जाफ़र बिन अबी तालिब (अ) की हब्शा से वापसी

इस्लामी तारीख़ का एक बेहद रौशन और पुर-अज़मत लम्हा वह है, जब जाफ़र बिन अबी तालिब (अ) हब्शा (अबीसीनिया) से मदीना मुनव्वरा वापस तशरीफ़ लाए। यह वापसी सिर्फ़ एक सफ़र की वापसी नहीं थी, बल्कि यह इस्लाम की हिकमत, सब्र, हिजरत और इलाही नुसरत की एक ज़िंदा मिसाल थी।

शिया अक़ीदे और मुस्तनद तारीखी रवायतों के मुताबिक़, जाफ़र (अ) रसूल-ए-ख़ुदा (स) के चचेरे भाई, हज़रत अली (अ) के बड़े भाई और इस्लाम के पहले मुहाजिरों में से थे। जब मक्का में मुसलमानों पर ज़ुल्म-ओ-सितम हद से बढ़ गया, तो रसूलुल्लाह (स) के हुक्म से एक गिरोह को हब्शा की तरफ़ हिजरत करने का आदेश दिया गया।

इस क़ाफ़िले की क़यादत जाफ़र बिन अबी तालिब (अ) के हाथों में थी। हब्शा के बादशाह नजाशी के दरबार में जाफ़र (अ) ने जिस इल्म, हिकमत और क़ुरआनी बसीरत के साथ इस्लाम का तआरुफ़ पेश किया, वह इस्लामी दावत की तारीख़ का एक सुनहरा बाब है।

शिया रवायतों के मुताबिक़, जाफ़र (अ) ने सूरह मरयम की आयात पढ़कर नजाशी और उसके दरबारियों के दिलों को गहराई से मुतास्सिर कर दिया। यह दलील, अख़लाक़ और क़ुरआनी हक़ीक़त की जीत थी।

नजाशी ने मुसलमानों को अमन दिया और उन्हें अपने मुल्क में पूरी आज़ादी के साथ रहने की इजाज़त दी। जाफ़र (अ) ने कई साल हब्शा में गुज़ारे, जहाँ वे सिर्फ़ एक पनाहगीर नहीं, बल्कि इस्लाम के नुमाइंदा और दाई के तौर पर पहचाने गए।

शिया तारीखी मआख़िज़ के मुताबिक़, जाफ़र बिन अबी तालिब (अ) की मदीना वापसी फ़तह-ए-ख़ैबर के मौक़े पर हुई। जब रसूल-ए-ख़ुदा (स) ने जाफ़र (अ) को देखा, तो आपने फ़रमाया:

“मुझे नहीं मालूम कि मैं किस पर ज़्यादा ख़ुश हूँ — ख़ैबर की फ़तह पर या जाफ़र की वापसी पर।”

यह जुमला शिया अक़ीदे में जाफ़र (अ) की अज़मत और मक़ाम को वाज़ेह करता है। रसूल (स) की यह ख़ुशी इस बात की गवाह है कि जाफ़र (अ) की हिजरत, उनकी क़यादत और उनका सब्र इलाही मक़सद के ऐन मुताबिक़ था।

शिया अक़ीदे के मुताबिक़, जाफ़र बिन अबी तालिब (अ) सिर्फ़ एक सहाबी नहीं, बल्कि अहले-बैत (अ) के अज़ीम अफ़राद में से हैं। बाद में जंग-ए-मूता में उन्होंने जिस तरह इस्लाम का परचम थामा और दोनों बाज़ू कट जाने के बाद भी परचम गिरने नहीं दिया, वह उनकी बे-मिसाल कुर्बानी की ज़िंदा दलील है।

इसी वजह से उन्हें “जाफ़र-ए-तय्यार” कहा जाता है, यानी वह जिनके बारे में यह बशारत दी गई कि अल्लाह ने उन्हें जन्नत में पर अता फ़रमाए हैं।

हब्शा से जाफ़र बिन अबी तालिब (अ) की वापसी इस्लामी तारीख़ में सिर्फ़ एक वापसी नहीं, बल्कि हिजरत की कामयाबी, दावत की जीत और अहले-बैत (अ) की कुर्बानी का ऐलान है।

शिया अक़ीदे और रिसर्च के मुताबिक़, जाफ़र (अ) की ज़िंदगी हमें यह सबक़ देती है कि इस्लाम तलवार से नहीं, बल्कि हक़, अख़लाक़ और सब्र से फैलता है।