्न सालिम से, अबी अब्दिल्लाह (अ.) से, मेराज की हदीस में रिवायत है:
हज़रत रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फ़रमाया: “ऐ अल्लाह! तूने अपने नबियों को फ़ज़ीलत अता की, तो मुझे भी अता फ़रमा।” तो अल्लाह (स.व.त.) ने फ़रमाया: “मैं तुम्हें अपने अर्श के नीचे से दो जुमले अता करता हूँ:
لَا حَوْلَ وَ لَا قُوَّۃَ
ला हौल व ला क़ुव्वत
कोई ताक़त नहीं और कोई क़ुव्वत नहीं
اِلَّا بِاللہِ وَ لَا مَنْجَأَ مِنْكَ
इल्ला बिल्लाहि व ला मंज़ा मिंका
मगर अल्लाह के साथ, और तुझसे कोई पनाह नहीं
اِلَّا اِلَیْكَ
इल्ला इलैका
मगर तेरी ही तरफ़
आप (स.अ.व.) ने फ़रमाया: “फ़रिश्तों ने मुझे सिखाया कि मैं सुबह और शाम क्या पढ़ूँ:
اَللّٰهُمَّ اِنَّ ظُلْمِيْ اَصْبَحَ مُسْتَجِيْرًا
अल्लाहुम्मा इन्ना ज़ुल्मी अस्बह मुस्तजीरन
ऐ अल्लाह! मेरा ज़ुल्म तेरी माफ़ी में पनाह माँगता हुआ सुबह हुआ
بِعَفْوِكَ وَ ذَنْبِيْ اَصْبَحَ
बि-अफ़्विका व ज़न्बी अस्बह
और मेरा गुनाह भी पनाह माँगता हुआ सुबह हुआ
مُسْتَجِيْرًا بِمَغْفِرَتِكَ
मुस्तजीरन बि-मग़फ़िरतिका
तेरी बख़्शिश में
وَ ذُلِّيْ اَصْبَحَ مُسْتَجِيْرًا بِعِزَّتِكَ
व ज़ुल्ली अस्बह मुस्तजीरन बि-इज़्ज़तिका
और मेरी बेइज़्ज़ती तेरी इज़्ज़त में पनाह माँगती हुई सुबह हुई
وَ فَقْرِيْاَصْبَحَ مُسْتَجِيْرًا
व फ़क़्री अस्बह मुस्तजीरन
और मेरी ग़रीबी तेरी दौलत में पनाह माँगती हुई सुबह हुई
وَ وَجْهِيَ الْبَالِيَ الْفَانِيَ
व वज्हियल बालियल फ़ानिया
और मेरी फ़ानी हालत पनाह माँगती हुई
بِوَجْهِكَ الدَّائِمِ الْبَاقِي الَّذِيْ لَا يَفْنٰى.
बि-वज्हिकद् दाइमिल बाक़िल लज़ी ला यफ़ना
तेरी उस बाक़ी रहने वाली ज़ात में जो कभी फ़ना नहीं होती
... और मैं यही दुआ शाम को भी पढ़ता हूँ
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पचास 56. सूरज निकलते वक़्त की दुआ
99. इब्न ताऊस की किताब मुहासबातुन-नफ़्स में, किताब अर-रबी’ से, मुहम्मद अल-मुस्तकीन से रिवायत है: अबी जा’फ़र (अ.) से रिवायत में है कि उन्होंने फ़रमाया:
जब सूरज की सुर्ख़ी पहाड़ की चोटी तक पहुँचती थी, तो नबी-ए-करीम (स.अ.व.) की आँखों से आँसू बहने लगते थे और आप (स.अ.व.) फ़रमाते थे:
اَللّٰهُمَّ اَمْسٰى ظُلْمِيْ مُسْتَجِيْرًا بِعَفْوِكَ
अल्लाहुम्मा अम्सा ज़ुल्मी मुस्तजीरन बि-अफ़्विका
ऐ अल्लाह! शाम हो गई और मेरा ज़ुल्म तेरी माफ़ी में पनाह लेने वाला बन गया
وَ اَمْسَتْ ذُنُوْبِيْ مُسْتَجِيْرَةً بِمَغْفِرَتِكَ
व अम्सत ज़ुनूबी मुस्तजीरतं बि-मग़फ़िरतिका
और मेरे गुनाह तेरी बख़्शिश में पनाह लेने वाले बन गए
وَ اَمْسٰى خَوْفِيْ مُسْتَجِيْرًا بِاَمْنِكَ
व अम्सा ख़ौफ़ी मुस्तजीरन बि-अमनिका
और मेरा डर तेरी अमान में पनाह लेने वाला बन गया
وَ اَمْسٰى ضَعْفِيْ مُسْتَجِيْرًا بِقُوَّتِكَ
व अम्सा ज़अफ़ी मुस्तजीरन बि-क़ुव्वतिका
और मेरी कमज़ोरी तेरी क़ुव्वत में पनाह लेने वाली बन गई
وَ اَمْسٰى وَجْهِيَ الْبَالِيَ الْفَانِيْ
व अम्सा वज्हियल बालियल फ़ानी
और मेरी फ़ानी और मिटने वाली हालत
مُسْتَجِيْرًا بِوَجْهِكَ الدَّائِمِ الْبَاقِيْ
मुस्तजीरन बि-वज्हिकद् दाइमिल बाक़ी
तेरी हमेशा बाक़ी रहने वाली ज़ात में पनाह लेने वाली बन गई
اَلْبِسْنِيْ عَافِيَتَكَ وَ غَشِّنِيْ بِرَحْمَتِكَ
अल्बिस्नी आफ़ियतिका व ग़श्शिनी बि-रहमतिका
मुझे अपनी आफ़ियत पहनादे और मुझे अपनी रहमत से ढाँप ले
وَ جَلِّلْنِيْ كَرَامَتَكَ
व जल्लिल्नी करामतिका
और मुझे अपनी करामत से इज़्ज़त अता फ़रमा
وَ قِنِيْ شَرَّ خَلْقِكَ مِنَ الْجِنِّ
व क़िनी शर्र ख़लक़िका मिनल जिन्नि
और मुझे अपनी मख़लूक़ के शर से, जिन्नों से महफ़ूज़ रख
وَ الْاِنْسِ يَا اَللهُ يَا رَحْمٰنُ يَا رَحِيْمُ.
वल-इन्सि या अल्लाहु या रहमानु या रहीमु
और इंसानों से भी, ऐ अल्लाह! ऐ रहमान! ऐ रहीम!

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पचास 57. उनकी आम दुआओं में से
100. अल-बिहार में, दावत अर-रावंदी से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की दुआओं में से यह दुआ थी:
يَا مَنْ اَظْهَرَ الْجَمِيْلَ
या मन अज़हरल जमील
ऐ वह ज़ात जो खूबसूरती को ज़ाहिर करती है
وَ سَتَرَ الْقَبِيْحَ يَا مَنْ لَمْ يَهْتِكِ السِّتْرَ
व सतरल क़बीह या मन लम यहतिकिस सित्र
और बदनुमाई को छुपाती है, ऐ वह ज़ात जिसने परदा फ़ाश नहीं किया
وَ لَمْ يُؤَاخِذْ بِالْجَرِيْرَةِ
व लम युअाख़िज़ बिल-जरीरति
और गुनाह पर पकड़ नहीं की
يَا عَظِيْمَ الْعَفْوِ يَا حَسَنَ التَّجَاوُزِ
या अज़ीमल अफ़्वि या हसनत-तजावुज़
ऐ बहुत बड़ा माफ़ करने वाले! ऐ बेहतरीन दरगुज़र करने वाले!
يَا وَاسِعَ الْمَغْفِرَةِ يَا بَاسِطَ الْيَدَيْنِ
या वासिअल मग़फ़िरति या बासितल यदैन
ऐ बहुत वसीअ बख़्शिश वाले! ऐ हाथ फैलाकर देने वाले!
بِالرَّحْمَةِ يَا صَاحِبَ كُلِّ
बिर्रहमतِ या साहिब कुल्ले
रहमत के साथ! ऐ हर चीज़ के मालिक!
وَ مُنْتَهٰى كُلِّ شَكْوٰى يَا مُقِيْلَ الْعَثَرَاتِ
व मुंतहा कुल्ले शक्वा या मुक़ीलल असरात
और हर शिकायत की इंतिहा! ऐ ठोकरों को माफ़ करने वाले!
يَا كَرِيْمَ الصَّفْحِ يَا عَظِيْمَ الْمَنِّ
या करीमस्सफ़्हि या अज़ीमल मन्न
ऐ दरियादिल माफ़ करने वाले! ऐ बहुत बड़ा इनाम देने वाले!
يَا مُبْتَدِئًا بِالنِّعَمِ قَبْلَ اسْتِحْقَاقِهَا
या मुब्तदिअन बिन्निअम क़ब्लस्तिहक़ाक़िहा
ऐ हक़ से पहले नेमतें अता करने वाले!
يَا اَمَلَاهُ يَا رَبَّاهُ يَا سَيِّدَاهُ
या अमलाहु या रब्बाहु या सय्यिदाहु
ऐ मेरी उम्मीद! ऐ मेरे रब! ऐ मेरे मौला!
يَا غَايَةَ رَغْبَتَاهُ
या ग़ायत रग़बताहु
ऐ मेरी तमन्नाओं की इंतिहा!
اَسْاَلُكَ بِكَ يَا اَللهُ اَنْ لَا تُشَوِّهَ
असअलुका बिका या अल्लाहु अन ला तुशव्विहा
मैं तुझसे सवाल करता हूँ ऐ अल्लाह! कि मुझे बदसूरत न बनाए
خَلْقِيْ بِالنَّارِ وَ اَنْ تَقْضِيَ لِيْ
ख़लक़ी बिन्नारि व अन तक़ज़ी ली
जहन्नम की आग से, और मेरी ज़रूरतें पूरी फ़रमा
حَوَائِجَ آخِرَتِيْ وَ دُنْيَايَ وَ تَفْعَلَ بِيْ كَذَا
हवाइजा आख़िरती व दुनयाया व तफ़अल बी कज़ा
मेरी आख़िरत और मेरी दुनिया की, और मेरे साथ ऐसा और ऐसा कर
وَ كَذَا وَ تُصَلِّيَ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ.
व कज़ा व तुसल्लिया अला मुहम्मदिन व आले मुहम्मदिन
और मुझ पर ऐसे वैसे फ़ज़्ल फ़रमा, और मुहम्मद और आले मुहम्मद पर दरूद भेज
101. शैख़ अल-मुफ़ीद अल-अमाली में: जाबिर अल-जुफ़ी से, अबी जा’फ़र मुहम्मद इब्न अली (अ.) से, जाबिर इब्न अब्दुल्लाह अंसारी से, अल्लाह के रसूल (स.अ.व.) से रिवायत है कि उन्होंने एक हदीस में फ़रमाया:
जिब्रईल ने कहा: “ऐ मुहम्मद! हर वक़्त यह कहा करो
اَلْحَمْدُ لِلهِ رَبِّ الْعَالَمِيْنَ.
अल-हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन
तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जो तमाम जहानों का रब है
102. अल-मुहज्ज में: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की दुआओं में से दुआ-ए-फ़रज यह है:
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْم
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और बेहद रहम करने वाला है
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ يَا اَللهُ يَا اَللهُ يَا اَللهُ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका या अल्लाहु या अल्लाहु या अल्लाहु
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सवाल करता हूँ, ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह!
يَا مَنْ عَلَا فَقَهَرَ وَ يَا مَنْ بَطَنَ فَخَبَرَ
या मन अला फ़क़हरा व या मन बतना फ़ख़बरा
ऐ वह जो बुलंद होकर ग़ालिब है, और ऐ वह जो पोशीदा होकर हर चीज़ से बाख़बर है
وَ يَا مَنْ مَلَكَ فَقَدَرَ
व या मन मलका फ़क़दरा
और ऐ वह जो मालिक होकर क़ुदरत रखता है
وَ يَا مَنْ عُبِدَ فَشَكَرَ
व या मन उबिदा फ़शकरा
और ऐ वह जिसकी इबादत की जाती है और वह बदला अता करता है
وَ يَا مَنْ عُصِىَ فَغَفَرَ
व या मन उसिया फ़ग़फ़रा
और ऐ वह जिसकी नाफ़रमानी की जाती है फिर भी वह बख़्श देता है
يَا مَنْ لَا يُحِيْطُ بِهِ الْفِكَرُ
या मन ला युहीतु बिहिल फ़िकरु
ऐ वह जिसे सोच भी घेर नहीं सकती
يَا مَنْ لَا يُدْرِكُهٗ بَصَرُ
या मन ला युद्रिकुहू बस़रु
ऐ वह जिसे निगाहें नहीं पा सकतीं
وَ يَا مَنْ لَا يَخْفٰى عَلَيْهِ اَثَرٌ
व या मन ला यख़्फ़ा अलैहि असरुन
और ऐ वह जिससे कोई भी निशानी छुपी नहीं
يَا عَالِيَ الْمَكَانِ يَا شَدِيْدَ الْاَرْكَانِ
या आलियल मकानि या शदीदल अर्कानि
ऐ बुलंद मक़ाम वाले! ऐ मज़बूत बुनियाद वाले!
يَا مُنْزِلَ الْقُرْآنِ يَا مُبَدِّلَ الزَّمَانِ
या मुंज़िलल क़ुरआनि या मुबद्दिलज़ ज़मानि
ऐ क़ुरआन नाज़िल करने वाले! ऐ ज़माने को बदलने वाले!
يَا قَابِلَ الْقُرْبَانِ يَا
या क़ाबिलल क़ुरबानि
ऐ क़ुरबानी क़बूल करने वाले!
يَا ذَا الْمَنِّ وَ الْاِحْسَانِ وَ
या ज़ल मन्नि वल एहसानी व
ऐ एहसान और इनायत वाले!
يَا ذَا الْعِزِّ وَ السُّلْطَانِ
या ज़ल इज़्ज़ति वस्सुल्तानि
ऐ इज़्ज़त और बादशाहत वाले!
يَا رَحِيْمُ يَا رَحْمٰنُ يَا رَبَّ الْاَرْبَابِ
या रहीमु या रहमानु या रब्बल अरबाबि
ऐ रहीम! ऐ रहमान! ऐ तमाम रबों के रब!
يَا تَوَّابُ يَا وَهَّابُ يَا مُعْتِقَ الرِّقَابِ
या तव्वाबु या वह्हाबु या मुअतिक़र रिक़ाबि
ऐ तौबा क़बूल करने वाले! ऐ बहुत अता करने वाले! ऐ गर्दनों को आज़ाद करने वाले!
يَا مُنْشِئَالسَّحَابِ يَا مَنْ حَيْثُ
या मुन्शिअस्सहाबि या मन हैस़ु
ऐ बादलों को पैदा करने वाले! ऐ वह जो
مَا دُعِيَ اَجَابَ يَا مُرَخِّصَالْاَسْعَارِ
मा दुआ इया अजाबा या मुरख़्ख़िसल असआरि
जब पुकारा जाए तो क़बूल करता है, ऐ क़ीमतों को कम करने वाले!
يَا مُنزِّلَ الْاَمْطَارِ
या मुनज्ज़िलल अमतारि
ऐ बारिश उतारने वाले!
يَا مُنْبِتَ الْاَشْجَارِ فِي الْاَرْضِ الْقِفَارِ
या मुनबितल अश्जारि फ़िल अरज़िल क़िफ़ारि
ऐ बंजर ज़मीन में दरख़्त उगाने वाले!
يَا مُخْرِجَ النَّبَاتِ يَا مُحْيِيَ الْاَمْوَاتِ
या मुख़रिजन नबाति या मुहय्यिल अम्वाति
ऐ पौधों को निकालने वाले! ऐ मुर्दों को ज़िंदा करने वाले!
يَا مُقِيْلَ الْعَثَرَاتِ يَا كَاشِفَ الْكُرُبَاتِ
या मुक़ीलल असराति या काशिफ़ल कुरुबाति
ऐ لغزشों से दरगुज़र करने वाले! ऐ परेशानियाँ दूर करने वाले!
يَا مَنْ لَا تَضْجُرُهُ الْاَصْوَاتُ
या मन ला तज़्ज़ुरुहुल अस्वातु
ऐ वह जिसकी सुनने से आवाज़ें उसे उकता नहीं देतीं
وَ لَا تُشَبِّهُ عَلَيْهِ اللُّغَاتُ وَ لَا تَغْشَاهالظُّلُمَاتُ ُ
व ला तुशब्बिहु अलैहिल्लुग़ातु व ला तग़्शाहुज़ ज़ुलुमातु
और न भाषाएँ उस पर उलझन पैदा करती हैं और न अंधेरियाँ उसे ढाँपती हैं
يَا مُعْطِيَ السُؤْلَاتِ
या मुअतियस सुअलाति
ऐ सवालों को अता करने वाले!
يَا وَلِيَّ الْحَسَنَاتِ يَا دَافِعَ الْبَلِيَّاتِ
या वलिय्यल हसनाति या दाफ़िअल बलिय्याति
ऐ नेकीयों के सरपरस्त! ऐ आफ़तों को टालने वाले!
يَا قَابِلَ الصَّدَقَاتِ يَا قَابِلَ التَّوْبَاتِ
या क़ाबिलस सदक़ाति या क़ाबिलत तौबाति
ऐ सदक़ात क़बूल करने वाले! ऐ तौबा क़बूल करने वाले!
يَا عَالِمَ الْخَفِيَّاتِ يَا مُجِيْبَ الدَّعْوَاتِ
या आलिमल ख़फ़िय्याति या मुजीबद दावाति
ऐ छुपी बातों के जानने वाले! ऐ दुआओं को क़बूल करने वाले!
يَا رَافِعَ الدَّرَجَاتِ
या राफ़िअद दरजाति
ऐ दर्जे बुलंद करने वाले!
يَا قَاضِيَ الْحَاجَاتِ يَا رَاحِمَ الْعَبَرَاتِ
या क़ाज़ियल हाजाति या राहिमल अबराति
ऐ ज़रूरतें पूरी करने वाले! ऐ आँसुओं पर रहम करने वाले!
يَا مُنْجِحَ الطَّلِبَاتِ يَا مُنْزِلَ الْبَرَكَاتِ
या मुन्जिहत तलबाति या मुन्ज़िलल बरकाति
ऐ मुरादें पूरी करने वाले! ऐ बरकतें उतारने वाले!
يَا جَامِعَ الشَّتَاتِ يَا رَادَّ مَا كَانَ فَاتَ
या जामिअश शताती या राद्द मा काना फ़ात
ऐ बिखरे हुए को जमा करने वाले! ऐ गुज़री हुई चीज़ लौटाने वाले!
جَمَالَ الْاَرَضِيْنَ وَ السَّمَاوَاتِ يَا
या जमालल अरज़ीन वस्समावाति
ऐ ज़मीनों और आसमानों को सजाने वाले!
يَا سَابِغَ النِّعَمِ يَا كَاشِفَ الْاَلَمِ
या साबिग़न निअमि या काशिफ़ल अलमि
ऐ नेमतें भरपूर देने वाले! ऐ दर्द दूर करने वाले!
يَا شَافِيَ السَّقَمِ يَا مَعْدِنَ الْجُوْدِ
या शाफ़ियस सक़मि या मअदनल जूदि
ऐ बीमारी शिफ़ा देने वाले! ऐ सख़ावत के ख़ज़ाने!
وَ الْكَرَمِ يَا اَجْوَدَ الْاَجْوَدِيْنَ
वल करमि या अजवदल अजवदीन
और करम के मालिक! ऐ सबसे ज़्यादा करम करने वाले!
يَا اَكْرَمَ الْاَكْرَمِيْنَ يَا اَسْمَعَ السَّامِعِيْنَ
या अकरमल अकरमीन या असमअस सामिईन
ऐ सबसे बढ़कर सख़ी! ऐ सबसे ज़्यादा सुनने वाले!
يَا اَبْصَرَ النَّاظِرِيْنَ يَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ
या अबसरन नाज़िरीन या अरहमर राहिमीन
ऐ सबसे ज़्यादा देखने वाले! ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले!
يَا اَقْرَبَ الْاَقْرَبِيْنَ يَا اِلٰهَ الْعَالَمِيْنَ
या अकरबल अकरबीन या इलाहल आलमीन
ऐ सबसे क़रीब! ऐ तमाम जहानों के इलाह!
يَا غِيَاثَ الْمُسْتَغِيْثِيْنَ يَا جَارَ الْمُسْتَجِيْرِيْنَ
या ग़ियासल मुस्तगीसीन या जारल मुस्तजीरीन
ऐ मदद माँगने वालों के मददगार! ऐ पनाह माँगने वालों के हामि!
يَا مُتَجَاوِزًا عَنِ الْمُسِيْئِيْنَ
या मुतजाविज़न अनिल मुसीईन
ऐ बुराई करने वालों से दरगुज़र करने वाले!
يَا مَنْ لَا يُعَجِّلُ عَلَى الْخَاطِئِيْنَ
या मन ला युअज्जिलु अलल ख़ातिईन
ऐ वह जो गुनहगारों को सज़ा देने में जल्दी नहीं करता!
يَا فَكَّاكَ الْمَأْسُوْرِيْنَ
या फ़क्काकल मअसूरीन
ऐ क़ैदियों को छुड़ाने वाले!
يَا مُفَرِّجَ غَمِّ الْمَغْمُوْمِيْنَ يَا جَامِعَ الْمُتَفَرِّقِيْنَ
या मुफ़र्रिज़ ग़म्मिल मग़मूमीन या जामिअल मुतफ़र्रिक़ीन
ऐ ग़मज़दों का ग़म दूर करने वाले! ऐ बिछड़े हुओं को मिलाने वाले!
يَا مُدْرِكَ الْهَارِبِيْنَ يَا غَايَةَ الطَّالِبِيْنَ
या मुदरिकल हारिबीन या ग़ायतत तालिबीन
ऐ भागने वालों को पकड़ने वाले! ऐ तलाश करने वालों की मंज़िल!
يَا صَاحِبَ كُلِّ غَرِيْبٍ يَا مُوْنِسَ كُلوَحِيْدٍ ِّ
या साहिब कुल्ले ग़रीबिन या मूनिस कुल्ले वहीद
ऐ हर परदेसी के साथी! ऐ हर तन्हा का हमदम!
يَا رَاحِمَ الشَّيْخِ الْكَبِيْرِ
या राहिमश शैख़िल कबीरी
ऐ बूढ़े पर रहम करने वाले!
يَا رَازِقَ الطِّفْلِ الصَّغِيْرِ
या राज़िक़त तिफ़्लिस सग़ीर
ऐ छोटे बच्चे को रिज़्क़ देने वाले!
يَا جَابِرَ الْعَظْمِ الْكَسِيْرِ
या जाबिरल अज़्मिल कसीर
ऐ टूटी हड्डी जोड़ने वाले!
يَا عِصْمَةَ الْخَائِفِ الْمُسْتَجِيْرِ
या इस्मतल ख़ाइफ़िल मुस्तजीर
ऐ डरने वाले पनाह माँगने वाले की हिफ़ाज़त!
يَا مَنْ لَهُ التَّدْبِيْرُ وَ اِلَيْهِ التَّقْدِيْرُ
या मन लहुत तदबीरु व इलैहित तक़दीरु
ऐ वह जिसके हाथ में इंतज़ाम है और उसी की तरफ़ तक़दीर है!
يَا مَنِ الْعَسِيْرُ عَلَيْهِ سَهْلٌ يَسِيْرٌ
या मनिल असीरु अलैहि सहलुन यसीरुन
ऐ वह जिसके लिए मुश्किल भी आसान है!
يَا مَنْ هُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ خَبِيْرٌ
या मन हु्वा बिकुल्ले शयइन ख़बीरुन
ऐ वह जो हर चीज़ से बाख़बर है!
يَا مَنْ هُوَ عَلٰىكُلِّ شَيْءٍ قَدِيْرٌ
या मन हु्वा अला कुल्ले शयइन क़दीरुन
ऐ वह जो हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है!
يَا خَالِقَ السَّمَاءِ وَ الْقَمَرِ الْمُنِيْرِ
या ख़ालिक़स समाई वल क़मरिल मुनीर
ऐ आसमान और चमकते चाँद के ख़ालिक़!
يَا فَالِقَ الْاِصْبَاحِ يَا
या फ़ालिक़ल इस्बाहि या
ऐ सुबह को चीरने वाले! ऐ
مُرْسِلَ الرِّيَاحِ يَا بَاعِثَ الْاَرْوَاحِ
मुर्सिलर रियाहि या बाइस़ल अरवाहि
हवाएँ भेजने वाले! ऐ रूहों को भेजने वाले!
يَا ذَا الْجُوْدِ وَ السَّمَاحِ
या ज़ल जूदि वस्समाहि
ऐ सख़ावत और दरगुज़र वाले!
يَا مَنْ بِيَدِهٖ كُلُّ مِفْتَاحٍ
या मन बियदिही कुल्लु मिफ़ताहिन
ऐ वह जिसके हाथ में हर कुंजी है!
يَا عِمَادَ مَنْ لَا عِمَادَ لَهٗ
या इमाद मन ला इमाद लहू
ऐ उसके सहारे जो बे-सहारा है!
يَا سَنَدَ مَنْ لَا سَنَدَ لَهٗ يَا ذُخْرَ مَنْ لَا ذُخْرَ لَهٗ
या सनद मन ला सनद लहू या ज़ुख़्र मन ला ज़ुख़्र लहू
ऐ उसके सहायक जिसके पास कोई सहायक नहीं! ऐ उसके ज़खीरा जिसके पास कोई ज़खीरा नहीं!
يَا عِزَّ مَنْ لَا عِزَّ لَهٗ يَا كَنْزَ مَنْ لَا كَنْزَ لَهٗ
या इज़्ज़ मन ला इज़्ज़ लहू या कन्ज़ मन ला कन्ज़ लहू
ऐ उसके लिए इज़्ज़त जिसके पास इज़्ज़त नहीं! ऐ उसके लिए ख़ज़ाना जिसके पास ख़ज़ाना नहीं!
يَا حِرْزَ مَنْ لَا حِرْزَ لَهٗ
या हिर्ज़ मन ला हिर्ज़ लहू
ऐ उसके लिए पनाह जिसके पास कोई पनाह नहीं!
يَا عَوْنَ مَنْ لَا عَوْنَ لَهٗ
या औन मन ला औन लहू
ऐ उसके मददगार जिसके पास कोई मददगार नहीं!
يَا رُكْنَ مَنْ لَا رُكْنَ لَهٗ
या रुक्न मन ला रुक्न लहू
ऐ उसके सहारे जिसके पास कोई सहारा नहीं!
يَا غِيَاثَ مَنْ لَا غِيَاثَ لَهٗ
या ग़ियास मन ला ग़ियास लहू
ऐ उसके फ़रियाद-रस जिसके पास कोई फ़रियाद-रस नहीं!
يَا عَظِيْمَ الْمَنِّ يَا كَرِيْمَ الْعَفْوِ يَا حَسَنَ التَّجَاوُزِ
या अज़ीमल मन्नि या करीमल अफ़्वि या हसनत तजावुज़
ऐ बड़े एहसान वाले! ऐ माफ़ी में सख़ी! ऐ बेहतरीन दरगुज़र करने वाले!
يَا وَاسِعَ الْمَغْفِرَةِ يَا بَاسِطَ الْيَدَيْنِ بِالرَّحْمَةِ
या वासिअल मग़फ़िरति या बासितल यदैन बिर्रहमत
ऐ बहुत वसीअ बख़्शिश वाले! ऐ रहमत के साथ हाथ फैलाने वाले!
يَا مُبْتَدِئًا بِالنِّعَمِ قَبْلَ اسْتِحْقَاقِهَا
या मुब्तदिअन बिन्निअम क़ब्लस्तिहक़ाक़िहा
ऐ हक़ से पहले नेमतें अता करने वाले!
يَا ذَا الْحُجَّةِ الْبَالِغَةِ يَا ذَا الْمُلْكِ
या ज़ल हुज्जतिल बालिग़ति या ज़ल मुल्कि
ऐ मुकम्मल दलील वाले! ऐ बादशाही के मालिक!
اَسْاَلُكَ بِعِلْمِكَ وَ الْمَلَكُوْتِ يَا ذَا الْعِزِّ
असअलुका बिइल्मिका वल मलाकूति या ज़ल इज़्ज़ि
मैं तुझसे तेरे इल्म और सल्तनत के वासिते से सवाल करता हूँ, ऐ इज़्ज़त वाले!
الْغُيُوْبِوَ الْجَبَرُوْتِ يَا مَنْ هُوَ حَيٌّ لَا يَمُوْتُ
वल ग़ुयूबि वल जबरूत या मन हु्वा हय्युन ला यमूत
और ग़ैब और क़ुदरत के वासिते से, ऐ वह जो ज़िंदा है और कभी नहीं मरता!
وَ بِمَعْرِفَتِكَ مَا فِيْ ضَمَائِرِ الْقُلُوْبِ
व बिमारिफ़तिका मा फ़ी ज़माइरिल क़ुलूबि
और तेरी उस पहचान के वासिते से जो दिलों के भेद जानती है
وَ بِكُلِّ اسْمٍ هُوَ لَكَ اصْطَفَيْتَهٗ لِنَفْسِكَ
व बिकुल्ले इस्मिन हु्वा लका इस्तफ़ैतहू लिनफ़्सिका
और तेरे हर उस नाम के वासिते से जिसे तूने अपने लिए चुना है
اَوْ اَنْزَلْتَهٗ فِيْ كِتَابٍ مِنْ كُتُبِكَ
औ अनज़लतहू फ़ी किताबिन मिन कुतुबिका
या जिसे तूने अपनी किताबों में नाज़िल किया है
اَوِ اسْتَاْثَرْتَ بِهٖ فِيْ عِلْمِ الْغَيْبِ عِنْدَكَ
औ इस्तअसर्त बहि फ़ी इल्मिल ग़ैबि इन्दका
या जिसे तूने अपने इल्म-ए-ग़ैब में छुपा रखा है
وَ بِاَسْمَائِكَ الْحُسْنٰى كُلِّهَا حَتّٰى انْتَهٰى
व बिअस्माइकल हुस्ना कुल्लिहा हत्ता इन्तहा
और तेरे तमाम हुस्ना नामों के वासिते से यहाँ तक कि पहुँचे
اِسْمِكَ الْعَظِيْمِ الْاَعْظَمِ الَّذِيْ اِلٰى
इला इस्मिकाल अज़ीमिल अअज़मिल्लज़ी
तेरे उस सबसे अज़ीम नाम तक जिसे तूने
فَضَّلْتَهٗ عَلٰى جَمِيْعِ اَسْمَائِكَ
फ़ज़्ज़लतहू अला जमीइ अस्माइका
अपने तमाम नामों पर फ़ज़ीलत दी है
اَسْاَلُكَ بِهٖ اَسْاَلُكَ بِهٖ اَسْاَلُكَ بِهٖ
असअलुका बहि असअलुका बहि असअलुका बहि
मैं तुझसे उसी के वासिते से सवाल करता हूँ, उसी के वासिते से, उसी के वासिते से
اَنْ تُصَلِّيَ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَ آلِهٖ
अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिन व आलिही
कि तू मुहम्मद और उनकी आल पर दरूद भेजे
وَ اَنْ تُيَسِّرَ لِيْ مِنْ اَمْرِيْ مَا اَخَافُ عُسْرَهٗ
व अन तुयस्सिर ली मिन अम्री मा अख़ाफ़ु उस्रहू
और मेरे उस काम को मेरे लिए आसान कर दे जिससे मुझे सख़्ती का डर है
وَ تُفَرِّجَ عَنِّي الْهَمَّ وَ الْغَمَّ وَ الْكَرْبَ
व तुफ़र्रिज़ अन्निल हम्मा वल ग़म्मा वल करबा
और मुझसे फ़िक्र, ग़म और परेशानी दूर कर दे
وَ مَا ضَاقَ بِهٖ صَدْرِيْ وَ
व मा ज़ाक़ा बहि सद्री व
और जो मेरे सीने को तंग कर दे
عِيْلَ بِهٖ صَبْرِيْ فَاِنَّهٗ لَا يَقْدِرُ
ईला बहि सब्री फ़इन्नहू ला यक़दिरु
और जिससे मेरा सब्र जवाब दे जाए, क्योंकि तेरे सिवा कोई क़ुदरत नहीं रखता
عَلٰى فَرَجِيْ سِوَاكَ وَ افْعَلْ بِيْ
अला फ़रजी सिवाका वफ़अल बी
कि मुझे राहत दे सके; पस मेरे साथ वही कर
مَا اَنْتَ اَهْلُهٗ يَا اَهْلَ التَّقْوٰى
मा अन्त अहलुहू या अहलत्-तक़्वा
जैसा तू इसके क़ाबिल है, ऐ तक़्वा के मालिक
وَ اَهْلَ الْمَغْفِرَةِ يَا مَنْ لَا يَكْشِفُ الْكَرْبَ غَيْرُهٗ
व अहलल मग़फ़िरह या मन ला यक्शिफुल कर्बा ग़ैरुहू
और बख़्शिश के मालिक, ऐ वह जिसके सिवा कोई परेशानी दूर नहीं करता
وَ لَا يُجَلِّي الْحُزْنَ سِوَاهُ
व ला युजल्लिल हुज़्न सिवाहू
और जिसके सिवा कोई ग़म दूर नहीं करता
وَ لَا يُفَرِّجْ عَنِّيْ اِلَّا هُوَ اِكْفِنِيْ شَرَّ نَفْسِيْ خَاصَّةً
व ला युफ़र्रिज़ अन्नी इल्ला हु्वा इक्फ़िनी शर्र नफ़्सी ख़ास्सतन
और मेरे सिवा कोई राहत नहीं देता सिवाय उसके; मुझे मेरे नफ़्स की बुराई से ख़ास तौर पर बचा
وَ شَرَّ النَّاسِ عَامَّةً وَ اَصْلِحْ لِيْ شَاْنِيْ كُلَّهٗ
व शर्रन नासि आम्मतन व अस्लिह ली शानी कुल्लहू
और आम लोगों की बुराई से भी, और मेरे सारे मामलों को ठीक कर दे
وَ اَصْلِحْ اُمُوْرِيْ وَ اقْضِ لِيْ حَوَائِجِيْ
व अस्लिह उमूरी वक़ज़ी ली हवाइजि
और मेरे तमाम काम दुरुस्त कर दे और मेरी ज़रूरतें पूरी कर
وَ اجْعَلْ لِيْ مِنْ اَمْرِيْ فَرَجًا
वज्अल ली मिन अम्री फ़रजन
और मेरे लिए मेरे काम में कुशादगी पैदा कर
وَ مَخْرَجًا فَاِنَّكَ تَعْلَمُ وَ لَا اَعْلَمُ
व मख़्रजन फ़इन्नका तअलमु व ला अअलमु
और निकलने का रास्ता बना, क्योंकि तू जानता है और मैं नहीं जानता
وَ تُقَدِّرُ وَ لَا اُقَدِّرُ وَ اَنْتَ
व तुक़द्दिरु व ला उक़द्दिरु व अन्त
और तू ताक़त रखता है और मैं ताक़त नहीं रखता, और तू
عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيْرٌ
अला कुल्ले शयइन क़दीरुन
हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है
بِرَحْمَتِكَ يَا اَرْحَمَ الرَّاحِمِين
बि-रहमतिका या अरहमर राहिमीन
तेरी रहमत के वासिते से, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले
103. मोहज्ज अल-दावात में भी: मुहम्मद इब्न अल-हसन अस्सफ़्फ़ार से, इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) से रिवायत है कि उन्होंने फ़रमाया:
अल्लाह के रसूल (स.अ.व.) अपनी दुआ में यूँ कहा करते थे:
اَللّٰہُمَّ اجْعَلْنِیْ صَبُوْرًا وَ اجْعَلْنِیْ شَكُوْرًا
अल्लाहुम्मज्अल्नी सबूरन वज्अल्नी शकूरन
ऐ अल्लाह! मुझे सब्र करने वाला बना और मुझे शुक्र करने वाला बना
وَ اجْعَلْنِیْ فِیْ اَمَانِكَ
वज्अल्नी फ़ी अमानिका
और मुझे अपनी पनाह में रख
104. अल-इरशाद (अद-दैलमी) में है: आप (स.अ.व.) दुआ करते हुए यूँ फ़रमाते थे:
اَللّٰهُمَّ اقْسِمْ لَنَا مِنْ خَشْيَتِكَ
अल्लाहुम्मक़्सिम लना मिन ख़श्यतिका
ऐ अल्लाह! हमें अपने डर में से इतना हिस्सा अता कर
مَا يَحُوْلُ بَيْنَنَا وَ بَيْنَ مَعْصِيَتِكَ
मा यहूलु बैनना व बैन मअसियतिका
जो हमें तेरी नाफ़रमानी से रोक दे
وَ مِنْ طَاعَتِكَ مَا تُبَلِّغْنَا بِهٖ جَنَّتَكَ
व मिन ताअतिक मा तुबल्लिग़ुना बिही जन्नतिका
और अपनी इताअत में से इतना अता कर जिससे हमें तेरी जन्नत मिल जाए
وَ مِنَ الْيَقِيْنِ مَا يُهَوِّنُ عَلَيْنَا
व मिनल यक़ीनी मा युहव्विनु अलैना
और यक़ीन में से इतना दे कि
مِنْ مَصَائِبِ الدُّنْيَا وَ مَتِّعْنَا بِاَسْمَاعِنَا
मिन मसाइबिद्दुन्या व मत्तिअना बिअस्माइना
दुनिया की मुसीबतें हम पर हल्की हो जाएँ, और हमें हमारी सुनने की ताक़त से फ़ायदा देता रह
وَ اَبْصَارِنَا عَلٰى مَنْ عَادَانَا
व अब्सारिना अला मन आदाना
और हमारी आँखों की रौशनी से भी, और हमारे दुश्मनों पर हमारी मदद फ़रमा
وَ لَا تَجْعَلِ الدُّنْيَا اَكْبَرَ هَمِّنَا
व ला तज्अलिद्दुन्या अकबर हम्मिना
और दुनिया को हमारा सबसे बड़ा ग़म न बना
وَ لَا تُسَلِّطْ عَلَيْنمَنْ لَا يَرْحَمُنَا.َا
व ला तुसल्लित अलैना मन ला यरहमुना
और हम पर ऐसे लोगों को हावी न कर जो हम पर रहम न करें
اَللّٰهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ واِلَيْكَ الْمُشْتَكٰى وَ اَنْتَ الْمُسْتَعَانَ
अल्लाहुम्मा लकल हम्दु व इलैकल मुश्तका व अन्तल मुस्तआन
ऐ अल्लाह! सारी तारीफ़ तेरे लिए है, तुझी से फ़रियाद की जाती है और तू ही मददगार है
وَ فِيْمَا عِنْدَكَ مِنَ الرَّغْبَةِ
व फीमा इन्दका मिनर रग़बत
और जो चाहा जाता है वह तेरे पास है
عَوْرَتِيْ.وَ لَدَيْكَ غَايَةُ الطَّلِبَةِ. اَللّٰهُمَّ آمِنْ رَوْعَتِيْ وَ اسْتُرْ
व लदैका ग़ायतुत्तलबह। अल्लाहुम्मा आमिन रौअती वसतुर अवरती
और तमाम चाहतों की इंतिहा भी तेरे पास है। ऐ अल्लाह! मेरे डर को अमन दे और मेरे ऐब छुपा दे
اَللّٰهُمَّ اَصْلِحْ دِيْنَنَا الَّذِيْ
अल्लाहुम्मा अस्लिह दीननल लज़ी
ऐ अल्लाह! हमारे दीन को ठीक कर दे जो
هُوَ عِصْمَةُ اَمْرِنَا
हुवा इस्मतु अम्रिना
हमारे तमाम कामों की हिफ़ाज़त है
وَ اَصْلِحْ لَنَا دُنْيَانَا الَّتِيْ فِيْهَا مَعَاشُنَا
व अस्लिह लना दुन्यानल लती फ़ीहा मआशुना
और हमारी दुनिया को भी दुरुस्त कर दे जिसमें हमारी ज़िंदगी है
وَ اَصْلِحْ آخِرَتَنَا الَّتِيْ اِلَيْهَا مُنْقَلَبُنَا
व अस्लिह आख़िरतनल लती इलैहा मुनक़लाबुना
और हमारी आख़िरत को भी दुरुस्त कर दे जिसकी तरफ़ हमें लौटना है
وَ اجْعَلِ الْحَيَاةَ زِيَادَةً لَنَا فِيْ كُلِّ خَيْر
वज्अलिल हयात ज़ियादतन लना फ़ी कुल्ले ख़ैर
और हमारी ज़िंदगी को हर भलाई में बढ़ोतरी का ज़रिया बना
وَ الْوَفَاةَ رَاحَةً لَنَا مِنْ كُلِّ سُوْءٍ
वल वफ़ात राहतन लना मिन कुल्ले सू
और मौत को हर बुराई से हमारे लिए राहत बना दे
اَللّٰهُمَّ اِنَّا نَسْاَلُكَ
अल्लाहुम्मा इन्ना नसअलुका
ऐ अल्लाह! हम तुझसे सवाल करते हैं
مُوْجِبَاتِ رَحْمَتِكَ وَ عَزَائِمَ مَغْفِرَتِكَ
मूजिबाते रहमतिका व अज़ाइम मग़फ़िरतिका
तेरी रहमत को वाजिब करने वाली चीज़ें और तेरी बख़्शिश को पक्का करने वाली बातें
وَ الْغَنِيْمَةَ مِنْ كُلِّ بِرٍّ
वल्-ग़नीमत मिन कुल्ले बिर्रिन
और हर नेकी से फ़ायदा अता फ़रमा
وَ السَّلَامَةَ مِنْ كُلِّ اِثْمٍ
वस्सलामत मिन कुल्ले इस्मिन
और हर गुनाह से सलामती अता कर
يَا مَوْضِعَ كُلِّ شَكْوٰى
या मौज़िअ क़ुल्ले शक्वा
ऐ वह जिसके पास हर शिकायत पेश की जाती है
وَ شَاهِدَ كُلِّ نَجْوٰى
व शाहिद क़ुल्ले नज्वा
और हर राज़ की गवाही देने वाला
وَ كَاشِفَ كُلِّ بَلْوٰى فَاِنَّكَ تَرٰى
व काशिफ़ क़ुल्ले बल्वा फ़इन्नका तरा
और हर मुसीबत को दूर करने वाला, बेशक तू देखता है
وَ لَا تُرٰى وَ اَنْتَ بِالْمَنْظَرِ الْاَعْلٰى اَسْاَلُكَ الْجَنَّةَ
व ला तुरा व अन्त बिल-मंज़रिल आला असअलुकल जन्नत
और तू देखा नहीं जाता, और तू सबसे बुलंद मक़ाम पर है; मैं तुझसे जन्नत मांगता हूँ
وَ مَا يُقَرِّبُ اِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ اَوْ فِعْل
व मा युक़र्रिबु इलैहा मिन क़ौलिन अव फ़िअलिन
और हर वह बात और अमल जो मुझे उसके क़रीब कर दे
وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنَ النَّارِ
व अऊज़ु बिका मिनन-नार
और मैं तेरी पनाह चाहता हूँ जहन्नम से
وَ مَا يُقَرِّبُ اِلَيْهَا مِنْ قَوْلٍ اَوْ فِعْلٍ.
व मा युक़र्रिबु इलैहा मिन क़ौलिन व फ़िअलिन
और हर वह बात और अमल जो मुझे उसकी तरफ़ ले जाए
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ خَيْرَ الْخَيْرِ رِضْوَانَكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका ख़ैरल-ख़ैर रिज़वानक
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे बेहतरीन भलाई, यानी तेरी रज़ा मांगता हूँ
وَ الْجَنَّةَ وَ اَعُوْذُ بِكَ
वल-जन्नत व अऊज़ु बिका
और जन्नत, और मैं तेरी पनाह चाहता हूँ
مِنْ شَرِّ الشَّرِّ سَخَطُكَ وَ النَّارُ اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَسْاَلُكَ
मिन शर्रिश-शर्र सख़तुक वन्नार, अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका
सबसे बुरे शर से, यानी तेरी नाराज़गी और आग से; ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मांगता हूँ
خَيْرَ مَا تَعْلَمُ وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ شَرِّ
ख़ैर मा तअलमु व अऊज़ु बिका मिन शर्रि
वह भलाई जो तू जानता है, और उस बुराई से तेरी पनाह चाहता हूँ
مَا تَعْلَمُ فَاِنَّكَ اَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوْبِ.
मा तअलमु फ़इन्नका अन्त अल्लामुल-ग़ुयूब
जिसे तू जानता है, क्योंकि तू ही ग़ैब का जानने वाला है
105. जामे अल-अख़बार में: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से रिवायत की गई दुआ:
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُ بِكَ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ
مِنْ سُوْءِ الْقَضَاءِ وَ سُوْءِ الْقَدَرِ
मिन सूइल-क़ज़ा व सूइल-क़दर
बुरे फ़ैसले और बुरे मुक़द्दर से
وَ سُوْءِ الْمَنْظَرِ
व सूइल-मंज़र
और बुरी हालत से
فِیْ الْاَہْلِ وَ الْمَالِ وَ الْوَلَدِ.
फ़िल-अह्लि वल-मालि वल-वलद
अपने घर वालों, माल और औलाद के बारे में
106. इसी तरह आप (स.अ.व.) की दुआओं में से:
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ غِنًی یُطْغِیْنِیْ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन ग़िनन युतग़ीनी
ऐ अल्लाह! मैं उस दौलत से तेरी पनाह चाहता हूँ जो मुझे सरकश बना दे
وَ فَقْرٍ یُنْسِیْنِیْ وَ ہَوًی یُرْدِیْنِیْ
व फ़क़रिन युन्सीनी व हवन युर्दीनी
और उस ग़रीबी से जो मुझे भुला दे, और उस ख़्वाहिश से जो मुझे तबाह कर दे
وَ عَمَلٍ یُخْزِیْنِیْ وَ جَارٍ یُؤْذِیْنِی
व अमलिन युख़ज़ीनी व जारिन युअज़ीनी
और उस अमल से जो मुझे रुस्वा करे, और उस पड़ोसी से जो मुझे तकलीफ़ दे
107. और आप (स.अ.व.) की दुआओं में से:
اَللّٰهُمَّ اجْعَلْنَا مَشْغُوْلِيْنَ
अल्लाहुम्मज्अलना मशग़ूलीन
ऐ अल्लाह! हमें मशग़ूल रख
بِاَمْرِكَ آمِنِيْنَ بِوَعْدِكَ آيِسِيْنَ
बि-अम्रिका आमिनीन बि-वअदिका आयिसीन
तेरे हुक्म में, तेरे वादे पर यक़ीन रखने वाले, मख़लूक़ से मायूस
مِنْ خَلْقِكَ آنِسِيْنَ بِكَ مُسْتَوْحِشِيْنَ
मिन ख़ल्क़िका आनिसीन बिका मुस्तवहिशीन
तेरी मख़लूक़ से, और तुझसे दिल लगाने वाले
مِنْ غَيْرِكَ رَاضِيْنَ بِقَضَائِكَ صَابِرِيْنَ
मिन ग़ैरिका राज़ीन बि-क़ज़ाइका साबिरीन
तेरे सिवा हर चीज़ से बेपरवाह, तेरे फ़ैसले पर राज़ी और सब्र करने वाले
عَلٰى بَلَائِكَ شَاكِرِيْنَ
अला बलाइका शाकिरीन
तेरी आज़माइशों पर शुक्र करने वाले
عَلٰى نَعْمَائِكَ مُتَلَذِّذِيْنَ بِذِكْرِكَ فَرِحِيْنَ
अला नअमाइका मुतलज़्ज़िज़ीन बि-ज़िक्रिका फ़रिहीन
तेरी नेमतों पर लुत्फ़ उठाने वाले, तेरे ज़िक्र से खुश रहने वाले
بِكِتَابِكَ مُنَاجِيْنَ اِيَّاكَ آنَاءَ اللَّيْلِ
बि-किताबिका मुनाजीन इय्याका आना-अल-लैल
तेरी किताब के साथ, रात के वक़्त तुझसे सरगोशी करने वाले
وَ اَطْرَافَ النَّهَارِ مُسْتَعِدِّيْنَ لِلْمَوْتِ
व अत्राफ़न-नहार मुस्तइद्दीन लिल-मौत
और दिन के किनारों पर मौत के लिए तैयार रहने वाले
مُشْتَاقِيْنَ اِلٰى لِقَائِكَ مُتَبَغِّضِيْنَ لِلدُّنْيَا
मुश्ताक़ीन इला लिक़ाइका मुतबग़्ग़िज़ीन लिद्दुन्या
तुझसे मिलने के शौक़ीन, दुनिया से बेज़ार
لِلْآخِرَةِمُحِبِّيْنَ
लिल-आख़िरति मुहिब्बीन
और आख़िरत से मुहब्बत करने वाले
آتِنَا مَا وَعَدْتَنَا عَلٰى وَ
आतिना मा वअदताना अला
हमें वह अता कर जिसका तूने वादा किया है
رُسُلِكَ وَ لَا تُخْزِنَا يَوْمالْقِيَامَةِ اِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيْعَاد َ
रुसुलिका व ला तुख़ज़िना यौमल-क़ियामत, इन्नका ला तुख़लिफ़ुल-मीआद
अपने रसूलों के ज़रिये, और क़ियामत के दिन हमें रुस्वा न करना, बेशक तू वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता
108. अल-काफ़ी में रिवायत है:
اَللّٰہُمَّ لَکَ الْحَمْدُ حَمْدًا خَالِدًا مَعَ خُلُوْدِکَ
अल्लाहुम्मा लकल-हम्दु हम्दन ख़ालिदन मअ ख़ुलूदिक
ऐ अल्लाह! तेरे लिए वह हम्द है जो तेरी अबदीयत के साथ हमेशा रहने वाली है
وَ لَکَ الْحَمْدُ حَمْدًا لَا مُنْتَہٰی لَہٗ دُوْنَ عِلْمِکَ
व लकल-हम्दु हम्दन ला मुन्तहा लहू दून इल्मिक
और तेरे लिए वह हम्द है जिसकी कोई इंतिहा नहीं, मगर तेरे इल्म से
وَ لَکالْحَمْدُ حَمْدًاَ
व लकल-हम्दु हम्दन
और तेरे लिए वह हम्द है
اَمَدَ لَہٗ دُوْنَ مَشِیَّتِکَ
अमदन लहू दून मशीयतिक
जिसकी मियाद तेरी मर्ज़ी के बग़ैर मुक़र्रर नहीं
وَ لَکالْحَمْدُ حَمْدًاَ
व लकल-हम्दु हम्दन
और तेरे लिए वह हम्द है
لَا اَجْرَ لِقَآئِلِہٖ اِلَّا رِضَاکَ.
ला अज्र लिक़ाइलिही इल्ला रिज़ाक
जिसे कहने वाले के लिए तेरी रज़ा के सिवा कोई बदला नहीं
اَللّٰهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ كُلُّهٗ ولَكَ الْمَنُّ كُلُّهٗ وَ لَكَ الْفَخْرُ كُلُّهَ
अल्लाहुम्मा लकल-हम्दु कुल्लुहू व लकल-मन्नु कुल्लुहू व लकल-फ़ख़्रु कुल्लुहू
ऐ अल्लाह! सारी हम्द तेरे लिए है, सारा एहसान तेरा है, और सारी बड़ाई तेरी ही है
وَ لَكَ الْبَهَاءُ كُلُّهٗ وَ لَكَ النُّوكُلُّ
व लक़ल बहा कुल्लुहू व लक़न नूरु कुल्लुहू
और सारी रौनक़ तेरी ही है और सारी रौशनी भी तेरी ही है
وَ لَكَ الْعِزَّةُ كُلُّهَا وَ لَكَ الْجَبَرُوْتُ كُلُّهَا
व लक़ल इज़्ज़त कुल्लुहा व लक़ल जबरूत कुल्लुहा
और सारी इज़्ज़त तेरी है और सारी क़ुदरत भी तेरी ही है
وَ لَكَ الْعَظَمَةُ كُلُّهَا وَ لَكَ الدُّنْيَا كُلُّهَا
व लक़ल अज़मत कुल्लुहा व लक़द दुन्या कुल्लुहा
और सारी अज़मत तेरी है और पूरी दुनिया भी तेरी ही है
وَ لَكَ الْآخِرَةُ كُلُّهَا وَ لَكَ اللَّيْلُ
व लक़ल आख़िरत कुल्लुहा व लक़ल लै़लु
और पूरी आख़िरत भी तेरी है और सारी रात भी तेरी है
وَ النَّهَارُ كُلُّهٗ وَ لَكَ الْخَلْقُ كُلُّهٗ
वन्नहारु कुल्लुहू व लक़ल ख़ल्क़ु कुल्लुहू
और सारा दिन भी तेरा है और सारी मख़लूक़ भी तेरी ही है
وَ بِيَدِكَ الْخَيْرُ كُلُّهٗ وَ اِلَيْكَ يَرْجِعُ الْاَمْرُ كُلُّهٗ
व बियदिकल ख़ैरु कुल्लुहू व इलैका यरजिउल अम्रु कुल्लुहू
और तमाम भलाई तेरे हाथ में है और हर मामला तेरी ही तरफ़ लौटता है
عَلَانِيَتُهٗ وَ سِرُّهُ
अलानियतुहू व सिर्रुहू
चाहे वह ज़ाहिर हो या पोशीदा
اَللّٰهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ حَمْدًا اَبَدًا اَنْتَ
अल्लाहुम्मा लक़ल हम्दु हम्दन अबदन अन्त
ऐ अल्लाह! तेरे लिए हमेशा की हम्द है
حَسَنُ الْبَلَاءِ جَلِيْلُ الثَّنَاءِ سَابِغُ النَّعْمَاءِ
हसनुल बला जलीलुस सना साबिग़ुन नअमाअ
तू बेहतरीन आज़माने वाला है, बहुत ज़्यादा तारीफ़ के क़ाबिल है, नेमतों से भरपूर है
عَدْلُ الْقَضَاءِ جَزِيْلُ الْعَطَاءِ حَسَنُ الْآلَاءِ اِلٰهُ
अद्लुल क़ज़ा जज़ीलुल अताअ हसनुल आला इलाहु
तेरा फ़ैसला इंसाफ़ वाला है, तेरा अता करना बहुत बड़ा है, तू बेहतरीन नेमत देने वाला है
مَنْ فِي الْاَرْضِوَ اِلٰهُ مَنْ فِي السَّمَاء
मन फिल अरज़ि व इलाहु मन फिस समा
ज़मीन वालों का भी वही इलाह है और आसमान वालों का भी वही इलाह है
اَللّٰهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ فِي السَّبْعِ
अल्लाहुम्मा लक़ल हम्दु फिस सब्अ
ऐ अल्लाह! सात सख़्त दौरों में भी तेरे ही लिए हम्द है
الشِّدَادِ وَ لَكَ الْحَمْدُ فِي الْاَرْضِ الْمِهَادِ
शिदादि व लक़ल हम्दु फिल अरज़िल मिहाद
और फैली हुई ज़मीन में भी तेरे ही लिए हम्द है
وَ لَكَ الْحَمْدُ طَاقَةَ الْعِبَادِ
व लक़ल हम्दु ताक़तल इबाद
और बंदों की ताक़त के मुताबिक़ भी तेरे ही लिए हम्द है
وَ لَكَ الْحَمْدُ سَعَةَ الْبِلَادِ
व लक़ल हम्दु सअतल बिलाद
और तमाम मुल्कों की वुसअत तक भी तेरे ही लिए हम्द है
وَ لَكَ الْحَمْدُ فِي الْجِبَالِ الْاَوْتَادِ
व लक़ल हम्दु फिल जिबालिल औताद
और पहाड़ों में भी जो खूंटों की तरह हैं, तेरे ही लिए हम्द है
لَوكَ الْحَمْدُفِي اللَّيْلِ اِذَا يَغْشٰى
व लक़ल हम्दु फिल लै़लि इज़ा यग़शा
और जब रात छा जाती है तब भी तेरे ही लिए हम्द है
وَ لَكَ الْحَمْدُ فِي النَّهَارِ اِذَا تَجَلّٰى
व लक़ल हम्दु फिन नहारि इज़ा तजल्ला
और जब दिन रोशन होता है तब भी तेरे ही लिए हम्द है
وَ لَكَ الْحَمْدُ فِي الْآخِرَةِ وَ الْاُوْلٰى
व लक़ल हम्दु फिल आख़िरति वल ऊला
और आख़िरत में भी और पहले में भी तेरे ही लिए हम्द है
وَ لَكَ الْحَمْدُ فِي الْمَثَانِيْ وَ الْقُرْآنِ الْعَظِيْمِ
व लक़ल हम्दु फिल मसानी वल क़ुरआनिल अज़ीम
और सब्अ मसानी और अज़ीम क़ुरआन में भी तेरे ही लिए हम्द है
وَ سُبْحَانَ اللهِ وَ بِحَمْدِهٖ
व सुब्हानल्लाहि व बिहम्दिही
और अल्लाह पाक है और उसी की हम्द है
وَ الْاَرْضُ جَمِيْعًا قَبْضَتُهٗ يَوْمَ الْقِيَامَةِ
वल अरज़ु जमीअन क़ब्ज़तुहू यौमल क़ियामत
और क़ियामत के दिन सारी ज़मीन उसकी गिरफ़्त में होगी
وَ السَّمٰوَاتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِيْنِهٖ سُبْحانَهٗ
वस्समावातु मत्विय्यातुन बियमीनीही सुब्हानहू
और आसमान उसकी दाईं तरफ़ लपेट दिए जाएंगे, वह पाक है
وَ تَعَالٰىعَمَّا يُشْرِكُوْنَ سُبْحَانَ اللهِ
व तआला अम्मा युश्रिकून सुब्हानल्लाह
और वह उन शरीकों से बहुत बुलंद है जो लोग ठहराते हैं
وَ بِحَمْدِهٖ كُلُّ شَيْءٍ هَالِكٌ اِلَّا وَجْهَه
व बिहम्दिही कुल्लु शैइन हालिक़ुन इल्ला वज्हहू
और उसी की हम्द के साथ हर चीज़ फ़ना होने वाली है सिवाय उसके चेहरे के
سُبْحَانَكَ رَبَّنَا وَ تَعَالَيْتَ وَ تَبَارَكْتَ
सुब्हानका रब्बना व तआलैत व तबारकत
ऐ हमारे रब! तू पाक है, बुलंद है और बरकत वाला है
وَ تَقَدَّسْتَ خَلَقْتَ كُلَّ شَيْءٍ بِقُدْرَتِكَ
व तक़द्दस्त ख़लक़्ता कुल्ला शैइन बि-क़ुदरतिका
तू बहुत पाक है, तूने हर चीज़ अपनी क़ुदरत से पैदा की
وَ قَهَرْتَ كُلَّ شَيْءٍ بِعِزَّتِكَ
व क़हर्ता कुल्ला शैइन बि-इज़्ज़तिका
और तूने हर चीज़ को अपनी इज़्ज़त से मग़लूब कर दिया
وَ عَلَوْتَ فَوْقَ كُلِّ شَيْءٍ بِارْتِفَاعِكَ
व अलवता फ़ौक़ा कुल्ले शैइन बिरतिफ़ाअिका
और तू हर चीज़ से ऊपर है अपनी बुलंदी के साथ
وَ غَلَبْتَ كُلَّ شَيْءٍ بِقُوَّتِكَ
व ग़लब्ता कुल्ला शैइन बि-क़ुव्वतिका
और तूने हर चीज़ को अपनी ताक़त से मात दे दी
وَ ابْتَدَعْتَ كُلَّ شَيْءٍ بِحِكْمَتِكَ وَ عِلْمِكَ
वब्तदअता कुल्ला शैइन बि-हिकमतिका व इल्मिक
और तूने हर चीज़ को अपनी हिकमत और इल्म से इजाद किया
وَ بَعَثْتَ الرُّسُلَ بِكُتُبِكَ وَ هَدَيْتَ الصَّالِحِيْنَ بِاِذْنِكَ
व बअसता रुसुल बि-कुतुबिका व हदयता स्सालिहीन बि-इज़निका
और तूने अपने रसूलों को अपनी किताबों के साथ भेजा और नेक लोगों को अपने हुक्म से हिदायत दी
وَ اَيَّدْتَ الْمُؤْمِنِيْنَ بِنَصْرِكَ
व अय्यदता अल-मोमिनीन बि-नस्रिका
और तूने मोमिनों की अपनी मदद से ताईद की
وَ قَهَرْتَ الْخَلْقَ بِسُلْطَانِكَ لَا اِلٰهَ اِلَّا اَنْتَ
व क़हर्ता अल-ख़ल्क़ बि-सुल्तानिका ला इलाहा इल्ला अन्त
और तूने सारी मख़लूक़ को अपनी बादशाहत से दबा रखा है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं
وَحْدَكَ لَا شَرِيْكَ لَكَ لَا نَعْبُدُ غَيْرَكَ
वहदका ला शरीका लका ला नअबुदु ग़ैरक
तू अकेला है तेरा कोई शरीक नहीं, हम तेरे सिवा किसी की इबादत नहीं करते
وَ لَا نَسْاَلُ اِلَّا اِيَّاكَ
व ला नसअलु इल्ला इय्याक
और हम तेरे सिवा किसी से सवाल नहीं करते
وَ لَا نَرْغَبُ اِلَّا اِلَيْكَ اَنْتَ مَوْضِعُ شَكْوَانَا
व ला नरग़बु इल्ला इलैका अन्त मौज़िउ शक्वाना
और हम तेरे सिवा किसी की तरफ़ रग़बत नहीं रखते, तू ही हमारी फ़रियाद सुनने वाला है
وَ مُنْتَهٰى رَغْبَتِنَا وَ اِلٰهُنَا وَ مَلِيْكُنَا.
व मुन्तहा रग़बतिना व इलाहुना व मलीकुना
और तू ही हमारी तमाम चाहतों का मक़सद है, और तू ही हमारा इलाह और हमारा मालिक है
109. अल-जाफ़रिय्यात में: जाफ़र इब्न मुहम्मद (अ.) से, अपने बुज़ुर्गों से, इमाम अली (अ.) से रिवायत है कि उन्होंने फ़रमाया:
जब दस्तरख़्वान रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के सामने बिछाया जाता था तो आप (स.अ.व.) फ़रमाते थे:
اَللّٰہُمَّ اجْعَلْہَا نِعْمَۃ
अल्लाहुम्मज इज्‌अल्हा नेमतन
ऐ अल्लाह! इसे एक नेमत बना दे
مَحْصُوْرَۃً مَشْكُوْرَۃً مَوْصُوْلَۃً بِالْجَنَّۃِ.
महसूरतन मश्कूरतन मौसूलतन बिल जन्नत
जो महदूद हो, क़ाबिले-शुक्र हो और जन्नत से जुड़ी हुई हो
110. अवारिफ़-उल-मआरिफ़ में: इरबाज़ बिन सारिया से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ यह दुआ फ़रमाते थे:
اَللّٰہُمَّ اجْعَلْ حُبَّكَ اَحَبُّ اِلَیَّ
अल्लाहुम्मज इज्‌अल हुब्बका अहब्बु इलैय्या
ऐ अल्लाह! अपनी मुहब्बत को मेरे लिए सबसे ज़्यादा प्यारी बना दे
مِنْ نَفْسِیْ وَ سَمْعِیْ وَ بَصَرِیْ وَ اَہْلِیْ
मिन नफ़्सी व समई व बसरी व अहली
मेरी जान, मेरी सुनने की ताक़त, मेरी देखने की ताक़त और मेरे घर वालों से भी ज़्यादा
وَ مَالِیْ وَ مِنَ الْمَاءِ الْبَارِدِ
व माली व मिनल माइल बारिद
मेरे माल से भी और ठंडे पानी से भी ज़्यादा
111. अल-फ़क़ीह में: रसूलुल्लाह ﷺ अपनी दुआ में फ़रमाते थे:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ وَلَدٍ يَكُوْنُ عَلَيَّ رَبًّا
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन वलदिन यकूनु अलैय्या रब्बन
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ ऐसे बेटे से जो मुझ पर हावी हो जाए
وَ مِنْ مَالٍ يَكُوْنُ عَلَيَّ ضِيَاعًا
व मिन मालिन यकूनु अलैय्या ज़ियाअन
और ऐसे माल से जो मेरी तबाही का कारण बने
وَ مِنْ زَوْجَةٍ تُشَيِّبُنِيْ قَبْلَ اَوَانِ مَشِيْبَتِيْ
व मिन ज़ौजतिन तुशैय्यिबुनी क़ब्ल अवान-ए मश़ीबत़ी
और ऐसी बीवी से जो मुझे वक्त से पहले बूढ़ा कर दे
وَ مِنْ خَلِيْلٍ مَاكِرٍ عَيْنَاهُ تَرَانِيْ
व मिन ख़लीलिन माकरिन ऐनाहू तरानी
और ऐसे मक्कार दोस्त से जिसकी आँखें तो मुझे देखें
وَ قَلْبُهٗ يَرْعَانِيْ اِنْ رَاٰى خَيْرًا دَفَنَهٗ
व क़ल्बुहू यरआनी इन रआ ख़ैरन दफ़नहू
लेकिन दिल मेरे लिए जलता रहे, अगर कोई भलाई देखे तो उसे छुपा ले
وَ اِنْ رَاٰى شَرًّا اَذَاعَهٗ
व इन रआ शर्रन अज़ाअहू
और अगर कोई बुराई देखे तो उसे फैला दे
وَ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ وَجْعِ الْبَطْنِ
व अऊज़ु बिका मिन वज्अिल बत्न
और मैं तेरी पनाह चाहता हूँ पेट के दर्द से
112. अल-मुहज्ज में: रसूलुल्लाह ﷺ की दुआओं में से:
اَللّٰهُمَّ اِنِّيْ اَعُوْذُ بِكَ اَنْ اَفْتَقِر
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका अन अफ़्तक़िर
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह चाहता हूँ कि मैं फ़क़ीर हो जाऊँ
فِيْ غِنَاكَ اَوْ اَضِلَّ فِيْ هُدَاكَ اَوْ اَذِلَّ
फ़ी ग़िनाका अव अज़िल्ल फ़ी हुदाका अव अज़िल्ल
तेरी बेनियाज़ी के होते हुए, या तेरी हिदायत में गुमराह हो जाऊँ, या ज़लील हो जाऊँ
فِي عِزِّكَ اَوْ اُضَامَ فِيْ سُلْطَانِكَ اَوْ اُضْطَهَدَ
फ़ी इज़्ज़िका अव उज़ामा फ़ी सुल्तानिका अव उज़्तहद
तेरी इज़्ज़त के रहते, या तेरी हुकूमत में ज़ुल्म का शिकार बनूँ
اولْاَمْرُ اِلَيْكاَللّٰهُمَّ اِنِّيْ
वल अम्रु इलैका, अल्लाहुम्मा इन्नी
हालाँकि तमाम मामले तेरी ही तरफ़ लौटते हैं, ऐ अल्लाह! मैं
اَعُوْذُ بِكَاَنْ اَقُوْلَ زُوْرًا اَوْ اَغْشٰىفُجُوْرًا
अऊज़ु बिका अन अक़ूला ज़ूरन अव अग़शा फ़ुजूरन
तेरी पनाह चाहता हूँ कि झूठ बोलूँ या बदकारी करूँ
اَوْ اَكُوْنَ بِكَ مَغْرُوْ
अव अकूना बिका मग़रूरन
या तेरे सामने घमंड करने लगूँ

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फिफ़्टी 58. उनका पर्दा
113. अल-बिहार में अल-ख़राज्ज से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ हजरे-असवद के सामने, काबा की तरफ़ और बैतुल-मक़्दिस की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते थे, और जब तक नमाज़ मुकम्मल न कर लेते दिखाई नहीं देते थे, और यह आयत उनके लिए पर्दा बन जाती थी:
وَاِذَا قَرَاْتَ الْقُرْاٰنَ جَعَلْنَا بَيْنَكَ
व इज़ा क़रअतल क़ुरआना जअल्ना बैना-का
और जब तुम क़ुरआन पढ़ते हो तो हम तुम्हारे बीच
وَبَيْنَ الَّذِيْنَ لَا يُؤْمِنُوْنَ بِالْاٰخِرَۃِ حِجَابًا مَّسْتُوْرًاۙ
व बैनल्लज़ीना ला यूअमिनूना बिल आख़िरति हिजाबन मस्तूरा
और जो आख़िरत पर ईमान नहीं लाते उनके बीच छुपा हुआ पर्दा कर देते हैं
और यह आयत:
اُولٰۗىِٕكَ الَّذِيْنَ طَبَعَ اللہُ عَلٰي قُلُوْبِہِم
उलाइकल लज़ीना तबअल्लाहु अला क़ुलूबिहिम
ये वही लोग हैं जिनके दिलों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है
और यह आयत:
وَجَعَلْنَا عَلٰي قُلُوْبِہِمْ
व जअल्ना अला क़ुलूबिहिम
और हमने उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं
اَكِنَّۃً اَنْ يَّفْقَہُوْہُ وَفِيْٓ اٰذَانِہِمْ وَقْرًا
अकिन्नतन अय्यफ्क़हूहू व फ़ी आज़ानिहिम वक़्रा
और उनके कानों में बोझ डाल दिया है ताकि वे समझ न सकें
और:
اَفَرَءَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ اِلٰــہَہٗ ہَوٰىہُ وَاَضَلَّہُ اللہُ
अफ़रअयता मनित्तख़ज़ा इलाहहू हवाहू व अज़ल्लहुल्लाह
क्या तुमने उसे देखा जिसने अपनी ख़्वाहिश को ही अपना माबूद बना लिया
عَلٰي عِلْمٍ وَّخَتَمَ عَلٰي سَمْعِہٖ وَقَلْبِہٖ
अला इल्मिन व ख़तम अला समइही व क़ल्बिही
हालाँकि अल्लाह ने इल्म के बावजूद उसके कान और दिल पर मुहर लगा दी
وَجَعَلَ عَلٰي بَصَرِہٖ غِشٰوَۃًۭ
व जअला अला बसरिही ग़िशावह
और उसकी आँखों पर भी परदा डाल दिया
فَمَنْ يَّہْدِيْہِ مِنْۢ بَعْدِ اللہِۭ اَفَلَا تَذَكَّرُوْنَ
फ़मन यह्दीही मिम बादिल्लाह अफ़ला तज़क्करून
तो अल्लाह के बाद उसे कौन हिदायत देगा? क्या तुम नसीहत नहीं लेते
114. इसी तरह: अब्बास बिन मुजाहिद अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि अली बिन अल-हुसैन (अ.) शाबान के महीने में हर रोज़ ज़ुहर के वक़्त और पंद्रहवीं रात को यह दुआ पढ़ते थे और नबी ﷺ पर दरूद भेजते थे:
اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन
ऐ अल्लाह! मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा
وَآلِ مُحَمَّدٍ شَجَرَةِ النُّبُوَّةِ
व आले मुहम्मदिन शजरतिन नुबुव्वत
और मुहम्मद की आल पर, जो नुबुव्वत का दरख़्त हैं
وَمَوضِعِ الرِّسالَةِ وَ ھٰذَا شَھْرُ نَبِیِّکَ سَیِّدِ
व मौज़िअर रिसालत व हाज़ा शहरु नबिय्यिका सैय्यिदि
और रिसालत के मक़ाम पर, और यह तेरे नबी का महीना है
رُسُلِکَ شَعْبَانُ الَّذِیْ حَفَفْتَہٗ مِنْکَ بِالرَّحْمَةِ
रुसुलिका शाबानुल लज़ी हफ़फ़्तहू मिंका बिर्रहमत
जो रसूलों के सरदार हैं, शाबान वह महीना है जिसे तूने अपनी रहमत से घेर रखा है
وَ الرِّضْوَانِ الَّذِیْ کَانَ رَسُوْلُ اللهِ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ
वर्रिज़वानिल लज़ी काना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि
और अपनी रज़ामंदी से, जिसमें रसूलुल्लाह ﷺ
وَ آلِہٖ وَ سَلَّمَ یَدْاَبُ فِیْ صِیَامِہٖ
व आलेही व सल्लम यदअबु फ़ी सियामिही
और उनकी आल लगातार रोज़ा रखते थे
وَ قِیَامِہٖ فِیْ لَیَالِیْہِ
व क़ियामिही फ़ी लयालिही
और इसकी रातों में क़ियाम करते थे
وَ اَیَّامِہٖ بُـخُوْعًا لَکَ فِیْ اِکْرَامِہٖ
व अय्यामिही बुख़ुअन लका फ़ी इकरामिही
और इसके दिनों में तेरे सामने आज़िज़ी इख़्तियार करते थे
وَ اِعْظَامِہٖ اِلٰی مَحَلِّ حِمَامِہٖ اَللّٰھُمَّ فَاَعِنَّا
व इअज़ामिही इला महल्ले हिमामिही अल्लाहुम्मा फ़अइन्ना
और उसकी ताज़ीम में, यहाँ तक कि उनका इंतिक़ाल हुआ, ऐ अल्लाह! हमें मदद दे
عَلَیالْاِسْتِنَانِ بِسُنَّتِہٖ فِیْہِ
अलल इस्तिनानि बि-सुन्नतिही फ़ीही
कि हम इसमें उनकी सुन्नत पर अमल करें
وَ نَیْلِ الشَّفَاعَةِ لَدَیْہِ
व नयलिश शफ़ाअति लदयही
और उनकी शफ़ाअत हासिल करें
115. शैख़ बहाई के कश्कोल में: मेरे वालिद की तहरीर में है कि अता से रसूलुल्लाह ﷺ के इस क़ौल का मतलब पूछा गया: “सबसे बेहतरीन दुआ मेरी दुआ है और मुझसे पहले नबियों की दुआ है”, और वह यह है:
لَا اِلٰہَ اِلَّا اللہُ وَحْدَہٗ وَ حْدَہٗ وَحْدَہ
ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहू वहदहू वहदहू
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, अकेला है, अकेला है
لَا شَرِیْكَ لَہٗ لَہُ الْمُلْكُ
ला शरीका लहू लहुल मुल्कु
उसका कोई शरीक नहीं, उसी का बादशाही है
وَ لَہُ الْحَمْدُ یُحْیِیْ وَ یُمِیْتُ
व लहुल हम्दु युहयी व युमीतु
और उसी के लिए तमाम हम्द है, वही ज़िंदगी देता है और मौत देता है
وَ ہُوَ حَیٌّ لَا یَمُوْتُ بِیَدِہِ الْخَیْر
व हु्वा हय्युन ला यमूतु बि-यदिहिल ख़ैरु
वह ज़िंदा है, उसे कभी मौत नहीं, उसी के हाथ में सारी भलाई है
وَ ہُوَعَلٰی كُلِّ شَیْءٍ قَدِیْرٌ.
व हु्वा अला कुल्लि शय-इन क़दीर
और वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है
यह दुआ नहीं बल्कि तस्बीह और हम्द है
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फिफ़्टी 59. अगरबत्ती जलाते समय उनकी दुआ
116. अल-बिहार में अमान अल-अख़्तर से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह ﷺ अगरबत्ती जलाते तो यह फ़रमाते थे:
اَلْحَمْدُ لِلهِ الَّذِيْ بِنِعْمَتِهٖتَتِمُّ الصَّالِحَاتُ.
अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी बि-निअमतिही ततिम्मुस्सालिहात
तमाम हम्द अल्लाह के लिए है जिसकी नेमत से सारी नेकियाँ पूरी होती हैं
طَيِّبْ عُرْفَنَا وَ ذَكِّ رَوَائِـحَنَا
अल्लाहुम्मा त़य्यिब उर्फ़ना व ज़क्कि रवाइहना
ऐ अल्लाह! हमारी खुशबू को पाक और बेहतर बना दे
وَ اَحْسِنْ مُنْقَلَبَنَا وَ اجْعَلِ التَّقْوٰى زَادَنَا
व अहसिन मुन्क़लाबना वज्अलित्तक़वा ज़ादना
और हमारे लौटने की जगह को बेहतर बना दे, और तक़वा को हमारा ज़ाद बना दे
وَ الْجَنَّةَ مَعَادَنَا وَ لَا تُفَرِّقْ بَيْنَنَا وَ بَيْنَ عَافِيَتِنَا اِيَّانَا
वल जन्नत मआदना व ला तुफ़र्रिक़ बैना-ना व बैना आफ़ियतिना इय्याना
और जन्नत को हमारा ठिकाना बना दे, और हमारी आफ़ियत को हमसे जुदा न कर
وَ كَرَامَتِكَ لَنَا اِنَّكَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيْرٌ
व करामतिका लना इन्नका अला कुल्लि शय-इन क़दीर
और अपनी इज़्ज़त और करम हम पर क़ायम रख, बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है

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सिक्स्टी 60. उनका रोज़ाना ज़िक्र
117. जब रसूलुल्लाह ﷺ अपनी बात पूरी कर लेते और उठना चाहते तो यह फ़रमाते थे:
اَللّٰہُمَّ اغْفِرْ لَنَا مَا اَخْطَاْنَا
अल्लाहुम्मग़्फ़िर लना मा अख़्तअना
ऐ अल्लाह! हमारी ग़लतियों को माफ़ फ़रमा दे
وَ مَا تَعَمَّدْنَا وَ مَا اَسْرَرْنَا
व मा तअम्मदना व मा असररना
और जो जानबूझ कर किया और जो हमने छुपाया
وَ مَا اَنْتَ اَعْلَمُ بِہٖ مِنَّا اَنْتَ الْمُقَدِّمُ
व मा अन्त अअलमु बिही मिन्ना अन्तल मुक़द्दिमु
और वह भी जिसे तू हमसे ज़्यादा जानता है, तू ही आगे बढ़ाने वाला है
وَ اَنْتَ الْمُؤَخِّرُ لَا اِلٰہَ اِلَّا اَنْت
व अन्तल मुअख़्ख़िरु ला इलाहा इल्ला अन्त
और तू ही पीछे करने वाला है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं
118. अल-दुर्रुल-मंसूर में उम्मे सलमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ अक्सर यह दुआ पढ़ते थे:
اَللّٰہُمَّ مُقَلِّبَ الْقُلُوْبِ
अल्लाहुम्मा मुक़ल्लिबल क़ुलूब
ऐ अल्लाह! दिलों को फेरने वाले
ثَبِّتْ قَلْبِیْ عَلٰی دِیْنِكَ
सब्बित क़ल्बी अला दीनिक
मेरे दिल को अपने दीन पर क़ायम रख
मैंने कहा: ऐ रसूलुल्लाह! क्या दिल पलट जाते हैं? आपने फ़रमाया:
हाँ, अल्लाह ने कोई इंसान पैदा नहीं किया मगर उसका दिल अल्लाह की दो उँगलियों के बीच है, वह चाहे तो उसे सीधा कर दे और चाहे तो फेर दे।
سُبْحَانَهٗ مِنْہُ یُسَبِّحُ الرَّعْدَ بِحَمْدِہٖ
सुब्हानहू मिन्हू युसब्बिहुर्रअद बि-हम्दिही
वह पाक है, उसी की हम्द के साथ गरज तस्बीह करती है
120. सालेम बिन अब्दुल्लाह अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि जब रसूलुल्लाह ﷺ गरज और बिजली की आवाज़ सुनते तो यह फ़रमाते थे:
اَللّٰہُمَّ لَا تَقْتُلْنَا بِغَضَبِكَ
अल्लाहुम्मा ला तक्तुलना बि-ग़ज़बिक
ऐ अल्लाह! हमें अपने ग़ज़ब से हलाक न कर
وَ لَا تُہْلِكْنَا بِعَذَابِكَ
व ला तुह्लिकना बि-अज़ाबिक
और अपने अज़ाब से तबाह न कर
وَ عَافِنَا قَبْلَ ذٰلِكَ
व आफ़िना क़ब्ला ज़ालिक
और उससे पहले हमें आफ़ियत अता फ़रमा
121. शैख़ तूसी की अमाली में है कि जब रसूलुल्लाह ﷺ काले बादल देखते तो सब कुछ छोड़ देते और फ़रमाते:
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِیْہ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा फीह
ऐ अल्लाह! मैं इसमें मौजूद हर बुराई से तेरी पनाह चाहता हूँ
और अगर वह गुज़र जाता तो अल्लाह की हम्द करते, और अगर बारिश होती तो फ़रमाते:
اَللّٰہُمَّ نَاشِئًا نَافِعًا
अल्लाहुम्मा नाशिअन नाफ़िअन
ऐ अल्लाह! इसे फ़ायदा देने वाली बना दे
122. अल-बिहार में है: जब रसूलुल्लाह ﷺ देखते कि हवा तेज़ हो गई है तो फ़रमाते:
اَللّٰہُمَّ اجْعَلْہَا رِیَاحًا
अल्लाहुम्मज्अल्हा रियाहन
ऐ अल्लाह! इसे रहमत वाली हवाएँ बना दे
وَ لَا تَجْعَلْہَا رِیْحًا
व ला तज्अल्हा रीहन
और इसे तबाही लाने वाली हवा न बना
123. मुहाज अल-दावत में है: जाबिर से, अबी जाफ़र (अ.स.) से रिवायत है कि उन्होंने कहा:
जिब्रईल ने कहा: “ऐ अल्लाह के नबी! जान लो कि मैंने किसी नबी से उतनी मोहब्बत नहीं की जितनी तुमसे की है, इसलिए बार-बार यह कहा करो:
اَللّٰهُمَّ اِنَّكَ تَرٰى وَ لَا تُرٰى
अल्लाहुम्मा इन्नका तरा व ला तुरा
ऐ अल्लाह! तू देखता है और देखा नहीं जाता
وَ اَنْتَ بِالْمَنْظَرِ الْاَعْلٰى
व अन्त बिल-मंज़रिल आला
और तू सबसे बुलंद मक़ाम पर है
وَ اَنَّ اِلَيْكَ الْمُنْتَهٰى وَ الرُّجْعٰى
व अन्ना इलैका अल-मुन्तहा वर-रुज्आ
और तेरी ही तरफ़ आख़िरी ठिकाना और वापसी है
وَ اَنَّ لَكَ الْآخِرَةَ وَ الْاُوْلٰى
व अन्ना लकल आख़िरत वल ऊला
और आख़िरत और दुनिया दोनों तेरे ही लिए हैं
وَ اَنَّ لَكَ الْمَمَاتَ وَ الْمَحْيَا رَبِّ
व अन्ना लकल ममात वल मह्या रब्बि
और मौत और ज़िंदगी दोनों तेरे ही क़ब्ज़े में हैं, ऐ रब!
اَعُوْذُ بِكَ اَناَذِلّ وَ اَخْزٰى
अऊज़ु बिका अन अज़िल्ल व अख़ज़ा
मैं तेरी पनाह चाहता हूँ कि ज़लील और रुस्वा किया जाऊँ