इस्लामी इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनकी ज़िंदगी भले ही बहुत छोटी रही हो, लेकिन जिनकी याद और संदेश क़यामत तक इंसानियत के ज़ेहन में ज़िंदा रहने वाले हैं। ऐसे ही एक अज़ीम और पाक नाम हैं — हज़रत अली असग़र (स)।
वे इमाम हुसैन (अ) के सबसे छोटे पुत्र थे, जिनकी उम्र करबला के मैदान में कुछ महीनों से अधिक नहीं थी, लेकिन जिनकी शहादत ने ज़ालिमियत के चेहरे से नक़ाब नोच लिया और इंसाफ़ की बुलंदी को हमेशा के लिए अमर कर दिया।
अली असग़र (स) की शहादत सिर्फ़ एक मासूम बच्चे की हत्या नहीं थी, बल्कि वह ज़ुल्म के मुक़ाबले में हक़ की आख़िरी दलील, और इंसानियत के ज़मीर पर सबसे गहरी चोट थी।
हज़रत अली असग़र (स) का असली नाम अब्दुल्लाह था। वे इमाम हुसैन इब्न अली (अ) के पुत्र और हज़रत रबाब (स) के लाल थे। हज़रत रबाब एक शरीफ़, नेक और पाक दामन महिला थीं।
अली असग़र (स) की सही विलादत की तारीख़ इतिहास में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है, लेकिन यह बात लगभग सभी स्रोतों में मानी जाती है कि वे करबला के वक़्त दूध पीते शिशु थे।
इमाम हुसैन (अ) अपने पिता हज़रत अली (अ) से बेहद मोहब्बत करते थे और इसी वजह से वे अपने बेटों का नाम भी “अली” रखना पसंद करते थे। इसी परंपरा के तहत अब्दुल्लाह को अली अल-असग़र कहा गया।
करबला की घटना को समझने के लिए उस दौर की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझना बेहद ज़रूरी है। रसूलुल्लाह (स) की वफ़ात के बाद सत्ता को लेकर संघर्ष शुरू हुआ और यज़ीद इब्न मुआविया को ख़लीफ़ा घोषित किया गया।
यज़ीद का शासन अन्याय, ऐयाशी और इस्लामी मूल्यों के खुले उल्लंघन का प्रतीक था। ऐसे शासक की बैअत करना इमाम हुसैन (अ) के लिए नामुमकिन था।
“मुझ जैसा व्यक्ति यज़ीद जैसे व्यक्ति की बैअत नहीं कर सकता।”
जब इमाम हुसैन (अ) मदीना से मक्का और फिर कूफ़ा की ओर रवाना हुए, तो उनके साथ उनका परिवार भी था। इस क़ाफ़िले में बुज़ुर्ग, जवान और बच्चे सभी शामिल थे।
यह कोई जंग की तैयारी वाला क़ाफ़िला नहीं था, बल्कि यह सत्य और सुधार की यात्रा थी, ताकि दुनिया जान सके कि इमाम हुसैन (अ) सिर्फ़ अल्लाह और इंसानियत के लिए खड़े हैं।
करबला पहुँचने के बाद यज़ीदी फ़ौजों ने फ़ुरात नदी का पानी बंद कर दिया। तीन दिन तक ख़ेमों में पानी की एक बूंद नहीं थी।
अली असग़र (स) की हालत सबसे ज़्यादा नाज़ुक थी। माँ रबाब (स) का दूध सूख चुका था, और शिशु की प्यास बढ़ती जा रही थी।
10 मुहर्रम, यानी आशूरा के दिन, इमाम हुसैन (अ) ने अपने पुत्र को गोद में उठाया और दुश्मन के सामने इंसानियत की आख़िरी अपील की।
“अगर मुझे गुनहगार समझते हो, तो इस बच्चे का क्या क़सूर है? इसे पानी दे दो।”
लेकिन जवाब में इंसाफ़ नहीं आया। एक ज़हरीला तीर छोड़ा गया जो अली असग़र (स) के नन्हे गले में लगा। वे अपने पिता की गोद में शहीद हो गए।
इमाम हुसैन (अ) ने मासूम शहीद को गोद से उतारा और अल्लाह की बारगाह में सब्र के साथ कहा:
“ऐ अल्लाह! जो कुछ तू देख रहा है, वही हमारे लिए काफ़ी है।”
फिर उन्होंने करबला की तपती ज़मीन में अपने नन्हे बेटे को सुपुर्द-ए-ख़ाक किया।
आज भी मुहर्रम में अली असग़र (स) की याद दिलों को हिला देती है। मजलिसों और जुलूसों में खाली झूले और नन्हे कपड़े दिखाई देते हैं।
अली असग़र (स) की ज़िंदगी कुछ महीनों की थी, लेकिन उनका असर सदियों का है। वे इंसानियत का पैमाना और हक़ की सबसे मासूम शहादत हैं।
जब तक करबला ज़िंदा रहेगी,
अली असग़र (स) का नाम भी ज़िंदा रहेगा।