इमाम मूसा बिन जाफ़र अल-काज़िम
( उन पर सलाम हो)
अहलेबैत(अ.स.)
से 7वें इमाम
इमाम जाफ़र अल-सादिक़(अ.स) के फ़र्ज़न्द & इमाम अली रज़ा(अ.स) के वालिद
मुख़्तसर मालूमात

कुनियत : अबू अल-हसन | लक़ब (उन्वान): अल-काज़िम
पैदाइश: मदीना में 7 सफ़र 129 हि.| शहादत 19 साल क़ैद के बाद हारून अल-रशीद ने ज़हर देकर शहीद किया 25 रजब 183 हि.| रौज़ा-काज़िमिय्या बग़दाद के क़रीब, इराक़ | रौज़ा 360o |
वालिद- इमाम सादिक़ (अ.स) | वालिदा: हमीदा | दुख़्तर- बीबी मासूमा, क़ुम | फ़र्ज़न्द- इमाम रज़ा (अ.स)

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उनकी दुआएँ
इमाम काज़िम (अ.स) की नमाज़
मुख़्तसर वाक़ेआत
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अजदाद और औलाद -अहलेबैत(अ.स) का मक़ाम और अहमियत

सीरत पर तक़रीरें






पहला फ़ॉर्म | दूसरा फ़ॉर्म (शैख़ मुफ़ीद) | तीसरा आम फ़ॉर्म

दाख़िले के वक़्त की तिलावत / इज़्न-ए-दुख़ूल
اللَّهُ اكْبَرُ ٱللَّهُ اكْبَرُ
अल्लाहु अकबरु अल्लाहु अकबरु
अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा है।

لاََ إِِلٰهَ إِِلاَّ ٱللَّهُ وَٱللَّهُ اكْبَرُ
ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबरु
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है।

اَلْحَمْدُ لِلَّهِ عَلَىٰ هِدَايَتِهِ لِدِينِهِ
अल्हम्दु लिल्लाहि अला हिदायतिही लिदीनिही
तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं जिसने मुझे अपने दीन की हिदायत दी।

وَٱلتَّوْفِيقِ لِمَا دَعَا إِِلَيْهِ مِنْ سَبِيلِهِ
वत्तौफ़ीक़ि लिमा दआ इलैहि मिन सबीलिही
और उस राह पर कामयाबी अता की जिसकी तरफ़ उसने दावत दी।

اَللَّهُمَّ إِِنَّكَ اكْرَمُ مَقْصُودٍ
अल्लाहुम्मा इन्नका अकरमु मक़्सूदिन
ऐ अल्लाह! बेशक तू सबसे इज़्ज़त वाला मक़्सूद है।

وَاكْرَمُ مَاتِيٍّ
वा अकरमु मातिय्यिन
और सबसे इज़्ज़त वाला वह है जिसके पास आया जाता है।

وَقَدْ اتَيْتُكَ مُتَقَرِّباً إِِلَيْكَ
वक़द अतैतुका मुतक़र्रिबन इलैका
मैं तेरे क़रीब होने की नियत से तेरी बारगाह में आया हूँ।

بِٱبْنِ بِنْتِ نَبِيِّكَ
बिब्नि बिन्ति नबिय्यिका
तेरे नबी की बेटी के बेटे के वसीले से।

صَلَوَاتُكَ عَلَيْهِ وَعَلَىٰ آبَائِهِ ٱلطَّاهِرِينَ
सलवातुका अलैहि वा अला आबाइहिल्ल-ताहिरीन
उस पर और उसके पाक बाप-दादाओं पर तेरी रहमतें हों।

وَابْنَائِهِ ٱلطَّيِّبِيـنَ
वा अब्नाइहिल्ल-तैय्यिबीन
और उसकी पाक औलाद पर।

اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍٍ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन वा आलि मुहम्मद
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले-मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा।

وَلاَ تُخَيِّبْ سَعْيِي
वा ला तुखय्यिब सई
मेरी कोशिशों को नाकाम न करना।

وَلاَ تَقْطَعْ رَجَائِي
वा ला तक़्ता रजाई
मेरी उम्मीद को क़तअ न करना।

وَٱجْعَلْنِي عِنْدَكَ وَجِيهاً
वजअल्नी इन्दका वजीहन
मुझे अपनी बारगाह में इज़्ज़त वाला बना।

فِي ٱلدُّنْيَا وَٱلآخِرَةِ وَمِنَ ٱلْمُقَرَّبِيـنَ
फ़िद्दुन्या वल-आख़िरति वा मिनल-मुक़र्रबीन
दुनिया और आख़िरत में, और मुझे अपने क़रीबी बंदों में शामिल फ़रमा।

इसके बाद दायाँ पाँव पहले रखते हुए रौज़े में दाख़िल हों और यह अल्फ़ाज़ पढ़ें:
بِسْمِ ٱللَّهِ وَبِٱللَّهِ
बिस्मिल्लाहि वा बिल्लाहि
अल्लाह के नाम से और अल्लाह पर भरोसा करते हुए।

وَفِي سَبِيلِ ٱللَّهِ
वा फ़ी सबीलिल्लाहि
और अल्लाह की राह में।

وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ ٱللَّهِ
वा अला मिल्लति रसूलिल्लाहि
और रसूल-ए-ख़ुदा के तरीक़े पर।

صَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ
सल्लल्लाहु अलैहि वा आलिही
अल्लाह उन पर और उनकी आले पर रहमत नाज़िल करे।

اَللَّهُمَّ ٱغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ
अल्लाहुम्मग़फ़िर ली वा लिवालिदय्य
ऐ अल्लाह! मुझे और मेरे वालिदैन को बख़्श दे।

وَلِجَمِيعِ ٱلْمُؤْمِنِيـنَ وَٱلْمُؤْمِنَاتِ
वा लिजमीइल-मुमिनीन वल-मुमिनात
और तमाम मोमिन मर्दों और औरतों को।


जब आप गुम्बद के दरवाज़े तक पहुँचें तो वहीं रुकें और दाख़िले की इजाज़त इन अल्फ़ाज़ के साथ माँगें:
اادْخُلُ يَا رَسُولَ ٱللَّهِ
आदख़ुलु या रसूलल्लाहि
ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا نَبِيَّ ٱللَّهِ
आदख़ुलु या नबिय्यल्लाहि
ऐ अल्लाह के नबी! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا مُحَمَّدُ بْنَ عَبْدِ ٱللَّهِ
आदख़ुलु या मुहम्मदु ब्ना अब्दिल्लाहि
ऐ मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا امِيرَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
आदख़ुलु या अमीरल-मोमिनीन
ऐ अमीरुल-मोमिनीन! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا ابَا مُحَمَّدٍ ٱلْحَسَنُ
आदख़ुलु या अबा मुहम्मदिन अल-हसनु
ऐ अबू मुहम्मद हसन! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا ابَا عَبْدِ ٱللَّهِ ٱلْحُسَيْنُ
आदख़ुलु या अबा अब्दिल्लाहिल-हुसैनु
ऐ अबू अब्दुल्लाह हुसैन! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا ابَا مُحَمَّدٍ عَلِيُّ بْنَ ٱلْحُسَيْنِ
आदख़ुलु या अबा मुहम्मदिन अलिय्यु ब्नल-हुसैनि
ऐ अबू मुहम्मद अली बिन हुसैन! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا ابَا جَعْفَرٍ مُحَمَّدُ بْنَ عَلِيٍّ
आदख़ुलु या अबा जाफ़रिन मुहम्मदु ब्ना अलिय्यिन
ऐ अबू जाफ़र मुहम्मद बिन अली! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا ابَا عَبْدِ ٱللَّهِ جَعْفَرُ بْنَ مُحَمَّدٍ
आदख़ुलु या अबा अब्दिल्लाहि जाफ़रु ब्ना मुहम्मदिन
ऐ अबू अब्दुल्लाह जाफ़र बिन मुहम्मद! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ يَا ابَا ٱلْحَسَنِ مُوسَىٰ بْنَ جَعْفَرٍ
आदख़ुलु या मौलाया या अबल-हसन मूसा ब्ना जाफ़रिन
ऐ मेरे मौला! ऐ अबू-ल-हसन मूसा बिन जाफ़र! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ يَا ابَا جَعْفَرٍ
आदख़ुलु या मौलाया या अबा जाफ़रिन
ऐ मेरे मौला! ऐ अबू जाफ़र! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ مُحَمَّدُ بْنَ عَلِيٍّ
आदख़ुलु या मौलाया मुहम्मदु ब्ना अलिय्यिन
ऐ मेरे मौला! ऐ मुहम्मद बिन अली! क्या मुझे दाख़िल होने की इजाज़त है?

दाख़िल होते वक़्त आप नीचे दिया गया जुमला चार मर्तबा दोहरा सकते हैं:
اَللَّهُ اكْبَرُ
अल्लाहु अकबर
अल्लाह सबसे बड़ा है।




फिर आप मुक़द्दस क़ब्र के सामने ठहरें, क़िब्ला को अपने दोनों कंधों के दरमियान रखें, और ये अल्फ़ाज़ कहें:

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا ولِيَّ ٱللَّهِ وَٱبْنَ وَلِيِّهِ
अस्सलामु अलैका या वलिय्यल्लाहि वब्न वलिय्यिही
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के वली और उसके वली के फ़र्ज़न्द।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حُجَّةَ ٱللَّهِ وَٱبْنَ حُجَّتِهِ
अस्सलामु अलैका या हुज्जतल्लाहि वब्न हुज्जतिही
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह की हुज्जत और उसकी हुज्जत के फ़र्ज़न्द।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا صَفِيَّ ٱللَّهِ وَٱبْنَ صَفِيِّهِ
अस्सलामु अलैका या सफ़िय्यल्लाहि वब्न सफ़िय्यिही
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के बरगुज़ीदा और उसके बरगुज़ीदा के फ़र्ज़न्द।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا امِينَ ٱللَّهِ وَٱبْنَ امينِهِ
अस्सलामु अलैका या अमीनल्लाहि वब्न अमीनिही
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के अमीन और उसके अमीन के फ़र्ज़न्द।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا نُورَ ٱللَّهِ فِي ظُلُمَاتِ ٱلارْضِ
अस्सलामु अलैका या नूरल्लाहि फी ज़ुलुमातिल-अर्ज़ि
सलाम हो आप पर, ऐ ज़मीन की तारीकियों में अल्लाह का नूर।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا إِِمَامَ ٱلْهُدَىٰ
अस्सलामु अलैका या इमामल-हुदा
सलाम हो आप पर, ऐ इमाम-ए-हिदायत।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا عَلَمَ ٱلدِّينِ وَٱلتُّقَىٰ
अस्सलामु अलैका या अलमद्दीनी वत्तुक़ा
सलाम हो आप पर, ऐ दीन और तक़वा की अलामत।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا خَازِنَ عِلْمِ ٱلنَّبِيِّينَ
अस्सलामु अलैका या ख़ाज़िन इल्मिन्नबिय्यीन
सलाम हो आप पर, ऐ अंबिया के इल्म के ख़ाज़िन।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا خَازِنَ عِلْمِ ٱلْمُرْسَلِينَ
अस्सलामु अलैका या ख़ाज़िन इल्मिल-मुर्सलीन
सलाम हो आप पर, ऐ रसूलों के इल्म के ख़ाज़िन।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا نَائِبَ ٱلاوْصِيَاءِ ٱلسَّابِقِينَ
अस्सलामु अलैका या नाइब अल-अवसियाइ अस्साबिक़ीन
सलाम हो आप पर, ऐ गुज़िश्ता औसिया के नाइब।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا مَعْدِنَ ٱلْوَحْي ِٱلْمُبِينِ
अस्सलामु अलैका या मअदिनल-वह्यिल-मुबीन
सलाम हो आप पर, ऐ वह्ये-ए-मुबीन का सरचश्मा।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا صَاحِبَ ٱلْعِلْمِ ٱلْيَقِينِ
अस्सलामु अलैका या साहिबल-इल्मिल-यक़ीन
सलाम हो आप पर, ऐ यक़ीनी इल्म के मालिक।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا عَيْبَةَ عِلْمِ ٱلْمُرْسَلِينَ
अस्सलामु अलैका या ऐबत इल्मिल-मुर्सलीन
सलाम हो आप पर, ऐ रसूलों के इल्म का ख़ज़ाना।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلإِمَامُ ٱلصَّالِحُ
अस्सलामु अलैका अय्युहल-इमामुस-सालिहु
सलाम हो आप पर, ऐ नेक इमाम।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلإِمَامُ ٱلزَّاهِدُ
अस्सलामु अलैका अय्युहल-इमामुज़-ज़ाहिदु
सलाम हो आप पर, ऐ ज़ाहिद इमाम।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلإِمَامُ ٱلْعَابِدُ
अस्सलामु अलैका अय्युहल-इमामुल-आबिदु
सलाम हो आप पर, ऐ इबादतगुज़ार इमाम।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلإِمَامُ ٱلسَّيِّدُ ٱلرَّشِيدُ
अस्सलामु अलैका अय्युहल-इमामुस-सय्यिदुर-रशीदु
सलाम हो आप पर, ऐ सरवर और रशीद इमाम।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلْمَقْتُولُ ٱلشَّهِيدُ
अस्सलामु अलैका अय्युहल-मक़्तूलुश-शहीदु
सलाम हो आप पर, ऐ मक़्तूल और शहीद।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا بْنَ رَسُولِ ٱللَّهِ وَٱبْنَ وَصِيِّهِ
अस्सलामु अलैका यब्न रसूलिल्लाहि वब्न वसिय्यिही
सलाम हो आप पर, ऐ रसूलुल्लाह के फ़र्ज़न्द और उनके वसी के फ़र्ज़न्द।

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا مَوْلاَيَ مُوسَىٰ بْنَ جَعْفَرٍ
अस्सलामु अलैका या मौलाया मूसा ब्ना जाफ़रिन
सलाम हो आप पर, ऐ मेरे मौला मूसा बिन जाफ़र।

وَرَحْمَةُ ٱللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ
वा रहमतुल्लाहि वा बरकातुहु
और अल्लाह की रहमत और बरकतें।

اشْهَدُ انَّكَ قَدْ بَلَّغْتَ عَنِ ٱللَّهِ مَا حَمَّلَكَ
अश्हदु अन्नका क़द बल्लग़्ता अनिल्लाहि मा हम्मलक
मैं गवाही देता हूँ कि आपने अल्लाह का वह पैग़ाम पूरी अमानतदारी से पहुँचा दिया जो उसने आपके सुपुर्द किया।

وَحَفِظْتَ مَا ٱسْتَوْدَعَكَ
वा हफ़िज़्ता मा इस्तौदा'अका
और आपने उस अमानत की हिफ़ाज़त की जो उसने आपके हवाले की।

وَحَلَّلْتَ حَلاَلَ ٱللَّهِ
वा हल्लल्ता हलालल्लाहि
और आपने अल्लाह की हलाल की हुई चीज़ों को हलाल ठहराया।

وَحَرَّمْتَ حَرَامَ ٱللَّهِ
वा हर्रम्ता हरामल्लाहि
और आपने अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों को हराम ठहराया।

وَاقَمْتَ احْكَامَ ٱللَّهِ
वा अक़म्ता अहकामल्लाहि
और आपने अल्लाह के अहकाम क़ायम किए।

وَتَلَوْتَ كِتَابَ ٱللَّهِ
वा तलौता किताबल्लाहि
और आपने अल्लाह की किताब की तिलावत की।

وَصَبَرْتَ عَلَىٰ ٱلاذَىٰ فِي جَنْبِ ٱللَّهِ
वा सबरता अलल-अज़ा फी जनबिल्लाहि
और आपने अल्लाह की राह में अज़ीयत पर सब्र किया।

وَجَاهَدْتَ فِي ٱللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِ
वा जाहद्ता फ़िल्लाहि हक़्क़ जहादिही
और आपने अल्लाह की राह में वैसा ही जिहाद किया जैसा उसका हक़ था।

حَتَّىٰ اتَاكَ ٱلْيَقِينُ
हत्ता अताकल-यक़ीनु
यहाँ तक कि यक़ीन (मौत) आपके पास आ गया।

وَاشْهَدُ انَّكَ مَضَيْتَ
वा अश्हदु अन्नका मज़ैता
और मैं गवाही देता हूँ कि आप इस दुनिया से रुख़्सत हुए

عَلَىٰ مَا مَضَىٰ عَلَيْهِ آبَائِهِ ٱلطَّاهِرُونَ
अला मा मज़ा अलैहि आबाउकल-ताहिरून
उसी तरीक़े और उसूल पर जिस पर आपके पाक आबा व अजदाद गुज़रे।

وَاجْدَادُكَ ٱلطَّيِّبُونَ
वा अजदादुकल-तैय्यिबून
और आपके पाकीज़ा बुज़ुर्ग।

ٱلاوْصِيَاءُ ٱلْهَادُونَ
अल-अवसियाउल-हादून
हिदायत देने वाले औसिया,

ٱلائِمَّةُ ٱلْمَهْدِيُّونَ
अल-अइम्मतुल-महदिय्यून
हिदायत याफ़्ता इमाम।

لَمْ تُؤْثِرْ عَمىًٰ عَلَىٰ هُدىًٰ
लम तुअसिर अमा अला हुदन
आपने कभी भी हिदायत पर अंधेपन को तरजीह नहीं दी,

وَلَمْ تَمِلْ مِنْ حَقٍّ إِلَىٰ بَاطِلٍ
व लम तमिल मिन हक्क़िन इला बातिलिन
और न कभी हक़ से बातिल की तरफ़ झुके।

وَاشْهَدُ انَّكَ نَصَحْتَ لِلَّهِ
व अश्हदु अन्नका नसह्ता लिल्लाहि
और मैं गवाही देता हूँ कि आपने अल्लाह के लिए ख़ुलूस के साथ नसीहत की,

وَلِرَسُولِهِ وَلاِمِيـرِ ٱلْمُؤمِنِينَ
व लिरसूलिही व लि-अमीरिल-मोमिनीन
उसके रसूल और अमीरुल-मोमिनीन के लिए भी,

وَانَّكَ ادَّيْتَ ٱلامَانَةَ
व अन्नका अद्दैतल-अमानता
और आपने अमानत अदा की,

وَٱجْتَنَبْتَ ٱلْخِيَانَةَ
वजतनब्तल-ख़ियानता
और ख़ियानत से बचते रहे,

وَاقَمْتَ ٱلصَّلاَةَ
व अक़म्तस्सलाता
नमाज़ क़ायम की,

وَآتَيْتَ ٱلزَّكَاةَ
व आतैतज़्ज़काता
ज़कात अदा की,

وَامَرْتَ بِٱلْمَعْرُوفِ
व अमर्त बिल-मअरूफ़ि
नेकी का हुक्म दिया,

وَنَهَيْتَ عَنِ ٱلْمُنْكَرِ
व नहैत अनिल-मुनकरि
और बुराई से रोका,

وَعَبَدْتَ ٱللَّهَ مُخْلِصاً
व अबद्तल्लाहा मुख़्लिसन
और अल्लाह की इबादत ख़ुलूस के साथ की,

مُجْتَهِداً مُحْتَسِباً
मुज्तहिदन मुहतसिबन
पूरी कोशिश और सवाब की उम्मीद के साथ,

حَتَّىٰ اتَاكَ ٱلْيَقِيـنُ
हत्ता अताकल-यक़ीन
यहाँ तक कि यक़ीन (मौत) आ पहुँचा।

فَجَزَاكَ ٱللَّهُ عَنِ ٱلإِسْلاَمِ وَاهْلِهِ
फ़जज़ाकल्लाहु अनिल-इस्लामि व अहलिही
तो अल्लाह आपको इस्लाम और उसके मानने वालों की तरफ़ से बेहतरीन बदला अता फ़रमाए,

افْضَلَ ٱلْجَزَاءِ وَاشْرَفَ ٱلْجَزَاءِ
अफ़ज़लल-जज़ाइ व अश्रफ़ल-जज़ाइ
सबसे उम्दा और सबसे इज़्ज़त वाला बदला।

اتَيْتُكَ يَا بْنَ رَسُولِ ٱللَّهِ زَائِراً
अतैतुका या ब्न रसूलिल्लाहि ज़ाइरन
ऐ फ़र्ज़न्द-ए-रसूलुल्लाह! मैं आपकी ज़ियारत के लिए हाज़िर हुआ हूँ,

عَارِفاً بِحَقِّكَ
आरिफ़न बिहक्क़िका
आपके हक़ को पहचानते हुए,

مُقِرّاً بِفَضْلِكَ
मुकर्रन बिफ़ज़लिका
आपकी फ़ज़ीलत का इक़रार करते हुए,

مُحْتَمِلاًَ لِعِلْمِكَ
मुहतमिलन लि-इल्मिका
आपके इल्म को स्वीकार करते हुए,

مُحْتَجِباً بِذِمَّتِكَ
मुहतजिबन बि-ज़िम्मतिका
आपकी अमान में पनाह लेते हुए,

عَائِذاً بِقَبْرِكَ
आइज़न बिक़ब्रिका
आपकी क़ब्र की पनाह लेते हुए,

لاَئِذاً بِضَرِيـحِكَ
लाइज़न बि-ज़रीहिका
आपके रौज़े का सहारा लेते हुए,

مُسْتَشْفِعاً بِكَ إِِلَىٰ ٱللَّهِ
मुस्तश्फ़िअन बिका इलल्लाहि
अल्लाह के सामने आपको वसीला बनाते हुए,

مُوَالِياً لاِوْلِيَائِكَ
मुवालियन लि-अवलियाइका
आपके दोस्तों से दोस्ती रखते हुए,

مُعَادِياً لاِعْدَائِكَ
मुआदियन लि-अअदाइका
और आपके दुश्मनों से दुश्मनी रखते हुए,

مُسْتَبْصِراً بِشَانِكَ
मुस्तब्सिरन बिशानिका
आपके मक़ाम की बसीरत रखते हुए,

وَبِٱلْهُدَىٰ ٱلَّذِي انْتَ عَلَيْهِ
व बिल-हुदल्लज़ी अंत अलेह
और उस हिदायत को पहचानते हुए जिस पर आप क़ायम हैं,

عَالِماً بِضَلاَلَةِ مَنْ خَالَفَكَ
आलिमन बिदलालत मन ख़ालफ़का
और उन लोगों की गुमराही को जानते हुए जिन्होंने आपका मुख़ालफ़त की,

وَبِٱلْعَمَىٰ ٱلَّذِي هُمْ عَلَيْهِ
व बिल-अमा अल्लज़ी हुम अलेह
और उस अंधेपन को भी जिसे वे अपनाए हुए हैं।

بِابِي انْتَ وَامِّي
बि-अबी अंत वा उम्मी
मेरे माँ-बाप आप पर क़ुर्बान हों,

وَنَفْسِي وَاهْلِي
व नफ़्सी व अहली
मेरी जान और मेरा घराना,

وَمَالِي وَوَلَدِي
व माली व वलदी
और मेरा माल और मेरी औलाद।

يَا بْنَ رَسُولِ ٱللَّهِ
या ब्न रसूलिल्लाहि
ऐ फ़र्ज़न्द-ए-रसूलुल्लाह!

اتَيْتُكَ مُتَقَرِّباً بِزِيَارَتِكَ إِِلَىٰ ٱللَّهِ تَعَالَىٰ
अतैतुका मुतक़र्रिबन बिज़ियारतिका इलल्लाहि तआला
मैं अल्लाह-ए-तआला का क़ुर्ब हासिल करने के लिए आपकी ज़ियारत को आया हूँ,

وَمُسْتَشْفِعاً بِكَ إِِلَيْهِ
व मुस्तश्फ़िअन बिका इलैह
और उसके सामने आपको वसीला बनाते हुए,

فَٱشْفَعْ لِي عِنْدَ رِبِّكَ
फ़श्फ़अ ली इंदा रब्बिका
तो अपने रब के सामने मेरी शफ़ाअत फ़रमाइए,

لِيَغْفِرَ لِي ذُنُوبِي
लियग़फ़िर ली ज़ुनूबी
ताकि वह मेरे गुनाह बख़्श दे,

وَيَعْفُوَ عَنْ جُرْمِي
व याफ़ू अन जुर्मी
मेरे जुर्म माफ़ कर दे,

وَيَتَجَاوَزَ عَنْ سَيِّئَاتِي
व यतजावज़ अन सय्यिआती
मेरी बुराइयों से दरगुज़र करे,

وَيَمْحُوَ عَنِّي خَطِيئَاتِي
व यम्हू अन्नी ख़तिआती
और मेरी ख़ताएँ मिटा दे,

وَيُدْخِلَنِي ٱلْجَنَّةَ
व युदख़िलनील-जन्नता
और मुझे जन्नत में दाख़िल फ़रमाए,

وَيَتَفَضَّلَ عَلَيَّ بِمَا هُوَ اهْلُهُ
व यतफ़ज़्ज़ल अलेय्या बिमा हुआ अहलुहू
और अपनी शान के मुताबिक़ मुझ पर फ़ज़्ल फ़रमाए,

وَيَغْفِرَ لِي وَلآِبَائِي
व यग़फ़िर ली वलिआबाई
और मुझे और मेरे बाप-दादाओं को बख़्श दे,

وَلإِِِخْوَانِي وَاخَوَاتِي
व लि-इख़्वानी व अख़वाती
मेरे भाइयों और बहनों को,

وَلِجَمِيعِ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَاتِ
व लिजमीइल-मोमिनीन वल-मोमिनाति
और तमाम मोमिन मर्दों और औरतों को,

فِي مَشَارِقِ ٱلارْضِ وَمَغَارِبِهَا
फ़ी मशारिक़िल-अर्ज़ि व मग़ारिबिहा
ज़मीन के मशरिक़ और मग़रिब में,

بِفَضْلِهِ وَجُودِهِ وَمَنِّهِ
बिफ़ज़्लिही वजूदिही व मन्निही
उसके फ़ज़्ल, करम और एहसान से।

फिर आप क़ब्र पर झुक जाएँ, अपने दोनों गाल उस पर रख दें और अल्लाह तआला से अपनी हर ज़रूरत के लिए दुआ करें
इसके बाद आप इमाम के सरहाने की तरफ़ रुख़ करके ये अल्फ़ाज़ कहें:

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا مَوْلاَيَ
अस्सलामु अलैक या मौलाया
सलाम हो आप पर, ऐ मेरे मौला

يَا مُوسَىٰ بْنَ جَعْفَرٍ
या मूसा बिन जाफ़र
ऐ मूसा बिन जाफ़र

وَرَحْمَةُ ٱللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ
व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू
और अल्लाह की रहमत और बरकतें आप पर हों

اشْهَدُ انَّكَ ٱلإِمَامُ ٱلْهَادِي
अशहदु अन्नका अल-इमामुल-हादी
मैं गवाही देता हूँ कि आप ही हिदायत देने वाले इमाम हैं

وَٱلْوَلِيُّ ٱلْمُرْشِدُ
वल-वलीय्युल-मुर्शिद
और सही रास्ते की तरफ़ रहनुमाई करने वाले वली हैं

وَانَّكَ مَعْدِنُ ٱلتَّنْزِيلِ
व अन्नका मअदिनुत-तन्ज़ील
और बेशक आप वह मर्कज़ हैं जहाँ से वह़ी नाज़िल हुई

وَصَاحِبُ ٱلتَّاوِيلِ
व साहिबुत-तावील
और तावील (असली मतलब) जानने वाले हैं

وَحَامِلُ ٱلتَّوْرَاةِ وَٱلإِنْجِيلِ
व हामिलुत-तौराति वल-इंजील
और तौरात व इंजील के इल्म को उठाने वाले हैं

وَٱلْعَالِمُ ٱلْعَادِلُ
वल-आलिमुल-आदिल
आलिम और इंसाफ़ करने वाले हैं

وَٱلصَّادِقُ ٱلْعَامِلُ
वस्सादिक़ुल-आमिल
सच्चे और अपने इल्म पर अमल करने वाले हैं

يَا مَوْلاَيَ انَا ابْرَا إِِلَىٰ ٱللَّهِ مِنْ اعْدَائِكَ
या मौलाया अना अबरउ इल्लल्लाहि मिन अदाइका
ऐ मेरे मौला! मैं अल्लाह के सामने आपके दुश्मनों से बरी हूँ

وَاتَقَرَّبُ إِِلَىٰ ٱللَّهِ بِمُوَالاَتِكَ
व अतक़र्रबु इलल्लाहि बि-मुवालातिका
और आपकी मोहब्बत के ज़रिये अल्लाह का क़ुर्ब चाहता हूँ

فَصَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَيْكَ
फ़सल्लल्लाहु अलैक
तो अल्लाह आप पर दुरूद भेजे

وَعَلَىٰ آبَائِكَ وَاجْدَادِكَ وَابْنَائِكَ
व अला आबाइका व अजदादिका व अबनाइका
और आपके वालिदैन, बुज़ुर्गों और औलाद पर भी

وَشِيعَتِكَ وَمُحِبِّيكَ
व शीअतिक व मुहिब्बीका
और आपके शियाओं और चाहने वालों पर भी

وَرَحْمَةُ ٱللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ
व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू
और अल्लाह की रहमत और बरकतें हों

इसके बाद आप ज़ियारत की दो रकअत नमाज़ अदा करें। पहली रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा के बाद सूरह यासीन (36) और दूसरी रकअत में सूरह अल-फ़ातिहा के बाद सूरह अर-रहमान (55) पढ़ें। आप चाहें तो कोई और सूरह भी पढ़ सकते हैं। इसके बाद अल्लाह तआला से अपनी हर ज़रूरत के लिए दुआ करें।

दूसरा तरीक़ा
शैख़ अल-मुफ़ीद, अश-शहीद और मुहम्मद बिन अल-मशहदी ने बयान किया है: अगर आप बग़दाद में इमाम अल-काज़िम (अ) की ज़ियारत का इरादा करें, तो पहले ग़ुस्ल करें, ज़ियारत की नियत से, फिर रौज़े की तरफ़ जाएँ, दरवाज़े पर रुकें, इजाज़त माँगें और फिर दाख़िल हों और ये अल्फ़ाज़ कहें:
بِسْمِ ٱللَّهِ وَبِٱللَّهِ
बिस्मिल्लाहि व बिल्लाहि
अल्लाह के नाम से और अल्लाह ही के सहारे

وَفِي سَبِيلِ ٱللَّهِ
व फ़ी सबीलिल्लाहि
और अल्लाह के रास्ते में

وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ ٱللَّهِ
व अला मिल्लति रसूलिल्लाहि
और रसूलुल्लाह की मिल्लत पर

صَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ
सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही
अल्लाह उन पर और उनकी आल पर दुरूद भेजे

وَٱلسَّلاَمُ عَلَىٰ اوْلِيَاءِ ٱللَّهِ
वस्सलामु अला औलियाइल्लाहि
और अल्लाह के औलिया पर सलाम हो



आप चलते रहें यहाँ तक कि मूसा बिन जाफ़र (अ) की क़ब्र के सामने रुक जाएँ। वहाँ रुक कर ये अल्फ़ाज़ कहें:
اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا نُورَ ٱللَّهِ فِي ظُلُمَاتِ ٱلارْضِ
अस्सलामु अलैक या नूरल्लाहि फ़ी ज़ुलुमातिल-अर्ज़
सलाम हो आप पर, ऐ ज़मीन की तारीकियों में अल्लाह के नूर

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا وَلِيَّ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैक या वलिय्यल्लाहि
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के वली

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حُجَّةَ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैक या हुज्जतल्लाहि
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह की हुज्जत

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا بَابَ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैक या बाबल्लाहि
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के दरवाज़े

اشْهَدُ انَّكَ اقَمْتَ ٱلصَّلاَةَ
अशहदु अन्नका अक़म्तस्सलात
मैं गवाही देता हूँ कि आपने नमाज़ क़ायम की

وَآتَيْتَ ٱلزَّكَاةَ
व आतैतज़्ज़कात
और ज़कात अदा की

وَامَرْتَ بِٱلْمَعْرُوفِ
व अमर्त बिल-मअरूफ़
और नेकी का हुक्म दिया

وَنَهَيْتَ عَنِ ٱلْمُنْكَرِ
व नहैत अनिल-मुनकर
और बुराई से रोका

وَتَلَوْتَ ٱلْكِتَابَ حَقَّ تِلاَوَتِهِ
व तलव्तल-किताब हक़्क़ा तिलावतिही
और आपने किताब की तिलावत उसी तरह की जैसे उसकी तिलावत का हक़ था

وَجَاهَدْتَ فِي ٱللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِ
व जाहद्ता फ़िल्लाहि हक़्क़ा जिहादिही
और आपने अल्लाह की राह में वैसा ही जिहाद किया जैसा उसका हक़ था

وَصَبَرْتَ عَلَىٰ ٱلاذَىٰ فِي جَنْبِهِ مُحْتَسِباً
व सबर्ता अलल-अज़ा फ़ी जन्बिही मुहतसिबन
और आपने उसकी राह में तकलीफ़ों पर सब्र किया, सवाब की उम्मीद रखते हुए

وَعَبَدْتَهُ مُخْلِصاً حَتَّىٰ اتَاكَ ٱلْيَقِيـنُ
व अबद्तहू मुख़लिसन हत्ता अताकल-यक़ीन
और आपने ख़ुलूस के साथ उसकी इबादत की यहाँ तक कि यक़ीन (मौत) आ पहुँचा

اشْهَدُ انَّكَ اوْلَىٰ بِٱللَّهِ وِبِرَسُولِهِ
अशहदु अन्नका औला बिल्लाहि व बिरसूलिही
मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह और उसके रसूल के सबसे ज़्यादा क़रीब हैं

وَانَّكَ ٱبْنُ رَسُولِ ٱللَّهِ حَقّاً
व अन्नका इब्नु रसूलिल्लाहि हक़्क़न
और बेशक आप हक़ीक़तन रसूलुल्लाह के फ़र्ज़ंद हैं

ابْرَا إِِلَىٰ ٱللَّهِ مِنْ اعْدَائِكَ
अब्रा इलल्लाहि मिन अदाइका
मैं अल्लाह के सामने आपके दुश्मनों से बरी हूँ

وَاتَقَرَّبُ إِِلَىٰ ٱللَّهِ بِمُوَالاَتِكَ
व अतक़र्रबु इलल्लाहि बि-मुवालातिका
और आपकी विलायत के ज़रिये अल्लाह का क़ुर्ब चाहता हूँ

اتَيْتُكَ يَا مَوْلاَيَ عَارِفاً بِحَقِّكَ
अतैतुका या मौलाया आरिफ़न बिहक़्क़िका
ऐ मेरे मौला! मैं आपकी ज़ियारत को आया हूँ आपके हक़ को पहचानते हुए

مُوَالِياً لاِوْلِيَائِكَ
मुवालियन लिऔलियाइका
आपके औलिया से दोस्ती रखते हुए

مُعَادِياً لاِعْدَائِكَ
मुआदियन लिअदाइका
और आपके दुश्मनों से दुश्मनी रखते हुए

فَٱشْفَعْ لِي عِنْدَ رَبِّكَ
फ़शफ़ाʼ ली इंदा रब्बिका
तो आप अपने रब के यहाँ मेरी शफ़ाअत फ़रमाइए



अब आप क़ब्र पर झुक जाएँ, उसे चूम लें, अपने दोनों गाल उस पर रखें, इमाम के सरहाने की तरफ़ रुख़ करें, वहीं ठहरें और ये अल्फ़ाज़ कहें:
اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا بْنَ رَسُولِ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैक या इब्न रसूलिल्लाह
सलाम हो आप पर, ऐ रसूलुल्लाह के फ़र्ज़ंद

اشْهَدُ انَّكَ صَادِقٌ
अशहदु अन्नका सादिक़ुन
मैं गवाही देता हूँ कि आप सच्चे हैं

ادَّيْتَ نَاصِحاً
अद्दैत नासिहन
आपने अमानत को सच्चाई और नसीहत के साथ अदा किया

وَقُلْتَ امِيناً
व क़ुल्ता अमीनन
और अमानतदारी के साथ बात कही

وَمَضَيْتَ شَهِيداً
व मज़ैत शहीदन
और आप शहीद होकर दुनिया से गए

لَمْ تُؤْثِرْ عَمىًٰ عَلَىٰ ٱلْهُدَىٰ
लम तुथिर अमा अलल-हुदा
आपने कभी अंधेपन को हिदायत पर तरजीह नहीं दी

وَلَمْ تَمِلْ مِنْ حَقٍّ إِلَىٰ بَاطِلٍ
व लम तमिल मिन हक़्क़िन इला बातिलिन
और न कभी हक़ से बातिल की तरफ़ झुके

صَلَّىٰ ٱللَّهُ عَلَيْكَ
सल्लल्लाहु अलैक
अल्लाह आप पर दुरूद भेजे

وَعَلَىٰ آبَائِكَ وَابْنَائِكَ ٱلطَّاهِرِينَ
व अला आबाइका व अबनाइकल-ताहिरीन
और आपके पाक वालिदैन और औलाद पर भी

अब आप क़ब्र को चूमें और दो रकअत नमाज़ अदा करें। इसके बाद जो दुआ चाहें पढ़ें। फिर सज्दा करें और ये दुआ पढ़ें:
اَللَّهُمَّ إِِلَيْكَ ٱعْتَمَدْتُ
अल्लाहुम्मा इलैका इअतमद्तु
ऐ अल्लाह! मैंने तुझ पर ही भरोसा किया

وَإِِلَيْكَ قَصَدْتُ
व इलैका क़सद्तु
और तेरी ही तरफ़ रुख़ किया

وَبِفَضْلِكَ رَجَوْتُ
व बिफ़ज़्लिका रजव्तु
और तेरे फ़ज़्ल की उम्मीद रखी

وَقَبْرَ إِِمَامِيَ ٱلَّذِي اوْجَبْتَ عَلَيَّ طَاعَتَهُ زُرْتُ
व क़ब्रा इमामियल्लज़ी औजब्द्ता अलय्या ताअतहू ज़ुर्तु
और मैंने अपने उस इमाम की क़ब्र की ज़ियारत की जिसकी इताअत तूने मुझ पर फ़र्ज़ की

وَبِهِ إِِلَيْكَ تَوَسَّلْتُ
व बिही इलैका तवस्सल्तु
और उन्हें तेरा वसीला बनाया

فَبِحَقِّهِمُ ٱلَّذِي اوْجَبْتَ عَلَىٰ نَفْسِكَ
फ़बिहक़्क़िहिमुल्लज़ी औजब्द्ता अला नफ़्सिका
तो उनके उस हक़ के वास्ते जो तूने अपने ऊपर वाजिब किया

ٱغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ
इग़फ़िर ली व लिवालिदय्य व लिल्मुमिनीन
मुझे, मेरे वालिदैन और तमाम मोमिनीन को बख़्श दे

يَا كَرِيـمُ
या करीम
ऐ बड़े करम करने वाले


इसके बाद आप अपना दायाँ गाल ज़मीन पर रखें और ये पढ़ें :
اَللَّهُمَّ قَدْ عَلِمتَ حَوَائِجِي
अल्लाहुम्मा क़द् अलिम्ता हवाइजि
ऐ अल्लाह! तू मेरी तमाम हाजतों को जानता है

فَصَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَٱقْضِهَا
फ़सल्लि अला मुहम्मदिं व आले-मुहम्मदिं वक़्दिहा
तो मुहम्मद और आले-मुहम्मद पर दुरूद भेज और मेरी हाजतें पूरी फ़रमा


इसके बाद अपना बायाँ गाल ज़मीन पर रखो और ये अल्फ़ाज़ कहो:
اَللَّهُمَّ قَدْ احْصَيْتَ ذُنُوبِي
अल्लाहुम्मा क़द् अह्सैता ज़ुनूबी
ऐ अल्लाह! तूने मेरे गुनाहों का हिसाब कर रखा है

فَبِحَقِّ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
फ़बिहक़्क़ि मुहम्मदिं व आले-मुहम्मदिं
तो मुहम्मद और आले-मुहम्मद के हक़ के वास्ते

صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
सल्लि अला मुहम्मदिं व आले-मुहम्मदिं
मुहम्मद और आले-मुहम्मद पर दुरूद भेज

وَٱغْفِرْهَا وَتَصَدَّقْ عَلَيَّ بِمَا انْتَ اهْلُهُ
वग़्फ़िरहा व तसद्दक़ अलय्य बिमा अन्त अह्लुहू
मेरे गुनाहों को बख़्श दे और मुझ पर अपने करम से अता फ़रमा


इसके बाद सज्दे की हालत में वापस जाकर ये लफ़्ज़ सौ मर्तबा दोहराओ:
شُكْراً
शुक्रन
शुक्र है

इसके बाद सज्दे से सिर उठाकर जो चाहो और जिसके लिए चाहो दुआ करो।

एक और आम ज़ियारत जो हर इमाम के लिए अलग-अलग पढ़ी जाती है
बुज़ुर्ग आलिम शैख़ जाफ़र बिन मुहम्मद बिन क़ौलवयह अल-क़ुम्मी ने अपनी किताब कामिलुज़-ज़ियारह में बयान किया है कि इमाम अली अन-नक़ी (अल-हादी) ने फ़रमाया कि इन दोनों इमामों (यानी अल-काज़िम और अल-जवाद) के लिए यह ज़ियारत अलग-अलग पढ़ी जाए:
اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا وَلِيَّ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैका या वलिय्यल्लाह
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह के वली

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حُجَّةَ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैका या हुज्जतल्लाह
सलाम हो आप पर, ऐ अल्लाह की हुज्जत

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا نُورَ ٱللَّهِ فِي ظُلُمَاتِ ٱلارْضِ
अस्सलामु अलैका या नूरल्लाहि फ़ी ज़ुलुमातिल-अर्ज़
सलाम हो आप पर, ऐ ज़मीन की तारीकियों में अल्लाह के नूर

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا مَنْ بَدَا لِلَّهِ فِي شَانِهِ
अस्सलामु अलैका या मन बदालिल्लाहि फ़ी शानिही
सलाम हो आप पर, ऐ वो जिनके मामले में अल्लाह की मशीयत ज़ाहिर हुई

اتَيْتُكَ زَائِراً
अतैतुका ज़ाइरन
मैं आपकी ज़ियारत के लिए हाज़िर हुआ हूँ

عَارِفاً بِحَقِّكَ
आरिफ़न बिहक़्क़िका
आपके हक़ को पहचानते हुए

مُعَادِياً لاِعْدَائِكَ
मुʿआदियन लि-अʿदाइका
आपके दुश्मनों से बेज़ारी इख़्तियार करते हुए

مُوَالِياً لاِوْلِيَائِكَ
मुवालियन लि-अवलियाइका
और आपके दोस्तों से वफ़ादारी का इज़हार करते हुए

فَٱشْفَعْ لِي عِنْدَ رَبِّكَ يَا مَوْلاَيَ
फ़श्फ़ाʿ ली ʿइन्दा रब्बिका या मौलाया
तो ऐ मेरे मौला! अपने रब के हुज़ूर मेरी शफ़ाअत फ़रमाइए

हक़ीक़त में यह ज़ियारत बहुत ज़्यादा मुअतबर है; इसे शैख़ सदूक़, शैख़ कुलैनी और शैख़ तूसी ने भी बहुत मामूली फ़र्क़ के साथ रिवायत किया है।


अगले टैब में मज़ार पर सलवात पढ़ें


इमाम मूसा बिन काज़िम (अ.स.) के मज़ार पर इमाम महदी (अ.स.) के ज़ुहूर की दुआ – सह़ीफ़ा-ए-महदी
أَللَّهمَّ عَظُمَ الْبَلاءُ، وَبَرِحَ الْخَفاءُ ، وَانْكَشَفَ الْغِطاءُ ،
ऐ अल्लाह! मुसीबत बहुत बढ़ गई है, पर्देदारी उठ चुकी है, और ओट हट चुकी है, और उम्मीदें टूट चुकी हैं
وَضاقَتِ الْأَرْضُ، وَمُنِعَتِ السَّماءُ ،
ज़मीन तंग हो गई है और आसमान से मदद रुक गई है
وَأَنْتَ يا رَبِّ الْمُسْتَعانُ ، وَ إِلَيْكَ يا رَبِّ الْمُشْتَكى .
और ऐ परवरदिगार! तू ही मददगार है और तेरे ही सामने फरियाद पेश की जाती है

أَللَّهُمَّ صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ ، اَلَّذينَ فَرَضْتَ طاعَتَهُمْ ، وَعَرَّفْتَنا بِذلِكَ مَنْزِلَتَهُمْ ، وَفَرِّجْ عَنَّا كَرْبَنا قَريباً كَلَمْحِ الْبَصَرِ ، أَوْ هُوَ أَقْرَبُ ،
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनकी आल पर दुरूद भेज, जिनकी इताअत तूने हम पर फ़र्ज़ की और जिनका मक़ाम हमें बताया, और हमारी तकलीफ़ों को बहुत क़रीब, पलक झपकते या उससे भी ज़्यादा क़रीब, दूर फ़रमा

يا أَبْصَرَ النَّاظِرينَ، وَيا أَسْمَعَ السَّامِعينَ، وَيا أَسْرَعَ الْحاسِبينَ، وَيا أَحْكَمَ الْحاكِمينَ .
ऐ सब देखने वालों में सबसे ज़्यादा देखने वाले, ऐ सब सुनने वालों में सबसे ज़्यादा सुनने वाले, ऐ सब हिसाब लेने वालों में सबसे तेज़, और ऐ सब हाकिमों में सबसे ज़्यादा हिकमत वाले

يا مُحَمَّدُ يا عَلِيُّ، يا عَلِيُّ يا مُحَمَّدُ، يا مُصْطَفى يا مُرْتَضى، يا مُرْتَضى يا مُصْطَفى ، اُنْصُراني فَإِنَّكُما ناصِرايَ ، وَاكْفِياني فَإِنَّكُما كافِيايَ ، يا صاحِبَ الزَّمانِ ، اَلْغَوْثَ الْغَوْثَ الْغَوْثَ ، أَدْرِكْني أَدْرِكْني أَدْرِكْني ،
ऐ मुहम्मद! ऐ अली! ऐ अली! ऐ मुहम्मद! ऐ मुस्तफ़ा! ऐ मुरतज़ा! ऐ मुरतज़ा! ऐ मुस्तफ़ा! मेरी मदद कीजिए, आप दोनों ही मेरे मददगार हैं, मेरी कफ़ालत कीजिए, आप दोनों ही मेरे काफ़ी हैं, ऐ साहिब-ए-ज़मां! अल-ग़ौस, अल-ग़ौस, अल-ग़ौस! मुझे पनाह दीजिए, मुझे पनाह दीजिए, मुझे पनाह दीजिए

इस आयत को (अद्रिकनी) तब तक कहो जब तक सांस क़ायम रहे, फिर अपनी हाजत माँगो, इंशाअल्लाह अल्लाह की मर्ज़ी से पूरी होगी।[1]
[1] मिसबाहुज़-ज़ाइर: 386
रिवायतों में इन दोनों मासूम इमामों (अ.स.) की ज़ियारत पर बहुत बड़ा सवाब बयान किया गया है। बहुत सी रिवायतों के मुताबिक़, इमाम मूसा बिन जाफ़र अल-काज़िम (अ.स.) की ज़ियारत रसूल-ए-ख़ुदा (स.) की ज़ियारत के बराबर है। एक दूसरी रिवायत में है कि जो शख़्स इमाम अल-काज़िम (अ.स.) की ज़ियारत करता है, वह गोया रसूल-ए-ख़ुदा (स.) और इमाम अली अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) की ज़ियारत करता है। तीसरी रिवायत के मुताबिक़, इमाम अल-काज़िम (अ.स.) की ज़ियारत इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत के समान है। चौथी रिवायत में है कि जो इमाम अल-काज़िम (अ.स.) की ज़ियारत करे, उसके लिए जन्नत है।
बुज़ुर्ग आलिम मुहम्मद बिन शहरआशूब ने अपनी किताब अल-मनाक़िब में, ख़तीब बग़दादी से उनकी तारीख़-ए-बग़दाद में यह क़ौल नक़्ल किया है कि अली बिन ख़ल्लाल कहा करते थे: “जब भी मुझे कोई बड़ी परेशानी पेश आती, मैं मूसा बिन जाफ़र की क़ब्र की तरफ़ रुख़ करता और अल्लाह से उनके वसीले से दुआ करता, तो अल्लाह तआला मेरी उस परेशानी को दूर फ़रमा देता।”
अली बिन ख़ल्लाल ने यह वाक़िआ भी बयान किया है: बग़दाद में लोगों ने एक औरत को तेज़ी से भागते देखा। लोगों ने पूछा: “कहाँ जा रही हो?” उसने कहा: “मैं मूसा बिन जाफ़र के पास जा रही हूँ, क्योंकि मेरा बेटा क़ैद में है।” इस पर हंबली मस्लक के एक आदमी ने मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा: “तुम्हारा बेटा जेल में ही मर जाएगा।” औरत ने जवाब दिया: “तो मैं अल्लाह से उस शख़्स के वसीले से दुआ करूँगी जो ख़ुद जेल में शहीद किया गया (यानी इमाम अल-काज़िम), ताकि अल्लाह अपनी क़ुदरत दिखाए।” नतीजतन, फ़ौरन उसका बेटा रिहा कर दिया गया और मज़ाक़ उड़ाने वाले आदमी का बेटा गिरफ़्तार होकर अपने गुनाह की सज़ा का हक़दार ठहरा।




सलवात के दो तरीक़े; 1) मज़ार पर और 2) जुमे के दिन छोटी सलवात
1. अपनी किताब मिसबाहुज़-ज़ाइर में बुज़ुर्ग सैय्यद इब्न ताऊस ने इमाम पर सलवात भेजने का एक तरीक़ा बयान किया है, जिसमें इमाम की फ़ज़ीलतों, कमालात, इबादत के तरीक़े और मसाइब का ज़िक्र है।

اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَاهْلِ بَيْتِهِ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिं व अह्लि बैतिही
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनके अहले-बैत पर दुरूद भेज

وَصَلِّ عَلَىٰ مُوسَىٰ بْنِ جَعْفَرٍ
व सल्लि अला मूसा ब्नि जाफ़रिन
और मूसा बिन जाफ़र पर भी दुरूद भेज

وَصِيِّ ٱلابْرَارِ
वसिय्यिल-अब्रारि
जो नेक लोगों के वसी हैं

وَإِِمَامِ ٱلاخْيَارِ
व इमामिल-अख़यारि
और बेहतरीन लोगों के इमाम हैं

وَعَيْبَةِ ٱلانْوَارِ
व अयबतिल-अनवारि
और अनवार का ख़ज़ाना हैं

وَوَارِثِ ٱلسَّكِينَةِ وَٱلْوَقَارِ
व वारिसिस्सकीनति वल-वक़ारि
और सुकून व वक़ार के वारिस हैं

وَٱلْحِكَمِ وَٱلآثَارِ
वल-हिकमि वल-आसारि
और हिकमतों व आसार के मालिक हैं

ٱلَّذِي كَانَ يُحْيِي ٱللَّيْلَ بِٱلسَّهَرِ إِِلَىٰ ٱلسَّحَرِ
अल्लज़ी काना युह्यिल-लैल बिल-सहरि इला-स्सहरि
जो रातों को जागकर सहर तक इबादत में ज़िंदा रखते थे

بِمُوَاصَلَةِ ٱلِٱسْتِغْفَارِ
बि-मुवासलतिल-इस्तिग़फ़ारि
लगातार इस्तिग़फ़ार के साथ

حَلِيفِ ٱلسَّجْدَةِ ٱلطَّوِيلَةِ
हलीफ़िस्सज्दतित्तवीलति
लंबे सज्दों के साथी थे

وَٱلدُّمُوعِ ٱلْغَزِيرَةِ
वद्दुमूइल-ग़ज़ीरति
और बहुत ज़्यादा आँसुओं वाले थे

وَٱلْمُنَاجَاةِ ٱلْكَثِيـرَةِ
वल-मुनाजातिल-कसीरति
और कसरत से मुनाजात करने वाले थे

وَٱلضَّرَاعَاتِ ٱلْمُتَّصِلَةِ
वद्दराअतिल-मुत्तसिलति
और लगातार गिड़गिड़ाने वाले थे

وَمَقَرِّ ٱلنُّهَىٰ وَٱلْعَدْلِ
व मक़र्रिन्नुहा वल-अदलि
अक़्ल और इंसाफ़ का मरकज़ थे

وَٱلْخَيْرِ وَٱلْفَضْلِ
वल-ख़ैरि वल-फ़ज़्लि
ख़ैर और फ़ज़्ल के सरचश्मा थे

وَٱلنَّدَىٰ وَٱلْبَذْلِ
वन्नदा वल-बज़्लि
और सख़ावत व इनायत के मालिक थे

وَمَالَفِ ٱلْبَلْوَىٰ وَٱلصَّبْرِ
व माअलफ़िल-बल्वा वस्सब्रि
मुसीबतों और सब्र के आदी थे

وَٱلْمُضْطَهَدِ بِٱلظُّلْمِ
वल-मुज़्तहदि बिज़्ज़ुल्मि
और ज़ुल्म के साथ सताए गए

وَٱلْمَقْبُورِ بِٱلْجَوْرِ
वल-मक़बूरि बिल-जौरि
और नाइंसाफ़ी के साथ दफ़्न किए गए

وَٱلْمُعَذَّبِ فِي قَعْرِ ٱلسُّجُونِ
वल-मुअज़्ज़बि फ़ी क़अ्रिस्सुजूनि
और जेलों की गहराइयों में अज़ाब दिए गए

وَظُلَمِ ٱلْمَطَامِيـرِ
व ज़ुलमिल-मटामीरि
और अँधेरी कोठरियों में रखे गए

ذِي ٱلسَّاقِ ٱلْمَرْضُوضِ بِحَلَقِ ٱلْقُيُودِ
ज़ी अस्साक़िल-मरज़ूज़ि बिहलक़िल-क़ुयूदि
वह जिनकी टाँग ज़ंजीरों के छल्लों से ज़ख़्मी की गई

وَٱلْجِنَازَةِ ٱلْمُنَادَىٰ عَلَيْهَا بِذُلِّ ٱلِٱسْتِخْفَافِ
वल-जनाज़तिल-मुनादा अलैहा बिज़ुल्लिल-इस्तिख़फ़ाफ़ि
और जिनकी जनाज़ा पुकार ज़िल्लत और तौहीन के साथ दी गई

وَٱلْوَارِدِ عَلَىٰ جَدِّهِ ٱلْمُصْطَفَىٰ وَابِيهِ ٱلْمُرْتَضَىٰ
वल-वारिदि अला जद्दिहिल-मुस्तफ़ा व अबीहिल-मुरतज़ा
और जो अपने नाना मुस्तफ़ा और अपने वालिद मुरतज़ा के पास पहुँचे

وَامِّهِ سَيِّدَةِ ٱلنِّسَاءِ
व उम्मिहि सय्यिदतिन-निसाइ
और अपनी वालिदा जो औरतों की सरदार हैं

بِإِرْثٍ مَغْصُوبٍ
बि-इर्थिन मग़सूबिन
छीनी हुई विरासत के साथ

وَوَلاَءٍ مَسْلُوبٍ
व वलाइं मस्लूबिन
और लूटी हुई वफ़ादारी के साथ

وَامْرٍ مَغْلُوبٍ
व अम्रिन मग़लूबिन
और ग़ल्बा पाए हुए हालात के साथ

وَدَمٍ مَطْلُوبٍ
व दमिन मत्लूबिन
और ऐसा ख़ून जिसका बदला बाक़ी था

وَسَمٍّ مَشْرُوبٍ
व सम्मिन मशरूबिन
और ज़हर पिया हुआ

اَللَّهُمَّ وَكَمَا صَبَرَ عَلَىٰ غَلِيظِ ٱلِْمحَنِ
अल्लाहुम्मा व कमा सबरा अला ग़लीज़िल-मिहनि
ऐ अल्लाह! जिस तरह उन्होंने सख़्त आज़माइशों पर सब्र किया

وَتَجَرَّعَ غُصَصَ ٱلْكُرَبِ
व तजर्रअ ग़ुससाल-कुरबि
और ग़मों की घुटन को पी लिया

وَٱسْتَسْلَمَ لِرِضَاكَ
वस्तसलमा लि-रिज़ाका
और तेरी रज़ा पर सर झुका दिया

وَاخْلَصَ ٱلطَّاعَةَ لَكَ
व अख़लसत्ताआता लका
और पूरी ख़ुलूस के साथ तेरी इताअत की

وَمَحَضَ ٱلْخُشُوعَ
व महज़ल-ख़ुशूअ
और मुकम्मल ख़ुशू अपनाया

وَٱسْتَشْعَرَ ٱلْخُضُوعَ
वस्तशअराल-ख़ुदूअ
और पूरी फ़रमाबरदारी को ओढ़ लिया

وَعَادَىٰ ٱلْبِدْعَةَ وَاهْلَهَا
व आदा अल-बिदअता व अहलहा
और बिदअत और उसके मानने वालों से दुश्मनी रखी

وَلَمْ يَلْحَقْهُ فِي شَيْءٍ مِنْ اوَامِرِكَ وَنَوَاهِيكَ لَوْمَةُ لاَئِمٍ
व लम यलहक़्हु फ़ी शैइं मिन अवामिरिका व नवाहिका लौमतु लाइमिन
और तेरे हुक्मों और मनाहियों पर अमल में किसी मलामत करने वाले की परवाह न की

صَلِّ عَلَيْهِ صَلاَةً نَامِيَةً
सल्लि अलैहि सलातन नामियतन
तो उन पर बढ़ती हुई सलात भेज

مُنْيفَةً زَاكِيَةً
मुनीफ़तन ज़ाकियतन
जो बुलंद और पाक करने वाली हो

تُوجِبُ لَهُ بِهَا شَفَاعَةَ امَمٍ مِنْ خَلْقِكَ
तूजिबु लहू बिहा शफ़ाअतَ उममिन मिन ख़ल्क़िका
जिसके ज़रिये तू उसे अपनी मख़लूक़ की क़ौमों की शफ़ाअत अता करता है

وَقُرُونٍ مِنْ بَرَايَاكَ
व क़ुरूनिन मिन बरायाका
और तेरी पैदा की हुई नस्लों और ज़मानों की

وَبَلِّغْهُ عَنَّا تَحِيَّةً وَسَلاَماً
व बल्लिघ्हु अन्ना तहिय्यतन व सलामन
और हमारी तरफ़ से उसे सलाम और दरूद पहुँचा

وَآتِنَا مِنْ لَدُنْكَ فِي مُوَالاَتِهِ فَضْلاًَ وَإِِحْسَاناً
व आतिना मिन लदुनका फी मुवालातिहि फ़ज़लन व इहसानन
और उसकी वलायत की बदौलत हमें अपनी तरफ़ से फ़ज़्ल और एहसान अता फ़रमा

وَمَغْفِرَةً وَرِضْوَاناً
व मग़फ़िरतन व रिज़वानन
और बख़्शिश और रज़ामंदी

إِِنَّكَ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَمِيمِ
इन्नका ज़ुल-फ़ज़्लिल-अमीमि
यक़ीनन तू बहुत बड़े फ़ज़्ल वाला है

وَٱلتَّجَاوُزِ ٱلْعَظِيمِ
वत्तजावुज़िल-अज़ीमि
और बड़ी दरगुज़र करने वाला है

بِرَحْمَتِكَ يَا ارْحَمَ ٱلرَّاحِمينَ
बिरहमतिका या अरहमर-राहिमीन
तेरी रहमत के सदक़े, ऐ सबसे बढ़कर रहम करने वाले


2. इमाम मूसा बिन जाफ़र अल-काज़िम पर सलवात
साकिन व मुतमइन (उन पर सलाम हो) जुमे के मुस्तहब आमाल में शैख़ तूसि ने अपनी किताब मिसबाह-उल-मुतहज्जिद में इमाम हसन अस्करी (उन पर सलाम हो) से यह रिवायत नक़्ल की है:

اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ عَلِيِّ بْنِ مُوسَىٰ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला अलीय्यि ब्नि मूसा
ऐ अल्लाह! अली बिन मूसा पर दुरूद भेज


ٱلَّذِي ٱرْتَضَيْتَهُ وَرَضَّيْتَ بِهِ مَنْ شِئْتَ مِنْ خَلْقِكَ
अल्लज़ी इरतज़ैतहू व रज़्ज़ैत बिही मन शिअता मिन ख़ल्क़िका
जिसे तूने पसंद फ़रमाया और जिसके ज़रिये तूने अपनी मख़लूक़ में से जिसे चाहा राज़ी किया

اَللَّهُمَّ وَكَمَا جَعَلْتَهُ حُجَّةً عَلَىٰ خَلْقِكَ
अल्लाहुम्मा व कमा जअल्तहू हुज्जतन अला ख़ल्क़िका
ऐ अल्लाह! जैसे तूने उसे अपनी मख़लूक़ पर हुज्जत क़रार दिया

وَقَائِماً بِأَمْرِكَ
व क़ाइमन् बि-अमरिका
और तेरे हुक्म को क़ायम रखने वाला बनाया

وَنَاصِراً لِدِينِكَ
व नासिरन लि-दीनिका
और तेरे दीन का मददगार ठहराया

وَشَاهِداً عَلَىٰ عِبَادِكَ
व शाहिदन अला इबादिका
और तेरे बन्दों पर गवाह बनाया

وَكَمَا نَصَحَ لَهُمْ فِي ٱلسِّرِ وَٱلْعَلاَنِيَةِ
व कमा नसहा लहुम फ़िस्सिर्रि वल-अलानियति
और जैसे उसने छुपे और खुले दोनों हालात में उनके साथ ख़ैरख़्वाही की


وَدَعَا إِلَىٰ سَبِيلِكَ
व दआ इला सबीलिका
और तेरे रास्ते की तरफ़ दावत दी


بِٱلْحِكْمَةِ وَٱلْمَوْعِظَةِ ٱلْحَسَنَةِ
बिल-हिक्मति वल-मौइज़तिल-हसनति
हिकमत और अच्छी नसीहत के साथ

فَصَلِّ عَلَيْهِ
फ़सल्लि अलैहि
तो उस पर दुरूद नाज़िल फ़रमा


أَفْضَلَ مَا صَلَّيْتَ عَلَىٰ أَحَدٍ
अफ़ज़ल मा सल्लैत अला अहदिन
वैसा बेहतरीन दुरूद जैसा तूने किसी पर नाज़िल किया हो

مِنْ أَوْلِيَائِكَ وَخِيَرَتِكَ مِنْ خَلْقِكَ
मिन औलियाइका व ख़ियरतिका मिन ख़ल्क़िका
तेरे औलिया और तेरी मख़लूक़ में से चुने हुओं में से किसी पर

إِنَّكَ جَوَادٌ كَرِيمٌ
इन्नका जवादुन करीमुन
बेशक तू बहुत सख़ी और बेहद करीम है




अल-इमाम अल-काज़िम (अ.स.) और अल-इमाम अल-जवाद (अ.स.) दोनों के लिए मुश्तरका ज़ियारत के सिग़े
नीचे कुछ ऐसे सिग़े हैं जो दोनों इमामों (`अ) को एक साथ मुख़ातब करके पढ़े जाते हैं।
अल-मुफ़ीद, अश-शहीद, और मुहम्मद इब्न अल-मशहदी ने यूँ कहा है:
जब आप दोनों इमामों (`अ) की एक साथ ज़ियारत करें, तो मुक़द्दस क़ब्र के पास रुकने के बाद ये अल्फ़ाज़ कहें:
اَلسَّلاَمُ عَلَيْكُمَا يَا وَلِيَّيِ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैकुमा या वलिय्यैल्लाहि
दोनों पर सलाम हो, ऐ अल्लाह के वलीयो!

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكُمَا يَا حُجَّتَيِ ٱللَّهِ
अस्सलामु अलैकुमा या हुज्जतैल्लाहि
दोनों पर सलाम हो, ऐ अल्लाह की हुज्जतो!

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكُمَا يَا نُورَيِ ٱللَّهِ فِي ظُلُمَاتِ ٱلارْضِ
अस्सलामु अलैकुमा या नूरैल्लाहि फ़ी ज़ुलुमातिल-अर्द़ि
दोनों पर सलाम हो, ऐ ज़मीन की तारीकियों में अल्लाह के नूरो!

اشْهَدُ انَّكُمَا قَدْ بَلَّغْتُمَا عَنِ ٱللَّهِ مَا حَمَّلَكُمَا
अशहदु अन्नकुमा क़द बल्लग़तुमा ‘अनिल्लाहि मा हम्मलकुमा
मैं गवाही देता हूँ कि तुम दोनों ने अल्लाह की तरफ़ से वो पैग़ाम पहुँचा दिया जो उसने तुम पर लाज़िम किया था,

وَحَفِظْتُمَا مَا ٱسْتُودِعْتُمَا
वा हफ़िज़्तुमा मा इस्तूदि‘तूमा
और जो अमानत तुम दोनों के सुपुर्द की गई थी उसकी हिफ़ाज़त की,

وَحَلَّلْتُمَا حَلاَلَ ٱللَّهِ
वा हलल्तुमा हलालल्लाहि
और अल्लाह के हलाल को हलाल ठहराया,

وَحَرَّمْتُمَا حَرَامَ ٱللَّهِ
वा हर्रम्तुमा हरामल्लाहि
और अल्लाह के हराम को हराम ठहराया,

وَاقَمْتُمَا حُدُودَ ٱللَّهِ
वा अक़म्तुमा हुदूदल्लाहि
और अल्लाह की हुदूद क़ायम रखीं,

وَتَلَوْتُمَا كِتَابَ ٱللَّهِ
वा तलव्तुमा किताबल्लाहि
और अल्लाह की किताब की तिलावत की,

وَصَبَرْتُمَا عَلَىٰ ٱلاذَىٰ فِي جَنْبِ ٱللَّهِ
वा सबऱ्तुमा ‘अलल-अज़ा फ़ी जनबिल्लाहि
और अल्लाह की राह में अज़ियत पर सब्र किया,

مُحْتَسِبَيْنِ حَتَّىٰ اتَاكُمَا ٱلْيَقِينُ
मुहतसिबैनِ हत्ता अताकुमा अल-यक़ीनु
उसके सवाब की उम्मीद रखते हुए, यहाँ तक कि यक़ीन (मौत) तुम तक आ पहुँचा।

ابْرَا إِِلَىٰ ٱللَّهِ مِنْ اعْدَائِكُمَا
अब्रउ इला-ल्लाहि मिन अ‘दाइ़कुमा
मैं अल्लाह के सामने तुम्हारे दुश्मनों से बेज़ार हूँ,

وَاتَقَرَّبُ إِِلَىٰ ٱللَّهِ بِوِلاَيَتِكُمَا
वा अतक़र्रबु इला-ल्लाहि बि-विलायतِकुमा
और तुम्हारी विलायत के ज़रिये अल्लाह का क़ुर्ब चाहता हूँ।

اتَيْتُكُمَا زَائِراً
अतैतुकुमा ज़ाइरन
मैं तुम्हारे पास ज़ियारत के लिए आया हूँ,

عَارِفاً بِحَقِّكُمَا
‘आरिफ़न बि-हक़्क़िकुमा
तुम दोनों के हक़ को पहचानते हुए,

مُوَالِياً لاِوْلِيَائِكُمَا
मुवालियन लि-अवलियाइ़कुमा
तुम्हारे दोस्तों से दोस्ती रखते हुए,

مُعَادِياً لاِعْدَائِكُمَا
मु‘आदियन लि-अ‘दाइ़कुमा
और तुम्हारे दुश्मनों से दुश्मनी रखते हुए,

مُسْتَبْصِراً بِٱلْهُدَىٰ ٱلَّذِي انْتُمَا عَلَيْهِ
मुस्तबसिरन बिल-हुदा अल्लज़ी अन्तुमा ‘अलैहि
उस हिदायत की बसीरत रखते हुए जिस पर तुम दोनों हो,

عَارِفاً بِضَلاَلَةِ مَنْ خَالَفَكُمَا
‘आरिफ़न बि-ज़लालतِ मन ख़ालफ़कुमा
और जो तुमसे इख़्तिलाफ़ करे उसकी गुमराही को समझते हुए।

فَٱشْفَعَا لِي عِنْدَ رَبِّكُمَا
फ़श्फ़अा ली ‘इन्दा रब्बिकुमा
तो मेरे लिए अपने रब के हज़ूर शफ़ाअत करो,

فَإِنَّ لَكُمَا عِنْدَ ٱللَّهِ جَاهاً عَظِيماً
फ़इन्ना लकुमा ‘इन्दल्लाहि जाहन ‘अज़ीमन
क्यूँकि अल्लाह के हज़ूर तुम दोनों का बड़ा मक़ाम है,

وَمَقَاماً مَحْمُوداً
वा मक़ामन महमूदन
और तारीफ़-शुदा मर्तबा है।


आप इसके बाद मुक़द्दस ख़ाक (उनकी क़ब्रों की) को चूम सकते हैं और उस पर अपना दायाँ गाल रख सकते हैं। फिर इमाम के सिर की जानिब मुँह करके ये अल्फ़ाज़ कहें:
اَلسَّلاَمُ عَلَيْكُمَا يَا حُجَّتَيِ ٱللَّهِ فِي ارْضِهِ وَسَمَائِهِ
अस्सलामु अलैकुमा या हुज्जतैयिल्लाहि फ़ी अरज़िही व समाइहि
दोनों पर सलाम हो, ऐ अल्लाह की हुज्जतो! उसकी ज़मीन और उसके आसमान में।

عَبْدُكُمَا وَوَلِيُّكُمَا زَائِرُكُمَا
अब्दुकुमा व वलिय्युकुमा ज़ाइरुकुमा
मैं—तुम दोनों का बंदा और दोस्त—तुम्हारी ज़ियारत को आया हूँ,

مُتَقَرِّباً إِِلَىٰ ٱللَّهِ بِزِيَارَتِكُمَا
मुतक़र्रिबन इलल्लाहि बिज़ियारतिकुमा
तुम दोनों की ज़ियारत के ज़रिये अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करता हुआ।

اَللَّهُمَّ ٱجْعَلْ لِي لِسَانَ صِدْقٍ فِي اوْلِيَائِكَ ٱلْمُصْطَفَيْنَ
अल्लाहुम्मज्‘अल ली लिसान सिद्क़िन फ़ी अवलियाइकल-मुस्तफ़यैन
ऐ अल्लाह! अपने चुने हुए औलिया के दरमियान मेरे लिए सच्ची ज़बान (अच्छी पहचान) क़ायम फ़रमा,

وَحَبِّبْ إِِلَيَّ مَشَاهِدَهُمْ
व हब्बिब इलय्य मशाहिदहुम
और उनकी ज़ियारतगाहों की मोहब्बत मेरे दिल में डाल दे,

وَٱجْعَلْنِي مَعَهُمْ فِي ٱلدُّنْيَا وَٱلآخِرَةِ
वज्‘अल्नी म‘अहुम फ़िद्दुन्या वल-आख़िरति
और मुझे दुनिया और आख़िरत में उनके साथ शामिल फ़रमा,

يَا ارْحَمَ ٱلرَّاحِمِينَ
या अरहमर्-राहिमीन
ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले!

इसके बाद हर इमाम की तरफ़ से दो रकअत नमाज़ अदा करें और फिर अल्लाह तआला से जो चाहें और जिसके लिए चाहें दुआ करें।

ज़ियारत के मुख़्तसर सिग़ों के बारे में नोट
जिस दौर में ज़ियारत के ये मुख़्तसर सिग़े जारी किए गए, वो सख़्त ज़ुल्म-ओ-सितम का ज़माना था (अहले-बैत के मुक़द्दस इमामों पर)। इसी वजह से तक़य्या (जान और ईमान की हिफ़ाज़त के लिए एहतियाती तौर पर अमल) किया जाता था। इसलिए इमामों (`अ) ने अपने मानने वालों को ज़ियारत के ये मुख़्तसर सिग़े सिखाए ताकि उन्हें ज़ालिम हुक्मरानों से महफ़ूज़ रखा जा सके।
अगर कोई ज़ायर ज़ियारत का तफ़सीली सिग़ा पढ़ना चाहे तो वह जामिअ (मुकम्मल) ज़ियारतें पढ़ सकता है, जिनका ज़िक्र इस किताब में आएगा। ये जामिअ ज़ियारतें दरअसल अहले-बैत के मुक़द्दस इमामों (`अ) के लिए बेहतरीन ज़ियारतें हैं। इन में से पहली ज़ियारत (यानी ज़ियारत-ए-जामिअह कबीरह) इमाम मूसा अल-काज़िम (`अ) के ज़ायरीनों के लिए ख़ास तौर पर मुस्तहब है, क्योंकि इसकी रिवायत में इस मुक़द्दस इमाम से ख़ास निस्बत पाई जाती है।


`अली अल-बग़दादी का वाक़िआ मफ़ातीह से
इस सिलसिले में हाज्ज `अली अल-बग़दादी का क़िस्सा बयान करना मुनासिब मालूम होता है। वह एक ख़ुशनसीब, नेक, बुज़ुर्ग और परहेज़गार शख़्स थे, जिनका क़िस्सा हमारे उस्ताद ने अपनी दो किताबों *जन्नतुल-मआवा* और *अन-नज्मुस-साक़िब* में बयान किया है। दूसरी किताब में वह लिखते हैं: “अगर इस किताब में इसके सिवा और कुछ भी न होता सिवाय इस सहीह और भरोसेमंद वाक़िये के, जिसमें बहुत से फ़वाइद हैं और जो इसी ज़माने में पेश आया, तब भी यह किताब बहुत क़ीमती और अहम होती।” कुछ तम्हीदी अल्फ़ाज़ के बाद, मुसन्निफ़ क़िस्सा बयान करते हैं: हाज्ज `अली—अल्लाह उनकी मदद फ़रमाए—ने यह वाक़िआ बयान किया: मुझ पर अस्सी तूमन (फ़ारसी सिक्का) ख़ुम्स की रकम वाजिब थी। इसलिए मैं मुक़द्दस शहर नजफ़ गया ताकि उनमें से बीस तूमन हज़रत शैख़ मुर्तज़ा—जो हिदायत और तक़वा की मिसाल थे—को अदा कर सकूँ। फिर मैंने बीस तूमन हज़रत शैख़ मुहम्मद हुसैन अल-मुज्तहिद अल-काज़िमी को और बीस तूमन हज़रत शैख़ मुहम्मद अश-शुरूक़ी को अदा किए। इस तरह मेरे पास सिर्फ़ बीस तूमन बाक़ी रह गए, जिन्हें मैं नजफ़ से वापसी पर हज़रत शैख़ मुहम्मद हसन आल-यासीन अल-काज़िमी को देने का इरादा रखता था—अल्लाह उनकी मदद फ़रमाए। जब मैं बग़दाद पहुँचा तो मैंने चाहा कि बाक़ी ख़ुम्स भी अदा कर दूँ। इसलिए उसी दिन, जो जुमा था, मैं सीधे काज़िमैन गया और दोनों अज़ीम इमामों—इमाम काज़िम और इमाम जव्वाद—की ज़ियारत की। इसके बाद मैं हज़रत शैख़ मुहम्मद हसन के पास पहुँचा और उन्हें उस बीस तूमन में से कुछ रकम दे दी। साथ ही उनसे वादा किया कि बाक़ी रकम मैं अपने माल की कुछ चीज़ें बेचने के बाद मुस्तहक़ीन तक पहुँचा दूँगा। इसके बाद मैंने काज़िमिया से रवाना होने की तैयारी की, हालाँकि शैख़ ने मुझे अपने यहाँ ठहरने पर बहुत ज़ोर दिया, लेकिन मैंने इनकार किया। मेरी मजबूरी यह थी कि मुझे अपनी कपड़े की फ़ैक्ट्री के मज़दूरों को उनकी मज़दूरी अदा करनी थी, क्योंकि मैं हर जुमा दोपहर को उनकी हफ़्तावार मज़दूरी देने का पाबंद था। मैं बग़दाद की तरफ़ रवाना हुआ। जब रास्ते का एक तिहाई हिस्सा तय कर चुका, तो मैंने एक ख़ूबसूरत सैय्यद को देखा जो काज़िमिया की तरफ़ आ रहे थे। उन्होंने मुझे सलाम किया, हाथ मिलाया, गले लगाया और कहा: “ख़ुश आमदीद।” उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाया और हम दोनों ने एक-दूसरे को बोसा दिया। हरे रंग की रौशन अमामा पहने हुए और चेहरे पर बड़ा सा काला तिल रखने वाले उस शख़्स ने मुझसे पूछा: “हाज्ज `अली, तुम कहाँ जा रहे हो?”
मैंने जवाब दिया: “मैं काज़िमैन की ज़ियारत करके अब बग़दाद जा रहा हूँ।”
उन्होंने कहा: “काज़िमैन वापस चलो। आज जुमा की रात है।”
मैंने कहा: “मैं वापस नहीं जा सकता।”
उन्होंने कहा: “हाँ, तुम जा सकते हो, ताकि मैं तुम्हारे लिए गवाही दूँ कि तुम मेरे दादा अमीरुल-मोमिनीन और हम अहले-बैत के वली हो। शैख़ भी तुम्हारे हक़ में गवाही देंगे, क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: ‘और दो गवाह बुलाओ।’” यह इशारा उस बात की तरफ़ था जिसकी मैं पहले से उम्मीद रखता था कि शैख़ मेरे लिए एक तहरीर लिख दें जिसे मैं अपने कफ़न में रख सकूँ, ताकि उसमें मेरी अहले-बैत से वलायत की गवाही हो। मैंने उनसे पूछा: “आप मुझे कैसे जानते हैं और मेरे हक़ में कैसे गवाही देंगे?” उन्होंने जवाब दिया: “क्या कोई अपने एहसान करने वालों को भूल सकता है?” मैंने पूछा: “किस एहसान की बात कर रहे हैं?” उन्होंने कहा: “उस माली हक़ की, जो तुमने मेरे नायब को अदा किया है।” मैंने पूछा: “आपका नायब कौन है?” उन्होंने कहा: “शैख़ मुहम्मद हसन।” मैंने पूछा: “क्या वह आपके नायब हैं?” उन्होंने कहा: “हाँ, और सैय्यद मुहम्मद भी।” हक़ीक़त यह थी कि मैंने इस शख़्स को पहले कभी नहीं देखा था, लेकिन वह मुझे नाम से पुकार रहे थे। इसलिए मैंने सोचा कि शायद हम पहले कभी मिले हों। मैंने यह भी सोचा कि शायद वह मुझसे ख़ुम्स का कुछ हिस्सा लेना चाहते हों। इसलिए मैंने उनसे कहा: “सैय्यद, मुझ पर आपका कुछ माली हक़ बनता है। मैंने हज़रत शैख़ मुहम्मद हसन से इजाज़त ली है कि बाक़ी रकम आपको अदा कर दूँ।” सैय्यद मुस्कुराए और बोले: “हाँ, तुमने नजफ़ में हमारे नायबों को हमारा हिस्सा अदा कर दिया है।” मैंने पूछा: “क्या वह क़ुबूल हो गया?” उन्होंने कहा: “हाँ, क़ुबूल हो गया।” इसके बाद उन्होंने मुझे अपने साथ काज़िमिया लौटने को कहा ताकि मैं उनके दादा की ज़ियारत कर सकूँ। मैं उनके साथ चल पड़ा। पूरे रास्ते मेरी बाईं हथेली उनके दाएँ हाथ में थी। रास्ते में मैंने देखा कि हमारे दाएँ तरफ़ साफ़ पानी की एक नहर बह रही है और नींबू, नारंगी, अंगूर, अनार वग़ैरह के दरख़्त हम पर साया किए हुए हैं, हालाँकि फल का मौसम नहीं था। मैंने जब इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा: “यह नहर और ये दरख़्त हमारे हर वली के साथ होते हैं जब वह हमारे दादा और हमारी ज़ियारत करता है।” (… आगे का पूरा वाक़िआ इसी तरह बयान किया गया है …)
मस्जिद बुरासा में ज़ियारत और नमाज़
काज़िमिया और बग़दाद के दरमियान वाक़े मस्जिद बुरासा मशहूर और बरकत वाली मस्जिदों में से है। अफ़सोस कि बहुत से ज़ायरीन इसके फ़ज़ीलत से नावाक़िफ़ रहते हैं। इतिहास की किताबों में बयान हुआ है कि यह जगह हज़रत अमीरुल-मोमिनीन (`अ) से मंसूब है और यहाँ नमाज़ अदा करना बड़ी फ़ज़ीलत रखता है। (आगे मस्जिद बुरासा का तारीख़ी बयान उसी तरह जारी है।) मस्जिद बुरासा की फ़ज़ीलतें
मेरी किताब *हदिय्यातुज़-ज़ाइर* में, मैंने मस्जिद बुरासा की ख़ुसूसियात पर चंद सतूर लिखे हैं। मैंने कहा है कि यह मस्जिद—रिवायात से समझ में आने के मुताबिक़—बहुत सी फ़ज़ीलतों की मालिक है; जिनमें से हर एक फ़ज़ीलत, अगर किसी और मस्जिद में भी होती, तो वह अकेली ही इतनी होती कि इंसान अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करने के लिए, उसमें नमाज़ और दुआ के ज़रिए इबादत करते हुए, दूर-दूर से सफ़र करके उसकी ज़ियारत को तैयार हो जाए।
पहली फ़ज़ीलत: अल्लाह तआला ने मुक़र्रर किया है कि इस मस्जिद में कोई लश्कर ठहरे नहीं, मगर वह लश्कर जिसका कमांड किसी नबी या नबी के वसी/जानी के हाथ में हो।
दूसरी फ़ज़ीलत: मस्जिद बुरासा हज़रत मरयम (अ) का घर थी।
तीसरी फ़ज़ीलत: यह हज़रत ईसा (अ) की रिहाइशगाह रही है।
चौथी फ़ज़ीलत: हज़रत मरयम (अ) के लिए जो चश्मा फूटा था, वह इसी मस्जिद में मौजूद है।
पाँचवीं फ़ज़ीलत: इमाम `अली अमीरुल-मोमिनीन (अ) ने उस चश्मे को करामत के तौर पर ज़ाहिर किया।
छठी फ़ज़ीलत: वहाँ एक सफ़ेद, मुबारक पत्थर है, जिस पर हज़रत मरयम (अ) ने हज़रत ईसा (अ) को अपने कंधे से उतार कर रखा था।
सातवीं फ़ज़ीलत: इमाम `अली अमीरुल-मोमिनीन (अ) ने करामत से उस पत्थर को भी ज़ाहिर किया, उसे क़िब्ला की तरफ़ क़ायम किया, और फिर उसके पीछे नमाज़ अदा की।
आठवीं फ़ज़ीलत: इमाम `अली (अ) और उनके दो बेटे—इमाम हसन अल-मुज्तबा और इमाम हुसैन सैय्यिदुश्शुहदा (अ)—ने इस मस्जिद में नमाज़ें अदा कीं।
नौवीं फ़ज़ीलत: इमाम `अली अमीरुल-मोमिनीन (अ) ने इस मस्जिद में चार दिन क़ियाम किया।
दसवीं फ़ज़ीलत: तमाम अंबिया, ख़ुसूसन हज़रत इब्राहीम (अ)—ख़लीलुर्रहमान—ने इस मस्जिद में नमाज़ अदा की।
ग्यारहवीं फ़ज़ीलत: इस मस्जिद में एक नबी की क़ब्र है—ज़्यादा मुमकिन है कि वह नबी युशा` (अ) हों। शैख़ (अल्लाह उन पर रहमत करे) के क़ौल के मुताबिक़, नबी युशा` (अ) का मक़बरा मस्जिद बुरासा के मुक़ाबिल सहन में है।
बारहवीं फ़ज़ीलत: यही वह जगह है जहाँ इमाम `अली अमीरुल-मोमिनीन (अ) के लिए सूरज को पलटाया गया था।
ज़ायरीन की मस्जिद बुरासा से ग़फ़लत
अफ़सोस और तअज्जुब की बात है कि इराक़ के मुक़द्दस मशाहिद की ज़ियारत करने वाले ज़्यादातर ज़ायरीन, इस मस्जिद की ज़ियारत से ग़ाफ़िल रहते हैं, हालाँकि इसका मुक़ाम बहुत बुलंद है, इसकी फ़ज़ीलतें अज़ीम हैं, और यह वह जगह है जहाँ इमाम `अली (अ) की इलाही निशानियाँ और करामात ज़ाहिर हुईं। हक़ीक़त यह है कि यह मस्जिद कोई ऐसी दूर-दराज़ या वीरान जगह में नहीं कि पहुँचना मुश्किल हो; बल्कि यह उसी रास्ते पर है जिस पर ज़ायरीन अक्सर मुक़द्दस मशाहिद की तरफ़ आते-जाते हैं। शायद हज़ार में से एक ज़ायिर भी इस जगह की ज़ियारत करता हो। यह भी हुआ है कि जब कोई ज़ायिर अल्लाह तआला के उस बड़े सवाब की तमन्ना लेकर इस मस्जिद में आता है जो इसके ज़ायरीन के लिए मुक़र्रर है, और उसके सामने दरवाज़ा बंद पाता है—मगर कुछ पैसे देने के बाद खुलता है—तो वह पैसे देने से झुँझला कर रह जाता है, और इस तरह रब के बड़े सवाब से ख़ुद को महरूम कर लेता है। दूसरी तरफ़, यही ज़ायिर बग़दाद शहर और वहाँ ज़ालिमों की इमारतें देखने के लिए बहुत पैसा खर्च कर देता है, या उससे भी ज़्यादा पैसा गैर-ज़रूरी चीज़ें ख़रीदने में उड़ा देता है, और बग़दाद के यहूदियों से उनके बदफ़ाल और नापाक माल ख़रीदने में भी लगाता है—जिसे अफ़सोस के साथ, ज़्यादातर ज़ायरीन के सफ़रों का एक “लाज़िमी हिस्सा” समझ लिया गया है।
मदद सिर्फ़ अल्लाह से माँगी जाती है।