हज़रत अबु तालिब (अ०स०)
इस्लाम का सबसे अज़ीम निगेहबान
अबू तालिब(अ.) ने तमाम मुश्किल हालात में रसूल-ए-ख़ुदा (स.) की हिमायत की, उनकी विलादत 29 शव्वाल को हुई और वफ़ात 26 रजब को हुई (कुछ रिवायतों में 7 रमज़ान), हिजरत से तीन साल पहले।
मक्‍का में (जन्नतुल मआला क़ब्रिस्तान) में दफ़्न हैं। इमाम अली (अ.) के वालिद, जो रसूल-ए-ख़ुदा (स.) के चचेरे भाई, दामाद और जानशीन थे


اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا سَيِّدَ الْبَطْحَآءِ وَابْنَ رَئِيْسِهَا
अस्सलामु अलैका या सैय्यिदल-बथ्हाई व इब्न-ए-रईसिहा।
आप पर सलाम हो, ऐ मक्का के सरदार और उसके सरदार के फ़र्ज़ंद

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا وَارِثَ الْكَعْبَةِ بَعْدَ تَاْسِيْسِهَا
अस्सलामु अलैका या वारिसल-कअ’बा बअ’दा तासीसिहा…
आप पर सलाम हो, ऐ काबा-ए-मुकर्रमा के वारिस, उसकी बुनियाद के बाद….

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا كَافِلَ رَسُوْلِ اللهِ
अस्सलामु अलैका या काफ़िला रसूलिल्लाह,
आप पर सलाम हो, ऐ रसूल-ए-ख़ुदा के काफ़िल/सरपरस्त

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حَافِظَ دِيْنِ اللهِ
अस्सलामु अलैका या हाफ़िज़ा दीनिल्लाह।
आप पर सलाम हो, ऐ दीन-ए-ख़ुदा के हाफ़िज़

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا عَمَّ الْمُصْطَفٰى
अस्सलामु अलैका या अम्मल-मुस्तफ़ा…
आप पर सलाम हो, ऐ अल-मुस्तफ़ा के चचा

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا اَبَا الْمُرْتَضٰى
अस्सलामु अलैका या अबल-मुर्तज़ा…
आप पर सलाम हो, ऐ अल-मुर्तज़ा के वालिद…

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا وَالِدَ الْاَئِمَّةِ الْهُدٰى كَفَاكَ بِمَا اَوْلاَكَ اللهُ شَرَفًا وَّ نَسَبًا وَّ حَسْبُكَ بِمَا اَعْطَاكَ اللهُ عِزًّا وَّ حَسَبًا
अस्सलामु अलैका या वालिदल-अइम्मातिल-हुदा, कफ़ाका बिमा अवलाकल्लाहु शरफ़न व नसबन व हसबुका बिमा आताकल्लाहु इज़्ज़न व हसबन।
आप पर सलाम हो, ऐ रहनुमा इमामों के वालिद; आपके लिए वही शरफ़ और नसब काफ़ी है जो अल्लाह ने आपको अता किया, और आपके लिए वही इज़्ज़त और मर्तबा काफ़ी है जो उसने आपको बख़्शा

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا شَرَفَ الْوُجُوْدِ
अस्सलामु अलैका या शरफ़ल-वुजूद।
आप पर सलाम हो, ऐ वुजूद के शरफ़…

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا وَ لِىَّ الْمَعْبُوْدِ
अस्सलामु अलैका या वलिय्यल माअबूद
आप पर सलाम हो, ऐ माबूद के वली/दोस्त

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حَارِسَ النَّبِىِّ الْمَوْعُوْدِ
अस्सलामु अलैका या हारिसन्नबिय्यिल मौ'ऊद।
आप पर सलाम हो, ऐ वादा-ए-रिसालत वाले नबी के निगेहबान..

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا مَنْ رُزِقَ وَلَدٌ هُوَ خَيْرُ مَوْلُوْدٍ
अस्सलामु अलैका या मन रुज़िका वलदन हुवा ख़ैरु मौलूद।
आप पर सलाम हो, ऐ वो शख़्स जिसे ऐसा बेटा अता हुआ जो बेहतरीन नव-मौलूद है

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا مَنْ خُصِّصَ بِالْوَلَدِ الزَّكِىِّ الطَّاهِرِ الْمُطَهَّرِ الْعَلِىٍّ اشْتُقَّ اسْمُهُ مِنَ الْعَلِىِّ
अस्सलामु अलैका या मन ख़ुस्सिसा बिल वलदिज़-ज़किय्यित-ताहिरिल मुतह्हरिल अलीये। अलीय्युन उश्तुक्का इस्मुहू मीनल अलीये
आप पर सलाम हो, ऐ वो शख़्स जिसे पाक, ताहिर, मुतह्हर और बुलंद-बाला बेटे (अली) के साथ मख़सूस किया गया, जिसका नाम अल्लाह के (अली) नाम से मुश्तक़ है

هَنِيْئًا لَّكَ ثُمَّ هَنِيْئًا لَّكَ مِنْ وَّلَدٍ هُوَ الْمُرْتَضٰى مِنْ رَسُوْلٍ وَّ اَخُ الرَّسُوْلِ وَ زَوْجُ الْبَتُوْلِ وَ سَيْفُ اللهِ الْمَسْلُوْلُ
हनिअन लका सुम्मा हनिअन लका मिन वलदिन हुवल मुर्तज़ा मिन रसूलिन व अख़ुर्रसूलि व ज़ौजुल बतूल व सैफ़ुल्लाहिल मसलूल।
आपको मुबारक हो, फिर आपको मुबारक हो, ऐसे फ़र्ज़ंद पर जो रसूल का मुर्तज़ा है, रसूल का भाई है, बतूल (बीबी फ़ातिमा) का शौहर है, और अल्लाह की खिंची हुई तलवार है। <

هَنِيْئًا لَّكَ ثُمَّ هَنِيْئًا لَّكَ مِنْ وَّلَدٍ هُوَ مِنْ مُّحَمَّدٍ الْمُصْطَفٰى بِمَنْزِلَةِ هَارُوْنَ مِنْ مُوْسٰى
हनिअन लका सुम्मा हनिअन लका मिन वलदिन हुवा मिन मुहम्मदिनिल मुस्तफ़ा बिमन्ज़िलति हारून मिन मूसा।
फिर आपको मुबारक हो, ऐसे फ़र्ज़ंद पर जिसकी मंज़िलत मुहम्मद अल-मुस्तफ़ा के साथ वैसी है जैसी हज़रत हारून की हज़रत मूसा के साथ थी

هَنِيْئًا لَّكَ مِنْ وَّلَدٍ هُوَ شَرِيْكُ النُّبُوَّةِ وَ الْمَخْصُوْصُ بِا لْاُخُوَّةِ وَ كَاشِفُ الْغُمَّةِ وَ اِمَامُ الْاُمَّةِ وَ اَبُوْ الْاَئِمَّةِ
हनिअन लका मिन वलदिन हुवा शरीकुन नुबुव्वति वल-मख़सूसु बिल-उख़ुव्वह, व काशिफुल ग़ुम्मह, व इमामुल उम्मह, व अबुल अइम्मह।
आपको मुबारक हो, ऐसे फ़र्ज़ंद पर जो नुबुव्वत में शरीक है। उख़ुव्वत के लिए मख़सूस है (रसूल-ए-ख़ुदा के साथ)। ग़म दूर करने वाला है, उम्मत का इमाम है और इमामों का वालिद है।
هَنِيْئًا لَّكَ مِنْ وَّ لَدٍ هُوَ قَسِيْمُ الْجَنَّةِ وَ النَّارِ وَ نِعْمَةُ اللهِ عَلَى الْاَبْرَارِ وَ نَقِمَةُ اللهِ عَلَى الْفُجَّارِ
हनिअन लका मिन वलदिन हुवा क़सीमुल जन्नति वन्नार, व नि'मतुल्लाहि अलल-अबरार, व नक़मतुल्लाहि अलल-फुज्जार।
आपको मुबारक हो, ऐसे फ़र्ज़ंद पर जो जन्नत और जहन्नम का तक़सीम करने वाला है, नेककारों पर अल्लाह की नेअमत है और फाजिरों पर उसकी नक़मत

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ وَ عَلَيْهِ وَ عَلَيْهِمْ اَجْمَعِيْنَ وَ رَحْمَةُ اللهِ وَ بَرَكَاتُهُ
अस्सलामु अलैका व अलैहि व अलैहिम अज्मईन व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
आप पर सलाम हो और उन पर सलाम हो और उन सब पर सलाम हो (इमामों पर), और अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें….





29 शव्वाल को पैदा हुए, इस्लाम के रसूल (स.) की तमाम मुश्किल हालात में मदद की, 26 रजब को वफ़ात पाई (कुछ रिवायतों में 7 रमज़ान), हिजरत से तीन साल पहले।
मक्का में (जन्नतुल मआला क़ब्रिस्तान) में दफ़्न हैं।
रसूल (स.) को गहरा रंज हुआ और आपने इस साल को "आमुल-हुज़्न" (ग़म का साल) नाम दिया।
रसूल-ए-ख़ुदा मुहम्मद (स.) की उम्र 8 साल थी जब उनके दादा अब्दुल-मुत्तलिब (अ.) का इंतिक़ाल हुआ। फिर उनके चचा, अबू-तालिब (अ.) ने उनकी कफ़ालत की।
अबू-तालिब (अ.) के वालिद का नाम अब्दु-मुनाफ़ था। उनकी वालिदा का नाम फ़ातिमा बिन्त अम्र था। वो बनी-मख़ज़ूम से थीं। अबू-तालिब (अ.) को शैख़ुल-बथ्हा कहा जाता था। रसूल-ए-ख़ुदा मुहम्मद (स.) अपने चचा के घराने में पले-बढ़े।

हज़रत अबू तालिब बिन अब्दुल मुत्तलिब  तहरीर: कमाल अल-सैयद

आमुल-फ़ील (हाथी का साल)

570 ईस्वी में, अबीसीनी (हबशी) लश्कर अब्रहा की सरपरस्ती में मक्का पर हमला-आवर हुए ताकि काबा को गिरा दें। अब्दुल मुत्तलिब, हमारे आका मुहम्मद [स] के दादा, मक्का के सरदार, काबा के गिर्द घूमते हुए अल्लाह से दुआ करते रहे कि सर्वशक्तिमान अल्लाह हमलावरों को उस घर को ढहाने से रोके जिसे इब्राहीम, अल-खलील, और उनके बेटे इस्माईल ने लोगों के लिए सिर्फ़ अल्लाह की इबादत के वास्ते बनाया। अल्लाह तआला ने अब्दुल मुत्तलिब की दुआ क़बूल की। जब हाथी और सिपाही काबा को ढहाने के लिए आगे बढ़े, क्षितिज पर अबाबील परिंदे अपनी चोंचों में कंकर/पत्थर लिए नज़र आए। वे पत्थर गिराने लगे। यूँ काबा के आसपास हमलावर शिकस्त खा गए।

नतीजतन, अल्लाह की क़ुदरत और अब्दुल मुत्तलिब की अहमियत ज़ाहिर हुई! इस साल को आमुल-फ़ील नाम दिया गया। हमारे आका मुहम्मद [स] इसी साल पैदा हुए। अबू-तालिब की उम्र तीस साल थी। अल्लाह तआला ने इस वाक़िए का ज़िक्र क़ुरआन-ए-मजीद में किया है: बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे रब ने हाथी वालों के साथ कैसा मामला किया? क्या उसने उनकी चाल को नाकाम और परागंदा नहीं कर दिया? और उन पर झुंड-दर-झुंड परिंदे भेजे, जो उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर फेंकते थे। फिर उसने उन्हें खाया हुआ भूसा बना दिया?

अब्दुल मुत्तलिब

अब्दुल मुत्तलिब, जिन्होंने ज़मज़म का कुआँ खोदा, उनके दस बेटे थे। अब्दुल्लाह, रसूल के वालिद, उनमें से एक थे। अबू तालिब, रसूल के चचा, भी उनमें से एक थे। हमारे आका मुहम्मद [स], यतीम थे। उनके वालिद अब्दुल्लाह का इंतिक़ाल उनके पैदा होने से थोड़े ही पहले हो गया था। जब उनकी वालिदा का इंतिक़ाल हुआ, उस वक़्त उनकी उम्र छह साल थी। तब उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने उनकी परवरिश की। वो उनसे बहुत मुहब्बत करते थे। वो समझते थे कि मुहम्मद [स] नबी होंगे। अब्दुल मुत्तलिब नेक थे। वो इब्राहीम और इस्माईल के दीन पर थे। उन्होंने अपने बेटों को अच्छे अख़लाक़ अपनाने की वसीयत की। मौत के वक़्त, अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटों से कहा: "मेरा एक पोता नबी होगा। इसलिए जो उसके ज़माने में मौजूद हो, उसे उस पर ईमान लाना चाहिए।" फिर वो अपने बेटे, अबू तालिब की तरफ़ मुड़े, और उसके कान में आहिस्ता से कहा: "अबू तालिब, मुहम्मद की बड़ी शान होगी। तो अपने हाथ और ज़बान से उसकी नुसरत करना।

निगेहबान

हमारे आका मुहम्मद [स] की उम्र 8 साल थी जब उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब का इंतिक़ाल हुआ। इसलिए उनके चचा, अबू तालिब ने उनकी कफ़ालत की। अबू तालिब का नाम अब्दुल मुनाफ़ था। उनकी वालिदा का नाम फ़ातिमा बिन्त अम्रू था। वो क़बीला-ए-बनी मख़ज़ूम से ताल्लुक़ रखती थीं। अबू तालिब को शैख़ुल-बथ्हा कहा जाता था। हमारे आका मुहम्मद [स] अपने चचा के साथ रहते थे। चचा उनसे शफ़क़त से पेश आते थे। फ़ातिमा बिन्त असद, जो उनके चचा की ज़ौजा थीं, वो भी उनसे बहुत मेहरबानी करती थीं। वो उन्हें अपने तमाम बेटों पर तरजीह देती थीं। यूँ हमारे आका मुहम्मद [स] एक नेक ख़ानदान में परवरिश पाए। अबू तालिब की अपने भतीजे के लिए मुहब्बत दिन-ब-दिन बढ़ती गई, उनके अच्छे अख़लाक़ और अज़ीम अदब की वजह से।
मसलन, जब खाना तैयार होता, यतीम बच्चा अदब से उसके पास पहुँचता। वो कहता:
अल्लाह के नाम से!
और जब फ़ारिग़ होता, कहता: अल्लाह का शुक्र!
एक दिन, अबू तालिब को अपने भतीजे मुहम्मद की कमी महसूस हुई। तो उन्होंने खाने से हाथ रोक लिया और कहा:"जब तक मेरा बेटा नहीं आता!"
जब मुहम्मद आए, अबू तालिब ने उन्हें दही का एक प्याला दिया। मुहम्मद ने उस प्याले से पी लिया। अबू तालिब के बेटे भी बारी-बारी उसी से पीते गए। सब सेर हो गए। चचा को ये अमल बहुत पसंद आया। तो उन्होंने अपने भतीजे से कहा: "मुहम्मद, तुम बरकत वाले हो!"

ख़ुशख़बरी

अबू तालिब ने अहल-ए-किताब (यहूद और नसारा) से एक ख़ुशख़बरी सुनी थी। ख़ुशख़बरी ये थी कि बहुत जल्द एक नबी ज़ाहिर होंगे। इसलिए वो अपने भतीजे का बहुत ख़याल रखते थे। वो समझते थे कि वही नबी होंगे। इसलिए वो उन्हें तन्हा नहीं छोड़ते थे। जब अबू तालिब ने शाम (सूरिया) की तरफ़ तिजारती सफ़र का इरादा किया, तो उन्होंने हमारे आका मुहम्मद [स] को अपने साथ ले लिया। उस वक़्त मुहम्मद नौ साल के थे। बुसरा में, जो क़ाफ़िलों के रास्ते पर वाक़े एक शहर था, एक मठ था। उस मठ में एक राहिब रहता था। राहिब का नाम बुहैरा था। वो हमेशा एक नए नबी के ज़ुहूर का मुंतज़िर रहता था जिसका ज़माना क़रीब आ चुका था। जब राहिब ने मुहम्मद को देखा, तो उसे यक़ीन हुआ कि वही वादा किए हुए नबी होंगे, क्योंकि उनमें नबी की शख़्सियत और कैफ़ियत नज़र आती थी। राहिब मक्की लड़के के चेहरे को बहुत ग़ौर से देखने लगा। इसी दौरान, हज़रत ईसा मसीह की ख़ुशख़बरी उसके ज़ेहन में गूँज उठी। राहिब ने अबू तालिब से लड़के का नाम पूछा। तो अबू-तालिब ने कहा:"उसका नाम मुहम्मद है।"
राहिब उनके मुक़द्दस नाम पर बहुत अदब से झुक गया। फिर उसने अबू तालिब से कहा: "मक्का वापस चले जाओ। अपने भतीजे को यहूद से महफ़ूज़ रखना, क्योंकि उसकी बहुत बड़ी शान होगी!"
अबू तालिब मक्का लौट आए। वो मुहम्मद से बेइंतिहा मुहब्बत करते थे। उनकी हिफ़ाज़त के बारे में बहुत होशियार रहते थे।

मुबारक बच्चा

साल गुज़रते गए। मक्का और उसके गांव ख़ुश्क हो गए क्योंकि बारिश नहीं थी। लोग शैख़ुल-बथ्हा के पास आए। उन्होंने उनसे कहा कि अल्लाह से बारिश के लिए दुआ करें। उन्होंने कहा: "अबू-तालिब, वादी सूखी हो गई है। हमारे घराने भूखे हैं। तो आइए और अल्लाह से बारिश की दुआ कीजिए।"

अबू तालिब बाहर निकले। उन्हें अल्लाह पर बहुत यक़ीन था। उन्होंने अपने भतीजे, मुहम्मद को भी साथ लिया। अबू तालिब और मुहम्मद काबा के पास खड़े हुए। बच्चे का दिल लोगों पर रहम से भर आया। अबू तालिब ने इब्राहीम और इस्माईल के रब से मूसलाधार बारिश नाज़िल करने की दुआ की। मुहम्मद ने आसमान की तरफ़ देखा। थोड़ा ही वक़्त गुज़रा था। आसमान बादलों से भर गया। बिजली चमकी। गरज की आवाज़ आई। फिर ज़ोरदार बारिश होने लगी। बारिश का पानी गांवों में बह निकला। लोग ख़ुश होकर लौटे, बारिश की नेअमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए। अबू तालिब भी लौट आए। अपने भतीजे के लिए उनकी मुहब्बत बहुत बढ़ गई। साल गुज़रते गए। मुहम्मद जवान हो गए। वो इंतिहाई बाअदब थे। इसलिए लोग उन्हें सादिक़, अमीन कहने लगे।

मज़लूमों का मददगार

अबू तालिब को ज़ुल्म सख़्त नापसंद था। इसी दौरान, उन्हें मज़लूम बहुत अज़ीज़ थे। इसलिए हमारे आका मुहम्मद [स] भी अबू तालिब से बहुत मुहब्बत करते थे। एक दिन, क़बीला-ए-कनाना और क़बीला-ए-क़ैस के दरमियान एक जंग हुई। क़बीला-ए-क़ैस हमलावर था। क़बीला-ए-कनाना का एक आदमी अबू तालिब के पास आया और कहा: "ऐ परिंदों को दाना देने वाले और हाजियों को पानी पिलाने वाले के बेटे; हमसे ग़ायब मत रहना। तुम्हारी मौजूदगी में हमें फ़तह मिलती है।" अबू तालिब ने जवाब दिया: "मैं तुमसे ग़ायब नहीं रहूँगा जब तुम ज़ुल्म, दुश्मनी, बदतमीज़ी और झूठ से बचोगे।" तो उन्होंने उनसे इस पर वादा लिया। हमारे आका मुहम्मद [स] अपने चचा के साथ खड़े रहे, कनाना के मुक़ाबिले में।

हिल्फ़ुल-फ़ुदूल (फ़ुदूल का गठबंधन)

मक्का के कुछ लोगों ने अल्लाह के घर के हाजियों पर हमला किया।
ख़थआम क़बीले का एक आदमी और उसकी बेटी, अल्लाह के घर की ज़ियारत के लिए आए। मक्का के एक जवान ने ज़बरदस्ती उस जवान लड़की को उठा लिया।
ख़थआमी आदमी चिल्लाया: "मदद! मदद! मदद!"
राह चलते एक शख़्स ने उससे कहा: "हिल्फ़ुल-फ़ुदूल के पास जाओ।"
वो आदमी अबू तालिब के पास गया।
अबू तालिब ने हिल्फ़ुल-फ़ुदूल की बुनियाद रखी। ये एक अहदनामा था जिस पर मक्का के सरदारों ने दस्तख़त किए। इस अहद के मुताबिक़ उन्होंने तय किया कि मज़लूम की मदद करेंगे और ज़ालिम को सज़ा देंगे।
जब ख़थआमी आदमी वहाँ पहुँचा और उनसे मदद मांगी, तो कुछ लोग अपनी तलवारें लेकर उस जवान के घर गए। उन्होंने उसे धमकाया और लड़की को उसके बाप के पास वापस पहुँचा दिया।
हमारे आका मुहम्मद [स] हिल्फ़ुल-फ़ुदूल के रुक्न थे।

ख़ुशगवार निकाह

अबू तालिब का बड़ा ख़ानदान था। वो ग़रीबों पर अपना बहुत-सा माल ख़र्च करते थे। वक़्त के साथ वो खुद भी तंगदस्त हो गए। हमारे आका मुहम्मद [स] ने महसूस किया कि उन्हें अपने चचा की मदद करनी चाहिए। इसलिए उन्होंने तय किया कि ख़दीजा का माल लेकर शाम जाएँ। ये काम कामयाब रहा। हमारे आका मुहम्मद [स] ने अमानतें उनके हक़दारों तक पहुँचा दीं। इससे ख़दीजा का दिल उनकी तरफ़ माइल हुआ। तो उन्होंने उनसे निकाह की दरख़्वास्त की। अबू तालिब इस पेशकश से बहुत ख़ुश हुए। इसलिए वो, बनी हाशिम के कुछ लोगों के साथ, और हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब (हमारे आका मुहम्मद के चचा) के साथ, ख़दीजा के घरवालों से उनका हाथ मांगने गए। अबू-तालिब ने कहा: "तमाम हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने हमें इब्राहीम और इस्माईल की औलाद में से बनाया, हमारे लिए एक महफ़ूज़ घर और अम्न की पनाहगाह बनाई, और हमारे वतन को बरकत वाला बनाया।" फिर उन्होंने कहा: "मेरा भतीजा मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह क़ुरैश के तमाम लोगों में सबसे बेहतर और सबसे अज़ीम है। और ये माल से बेहतर है क्योंकि माल फ़ानी है। वो ख़दीजा को पसंद करता है और ख़दीजा उसे पसंद करती हैं। ख़ुदा की क़सम, उसकी बहुत बड़ी शान होगी। ख़दीजा का मह्र मेरे माल से है।" मुहम्मद [स] और ख़दीजा का निकाह हो गया। साल गुज़रते गए। अल्लाह ने अबू तालिब को एक और बच्चा अता किया। बच्चे का नाम अली था। हमारे आका मुहम्मद [स] अपने चचा की फ़िक्र हल्की करना चाहते थे। इसलिए वो अपने चचा के घर गए ताकि अली को अपने घर ले जाएँ।

जिब्रील

साल गुज़रते गए। अबू तालिब की उम्र सत्तर साल हो गई। हमारे आका मुहम्मद [स] की उम्र चालीस साल थी। मुहम्मद हर रोज़ ग़ार-ए-हिरा जाते थे। उसी साल, जिब्रील आसमान से नाज़िल हुए। हमारे आका मुहम्मद [स] ने उन्हें कहते सुना: पढ़ो! पढ़ो! अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया। उसने इंसान को एक लथड़े से पैदा किया। पढ़ो और तुम्हारा रब सबसे ज़्यादा करीम है, जिसने क़लम से (लिखना) सिखाया, इंसान को वो सिखाया जो वो नहीं जानता था। फिर जिब्रील ने कहा: मुहम्मद, तुम अल्लाह के रसूल हो और मैं जिब्रील हूँ। मुहम्मद ग़ार-ए-हिरा से वापस आए, आसमानों की रिसालत की ज़िम्मेदारी लिए हुए। उनकी ज़ौजा, ख़दीजा, उन पर ईमान लाई। उनके चचेरे भाई अली बिन अबू तालिब भी उन पर ईमान लाए। एक दिन, जब हमारे आका मुहम्मद [स] नमाज़ पढ़ रहे थे और अली उनके पीछे थे, अबू तालिब आए और मेहरबानी से कहा:
ऐ मेरे भतीजे, तुम क्या कर रहे हो?
नबी [स] ने कहा: हम इस्लाम के दीन के मुताबिक़ अल्लाह की इबादत कर रहे हैं।
अबू तालिब ने ख़ुशी से कहा: इसमें कोई बुराई नहीं जो तुम कर रहे हो।
फिर उन्होंने अपने बेटे अली से कहा: अली, अपने चचेरे भाई की नुसरत करो। वो ख़ैर के सिवा कुछ नहीं करता।

नबी के घर में

कुछ अरसे के बाद, जिब्रील अल्लाह का हुक्म लेकर नाज़िल हुए: और अपने क़रीबी रिश्तेदारों को डरा दो, और मोमिनों में से जो तुम्हारा इत्तिबा करें, उनसे नरमी करो। रसूल-ए-ख़ुदा ने दस साल के अली को हुक्म दिया कि अपने क़बीले, यानी बनी हाशिम को दावत दें। अबू तालिब, अबू लहब और दूसरे लोग नबी के घर आए। जब सब खाना खा चुके, हमारे आका मुहम्मद [स] ने कहा: किसी अरब जवान ने अपनी क़ौम के पास वैसी चीज़ नहीं लाई जैसी मैं तुम्हारे पास लाया हूँ। मैं तुम्हारे लिए दुनिया और आख़िरत की भलाई लेकर आया हूँ। फिर उन्होंने उनसे इस्लाम पर ईमान लाने को कहा। अबू लहब उठ खड़ा हुआ और हसद से बोला: मुहम्मद ने तुम पर जादू कर दिया है। अबू तालिब ग़ुस्से में बोले: चुप रहो! ये तुम्हारा काम नहीं! अबू तालिब ने हमारे आका मुहम्मद [स] की तरफ़ रुख़ किया और कहा: उठो और जो चाहो कहो। अपने रब की रिसालत फैलाओ, क्योंकि तुम सादिक़ और अमीन हो। तो हमारे आका मुहम्मद [स] उठे और कहा: मेरे रब ने मुझे हुक्म दिया है कि मैं तुमसे उस पर ईमान लाने को कहूँ। तो इस मामले में मेरी मदद कौन करेगा? कौन मेरा भाई बनना चाहता है; मेरा वली/नायब, और मेरे बाद मेरा जानशीन? सब खामोश रहे। तो अली ने जोश से कहा: या रसूलल्लाह, मैं। नबी ख़ुश हुए और अपने नौजवान चचेरे भाई को गले लगाया, जबकि उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। बनी हाशिम खड़े हो गए। अबू लहब हँस रहा था और तंज़ से अबू तालिब से कह रहा था: मुहम्मद ने तुम्हें हुक्म दिया है कि तुम अपने बेटे की बात सुनो और उसकी इताअत करो। मगर अबू तालिब ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। बल्कि उन्होंने ग़ुस्से से उसकी तरफ़ देखा। अबू तालिब ने अपने भतीजे से नरमी से कहा: अल्लाह ने जो हुक्म दिया है, उसी पर चलते रहो। ख़ुदा की क़सम, मैं तुम्हारी नुसरत और हिफ़ाज़त करूँगा। हमारे आका मुहम्मद [स] ने अपने चचा की तरफ़ अदब से देखा। उन्हें ताक़त महसूस हुई जब तक मक्का का सरदार उनके साथ था।

मददगार

हालाँकि अबू तालिब बुज़ुर्ग थे, फिर भी वो मुहम्मद की दावत के साथ डटकर खड़े रहे। वो हमेशा क़ुरैश के मुशरिकों से उनकी हिफ़ाज़त करते थे। मक्का वालों की एक बड़ी तादाद ने अल्लाह के दीन पर ईमान क़बूल कर लिया, बुतों की परस्तिश और क़ुरैश के ज़ालिमों की धमकियों की परवाह किए बग़ैर। एक दिन, क़ुरैश के सरदार अबू तालिब के पास आए, हालाँकि वो बिस्तर पर थे। उन्होंने ग़ुस्से में कहा: अबू तालिब! अपने भतीजे को हमसे रोकिए क्योंकि उसने हमारे ख़यालात कमज़ोर कर दिए हैं और हमारे माबूदों की तौहीन की है। अबू तालिब को दुख हुआ क्योंकि उनकी क़ौम हक़ की आवाज़ सुनना नहीं चाहती थी। इसलिए उन्होंने उनसे कहा: मुझे मोहलत दो कि मैं उससे बात कर लूँ। अबू तालिब ने हमारे आका मुहम्मद [स] को क़ुरैश के सरदारों की बात बताई। नबी [स] ने अदब से कहा: चचा! मैं अपने रब के हुक्म की मुख़ालफ़त नहीं कर सकता। अबू जहल, जो सबसे ज़्यादा हसूद आदमी था, बोला: हम उसे हमारे माल में से जो चाहे देंगे। बल्कि, अगर वो चाहे तो हम उसे अपना बादशाह बना देंगे।
नबी [स] ने कहा: मैं कुछ नहीं चाहता सिवाय एक कलिमा के।
अबू जहल ने कहा: वो कलिमा क्या है? हम तुम्हें उसके बदले दस गुना दे देंगे!
हमारे आका मुहम्मद [स] ने कहा: कहो कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं।
तो अबू जहल ग़ुस्से से भर गया: इसके सिवा कोई और बात माँगो!
रसूल-ए-ख़ुदा [स] ने कहा: अगर तुम सूरज को मेरे दाहिने हाथ में रख दो और चाँद को मेरे बाएँ हाथ में, तब भी मैं इसके बदले कोई और बात नहीं माँगूँगा।
माहौल में तनाज़ा पैदा हो गया। मुशरिक उठ खड़े हुए। वो हमारे आका मुहम्मद [स] को धमका रहे थे।
अबू तालिब ने हमारे आका मुहम्मद से कहा: अपनी जान की हिफ़ाज़त करो और मुझे ज़्यादा तकलीफ़ में मत डालो। नबी की आँखों में आँसू आ गए जब उन्होंने जवाब दिया: चचा, ख़ुदा की क़सम, अगर वो सूरज को मेरे दाहिने हाथ में और चाँद को मेरे बाएँ हाथ में रख दें ताकि मैं इस काम को छोड़ दूँ, तो भी मैं इसे नहीं छोड़ूँगा जब तक अल्लाह इसे कामयाब न कर दे या मैं इसी राह में हलाक न हो जाऊँ।
नबी [स] उठे और अपने आँसू पोंछने लगे। तो अबू तालिब ने उन्हें शफ़क़त से बुलाया और कहा: भतीजे, क़रीब आओ।
हमारे आका मुहम्मद [स] क़रीब आए। चचा ने उन्हें चूमा और कहा: भतीजे, जैसा चाहो कहो। ख़ुदा की क़सम, मैं तुम्हें कभी तन्हा नहीं छोड़ूँगा।
फिर उन्होंने क़ुरैश की ताक़त के मुक़ाबिले में शेर पढ़ना शुरू किया: ख़ुदा की क़सम, वो सब मिलकर भी तुम तक नहीं पहुँच पाएँगे।
जब तक मेरे सिर के नीचे मिट्टी का तकिया न रख दिया जाए।
और जब तक मुझे दफ़्न न कर दिया जाए।

इस्लाम का नूर

हमारे आका मुहम्मद [स] नए दीन की तबलीग़ करते रहे ताकि लोगों को तारीकी से निकालकर नूर की तरफ़ लाएँ। फिर क़ुरैश के ज़ालिम अबू तालिब के पास आए। उन्होंने दूसरा तरीक़ा अपनाया: अबू तालिब, ये अमारह बिन अल-वलीद है (ख़ालिद बिन अल-वलीद का भाई)। वो क़ुरैश का सबसे ताक़तवर और सबसे ख़ूबसूरत जवान है। तो इसे ले लो और हमें मुहम्मद दे दो ताकि हम उसे क़त्ल कर दें। अबू तालिब को ये सुनकर बहुत तकलीफ़ हुई। उन्होंने ग़ुस्से में जवाब दिया: क्या तुम अपना बेटा मुझे देते हो कि मैं उसे तुम्हारे लिए पालूँ, और मैं अपना बेटा तुम्हें दे दूँ कि तुम उसे क़त्ल करो? क्या तुमने कभी देखा है कि ऊँटनी अपने बच्चे के सिवा किसी और पर रहम करे? मुशरिकों की अज़ियत और शदीद हो गई। वो लोगों को सताने लगे। अबू तालिब ने सोचा कि उनकी शरारत हमारे आका मुहम्मद [स] तक भी पहुँच जाएगी। इसलिए उन्होंने बनी हाशिम को बुलाया। उन्होंने उनसे कहा कि नबी [स] की हिफ़ाज़त करें और उन्हें बचाएँ। उन्होंने क़बूल किया सिवाय अबू लहब के। अबू तालिब ने सुना कि अबू जहल और दूसरे मुशरिक हमारे आका मुहम्मद [स] को क़त्ल करना चाहते हैं। तो वो और उनके बेटे जअ'फ़र मक्का की पहाड़ियों की तरफ़ गए ताकि उन्हें ढूँढें। उन्होंने इधर-उधर तलाश किया। आख़िरकार उन्होंने उन्हें अल्लाह की इबादत करते हुए पाया। उसी वक़्त, अली उनकी दाहिनी तरफ़ नमाज़ पढ़ रहे थे। उन्हें ये देखकर रंज हुआ कि हमारे आका मुहम्मद [स] के साथ अली के सिवा कोई नहीं। इसलिए अबू तालिब ने अपने भतीजे की हिम्मत बढ़ाने का इरादा किया। उन्होंने अपने बेटे जअ'फ़र से कहा:
अपने चचेरे भाई का पर निकालो।
यानी, उसकी बाईं तरफ़ खड़े होकर नमाज़ पढ़ो ताकि इस्तेक़ामत, ताक़त और यक़ीन पैदा हो। जअ'फ़र हमारे आका मुहम्मद [स] और अपने भाई अली के साथ खड़े हुए ताकि आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, आलमीन के रब, अल्लाह की इबादत करें। फिर, अबू तालिब को हमारे आका मुहम्मद [स] की फिक्र लगी। वो उनके लौटने का इंतज़ार करते रहे। मगर वो वापस नहीं आए। इसलिए वो उन्हें ढूँढने निकले। वो उस जगह गए जहाँ हमारे आका मुहम्मद [स] अकसर जाते थे। मगर उन्हें वहाँ नहीं पाया। फिर अबू तालिब लौट आए, बनी हाशिम को जमा किया और कहा: तुम में से हर एक एक मज़बूत लोहे की सलाख़ ले। अब मेरे पीछे चलो। जब मैं मस्जिद में दाख़िल होऊँ, तुम में से हर एक क़ुरैश के एक सरदार के पास बैठ जाए। उसे क़त्ल कर दे अगर हमें मालूम हो कि मुहम्मद को क़त्ल कर दिया गया है। बनी हाशिम के जवानों ने अबू तालिब की बात मानी। हर एक मुशरिक के पास बैठ गया। अबू तालिब हमारे आका मुहम्मद [स] का इंतज़ार करते रहे। इसी दौरान ज़ैद बिन हारिस आए और उन्हें बताया कि नबी [स] महफ़ूज़ हैं। तब अबू तालिब ने अपना मंसूबा ज़ाहिर किया कि जो लोग नबी [स] को नुक़सान पहुँचाना चाहते थे, उन्हें सज़ा दी जाएगी।
मुशरिक ज़लील हो गए। अबू जहल खामोश रहा। उसके चेहरे पर खौफ़ से पीलापन छा गया।
मुशरिकों में से कुछ ने अपने लड़कों और गुलामों को उकसाया कि हमारे आका मुहम्मद [s] को तकलीफ़ पहुँचाएँ।
एक दिन, नबी [स] नमाज़ पढ़ रहे थे। एक जवान आया और उन पर गंदगी/कचरा फेंक दिया। मुशरिक ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। हमारे आका मुहम्मद [स] बहुत रंजिदा हुए। इसलिए वो अपने चचा के पास गए और उन्हें उस जवान की बद-अख़लाक़ी के बारे में बताया।
अबू तालिब बहुत ग़ुस्से में आ गए। उन्होंने अपनी तलवार निकाली और मुशरिकों के पास आए। उन्होंने अपने लड़के को हुक्म दिया कि उनके चेहरों पर वही गंदगी/कचरा फेंक दे।
उन्होंने कहा: अबू तालिब, बस कीजिए!

बहिष्कार

जब मुशरिकों ने जान लिया कि अबू तालिब हमारे आका मुहम्मद [स] को तन्हा नहीं छोड़ेंगे और वो उनके लिए जान देने को भी तैयार हैं, तो उन्होंने तय किया कि बनी हाशिम पर मआशी और समाजी बहिष्कार लगाया जाए। इसी के साथ उन्होंने उनसे तमाम ताल्लुक़ात भी तोड़ दिए। मुहर्रम के महीने में, नुबुव्वत की बिअसत के सातवें साल, क़ुरैश के चालीस सरदारों ने बहिष्कार-नामा पर दस्तख़त किए और उसे काबा की दीवार पर लटका दिया। क़ुरैश को उम्मीद थी कि अबू तालिब झुक जाएँगे। मगर शैख़ुल-बथ्हा का दूसरा मंसूबा था। अबू तालिब ने अपने क़बीले को दो पहाड़ों के दरमियान एक वादी में ले गए ताकि हमारे आका मुहम्मद [स] को क़त्ल की साज़िश से बचाया जा सके। वो अक्सर वादी में जाते रहते थे ताकि उन रास्तों को बंद कर दें जिनसे दुश्मन रात में गुज़रकर हमारे आका मुहम्मद [स] को क़त्ल कर सकते थे। अबू तालिब, हालाँकि बुज़ुर्ग थे, उनके भाई हमज़ा, और बनी हाशिम के कुछ लोग रात में बारी-बारी नबी [स] की निगरानी करते थे। अबू तालिब हमेशा नबी के बिस्तर को एक जगह से दूसरी जगह बदलते रहते थे ताकि ठिकाना छुपा रहे। दिन और महीने गुज़रते गए। घिरा हुआ क़ाफ़िला मुकम्मल तन्हाई में था। उन्हें भूख और तंगी की तकलीफ़ें झेलनी पड़ीं। जब हज का मौसम आता, तो वो बाहर निकलकर कुछ खाना और कपड़े ख़रीदना चाहते। मक्का के सबसे अमीर क़ुरैशी ज़ालिम हर तरह का खाना पहले ही ख़रीद लेते थे ताकि घिरे हुए लोग उसे न ख़रीद सकें। उस तल्ख़ दौर में, अबू तालिब पहाड़ की तरह मज़बूत रहे। वो हमेशा हमारे आका मुहम्मद [स] के साथ डटे रहे। वो बेख़ौफ़, अटल ईमान वाले थे। अबू तालिब हमारे आका मुहम्मद [स] से अपने बेटों से बढ़कर मुहब्बत करते थे। वो कभी-कभी उन्हें देखते, रोते और कहते: जब मैं उन्हें देखता हूँ तो मुझे अपना भाई अब्दुल्लाह याद आता है। एक रात, अबू तालिब आए और हमारे आका मुहम्मद [स] को जगा दिया। उन्होंने अपने अठारह साल के बेटे अली से कहा: बेटे, उनके बिस्तर पर सो जाओ।
अपने बाप की मुहम्मद के लिए वफ़ादारी जानने के लिए, अली ने कहा: लेकिन, मैं तो क़त्ल हो जाऊँगा।
उनके बाप ने कहा: सब्र करो!
जोश से अली ने कहा: मुझे मौत से डर नहीं। मगर मैं चाहता हूँ कि आप मेरी नुसरत जान लें। अबू तालिब ने अली की पीठ थपथपाई। फिर उन्होंने हमारे आका मुहम्मद [स] को एक महफ़ूज़ जगह पर ले जाकर सुला दिया।
जब हमारे आका मुहम्मद [स] सो गए, अबू तालिब भी सो गए।
महीने दर महीने गुज़रते गए। घिरे हुए लोगों का सब्र और भूख बढ़ती गई। वो दरख़्तों के पत्ते खाने लगे। नबी [स] को भूखे बच्चों पर रहम आता था।

ख़ुशख़बरी

एक दिन, हमारे आका मुहम्मद [स] अपने चचा के पास आए। वो ख़ुशी से भर गए थे। उन्होंने कहा: चचा, मेरे रब ने सफ़ेद चींटी को हुक्म दिया कि बहिष्कार-नामा खा जाए। तो उसने सब खा लिया सिवाय अल्लाह के नाम के।
अबू तालिब ने ख़ुशी से कहा: क्या तुम्हारे रब ने तुम्हें इसकी ख़बर दी है?
मुहम्मद [स] ने जवाब दिया: जी हाँ, चचा।
अबू तालिब का दिल ईमान से भर गया। इसलिए अबू तालिब उठे और दारुन-नदवा, काबा के पास, गए जहाँ क़ुरैश के सरदार बैठे थे।
अबू-तालिब ने बैठे हुए लोगों को मुख़ातिब किया: ऐ क़ुरैश!
उन्होंने बुज़ुर्ग, बुज़ुर्गवार शख़्स के एहतराम में खड़े हो गए। उन्होंने उनकी बातें सुनीं। उन्हें बहिष्कार की वजह से उनकी शिकस्त और झुकाव की उम्मीद थी।
मगर शैख़ुल-बथ्हा ने कहा: ऐ क़ुरैश, मेरे भतीजे मुहम्मद ने मुझे बताया है कि अल्लाह ने सफ़ेद चींटी को तुम्हारा बहिष्कार-नामा खाने का हुक्म दिया, तो उसने सब खा लिया सिवाय उसके नाम के। अगर वो सच्चे हों, तो बहिष्कार खत्म कर दो।
अबू-जहल ने कहा: और अगर वो झूठे हुए?
अबू तालिब ने यक़ीन और ईमान के साथ जवाब दिया: तो मैं तुम्हें अपना भतीजा सौंप दूँगा।
क़ुरैश के सरदारों ने कहा: ठीक है।
उन्होंने काबा का दरवाज़ा खोला। उन्होंने देखा कि सफ़ेद चींटी ने अल्लाह के नाम के सिवा सब कुछ खा लिया था।
घिरे हुए लोग अबू तालिब की वादी से बाहर निकल आए। हमारे आका मुहम्मद [स] और उनके साथियों ने अल्लाह के मुक़द्दस घर के हाजियों के बीच इस्लाम की तबलीग़ शुरू कर दी।

वफ़ात

अबू तालिब की उम्र अस्सी साल से ज़्यादा हो चुकी थी। वो बहुत नातवां हो गए थे। इसलिए बिस्तर से लग गए। उनके दिल-ओ-दिमाग़ में हमारे आका मुहम्मद [स] के सिवा कुछ न था। उन्हें मालूम था कि अगर वो इंतिक़ाल कर गए, तो क़ुरैश किसी से नहीं डरेंगे और उनके भतीजे को क़त्ल कर देंगे। क़ुरैश के सरदार शैख़ुल-बथ्हा की अयादत के लिए आए। उन्होंने कहा: अबू तालिब, आप हमारे शैख़ और सरदार हैं। आप मौत के क़रीब हैं। तो अपने भतीजे और हमारे दरमियान दुश्मनी ख़त्म करा दीजिए। उससे कहिए कि हमें तकलीफ़ देना छोड़ दे, हम भी उसे तकलीफ़ देना छोड़ देंगे। उससे कहिए कि हमें हमारे दीन पर छोड़ दे, हम उसे उसके दीन पर छोड़ देंगे। अबू तालिब ने अबू जहल, अबू सुफ़यान और दूसरे क़ुरैशी सरदारों की तरफ़ देखा। उन्होंने कमज़ोर आवाज़ में कहा: अगर तुम मुहम्मद की बात सुनो और उसके हुक्मों की इताअत करो, तो तुम कामयाब हो जाओगे। उसकी इताअत करो ताकि दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी पाओ। मुल्हिद खड़े हो गए। अबू जहल ने हसद से कहा: क्या तुम चाहते हो कि हम तमाम माबूदों को एक माबूद बना दें? क़ुरैश के इस रवैये से अबू तालिब बहुत दुखी हुए। उन्हें हमारे आका मुहम्मद की सलामती की बहुत फ़िक्र थी। इसलिए उन्होंने बनी हाशिम को बुलाया और उनसे कहा कि हर क़ीमत पर हमारे आका मुहम्मद [स] की नुसरत करें। सबने उनकी बात मान ली। फिर अबू तालिब ने आँखें बंद कर लीं और सुकून से इंतिक़ाल कर गए। शैख़ुल-बथ्हा ख़ामोश हो गए। उनका जिस्म बेहरकत हो गया। उनके बेटे अली फूट-फूट कर रो पड़े। मक्का में हर तरफ़ मातमी आवाज़ें फैल गईं। मुल्हिद उनकी मौत पर ख़ुश हो रहे थे। अबू जहल ने ग़ुस्से से कहा: अब मुहम्मद से बदला लेने का वक़्त आ गया है। हमारे आका मुहम्मद [स] विदा कहने आए। उन्होंने अबू तालिब की रौशन पेशानी को चूमा और ग़मगीन आवाज़ में कहा: चचा, अल्लाह आप पर रहम फ़रमाए। आपने मुझे बचपन में तालीम दी, यतीम होने पर मेरी कफ़ालत की, और बड़े होने पर मेरी नुसरत की। अल्लाह आपको इसका बहुत बड़ा बदला अता फ़रमाए। फिर वो फूट-फूट कर रो पड़े। वो अपने बचपन के दिन अपने मेहरबान चचा के साथ याद करने लगे। उन्होंने अपने चचेरे भाई अली को गले लगाया। दोनों साथ-साथ रोने लगे।

आमुल-हुज़्न (ग़म का साल)

कुछ ही हफ़्ते गुज़रे थे कि मुहम्मद की ज़ौजा ख़दीजा का भी इंतिक़ाल हो गया। इसलिए हमारे आका मुहम्मद [स] ने उस साल को आमुल-हुज़्न (ग़म का साल) नाम दिया। क़ुरैश ने मुहम्मद और उन पर ईमान लाने वालों पर ज़ुल्म और बढ़ा दिया। एक दिन, एक नादान शख़्स ने उन पर मिट्टी फेंक दी। उनका सर मिट्टी से भर गया। वो घर चले गए। जब फ़ातिमा, मुहम्मद की बेटी, उनका सर धो रही थीं, तो वो रोने लगीं। नबी ने उनके सर पर हाथ फेरा और कहा: बेटी, मत रोओ। अल्लाह तुम्हारे बाप को बचाएगा। वो तुम्हारे बाप को अपने दीन और रिसालत के दुश्मनों से महफ़ूज़ रखेगा। जिब्रील आसमान से अल्लाह का हुक्म लेकर नाज़िल हुए। उन्होंने कहा: मुहम्मद, मक्का से निकल जाओ। तुम्हारा मददगार इंतिक़ाल कर चुका है। जब क़ुरैश ने हमारे आका मुहम्मद [स] को क़त्ल करने की साज़िश की, तो अली, अबू तालिब का नौजवान बेटा, उनके बिस्तर पर सो गया। वो उनके लिए जान देने को तैयार था। हमारे आका मुहम्मद [स] यसरिब (अल-मदीना अल-मुनव्वरा) की तरफ़ रवाना हुए। वहीं से इस्लाम का नूर दुनिया को रौशन करने लगा। जब मुसलमान हर साल अल्लाह के मुक़द्दस घर की ज़ियारत के लिए जाते हैं, तो वो शैख़ुल-बथ्हा की ज़िंदगी को याद करते हैं जो हमेशा अल्लाह के दीन की हिफ़ाज़त करते रहे। मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं, और जो उनके साथ हैं वो काफ़िरों के मुक़ाबिले में सख़्त दिल और आपस में रहमदिल हैं।
आख़िरी अपडेट ( मंगलवार, 12 मई 2009 10:02 )

नेक लोगों की दास्तानें: हज़रत अबू तालिब

अगर हज़रत अबू तालिब (अ.) और उनके बेटे (अली (अ.)) मौजूद न होते, तो इस्लाम क़ायम न हो पाता और न ही लोगों के दरमियान इतनी मक़बूलियत और क़ुबूलियत हासिल करता। इसमें कोई शक नहीं कि अबू तालिब (अ.) इस्लाम की पनाह थे। उन्होंने इसकी नुसरत की और उनके बेटे (अली (अ.)) ने मदीना की जंगों में हिस्सा लिया, अपनी जान को ख़तरे में डालकर इस्लाम और मुसलमानों को यक़ीनी तबाही से बचाया। (तहज़ीबुल मतीन जिल्द 1 सफ़ा 13)

अपने इंतिक़ाल से पहले, हज़रत अब्दुल मुत्तलिब (अ.) ने मक्का की तामीर, बैतुल्लाह की हिफ़ाज़त, तमाम ख़ानदानी उमूर, नसबी ज़िम्मेदारियाँ, और रसूल-ए-ख़ुदा (स.) की परवरिश की मुक़द्दस ज़िम्मेदारी अपने बेटे अबू तालिब (अ.) के सुपुर्द की, जो हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) से बड़े थे। यह उन्हें एक अनोखी और नुमायाँ इज़्ज़त हासिल हुई जो उनके दूसरे भाइयों को न मिली। अबू तालिब (अ.) की क़िस्मत की बदौलत, अपने आबाई ख़िदमात और वक़ार के अलावा, उन्होंने औलाद-ए-इस्माईल (अ.) से आला मर्तबा और शुजाअत भी विरासत में पाई।

(अ.) यह अज़ीम ख़िदमत (यानी रसूल (स.) की परवरिश) हाजियों की देखभाल से कम अहम न थी। काबा की निगरानी भी उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल थी। अबू तालिब (अ.) की बरتری को उजागर करने वाली एक और बात यह है कि वह और हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) एक ही वालिदा जनाबे फ़ातिमा बिन्त उमरू बिन आयज़ बिन इमरान बिन मख़ज़ूम (अ.) से पैदा हुए थे।

अबू तालिब (अ.) अपने छोटे भाई हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) से बहुत मुहब्बत करते थे। जब हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) की क़ुर्बानी के लिए क़ुरआ निकाला गया और हज़रत अब्दुल मुत्तलिब (अ.) अल्लाह से किए हुए अहद को पूरा करने पर मजबूर हुए, तो यही हज़रत अबू तालिब (अ.) थे जिन्होंने अपने भाइयों के साथ मिलकर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब (अ.) से दरख़्वास्त की कि हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) को छोड़ दिया जाए। तीन बार क़ुरआ निकाला गया और तीनों बार हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) का नाम निकला, और हर बार हज़रत अबू तालिब (अ.) ने उनकी जान के लिए फ़रियाद की और उन्हें छुरी से बचा लिया। (तारीख़-ए-तबरी जिल्द 4 सफ़ा 303)

कुछ इतिहासकारों के मुताबिक़ हज़रत अबू तालिब (अ.) का असल नाम अब्दुल मुनाफ़ था, जबकि कुछ दूसरे इसे इमरान बताते हैं। लेकिन अरबों में यह रिवायत है कि किसी शख़्स को उसके असली नाम के बजाय उसके कुनिये से पुकारा जाए। अल्लामा सैयद अहमद की सीरतुन्नबूव्वह में बयान है—

'हज़रत अबू तालिब (अ.) उन लोगों में से थे जो जाहिलियत के दौर में भी शराब को हराम समझते थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके वालिद अब्दुल मुत्तलिब (अ.)।'

हज़रत अबू तालिब (अ.) की पैदाइश तक़रीबन 526 ईस्वी में हुई — आमुल-फ़ील (हाथी का साल) से 35 साल पहले। 43 साल की उम्र में उन्हें अपनी आबाई क़ुदरत और मर्तबा हासिल हुआ। अरब में उन्हें इज़्ज़त के साथ बैज़तुल बलद (शहर का नूर), शैख़ुल-क़ुरैश और रईसुल-मक्का (मक्का का सरदार) के ख़िताब से याद किया जाता था। इलाही अमानत (यानी रसूल (स.)) की परवरिश उनकी सरपरस्ती में होना बिला-शक इज़्ज़त और ख़ुशी की बात थी। लेकिन इस ज़िम्मेदारी को निभाना बेहद नाज़ुक काम था, जिसके लिए आला अख़लाक़, यक़ीन और ईमान दरकार था। एक आम शख़्स यह ज़िम्मेदारी कभी पूरी नहीं कर सकता था। हज़रत अबू तालिब (अ.) ने रसूल (स.) की हिफ़ाज़त की यह ज़िम्मेदारी उठाई। उन्होंने न सिर्फ़ अपनी सच्चाई, मुहब्बत और सहनशीलता को काम में लगाया, बल्कि इन ख़ूबियों के अलावा अपनी क़ीमती जान को भी ख़तरे में डाला।

इब्न हजर अपनी किताब में लिखते हैं: 'जब अब्दुल मुत्तलिब (अ.) का इंतिक़ाल हुआ तो उन्होंने अपनी वसीयत में अबू तालिब (अ.) को रसूल-ए-ख़ुदा (स.) की परवरिश का हुक्म दिया। चुनांचे अबू तालिब (अ.) ने उन्हें (स.) बहुत मुहब्बत और शफ़क़त के साथ पाला-पोसा, यहाँ तक कि अपने बेटे अली (अ.) को भी उसी तरह न पाला। इस तरह अबू तालिब (अ.) ने अपने वालिद की वसीयत को रसूल (स.) की परवरिश करके पूरा किया। वो रसूल (स.) को अपने शाम (सूरिया) के सफ़र में भी साथ ले गए। इस वक़्त तक रसूल (स.) नौजवान हो चुके थे। जब उन्होंने (स.) नुबुव्वत का एलान किया तो हज़रत अबू तालिब (अ.) उनकी मदद और नुसरत के लिए खड़े हो गए। और जिन काफ़िरों ने रसूल (स.) की मुख़ालफ़त की, उन्होंने उनकी भी मुख़ालफ़त की। वो रसूल (स.) की बहुत ज़्यादा सना करते थे। उन क़सीदों में उनका पूरा शेर भी शामिल है जो उन्होंने उस वक़्त पढ़ा जब क़हत पड़ा और रसूल (स.) की बरकत से बारिश हुई।

"मुस्तफ़ा नबी (स.) बेहद हसीन हैं, उनका चेहरा नूरानी है। आप (मुहम्मद (स.)) की बरकत से बारिश होती है और आप यतीमों की पनाह हैं और बेवाओं के मददगार हैं।"

वो इस यतीम की हिफ़ाज़त इस हद तक करते थे कि जहाँ भी ठहरते, रसूल (स.) को भी वहीं रखते, जहाँ भी खाना खाते, वही रसूल (स.) को पेश करते, जहाँ सोते, वहीं उन्हें (रसूल (स.)) को भी सुलाते। जहाँ भी जाते, रसूल (स.) को साथ ले जाते।

अली बिन बुर्हानुद्दीन शाफ़ेई ने अपनी किताब 'इंसानुल उयून' में हज़रत अबू तालिब (अ.) की रसूल (स.) के प्रति मेहरबानी को इस तरह बयान किया है:

'हर रात हज़रत अबू तालिब (अ.) रसूल (स.) से कहते कि आप सोने के लिए चले जाएँ, और जब सब लोग सो जाते, तो हज़रत अबू तालिब (अ.) अपने बेटों या भाइयों या चचेरे भाइयों में से किसी एक को उनके (स.) बिस्तर पर सुला देते ताकि जो लोग रसूल (स.) पर हमला करना चाहते थे, वो ऐसा न कर सकें।'

इसी दौर में मक्का के काफ़िरों ने रसूल (स.) को मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से सताने की कोशिश की। हर क़िस्म की मुश्किलें और अज़िय्यतें उन पर डाली गईं। काफ़िरों ने इस्लाम की तबलीग़ और इशाअत रोकने के लिए साज़िशें रचीं। अबू तालिब (अ.) को बुज़ुर्ग समझकर उन्होंने उन्हें अपनी चालों से धमकाया, मगर इससे न तो उनकी कोशिशें रुक सकीं और न ही उनकी इस्तेक़ामत पर असर पड़ा।

हम इस हक़ीक़त को उजागर करने के लिए दो वाक़िआत बयान करते हैं:

हज़रत अबू तालिब (अ.) की हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) के यतीम के लिए मुहब्बत और शफ़क़त के पीछे कोई मक़सद तलाश करना जहालत और ग़फ़लत की निशानी है। हज़रत अब्दुल्लाह (अ.) का इंतिक़ाल हो चुका था, जनाबे आमिना (स.अ.) भी इंतिक़ाल कर चुकी थीं और हज़रत अब्दुल मुत्तलिब (अ.) भी दुनिया से रुख़्सत हो चुके थे। फिर रसूल (स.) के साथ कौन था? हक़ीक़त में उनके वालिद अबू तालिब (अ.) ही थे, और वालिदा जनाबे फ़ातिमा बिन्त असद (अ.) — अली (अ.) की वालिदा। रसूल (स.) के साथ रिश्ते के अलावा, उनकी (स.) आमद के बारे में कसीर पेशगोइयों के बाद अबू तालिब (अ.) उन्हें (स.) की हिफ़ाज़त के लिए और ज़्यादा पुख़्ता हो गए। जब क़ुरैश को यक़ीन हो गया कि हज़रत अबू तालिब (अ.) रसूल (स.) की नुसरत जारी रखेंगे और कभी दस्तबरदार नहीं होंगे, तो वे एक जवान शायर को ले आए, जो बहुत मालदार और ख़ूबसूरत था, और उसे हज़रत अबू तालिब (अ.) के सामने पेश किया। उन्होंने कहा कि उसे अपना बेटा बना लें ताकि बुढ़ापे में वह उनके लिए सहारा हो। इसके बदले वे चाहते थे कि हज़रत अबू तालिब (अ.) रसूल (स.) को उनके हवाले कर दें, क्योंकि उनके मुताबिक़ उन्होंने क़ुरैश के दरमियान इख़्तिलाफ़ पैदा कर दिया था और उनके अक़्लमंदों को बेवक़ूफ़ और नाक़ाबिल बना दिया था।

हज़रत अबू तालिब (अ.) ने जवाब दिया: 'क्या तुम्हारे ज़ेहन में आया कि कोई शख़्स अपने अज़ीज़ को इस लिए सौंप दे कि उसे क़त्ल किया जाए और दूसरे का जवान बेटा ले ले?'  (तबरी जिल्द 4 सफ़ा 584)

एक बार रसूल (स.) अबू तालिब (अ.) की मौजूदगी में अपने मानने वालों को दावत दे रहे थे। क़ुरैश के मुरतद्द, जो इस्लाम के इलाही पैग़ाम को मिटाने का इरादा किए हुए थे, हज़रत अबू तालिब (अ.) के पास आए और उन्हें सताने लगे। जब वे उनकी इस्तेक़ामत को डिगा न सके, तो उन्होंने उनसे कहा: 'अभी के अभी मुहम्मद (स.) को हमारे हवाले कर दो!' अबू तालिब (अ.) ने ऐसा जवाब दिया जिसने पत्थरदिल क़ुरैश को भी छू लिया। उन्होंने कहा: 'अगर ऊँटनी अपना बच्चा किसी और को सौंप दे, तो मैं भी मुहम्मद (स.) को तुम्हारे हवाले कर दूँगा।'   (मिन्हाजुन नबूव्वह मुहद्दिस देहलवी जिल्द 2 सफ़ा 77)

हज़रत अबू तालिब (अ.) की रसूल (स.) की परवरिश में इस्तेक़ामत और वफ़ादारी वाक़ई बेमिसाल है। क़ुरैश रसूल (स.) के दुश्मन थे, और हज़रत अबू तालिब (अ.) क़ुरैश के सरदार थे। उनकी अपनी क़ौम (यानी क़ुरैश) उनके ख़िलाफ़ हो गई थी और उन्होंने ऐसे क़वानीन और ज़ाब्ते बना दिए थे कि उन्हें रोटी जैसी बुनियादी ज़रूरतें ख़रीदने की भी इजाज़त नहीं थी। ऐसी हालत में अगर अबू तालिब (अ.) ने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए होते, तो फासिद क़ुरैश उन्हें मक्का से बाहर निकलने भी न देते।

उस दौर के मक्की लोगों ने न सिर्फ़ हज़रत अबू तालिब (अ.) को छोड़ दिया था बल्कि अल्लाह को भी भुला दिया था और बुतों की इबादत करने लगे थे।

बनी कुलैब का माबूद दुद्द था, जबकि बनी हु़ज़ैल सवाअ की इबादत करते थे, बनी मजहज यग़ूस की परस्तिश करते थे, ज़ुल कलाअ नस्र की इबादत करता था और हमदान यअूक़ को पूजते थे। हर क़बीले का अपना अलग माबूद था। ये माबूद हर घर में पूजे जाते थे। इन क़बीलों में बनी हाशिम इस वजह से नुमायाँ थे कि वो किसी इंसानी बनाए हुए माबूद की इबादत नहीं करते थे। हैरत की बात यह है कि इन तमाम झूठे माबूदों को मिटाने वाला वही था जिसकी तरबियत हज़रत अबू तालिब (अ.) कर रहे थे। फिर भला वो हज़रत अबू तालिब (अ.) के साथ कैसे मेल-जोल से रह सकते थे? इसी वजह से उन्होंने अबू तालिब (अ.) को धमकाया और उनकी दाढ़स, इस्तेक़ामत और वफ़ादारी को कमज़ोर करने की कोशिश की।

हज़रत अबू तालिब (अ.) को तलवारों से डराया गया और पत्थर बरसाए गए, मगर उन्होंने अल्लाह की अमानत को अपने क़रीब रखा और उससे जुदा न हुए। हक़ीक़त में हमें हज़रत अबू तालिब (अ.) को उनका हक़ देना चाहिए, उनकी वह थकान न मानने वाली कोशिश, अज़्म, इख़लास और बेग़र्ज़ी को मानकर, जिससे उन्होंने रसूल (स.) की हिफ़ाज़त की। यक़ीनन उनकी ख़िदमत इस्लाम के किसी भी दूसरे मददगार से कम नहीं। वो उन क़ुरैश का सामना कर रहे थे जिनके लिए किसी की जान लेना बहुत आसान था। उस वक़्त ऐसी कौन-सी रुकावट थी जो क़ुरैश को रसूल (स.) के क़त्ल से रोकती? न कोई मुहाजिर थे और न कोई अंसार जो रसूल (स.) की हिफ़ाज़त करते। बस हज़रत अबू तालिब (अ.) और बनी हाशिम के कुछ अफ़राद थे। बल्कि बनी हाशिम में अबू लहब भी था जो आख़िरी साँस तक रसूल (स.) का सख़्त दुश्मन रहा। वहीं हज़रत अबू तालिब (अ.) थे जो तन्हाई में रसूल (स.) को तसल्ली देते और अपने मेहरबान हाथ से शफ़क़त करते। मक्का के काफ़िरों को अपनी बदनीयती में कामयाब होने से सिर्फ़ उनकी बेमिसाल मौजूदगी, इस्तेक़ामत और सहनशीलता ने रोके रखा। जब भी उन पर कोई मुसीबत आती, वो सब्र की बुलंदी पर नज़र आते, सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा रखते और उसी की बरकतों के मुंतज़िर रहते। यक़ीनन उनके बग़ैर रसूल (स.) की हिफ़ाज़त और अम्न नामुमकिन था।

एक बार क़ुरैश हज़रत अबू तालिब (अ.) के पास आए और रसूल-ए-ख़ुदा (स.) के बारे में शिकायतें करने लगे। मगर हज़रत अबू तालिब (अ.) ने उनकी नुक्ताचीनी का कोई जवाब न दिया, और जब वो चले गए तो उन्होंने सारी बात रसूल (स.) को बता दी। रसूल (स.) ने सोचा कि उनके चचा हज़रत अबू तालिब (अ.) क़ुरैश से डर गए हैं और उन्हें (रसूल को) लोगों की हिदायत से रोकना चाहते हैं। अपने भतीजे (स.) की उदासी देखकर हज़रत अबू तालिब (अ.) भी रंजीदा हो गए। उन्होंने अपने प्यारे भतीजे (स.) का हाथ कुछ देर थामे रखा और आखिर कहा: 'मैं तुम्हें हिदायत के अपने मिशन को जारी रखने से रोकना नहीं चाहता। तुम तबलीग़ जारी रखो और जो अल्लाह ने तुम्हारे ज़िम्मे लगाया है उसे पूरा करो, और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई दुश्मन तुम्हें छूने या अपनी धमकियों से डराने की जुरअत नहीं कर सकता।' हज़रत अबू तालिब (अ.) ने एक शेर पढ़ा जिसका तर्जुमा यह है: 'मैं क़सम खाता हूँ क़ादिर-ए-मुतलक़ की, तुम्हारा दुश्मन तुम्हारी तरफ़ नज़र भी नहीं उठा सकेगा जब तक मैं मिट्टी के नीचे दफ़्न न हो जाऊँ। तुम अपना पैग़ाम ज़ाहिर करो और डरो मत, अल्लाह तुम्हारी आँखों को तुम्हारे कामों से ठंडक दे।' (तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 301)

इसी सिलसिले में अल्लामा क़ुरतबी ने अपनी किताब 'आ'लाम' में एक वाक़िआ बयान किया है, जिसमें हज़रत अबू तालिब (अ.) की इख़लास और वफ़ादारी का ज़िक्र है। वह लिखते हैं: 'एक दिन रसूल (स.) काबा की तरफ़ गए और वहाँ नमाज़ शुरू की। अबू जहल (ल.) ने कहा: 'क्या कोई है जो उनकी (स.) नमाज़ को बेकार कर दे?' इस उकसावे पर अब्दुल्लाह बिन ज़ुबारी उठा और रसूल (स.) के मुबारक चेहरे पर घोड़े की लीद और ख़ून मल दिया। रसूल (स.) ने नमाज़ छोड़ दी, अबू तालिब (अ.) के पास गए और कहा: 'ऐ चचा, क्या आप नहीं देखते कि मेरे साथ कैसा सुलूक किया जा रहा है?' अबू तालिब (अ.) ने पूछा: 'किसने इस तरह तुम्हारी बेइज़्ज़ती की है?'

रसूल (स.) ने जवाब दिया: 'अब्दुल्लाह बिन ज़ुबारी'। अबू तालिब (अ.) ग़ुस्से में उठ खड़े हुए, तलवार कंधे पर रखी और क़ुरैश के पास चले गए। जब उन्होंने उन्हें देखा तो सब भागने के लिए उठ खड़े हुए। अबू तालिब (अ.) ने कहा: 'ख़ुदा की क़सम, अगर किसी ने उठने की जुरअत की तो मैं उसे अपनी तलवार से क़त्ल कर दूँगा।' फिर उन्होंने रसूल (स.) की तरफ़ रुख़ किया और कहा: 'ऐ मेरे बेटे, किसने तुम्हारी बेइज़्ज़ती की?' उन्होंने (स.) अब्दुल्लाह बिन ज़ुबारी की तरफ़ इशारा किया। अबू तालिब (अ.) ने उसी घोड़े की लीद और ख़ून को उसके चेहरे, दाढ़ी और कपड़ों पर मल दिया।

आख़िर क़ुरैश को समझ आ गया कि उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद वो रसूल (स.) की तरक़्क़ी रोक नहीं सकते और न ही हज़रत अबू तालिब (अ.) की रसूल (स.) से मुहब्बत और वफ़ादारी को खत्म कर सकते हैं, क्योंकि हज़रत अबू तालिब (अ.) उनकी धमकियों की परवाह नहीं करते थे।

इसलिए उन्होंने एक नई चाल सोची। उन्होंने क़ुरैश के सरदारों और ख़ैरख़्वाहों को जमा किया और हज़रत अबू तालिब (अ.) और रसूल-ए-ख़ुदा (स.)—दोनों को सताने के नए तरीक़े सोचने लगे। आख़िर उन्होंने इन क़दमों पर इत्तिफ़ाक़ किया:

1. बनी हाशिम को मक्का छोड़ने पर मजबूर किया जाए।

2. उनसे तमाम ताल्लुक़ात और राब्ते (समाजी और मआशी) काट दिए जाएँ। न उनसे कोई चीज़ बेची जाए और न उनसे कोई सामान ख़रीदा जाए।

3. उन्हें किसी से मिलने न दिया जाए और न कोई उनके पास जाए।

4. बनी हाशिम को कोई शादी का पैग़ाम न भेजे और न उनकी तरफ़ से कोई पैग़ाम क़बूल किया जाए।

5. बनी हाशिम के किसी भी शख़्स से कोई बातचीत न करे।

इन तमाम शर्तों पर मुश्तमिल एक दस्तावेज़ तैयार किया गया और मक्का की तमाम मशहूर और नुमायाँ शख़्सियतों ने उस पर दस्तख़त किए। उसे काबा की दीवार पर लटका दिया गया ताकि लोगों की नज़र से ओझल न रहे और आने-जाने वाले मुसाफ़िर भी उसे पढ़कर बनी हाशिम से किसी भी क़िस्म का राब्ता रखने से बाज़ रहें। अबू तालिब (अ.) का पुख़्ता अज़्म और रसूल (स.) की हिफ़ाज़त व परवरिश में उनकी इस्तेक़ामत ने उन्हें सख़्त से सख़्त और मुश्किल से मुश्किल मुसीबतों को भी रज़ामंदी और इत्मीनान के साथ बर्दाश्त करने वाला बना दिया।

आख़िर अबू तालिब (अ.) ने तय किया कि क़ुरैशी ज़ुल्म हद से बढ़ गया है और उन्होंने मक्का छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अबू लहब को छोड़कर बनी हाशिम के तमाम अफ़राद को जमा किया। उन्होंने तय किया कि मक्का से दूर एक नई जगह पर रहें, जो एक वादी थी। बाद में यह जगह शिअब-ए-अबी तालिब (अ.) के नाम से मशहूर हो गई, और आज भी मक्का के बाहर मौजूद है। यह जला-वतन की जगह बहुत तंग थी और इसका निकलने का रास्ता इतना संकरा था कि एक वक़्त में सिर्फ़ एक ही शख़्स गुज़र सकता था। यह जगह एक क़ैदख़ाने जैसी थी जिसमें धूप और हवा के लिए बस एक छोटा सा रास्ता होता है। ऐसी दर्दनाक हालत में, अबू तालिब (अ.) और उनके अहल तीन साल तक तन्हाई में रहे; इस दौरान अबू तालिब (अ.) न किसी के पास जा सकते थे और न कोई उनसे मिल सकता था। न उनके पास खाने-पीने का सामान था और न मुसीबत में दिलासा देने वाला कोई। वादी के रहने वालों की तसल्ली बस इलाही तहरीक और मदद थी, जिसने उन्हें सख़्त तरीन हालात में भी कायम रखा। बेरहम क़ुरैश ने न सिर्फ़ अबू तालिब (अ.) बल्कि उनके पूरे ख़ानदान को भी अपने माहौल से दूर कर दिया। यह पत्थरदिल क़बीला, जो पहले अबू तालिब (अ.) को अपना सरदार और पेशवा मानता था, सिर्फ़ इस वजह से उनके ख़िलाफ़ हो गया कि उन्होंने रसूल (स.) की रिसालत में उनकी मदद की। इन अज़ियतों के मद्देनज़र, अगर क़ुरैश फ़िरऔन की तरह थे तो बनी हाशिम बनी इसराईल की तरह थे, या अगर क़ुरैश को बख़्तुन-नस्र जैसा समझा जाए तो बनी हाशिम बैतुल मुक़द्दस के बाशिंदों की तरह थे। (तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 382)

इन वाक़िआत के ज़रिए हम यह बात वाज़ेह करना चाहते हैं कि इतनी ना-क़ाबिले-बर्दाश्त मुसीबतों और ज़ुल्म के बावजूद, हज़रत अबू तालिब (अ.) ने इस्लाम और रसूल (स.) की हिफ़ाज़त से कभी मुँह नहीं मोड़ा और न ही कभी उनकी मदद से पीछे हटे। उनकी रहमत और मुहब्बत में ज़रा भी कमी नहीं आई। क़ुरैश के जो हमले रसूल (स.) पर होते थे, उनका रुख़ हज़रत अबू तालिब (अ.) की तरफ़ भी होता था। इस्लाम के रसूल (स.) को जो अज़ियतें झेलनी पड़ीं, वही सब हज़रत अबू तालिब (अ.) पर भी डाली गईं। लेकिन न तो इससे उनकी सहनशीलता पर असर पड़ा और न ही उनके अज़्म में कोई कमी आई। बिला-शक अबू तालिब (अ.) ने अपनी फ़ायदेमंद ख़िदमात के ज़रिए अब्दुल मुत्तलिब (अ.) की वसीयत को बेहतरीन तरीक़े से पूरा किया। उन्होंने यक़ीनी बनाया कि उनके बेटे रसूल (स.) की देखभाल करें और उनकी रिसालत में उनकी मदद करें। उन सख़्त हालात में रसूल (स.) की हिफ़ाज़त का काम हज़रत अबू तालिब (अ.) के सिवा किसी और के लिए मुमकिन न था, क्योंकि किसी और में अबू तालिब (अ.) जैसी क़ुव्वत-ए-इरादा और इस्तेक़ामत मौजूद नहीं थी।

हज़रत अबू तालिब (अ.) ने रसूल (स.) की हिफ़ाज़त और सलामती के लिए जो तरीक़े अपनाए, वो बहुत कामयाब साबित हुए। इस कामयाबी को हम रसूल-ए-ख़ुदा (स.) की बरकतों से मंसूब कर सकते हैं। बेशक अबू तालिब (अ.) की क़ियादत की ख़ूबियों ने भी इस्लाम के फैलाव में मदद की। शुरू से ही इस्लाम एक ऐसे हमदर्द की निगरानी और सरपरस्ती में रहा जिसने बिना किसी ख़ौफ़ और लालच के उसकी परवरिश की और उसे बढ़ाया। उनकी वफ़ादारी किसी ख़ुदग़र्ज़ी या ज़ाती फ़ायदे से आलूदा न थी। हज़रत अबू तालिब (अ.) ने अपनी पूरी ज़िंदगी इस्लाम के रसूल (स.) की हिफ़ाज़त और ख़िदमत में गुज़ार दी। हज़रत अबू तालिब (अ.) के यह अल्फ़ाज़ — “जब तक मेरी साँस चल रही है, कोई तुम्हें नुक़सान पहुँचाने की जुरअत नहीं कर सकता” — हर पहलू से दुरुस्त साबित हुए। मक्का में रसूल (ख़ुदा ना करे) की तौहीन करना आम बात थी। बाज़ारों और आम मजलिसों में फ़ुह्श अशआर खुलेआम पढ़े जाते थे। मज़लूम रसूल (स.) के पास ऐसा कोई न था जो इन मुजरिमों को सज़ा दे सके।

अबू तालिब (अ.) ने यह ज़िम्मेदारी अकेले अपने ऊपर ली और रसूल (स.) की मद्ह में अशआर और क़सीदे कहे और क़ुरैश को मुनासिब जवाब दिया। इन क़ीमती शायरी के मोतियों में से हम नीचे एक हिस्सा बयान कर रहे हैं।

'आप इतने बुलंद और पसंदीदा हैं कि अल्लाह तआला ने आपका मुबारक नाम अपने नाम से निकाला है। वह आसमानों में महमूद है, और आप इस ज़मीन पर क़ाबिल-ए-तारीफ़ हैं।'

इस्लामी दौर में जब यह शेर हस्सान बिन साबित तक पहुँचा, तो वो इसकी गहरी सोच और नफ़ीस मज़मून से बहुत मुतास्सिर हुए। फिर उन्होंने उसी शेर में अपने अल्फ़ाज़ का इज़ाफ़ा किया: 'क्या तुमने नहीं देखा कि अज़मत वाले अल्लाह ने अपने मख़लूक़ (स.) को बुलंद करने के लिए उसे (स.) ऊँचा दर्जा दिया और उसे यह निशानी अता की। उसने उसका (स.) नाम अपने नाम से निकाला। वह आसमान में महमूद है और वह (स.) ज़मीन पर क़ाबिल-ए-तारीफ़ है।'

हज़रत अबू तालिब (अ.) की एक और मशहूर नज़्म, जिसे मुहम्मद बिन इशाक़ (मुसन्निफ़-ए-सीरतुन्नबूव्वत) ने रिवायत किया है, अस्सी से ज़्यादा अशआर पर मुश्तमिल है। यह उस वक़्त कही गई जब मक्का सख़्त क़हत का शिकार था।

ताजिर अपने कारोबार से मायूस थे और किसान भी अपनी खेती-बाड़ी की पैदावार से मायूस हो चुके थे। तो मक्का वाले बारिश की दुआ के लिए हज़रत अबू तालिब (अ.) के पास आए। हज़रत अबू तालिब (अ.) रसूल (स.) को अपने साथ लेकर काबा गए। रसूल (स.) ने अल्लाह से दुआ की और उनकी (स.) दुआ की बरकत से ज़ोरदार बारिश हुई। सूखे खेत हरियाली से भर गए। इस वाक़िआ को बयान करने वाली नज़्म में से हम नीचे एक हिस्सा पेश कर रहे हैं:

'अल्लाह के ज़िक्र और काबा के तवाफ़ के लिए बनी हाशिम के सिवा कोई नहीं, और हर हाल में वो इसी अज़मत से फ़ायदा उठाते रहे। ख़ुदा की क़सम! हम न मुहम्मद (स.) को छोड़ेंगे और न ही उन्हें किसी के हवाले करेंगे। हम अपने बच्चों और औरतों को छोड़कर भी पीछे नहीं हटेंगे, जब तक नेज़े टकरा न जाएँ और तीर बरस न पड़ें और हम मिट्टी-धूल से ढँक न जाएँ।'

'ऐ मुहम्मद! तुम्हारे नूरानी चेहरे को देखकर बारिश की बूँदें गिरती हैं। तुम्हारी रहमत भरी मौजूदगी बेबस यतीम की पनाह है और बेवा की इज़्ज़त व पाकदामनी की हिफ़ाज़त है।'

इसके अलावा, अबू तालिब (अ.) की एक और नज़्म भी है जिसमें उन्होंने रसूल (स.) की मद्ह की, इस्लाम की फ़ज़ीलत और बरतरी बयान की और उसे बेहतरीन दीन क़रार दिया। इस नज़्म के कुछ हिस्से यह हैं:

'ऐ मुहम्मद! तुमने मुझे इस्लाम की तरफ़ बुलाया, तो मुझे मालूम हुआ कि तुम अपने दावे में सादिक़ हो और जो कुछ तुमने कहा वह हक़ था, और मैं उसका गवाह/अमीन हूँ। और मुझे यह भी मालूम हुआ कि मुहम्मद (स.) का दीन दुनिया के तमाम अदयान से बेहतर है।'

इस्लाम की तबलीग़ और उसके क़ायम होने में हज़रत अबू तालिब (अ.) की कोशिशें ख़ामोश या पोशीदा नहीं थीं, बल्कि सब पर ज़ाहिर थीं। वो दिल की गहराई से चाहते थे कि हर शख़्स इस्लाम पर चले और दिल से उसे क़बूल करे। एक बार हज़रत अबू तालिब (अ.) ने नबी (स.) और हज़रत अली (अ.) को वादी की तंगी में नमाज़ पढ़ते देखा। उस वक़्त इस्लाम इतना मशहूर नहीं हुआ था कि नबी (स.) खुलकर नमाज़ का एलान कर सकें। हज़रत अबू तालिब (अ.) उन्हें देख रहे थे।

जब वे नमाज़ से फ़ारिग़ हुए तो उन्होंने अपने बेटे — अली-ए-मुर्तज़ा (अ.) — को बुलाया और उनसे कहा: 'अपने भाई (मुहम्मद (स.)) की हिफ़ाज़त में और ज़्यादा फुर्ती और ताक़त से लग जाओ। वो तुम्हारा ख़ैरख़्वाह है और तुम्हारे लिए नुक़सान नहीं चाहता। जाओ, अल्लाह तुम दोनों की हिफ़ाज़त करे।'

इसी तरह एक बार हज़रत अबू तालिब (अ.) अपने बेटे — जअ'फ़र (अ.) — के साथ नबी (स.) से मिलने गए। उन्होंने देखा कि नबी (स.) और अली (अ.) नमाज़ में मशग़ूल हैं। हज़रत अबू तालिब (अ.) ने जअ'फ़र (अ.) की तरफ़ रुख़ करके कहा: 'तुम भी नबी (स.) के साथ शामिल क्यों नहीं हो जाते और दूसरी तरफ़ से उनकी (स.) हिफ़ाज़त करो जैसे अली (अ.) कर रहे हैं?' (कामिल — इब्न असिर, सफ़ा 43)

इस तरह हज़रत अबू तालिब (अ.) ने हर मुमकिन तरीक़े से नबी (स.) के बाज़ू मज़बूत करने की पूरी कोशिश की और इस मामले में कभी समझौता नहीं किया। इसी तरह उन्होंने अपने वालिद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब (अ.) की वसीयत पूरी की। उन्होंने नबी (स.) की विलायत से वाबस्ता होकर अपने दावे को सच कर दिखाया — 'जब तक मेरी नाक की साँस चल रही है, कोई तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता।' बल्कि रसूल-ए-ख़ुदा (स.) की हिफ़ाज़त की राह में उन्होंने अपनी जान तक क़ुर्बान कर दी। उनकी ज़िंदगी में हमें इस्लाम की ख़िदमत के सिवा कुछ और नज़र नहीं आता। शुरू में वो तिजारत करते थे, मगर क़ुरैश के ज़ुल्म के बाद वो नहीं चाहते थे कि नबी (स.) को उनके रहमो-करम पर छोड़ दें, इसलिए उन्होंने तिजारत के लिए शाम (सूरिया) जाना भी छोड़ दिया।

दो-चार मौक़ों पर उन्होंने नबी (स.) को अपने साथ ले भी गए, मगर बाद में वह भी छोड़ दिया। उन सफ़रों में से एक में उनकी मुलाक़ात राहिब बहीरा से हुई, जिसने नबी (स.) को देखकर उनकी नुबुव्वत की बशारत दी। इसके बाद हज़रत अबू तालिब (अ.) नबी (स.) की हिफ़ाज़त के लिए और ज़्यादा पुख़्ता हो गए और उन्हें (स.) अपनी सबसे बड़ी अमानत समझने लगे। इसके बाद उन्होंने شام जाना छोड़ दिया और नबी (स.) की ज़िंदगी की हिफ़ाज़त में मशग़ूल रहे।

हिजरत से तीन साल पहले, आमुल-फ़ील (हाथी के साल) के 49वें साल में, वफ़ादारी और ईमान के सूरज — हज़रत अबू तालिब (अ.) — अपने ग़ुरूब के क़रीब पहुँच चुके थे। आहिस्ता-आहिस्ता मौत की अलामतें उन पर ज़ाहिर होने लगीं। इस वक़्त तक, रसूल (स.) की उम्र क़रीब पचास साल थी। क़ुरैश अब पहले दिनों की तरह ख़तरा नहीं रहे थे। मुसलमानों का एक गिरोह पोशीदा तौर पर अपने दीन के फ़राइज़ और वाजिबात अदा कर रहा था। बैत-ए-अक़बा (आख़िरी बैअत) हो चुकी थी। इस्लाम की तरक़्क़ी के दिन तुलूअ हो चुके थे और ख़ुद रसूल (स.) भी इस पर कुछ इत्मीनान महसूस करने लगे थे। इस्लाम के उमूर धीरे-धीरे तरक़्क़ी और तकमी्ल की तरफ़ बढ़ रहे थे।

हालाँकि हालात हौसलाअफ़ज़ा थे, फिर भी हज़रत अबू तालिब (अ.), जो बिस्तर-ए-मर्ग पर थे, इस्लाम की मदद और नबी (स.) की जान की हिफ़ाज़त के अपने फ़र्ज़ को लेकर बहुत फ़िक्रमंद थे। उन्हें अपने ख़ानदान या उनकी मआशी हालत की चिंता नहीं थी, बल्कि उन्हें सिर्फ़ रसूल (स.) की ख़ैरियत की फ़िक्र थी। उन्हें डर था कि उनके बाद क़ुरैश फिर से रसूल (स.) को नुक़सान पहुँचाने की साज़िश करेंगे, जैसा उन्होंने पहले शिअब-ए-अबी तालिब में किया था। यह डर बेबुनियाद नहीं था, बल्कि समाज के दुश्मनाना हालात, नबी (स.) के ख़िलाफ़ मुख़ालफ़त और इख़्तिलाफ़, इस्लाम के क़बूल में क़ुरैश की दुश्मनी और दूसरे हस्सास मसाइल से यह डर पैदा हुआ था। हज़रत अबू तालिब (अ.) आख़िरी साँस तक अपने फ़राइज़ अदा करना चाहते थे। बिस्तर-ए-मर्ग पर सबसे पहले उन्होंने यही किया कि अपने क़बीले के तमाम लोगों को जमा किया और उन्हें वसीयत की।

हज़रत अबू तालिब (अ.) की वसीयत

मक़ातिल से रिवायत है कि हज़रत अबू तालिब (अ.) ने वक़्त-ए-वफ़ात बनी हाशिम को वसीयत की: 'ऐ बनी हाशिम, अगर तुम सब रसूल (स.) की इताअत करो और अगर तुम सब उनकी सिद्क़ पर ईमान लाओ तो तुम्हें हिदायत मिल जाएगी।'

मदारिजुन्नबूव्वह (मुहद्दिस देहलवी) और रौज़तुस सफ़ा जिल्द 2 में हज़रत अबू तालिब (अ.) का लोगों को मुख़ातब करके किया गया यह ख़ुत्बा दर्ज है, जो उनकी वसीयत भी था।

'ऐ क़ुरैश! तुम अल्लाह के सबसे परहेज़गार बंदे हो। मैं तुम्हें नेक़ी और फ़ज़ीलत के मामलात में मुहम्मद (स.) की वसीयत करता हूँ। वो क़ुरैश के अमीन हैं, अरब के सादिक़ हैं, और उनके पास वे तमाम खूबियाँ हैं जिनकी वजह से मैं तुम्हें वसीयत कर रहा हूँ। उन्होंने (स.) ऐसी खुशख़बरी लाई है जिसे तुम्हारे दिलों ने क़बूल किया, लेकिन तुम्हारी ज़बान ने ताना-ज़नी के ख़ौफ़ से उसका इनकार चुना। इसके बरअक्स, मैं देखता हूँ कि कमज़ोर और बेबस लोगों ने उनकी (स.) दावत क़बूल की है, उनकी शरीअत की तस्दीक़ की है और उनकी ताज़ीम की है। इस तरह वही लोग पेशवा बन गए और तुम्हारे सरदार ज़लील हो गए। घमंडी लोग पस्त हो गए और विनम्र लोग बेनियाज़ हो गए। जो उनसे (स.) दूर हुए वही बदनसीब हैं। मैं देख रहा हूँ कि अहले अरब उनसे (स.) वाबस्ता हो चुके हैं, उन्होंने अपने दिल उनकी मुहब्बत के लिए खोल दिए हैं और बेहद एहतेमाम के साथ उनकी पैरवी और ख़िदमत के लिए तैयार हो गए हैं। ऐ क़ुरैश! मुहम्मद (स.) से दोस्ती करो और उनके गिरोह के मददगार बनो। मैं अल्लाह की क़सम खाता हूँ जो लोग उनके (स.) दिखाए हुए रास्ते पर नहीं चलेंगे उन्हें हिदायत न मिलेगी, और सिर्फ़ वही लोग उनके तरीक़ों और सिफ़ात को क़बूल करेंगे जो नेक होंगे। अगर मौत को टाला जा सकता और मेरी ज़िंदगी में कुछ और मोहलत होती, तो मैं उनकी मदद करता और जहाँ तक मुमकिन होता उनके रास्ते से हर ख़तरा दूर कर देता।'

हाए अफ़सोस! हज़रत अबू तालिब (अ.) की आख़िरी आरज़ू पूरी न हो सकी और मौत ने उन्हें एक लम्हे की भी मोहलत न दी। क़ुरैश ने हज़रत अबू तालिब (अ.) की ख़ैरख़्वाहाना नसीहत को ठुकरा दिया और ग़ुस्से में उठकर बाहर निकल गए। कुछ ही देर बाद इस्लाम के इस अज़ीम मददगार ने अपने रब की पुकार पर लब्बैक कहा और उसी की तरफ़ लौट गए। अब इस्लाम उस सख़ी मददगार के साए से महरूम हो गया जिसने पचास साल तक इस्लाम के रसूल (स.) की हिफ़ाज़त और निगहबानी की ज़िम्मेदारी उठाए रखी। मushrikīn और मुख़ालिफ़ीन-ए-इस्लाम अपने तानों और हरकतों से जो वार करना चाहते थे, उन सब को उन्होंने अपने ऊपर ले लिया। बुढ़ापे में भी वो इस्लाम की तरक़्क़ी और तबलीग़ के लिए जुनून और जोश के साथ कोशिश करते रहे।


हज़रत अबू तालिब(अ.) मोहसिन-ए-इस्लाम

हज़रत अबू तालिब(अ.) हमारे महबूब नबी मुहम्मद(स) के चचा थे, जिन्होंने नबी(स) की परवरिश और निगहदाश्त की ज़िम्मेदारी उठाई। शुरू से ही उन्होंने पूरी ताक़त के साथ नबी(स) की हिफ़ाज़त की। वो इमाम अली(अ.) के वालिद भी थे।

सूरह वज़्-ज़ुहा में अल्लाह(सुब्हानहू व तआला) फ़रमाता है: "अलम यजिदका यतीमन फ़आवा" "क्या उसने तुम्हें यतीम न पाया और पनाह न दी?" (93,6)। शिया और सुन्नी उलमा की मशहूर तफ़ासीर में बयान है कि यह आयत उस हिफ़ाज़त और पनाह की तरफ़ इशारा करती है जो हज़रत अबू तालिब(अ.) ने उस वक़्त अता की जब नबी(स) यतीम हो गए थे। इस तरह हज़रत अबू तालिब(अ.) के इस अमल को अल्लाह(सुब्हानहू व तआला) ने अपना (सुब्हानहू व तआला) ही अमल क़रार दिया।

मशहूर वाक़िआ के बाद जब नबी मुहम्मद(स) ने मुशरिकीन-ए-मक्का की माल, निकाह और मर्तबा की पेशकशों को रद्द कर दिया, तो हज़रत अबू तालिब(अ.) ने नबी(स) की मुकम्मल हिमायत की और इस्लाम के उस नाज़ुक दौर में उन्हें हिफ़ाज़त और पनाह फ़राहम की।

शिअब-ए-अबी तालिब के सबसे कठिन दिनों में, हज़रत अबू तालिब(अ.) ने मुशरिकीन-ए-मक्का के समाजी बहिष्कार के नतीजे में बनी हाशिम को तन्हाई/हिसार में रहनुमा होकर संभाला। उन तीन सालों के दौरान, वो रात में नबी मुहम्मद(स) की सोने की जगह पर अपने बेटों को सुला देते थे ताकि अगर हमला हो तो उनके बेटे शहीद हो जाएँ मगर रसूल-ए-इस्लाम बच जाएँ।

 

हज़रत अबू तालिब(अ.) मोमिन-ए-क़ुरैश

कुछ लोग एतराज़ करते हैं कि हज़रत अबू तालिब(अ.) ने कभी इस्लाम क़बूल नहीं किया और कभी कलिमा नहीं पढ़ा। उनकी यह बात हैरतअंगेज़ है, क्योंकि वह खुद भी मुसलमान बनने के लिए कलिमा नहीं पढ़ते। जो लोग मुसलमान घरानों में पैदा होते हैं उन्हें मुसलमान बनने के लिए कलिमा पढ़ने की ज़रूरत नहीं होती। मेरी जानकारी में ऐसी कोई रिवायत नहीं कि इमाम अली(अ.) ने मुसलमान बनने के लिए कभी कलिमा पढ़ा हो। जो पहले गैर-मुसलमान रहा हो, उसे मुसलमान बनने के लिए वाक़ई कलिमा पढ़ने की ज़रूरत होती है।

अब ज़रा नीचे दी गई बातों पर ग़ौर करें:-

- हज़रत अबू तालिब(अ.) वही थे जिन्होंने अपने घर में इस्लाम की पहली दावत की मेज़बानी की दावत ज़ुल अशिरा। आजकल कोई भी मुसलमान जो दावत करता है, वह हक़ीक़त में हज़रत अबू तालिब(अ.) की सुन्नत पर अमल करता है।

- नबी मुहम्मद(स) का हज़रत ख़दीजा(अ.) से निकाह इन्तज़ाम करने वाले भी वही थे।

- वही थे जिन्होंने रसूल-ए-ख़ुदा(स) का निकाह पढ़ाया, और उस निकाह की शुरुआत अल्लाह(सुब्हानहू व तआला) की हम्द और उसके रसूल(स) की सना से हुई। उसमें हज़रत इब्राहीम(अ.) की नुबुव्वत, अल्लाह(सुब्हानहू व तआला) की नाज़िल की हुई किताबों का ज़िक्र और अल्लाह(सुब्हानहू व तआला) की हम्द-ओ-सना भी थी कि उसने हज़रत अबू तालिब(अ.) को हज़रत इब्राहीम(अ.) की नस्ल में क़रार दिया।

एतराज़ करने वाले के लिए एक और बात अगर हज़रत अबू तालिब(अ.) मुसलमान नहीं थे तो नबी मुहम्मद(स) ने कैसे (नऊज़ुबिल्लाह) एक मुशरिक को अपना निकाह पढ़ाने की इजाज़त दी? और अगर ऐसा था भी तो फिर एतराज़ करने वाले आज नबी(स) की इस सुन्नत पर अमल क्यों नहीं करते।

- वही थे जिन्होंने नबी मुहम्मद(स) की तरफ़ से हज़रत ख़दीजा(अ.) का मेहर अदा किया।

- क़ुरआनी हुक्म के मुताबिक़ कोई मुसलमान औरत इस्लाम क़बूल करने के बाद किसी गैर-मुसलमान के निकाह में नहीं रह सकती और न ही गैर-मुसलमान के साथ रह सकती है। हज़रत बीबी फ़ातिमा बिन्त-ए-असद(अ.) हज़रत अबू तालिब(अ.) के निकाह में उनकी वफ़ात तक रहीं।

एतराज़ करने वाले के लिए एक और बात: तमाम फ़िरक़े इस बात को मानते हैं कि हज़रत बीबी फ़ातिमा बिन्त-ए-असद(अ.) ने इस्लाम क़बूल किया था, तो फिर नबी(ब्पुह&hf) ने उन्हें हज़रत अबू तालिब(अ.) के साथ रहने की इजाज़त कैसे दी?

- जैसा कि ऊपर बयान हुआ, अल्लाह(सुब्हानहू व तआला) हज़रत अबू तालिब(अ.) की हिफ़ाज़त को अपनी (सुब्हानहू व तआला) ही हिफ़ाज़त क़रार देता है। पूरे क़ुरआन में किसी मुशरिक के किसी अमल के बारे में एक भी जगह नहीं कि अल्लाह(सुब्हानहू व तआला) ने उसे अपना अमल कहा हो।

- आख़िर में, नबी मुहम्मद(स) ने एक हदीस में फ़रमाया है कि क़यामत के दिन जो शख़्स यतीम की परवरिश करेगा वह जन्नत में मेरे साथ होगा जैसे ये दो उंगलियाँ (दो उंगलियों की तरफ़ इशारा करते हुए)। तो फिर वह शख़्स कहाँ होगा जिसने उस यतीम की परवरिश की जो आगे चलकर रसूल-ए-इस्लाम बना?

 

आम-उल-हुज़्न  हज़रत ख़दीजा(अ.) और हज़रत अबू तालिब(अ.) का इंतिक़ाल एक ही साल में हुआ, और नबी मुहम्मद(स) उनके जुदाई के ग़म से इतने मलूल हुए कि उन्होंने उस साल को आम-उल-हुज़्न क़रार दिया — यानी ग़म और मातम का साल।


अबू तालिब मज़लूम मोमिन सुन्नी और शिया किताबों में

इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.), से रिवायत है कि उन्होंने फ़रमाया, "मुझे तअज्जुब है कि लोग अबू तालिब के ईमान में शक क्यों करते हैं, जबकि जब कोई औरत इस्लाम क़बूल कर ले तो वह किसी गैर-मुस्लिम शौहर के साथ अपना निकाही रिश्ता जारी नहीं रख सकती, और फ़ातिमा बिन्त असद उन ख़वातीन में से थीं जिन्होंने बहुत शुरूआती दौर में इस्लाम क़बूल किया, फिर भी वह उनकी बीवी रहीं यहाँ तक कि उन्होंने अपनी आख़िरी साँस ली। 

अबू तालिब अहले बैत (अ.) के ख़िलाफ़ साज़िश में सबसे ज़्यादा मज़लूम मोमिनों में से एक हैं। वही शख़्स थे जिन्होंने मक्का में इस्लाम के दुश्मनों के मुक़ाबले में नबी मुहम्मद (स.अ.व.) की हिमायत और हिफ़ाज़त की। यह सिर्फ़ ख़ून के रिश्ते की वजह से नहीं था कि वो नबी के चचा थे, क्योंकि नबी (स.अ.व.) के और भी चचा थे, जिनमें अबू लहब भी था जो अपनी बीवी के साथ नबी के सख़्त दुश्मनों में शामिल था (सूरह मसद में उन पर खुलकर वार है)। अबू तालिब ने नबी की मदद इसलिए की कि उन्हें अल्लाह (स.व.त.) के पैग़ाम पर गहरा ईमान था कि यह आख़िरी और फ़ैसला कुन पैग़ाम है। अबू तालिब का ईमान उनके कलाम में ज़ाहिर हुआ जो शायरी की सूरत में सामने आया, क्योंकि वह कहते थे (मैं यक़ीनन जानता हूँ कि मुहम्मद का दीन) 
(तमाम अदयान में सबसे बेहतर है)(तारीख़ इब्न कसीर 3:42, फ़त्ह अल-बारी फ़ी शरह सहीह अल-बुख़ारी 7:153, अल-इसाबा 4:116 और बहुत से दूसरे माख़ज़)।
 

अबू तालिब कहते थे (यक़ीनन अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद को इज़्ज़त दी) अल्लाह की मख़लूक़ात में सबसे ज़्यादा मुकर्रम अहमद है अल्लाह ने उसके लिए अपने नाम से एक नाम निकाला 
तो अल्लाह महमूद है और वह मुहम्मद है) (दलाइल अल-नुबुव्वह अबू नुऐम 1:6, तारीख़ इब्न असाकिर 1:275, तारीख़ इब्न कसीर 1:266, अल-इसाबा इब्न हजर 4:115, अल-मवाहिब अल्लदुननियह अल-क़स्तलानी 1:518, तारीख़ अल-बुख़ारी से रिवायत। 


अहले बैत के दुश्मन जो उमय्यद और अब्बासी हुकूमतें थीं और उनके लोगों ने अबू तालिब के ख़िलाफ़ क़िस्से और झूठी हदीसें गढ़ीं और दावा किया कि वह काफ़िर थे। यह इल्ज़ाम मुआविया के दौर में मुस्लिम अवाम के नज़दीक क़ाबिल-ए-क़बूल नहीं था, वरना वह इमाम अली (अ.) के ख़िलाफ़ अपनी जंग में इसका ज़िक्र करता। बाद में इसे मनघढ़ंत रिवायतों से ताइद दी गई  
और उमय्यद व अब्बासी हुकूमतों ने इमाम अली (अ.) की शान को जाहिल अवाम की नज़रों में नुक़सान पहुँचाने के लिए इसे फैलाया। 
अबू तालिब के ख़िलाफ़ रिवायतों की जाँच: 
अगर आप अबू तालिब के ख़िलाफ़ बयान की जाने वाली मशहूर-ए-ज़माना हदीसों को लें और उनके रावी/नक़ल करने वालों की जाँच करें, तो आप उन्हें झूठे और गैर-मोअतमद लोग पाएँगे, जैसे:- 
1- सईद बिन अल-मुसय्यब, जो इमाम अली के खुल्लम-खुल्ला दुश्मन थे (शरह अल-नहज इब्न अबिल हदीद 1:370)। इसी शख़्स ने इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन अल-सज्जाद (अ.) की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ने से इनकार किया (शैख़ अल-अब्तह 66)(अल-वाक़िदी, अल-ग़दीर 8:9)। 
2- सुफ़यान अल-थौरी, जो अबू तालिब के ख़िलाफ़ रिवायतें बयान करता था। यह सुफ़यान अल-थौरी न सिर्फ़ इमाम अली (अ.) का दुश्मन था, बल्कि सुन्नी उलमा के नज़दीक भी झूठों से रिवायत करने वाला मशहूर था, जैसा कि अल-ज़हबी ने मीज़ान अल-ए’तिदाल 1:398 में इकरार किया।  
3- अल-ज़ुहरी, जो इमाम अली (अ.) का खुल्लम-खुल्ला दुश्मन था और इतना बड़ा झूठा था कि उसने यह दावा किया कि (यक़ीनन अली और अल-अब्बास जहन्नम वालों में से हैं और वे मुसलमान होकर नहीं मरेंगे)। इस ज़ुहरी का ज़िक्र सुन्नी किताबों में हदीसें गढ़ने वाले के तौर पर आता है (मीज़ान अल-ए’तिदाल अल-ज़हबी 3:126)। 
4- अब्दुल मलिक बिन उमैर अल-लख़्मी, जिनकी याददाश्त कमज़ोर हो गई थी, जैसा कि मशहूर सुन्नी आलिम अबू हातिम ने उनके बारे में कहा (अल-ग़दीर 8:23)। अहमद बिन हनबल उनके बारे में कहा करते थे कि उनकी रिवायतें बहुत ज़ईफ़ हैं (मीज़ान अल-ए’तिदाल अल-ज़हबी 2:151)। 
5- अब्दुल अज़ीज़ अल-दारा-वर्दी, जिनके बारे में अहमद बिन हनबल ने कहा (अरबी: लैसा हुवा बिशै’ — यानी: उसकी कोई हैसियत ही नहीं) (मीज़ान अल-ए’तिदाल अल-ज़हबी 2:128)। अहमद बिन हनबल ने यह भी कहा कि वह झूठ बयान करता है। (मीज़ान अल-ए’तिदाल 2:128)। 
ये झूठे लोग अबू तालिब के ख़िलाफ़ मनघढ़ंत हदीसें गढ़कर क़ुरआनी आयात के मआनी को मोड़ने की कोशिश करते रहे।  
 

अबू तालिब के बारे में नबी और अहले बैत के अक़वाल: 
इस्लाम में अबू तालिब का बुलंद मक़ाम नबी मुहम्मद (स.अ.व.) और अहले बैत (अ.) के बहुत से अक़वाल और अमल से वाज़ेह होता है, जो अल्लाह (स.व.त.) की मर्ज़ी के बग़ैर कुछ नहीं कहते। 
नबी मुहम्मद (स.अ.व.) जिनके बारे में है कि (वो अपनी ख्वाहिश से कुछ नहीं कहते, बल्कि वही कहते हैं जो उनकी तरफ़ वह्य की जाती है) (सूरह नज्म: 3), अबू तालिब की वफ़ात के बाद भी उनकी तारीफ़ किया करते थे। जब नबी के चचा अल-अब्बास ने नबी से पूछा: आप अबू तालिब के लिए क्या उम्मीद रखते हैं? तो नबी ने जवाब दिया: 
हर भलाई, मैं अपने रब से अबू तालिब के लिए उम्मीद करता हूँ (तज़किरत अल-ख़वास 10) (अल-ग़दीर 7:374)। 
नबी (स.अ.व.) बार-बार अबू तालिब की तारीफ़ फरमाते थे। उनमें से कुछ मौक़े सुन्नी उलमा ने भी बयान किए हैं, जैसे इब्न हिशाम ने सीरत इब्न हिशाम 1:300 में। 
अबू तालिब के ख़िलाफ़ इल्ज़ाम की वजह को नबी (स.अ.व.) ने इमाम अली से यूँ वाज़ेह किया: ऐ अली, तुम्हारे लिए मेरे भाई ईसा (अ.) की मिसाल है; जब यहूद उनसे बुग़्ज़ रखते थे तो उन्होंने उनकी माँ पर इल्ज़ाम लगाया। (कंज़ अल-उम्माल अल-मुत्तक़ी अल-हिंदी)। इमाम अली (अ.) के दुश्मनों ने भी ईसा (अ.) की माँ पर यहूद के इल्ज़ाम की तरह उनके वालिद पर झूठे इल्ज़ाम लगाए। 
इमाम अली (अ.) ने फरमाया: अल्लाह की क़सम, अबू तालिब ईमानदार मुसलमान (मोमिन) थे, वो अपने ईमान को पोशीदा रखते थे ताकि बनी हाशिम को क़ुरैश के बहिष्कार से नुक़सान न पहुँचे। (अल-हुज्जह 24, अल-ग़दीर 7:389, मो’जम अल-क़ुबूर 1:200)। 
इमाम अली (अ.) ने यह भी फरमाया: उस ज़ात की क़सम जिसने मुहम्मद को नबी बनाकर भेजा, अगर मेरे वालिद की शफ़ाअत रूए ज़मीन के तमाम गुनाहगारों के लिए दी जाए, तो अल्लाह उन सबको माफ़ कर देगा। (तज़किरत अल-ख़वास 11)। 
इमाम सज्जाद (अ.) से एक शख़्स ने उन लोगों के बारे में पूछा जो कहते हैं कि अबू तालिब काफ़िर थे, तो उन्होंने जवाब दिया: यह वाक़ई बहुत अजीब है, क्या वो अबू तालिब पर हमला कर रहे हैं या रसूल-ए-ख़ुदा पर, जबकि अल्लाह ने बहुत सी आयात में हुक्म दिया है कि किसी मोमिना को काफ़िर शौहर के साथ न छोड़ा जाए, और इसमें किसी को शक नहीं कि फ़ातिमा बिन्त असद बेहतरीन मोमिना ख़वातीन में से थीं, और वह अबू तालिब की बीवी रहीं यहाँ तक कि उनकी वफ़ात हुई? (इब्न अबिल हदीद, शरह नह्जुल बलाग़ा 3:312, शैख़ अल-अब्तह 76)। 
 

इमाम मुहम्मद अल-बाक़िर (अ.) ने फरमाया: अगर अबू तालिब का ईमान (ईमान) तमाम लोगों के ईमान के मुक़ाबले में तराज़ू में रखा जाए, तो अबू तालिब का ईमान ज़्यादा भारी होगा। क्या तुम नहीं जानते कि अमीरुल मोमिनीन अली (अ.) अब्दुल्लाह और आमिना (नबी के वालिदैन) की तरफ़ से और अबू तालिब की तरफ़ से भी हज्ज करने वालों को भेजा करते थे जब तक इमाम अली ज़िंदा रहे; फिर उन्होंने वसीयत की कि उनके बाद भी यह जारी रखा जाए। (शैख़ अल-अब्तह 32, अल-ग़दीर 7:381, अबू तालिब मोमिन क़ुरैश अल-ख़ुनैज़ी 257)। यह वाज़ेह है कि हज्ज सिर्फ़ मुसलमान की तरफ़ से ही किया जा सकता है। 
इमाम जाफ़र अल-सादिक़ (अ.) के पास एक शख़्स ने कहा: लोग दावा करते हैं कि अबू तालिब आग में एक हल्की-सी जगह (उथली जगह) में हैं। तो इमाम ने फरमाया: ये झूठ बोलते हैं, ऐसा नहीं कि जिब्रईल को इसी बात के साथ भेजा गया हो। यक़ीनन अबू तालिब अस्हाब-ए-कहफ़ की तरह हैं जिन्होंने अपना ईमान छुपाया और ज़ाहिर में शिर्क दिखाया, तो अल्लाह ने उनका अज्र दोगुना कर दिया। (अल-हुज्जह 17 और 115, मो’जम अल-क़ुबूर 1:191)। 
 

इमाम जाफ़र अल-सादिक़ (अ.) ने यूनुस बिन नबाता से पूछा: ऐ यूनुस, लोग अबू तालिब के बारे में क्या कहते हैं? यूनुस ने कहा: लोग कहते हैं कि वह आग में एक उथली जगह में हैं जहाँ से उनका दिमाग़ उबल रहा है। इमाम सादिक़ (अ.) ने फरमाया: अल्लाह के दुश्मन झूठ बोलते हैं। अबू तालिब (जन्नत में) अंबिया, सिद्दीक़ीन, शुहदा और सालेहीन के साथ हैं, और यही लोग सबसे बेहतर रफ़ीक़ हैं। (शैख़ अल-अब्तह 32, अल-हुज्जह 17, अल-ग़दीर 7:394 कंज़ अल-फ़वाइद से)।
 

इमाम मूसा अल-काज़िम (अ.) से दुरुस्त बिन अबी मंसूर ने पूछा: अबू तालिब की हालत क्या थी? इमाम काज़िम (अ.) ने जवाब दिया: उन्होंने नबी पर और उस तमाम पैग़ाम पर ईमान लाया जो नबी अल्लाह की तरफ़ से लेकर आए, और वसीयतें उनके हवाले कर दीं। (अल-अब्बास 18, अल-ग़दीर 7:395, अबू तालिब अल-ख़ुनैज़ी 262)। यह एक मासूम इमाम का बहुत अहम बयान है कि अबू तालिब के पास वसीयतें थीं, जो हर ज़माने में सबसे परहेज़गार शख़्स के पास होती हैं, इसलिए वे मुहम्मद (स.अ.व.) की नुबुव्वत से पहले अबू तालिब के पास थीं और अबू तालिब ने उन्हें नबी मुहम्मद (स.अ.व.) के हवाले कर दिया। अबू तालिब का यह अज़ीम मक़ाम दूसरे मोमिनों के मक़ाम से बहुत बुलंद है। यही वजह है कि मासूम इमाम मुहम्मद अल-बाक़िर (अ.) ने फरमाया कि अबू तालिब का ईमान तमाम मख़लूक़ के ईमान से ज़्यादा भारी है। (शैख़ अल-अब्तह 32)।  
 

इमाम अली अल-रज़ा (अ.) को अबान बिन महमूद की तरफ़ से एक ख़त मिला जिसमें उसने लिखा कि उसे अबू तालिब के बारे में शक है कि वह मुसलमान थे या नहीं। इमाम रज़ा (अ.) ने उसे क़ुरआन की यह आयत लिखी: (और जो रसूल की मुख़ालफ़त करे और मोमिनों के रास्ते के ख़िलाफ़ दूसरा रास्ता अपनाए, हम उसे उसी तरफ़ फेर देंगे जिधर वह फिर रहा है और जहन्नम में डालेंगे, और वह बहुत बुरा ठिकाना है) (4:115) फिर इमाम ने उसे लिखा: अगर तुम यह यक़ीन नहीं रखते कि अबू तालिब मोमिन थे, तो तुम्हारा ठिकाना आग में होगा। (शरह नहजुल बलाग़ा इब्न अबिल हदीद 3:311, अल-हुज्जह 16, मो’जम अल-क़ुबूर 1:189, अबू तालिब अल-ख़ुनैज़ी 264)। 
 

अबू तालिब को ग़ैर-ईमानदार (काफ़िर) कहना बिला-शक नबी की मुख़ालफ़त और मुक़ाबला करना है, क्योंकि नबी अबू तालिब के अज़ीम मक़ाम से वाक़िफ़ थे और हमेशा उनकी सिफ़त बयान करते रहे। यह नबी (स.अ.व.) को तकलीफ़ पहुँचाने के बराबर है, क्योंकि उनके शरीफ़ चचा, सरपरस्त और इस्लाम के हिफ़ाज़त करने वाले की तौहीन की जाती है जो आख़िर तक नबी के साथ जुड़े रहे। नबी को तकलीफ़ देना बड़ा गुनाह है, जैसा कि नबी ने हदीस में फरमाया: जिसने मेरे एक बाल को भी तकलीफ़ पहुँचाई उसने मुझे तकलीफ़ पहुँचाई, और जिसने मुझे तकलीफ़ पहुँचाई उसने अल्लाह को तकलीफ़ पहुँचाई। (अल-सवाआ’इक़ अल-मुहरिक़ा इब्न हजर 111)। अल्लाह क़ुरआन में फरमाता है : (और जो लोग रसूलुल्लाह को तकलीफ़ पहुँचाते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है) (अल-तौबा: 61) (बेशक जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को तकलीफ़ पहुँचाते हैं उन पर अल्लाह की लानत है दुनिया में भी और आख़िरत में भी) सूरह अल-अहज़ाब: 57। इससे अबू तालिब के ख़िलाफ़ बे-बुनियाद दावे के ख़तरनाक नतीजे वाज़ेह होते हैं; न सिर्फ़ इसलिए कि किसी मुसलमान पर काफ़िर होने का इल्ज़ाम लगाना अपने-आप में बड़ा गुनाह है, बल्कि इसलिए भी कि यह नबी को तकलीफ़ देता है और उनके अक़वाल व अफ़आल की मुख़ालफ़त करता है। यह अहले बैत (अ.) के भी ख़िलाफ़ है जो उम्मत-ए- मुहम्मद (स.अ.व.) में सबसे ज़्यादा परहेज़गार हैं, जिन्हें अल्लाह ने क़ुरआन के मुताबिक़ हर तरह की ख़ता से पाक रखा है (33:33)।  


इमाम हसन अल-अस्करी (अ.) ने एक हदीस बयान की कि अल्लाह ने अपने रसूल पर वह्य की: मैंने तुम्हारी मदद दो तरह के मददगारों से की; कुछ जो तुम्हारी मदद छुपकर करते हैं और कुछ जो खुलेआम करते हैं। तुम्हारे छुपे हुए मददगारों में सबसे बेहतर और सरदार अबू तालिब हैं, और तुम्हारे खुलेआम मददगारों में सबसे बेहतर और सरदार उनके बेटे अली इब्न अबी तालिब (अ.) हैं। फिर इमाम अस्करी (अ.) ने फरमाया: यक़ीनन अबू तालिब आल-ए-फ़िरऔन के उस मोमिन की तरह थे जो अपना ईमान छुपाए रखता था) (अल-हुज्जह 115, अबू तालिब अल-ख़ुनैज़ी:265)। 
मशहूर सहाबा की गवाही:- 
अबू बक्र ने कहा कि अबू तालिब ने वफ़ात नहीं पाई मगर इस गवाही के बाद कि: अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद उसके रसूल हैं। (शरह अल-नह्ज़ इब्न अबिल हदीद 3:312)(शैख़ अल-अब्तह 71), (अल-बिदायह वल-निहायह 3:123),(अल-इसाबह 4:116),(दला’इल अल-नुबुव्वह अल-बैहक़ी 1:120) और(कश्फ़ अल-ग़ुम्मह अल-शा’रानी 2:144) 
अब्दुल्लाह बिन अब्बास से एक शख़्स ने पूछा: ऐ रसूल के चचेरे भाई, मुझे अबू तालिब के बारे में बताइए, क्या वह मुसलमान थे? उन्होंने जवाब दिया: अबू तालिब ग़ैर-मुसलिम कैसे हो सकते हैं जबकि वह नबी के बारे में कहते थे: (क्या उन्होंने यह नहीं जाना कि हम यक़ीन रखते हैं कि हमारा बेटा (भतीजा) कभी झूठ नहीं बोलता) (और वह गलत बातों की परवाह नहीं करता)। 
इब्न अब्बास ने आगे कहा: अबू तालिब अस्हाब-ए-कहफ़ की तरह थे, जिन्होंने अपना ईमान छुपाया और ज़ाहिर में शिर्क दिखाया, तो अल्लाह ने उन्हें दोगुना अज्र अता किया। (अल-हुज्जह 94)। 
अबू ज़र अल-ग़िफ़ारी ने कहा: उस अल्लाह की क़सम जो इकलौता माबूद है, अबू तालिब ने वफ़ात नहीं पाई मगर मुसलमान होकर। (अल-ग़दीर 7:398)। 
हस्सान बिन साबित, नबी के शायर, ने हमज़ा और अबू तालिब के बारे में कहा: (अगर तुम किसी मय्यत पर मातम करते हो, तो मोमिन के भाई—मोमिन पर रोओ) तज़किरत अल-ख़वास सिब्त इब्न अल-जौज़ी 31। 
अबुल जह्म बिन हुथाफ़ा कहा करता था: मैं गवाही देता हूँ कि अबू तालिब मोमिन थे। (अल-ग़दीर 7:399, अल-हुज्जह 268)। 
 

मशहूर सुन्नी उलमा की गवाही:- 
सयूती ने पूरी किताब लिखकर साबित किया कि अबू तालिब मोमिन थे। किताब है (बुग़यत अल-तालिब ली-ईमान अबी तालिब) (अल-ज़री’आ अल-तहरानी 2:511)। 
सिब्त इब्निल-जौज़ी ने अपनी मशहूर किताब तज़किरत अल-ख़वास में लिखा: अबू तालिब का जन्नत वालों में से होना तहेक़ीक़ का मोहताज नहीं, क्योंकि उसके सबूत बयान से बढ़कर हैं। नबी की कफ़ालत और मदद में उनकी कोशिशें, ज़ालिमों और ग़ैर-ईमानदारों के नुक़सान से नबी की हिफ़ाज़त की कोशिशें, नबी का उनके इंतिक़ाल पर गहरा ग़म, उनके और ख़दीजा की वफ़ात वाले साल को “साल-ए-हज़्न” नाम देना, लंबे अरसे तक उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ करना, और कोई शख़्स नबी की दुआ की क़बूलियत में शक नहीं करता—ख़ासकर उनकी दुआ पर इसरार के साथ) (तज़किरत अल-ख़वास पृ. 10 और 11)। 
अल-मुबर्रद, अल-कामिल के मुसन्निफ़, ने अबू तालिब के ईमान का ज़िक्र किया जैसा कि इब्न मा’द ने अल-हुज्जह 263 में नक़्ल किया। 
अबू जाफ़र अल-इस्काफ़ी (रसाइ’ल अल-जाहिज़ 32)। 
ज़ैनी दहलान ने कहा कि अबू तालिब और नबी के बारे में बहुत-सी रिवायतें वाज़ेह करती हैं कि अबू तालिब का दिल ईमान से भरा हुआ था। (असना अल-मतालिब पेज 6 और 7)। 
इब्न वह्शी अल-हनफ़ी ने एक फ़तवा (हुक्म) जारी किया कि अबू तालिब से नफ़रत करना कुफ़्र (इस्लाम का इनकार) है। यही फ़तवा मलिकी आलिम अली अल-अज्हवारी से भी आया (अबू तालिब अल-उरफ़ी 144)। 
अल्लामा अल-अमीनी ने अपनी दायरतुल-मआ’रिफ़ (अल-ग़दीर) में कुछ सुन्नी उलमा के नाम ज़िक्र किए जिन्होंने यह तस्लीम किया कि अबू तालिब मो’मिन थे; जैसे अबुल-क़ासिम अल-बल्ख़ी, अल-तलमसानी (अपनी किताब हाशियत अल-शिफ़ा’ में), अल-शा’रानी, सिब्त इब्न अल-जौज़ी, अल-क़ुर्तुबी, अल-सबकी, अबी ताहिर, अल-सयूती और अन्य। 
यह भी क़ाबिले-ज़िक्र है कि बहुत से नामवर सुन्नी और शिया उलमा ने इस मौज़ू पर किताबें लिखीं। इन किताबों में से बहुत-सी के नाम अल-ग़दीर (7:401,402,403) और अबू तालिब ब-हैदर अल-उरफ़ी (229,330,332,333) में दर्ज हैं। 
 

यह भी क़ाबिले-ज़िक्र है कि अल्लामा अमीनी ने अपनी किताब अल-ग़दीर (7:385-400) में अबू तालिब के ईमान और उनके अज़ीम मक़ाम पर चालीस सहीह अहादीस जमा कीं। 
अबू तालिब पर ख़ुलासा:- 
1- अबू तालिब के बयानात उनके ईमान-ए-इस्लाम की तस्दीक़ करते हैं। ऐसे बयानात सुन्नी मआख़िज़ में भी और शिया मआख़िज़ में भी नक़्ल हुए हैं। 
2- इस्लाम की हिफ़ाज़त में अबू तालिब की मुकम्मल हिमायत और बड़ी तकलीफ़ें उनके अज़ीम ईमान को उजागर करती हैं—इस्लाम और रसूल मुहम्मद (स.अ.व.आ.) पर। 
3- क़ुरआनी आयात जो उन लोगों की तारीफ़ करती हैं जिन्होंने मोमिनों को पनाह दी, उनकी मदद की, और फरमाती हैं कि (वही हक़ीक़ी मोमिन हैं) (अल-अनफ़ाल:74)। अबू तालिब उनमें सबसे बेहतर थे, क्योंकि वे ख़ुद नबी (स.अ.व.आ.) के सरपरस्त और मददगार थे। 
4- नबी का अबू तालिब की तारीफ़ करना और लगातार उनके लिए दुआ करना, यह दलील है कि अबू तालिब अज़ीम मो’मिन थे। 
5- अहले बैत (अ.) के मासूमीन के अक़वाल अबू तालिब के अज़ीम मक़ाम पर। उनके बयानात की ताईद क़ुरआन से होती है (अल-अहज़ाब:33)। 
6- मशहूर सहाबा और सुन्नी उलमा की गवाही कि अबू तालिब ईमान वाले थे। 
7- अल्लाह ने नबी को हुक्म दिया कि किसी मुसलमान औरत को गैर-मुसलिम शौहर के साथ क़ायम न रहने दिया जाए। फातिमा बिंत असद एक अज़ीम मो’मिना ख़ातून थीं और नबी ने उन्हें अपनी माँ की तरह क़रार दिया। वे अबू तालिब के साथ उनकी वफ़ात तक रहीं—इसका मतलब है कि अबू तालिब मो’मिन थे। 
8- इमाम अली (अ.) हर साल अब्दुल्लाह और आमिना (नबी के वालिदैन) की तरफ़ से, और अबू तालिब की तरफ़ से भी हज्ज के लिए लोगों को भेजा करते थे। हज्ज या कोई भी इस्लामी इबादत सिर्फ़ मुसलमान की तरफ़ से ही अदा की जा सकती है। 
9- अबू तालिब के ख़िलाफ़ तमाम रिवायतें सियासी मक़ासिद पर मबनी थीं और अहले बैत (अ.) के ख़िलाफ़ हुकूमतों ने शुरू कीं। इमाम अली (अ.) को दशकों तक मिंबरों से गाली दी गई और उनके वालिद इस दुश्मनी के बड़े शिकार बने। 
10- अबू तालिब के ख़िलाफ़ बयान करने वाले तमाम रावी या तो झूठे थे, या इमाम अली के दुश्मन थे, या सीधे/बिल-वास्ता अहले बैत (अ.) के दुश्मनों से जुड़े हुए थे। 
 

सय्यद-मोहम्मद मुसावी 
वर्ल्ड अहलुल बैत इस्लामिक लीग 
लंदन यूके wabil@wabil.com

नबी (स), जो वफ़ादारी, निष्ठा और इंसाफ़ का सबसे आला नमूना थे, कभी किसी का एहसान नहीं झुठलाते थे; इसलिए अबू तालिब की वफ़ात ने उन पर गहरा असर छोड़ा। वह बहुत रंज में डूब गए और अपने चचा की कमी का बहुत बड़ा ख़ला महसूस किया।
जैसे ही इमाम अली ने उन्हें इस बड़े हादसे की बुरी ख़बर दी, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
आँसू पोंछने के बाद, उन्होंने उदास आवाज़ में अली को हुक्म दिया: "जाओ, उन्हें ग़ुस्ल दो, कफ़न दो और दफ़न कर दो! अल्लाह उन्हें बख़्श दे और उन पर रहमत करे।"(हवाला अस-सीरा अन-नबविय्या, जिल्द 1 पृ.84, अल-ग़दीर, जिल्द 3 पृ.99, जिल्द 7 पृ.373, शैख़ुल अब्तह पृ.44, अल-हुज्जह पृ.67, मो'जमुल क़ुबूर, जिल्द 1 पृ.204, तज़किरतुल ख़वास पृ.10, ईमान अबू तालिब पृ.10 और अ'यान अश-शिया, जिल्द 39 पृ.161)
यह, कई दूसरी दलीलों के साथ, अबू तालिब के ईमान को साबित करने वाली एक और दलील थी।
नबी (स) ने अली को—और कोई भी यह नहीं सोच सकता कि अली मुसलमान नहीं थे—अपने वालिद को ग़ुस्ल देने का हुक्म दिया। (2) इस्लाम किसी मुसलमान को किसी ग़ैर-ईमानदार को ग़ुस्ल देने की इजाज़त नहीं देता।
नबी (स) ने अल्लाह से अपने चचा की मग़फ़िरत की दुआ की और अल्लाह से उनके लिए रहमत मांगी। यह यक़ीनी है कि नबी (स) काफ़िरों के बारे में बहुत सख़्त थे और सिर्फ़ मोमिनों के लिए रहमदिल और मेहरबान थे।
अली ने अपने वालिद को ग़ुस्ल देने के बाद, और इस्लाम के मददगार के जिस्म को लोगों के कंधों पर उठाए जाने के बाद, नबी (स) को बताने के लिए वापस आए। नबी (स) अपने चचा के जनाज़े के सामने खड़े हो गए ताकि उन्हें साथ चलकर रुख़्सत करें—तारीफ़ और तस्बीह के साथ—और इस्लाम पर किए हुए उनके एहसानात के बदले इख़लास का इज़हार करें। नबी (स) ने फरमाया: "ऐ चचा! अल्लाह की रहमत आप पर हो और आपको अच्छा बदला मिले। आपने मुझे पाला-पोसा और गोद लिया जब मैं बच्चा था, और आपने मेरी मदद की और मेरा साथ दिया जब मैं जवान हुआ।" (1)
नबी (स) जनाज़े में शरीक रहे यहाँ तक कि उनके चचा को दफ़न कर दिया गया, फिर उन्होंने फरमाया: "अल्लाह की क़सम, मैं अल्लाह से आपके लिए मग़फ़िरत की दुआ करूँगा और आपके लिए ऐसी शफ़ाअत करूँगा कि इंसान और जिन्न हैरान रह जाएँगे।" (2)
नबी (स) ने अपने चचा की फ़ज़ीलतें बयान कीं, अल्लाह से उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ की, और क़यामत के दिन उनके लिए ऐसी शफ़ाअत का वादा किया जो इंसानों और जिन्नों को हैरान कर देगी।
वह शफ़ाअत कैसी होगी?
चलो यह फ़र्ज़ कर लें कि अबू तालिब (ग़ैर-ईमानदार) होते—हालाँकि ऐसा था नहीं, और यह सच्चाई और इंसाफ़-पसंद ज़मीर कभी क़बूल नहीं करेगा—और उन्होंने नबी (स) की बिलकुल भी मदद न की होती, फिर भी नबी (स) उनके लिए शफ़ाअत करके उन्हें जन्नत में दाख़िल करवा देते। मगर ऐसी शफ़ाअत इंसान और जिन्न को हैरान नहीं करती, क्योंकि नबी (स) किसी ग़ैर-ईमानदार के लिए शफ़ाअत नहीं करते।
लेकिन अगर अबू तालिब को उनकी फ़ज़ीलतों और नेक आमाल के बदले जन्नत में दाख़िला मिलना हो, तो फिर नबी (स) की शफ़ाअत जन्नत में दाख़िले से भी बढ़कर किसी ऊँचे दर्जे के लिए होगी, और यही बात इंसान और जिन्न को हैरान कर देगी।
नबी (स), अपने चचा के एहसानात की वफ़ादारी के साथ-साथ, इस बयान के ज़रिये उन लोगों का रद्द भी चाहते थे जो ग़लती से यह समझते थे कि अबू तालिब ने मिशन पर ईमान नहीं लाया—सिर्फ़ इस वजह से कि कभी-कभी हालात मुनासिब न होने पर वे अपने ईमान को छुपा लेते थे—ताकि मिशन के हित में, बिना रुकावट, अपनी ज़िम्मेदारियाँ अदा कर सकें।
फिर नबी (स) ने इस अफ़सोस भरे कलाम को भी जोड़ा: "आह मेरे वालिद! आह अबू तालिब! ऐ चचा, मेरा ग़म कितना तल्ख़ है! मैं आपको कैसे भूल सकता हूँ! आपने मुझे पाला जब मैं बच्चा था, आपने मेरा साथ दिया जब मैं जवान हुआ, और मैं आपके लिए आँख की पुतली और जिस्म के लिए रूह की मानिंद था।"
यह नबी (स) की एक और दलील थी जो अबू तालिब के ईमान को साबित करती है, जब उन्होंने फरमाया: "... आपने मेरा साथ दिया जब मैं जवान हुआ ..."
इस नाज़ुक तअबी़र पर ग़ौर कीजिए: नबी (स) ने कहा कि उनके चचा के दिल में उनका मक़ाम आँख और रूह जैसा था। क्या ही सटीक तश्बीह है, जो दिखाती है कि अबू तालिब नबी (स) से कितनी मुहब्बत करते थे और उनके दिल में नबी (स) का कितना बड़ा मक़ाम था।
क्या ऐसा शख़्स, जो नबी (स) से इतना प्यार और इतना अदब रखता हो, नबी (स) के मिशन पर ईमान न लाता? यक़ीनन नहीं! यह नामुमकिन से भी परे है!
लेकिन अब वह क़िला, जो नबी (स) को क़ुरैश की शरारतों से बचाता था, ढह चुका था, जब वह दिफ़ा करने वाला शेर क़ब्र में उतार दिया गया। फिर क़ुरैश के दरिंदों ने रास्ता ख़ाली और बे-पहरा पाया, तो उन्होंने नबी (स) को हर तरह की तकलीफ़, अज़ीयत, मज़ाक़ और तल्ख़ तौहीन से सताना शुरू कर दिया; इसलिए अबू तालिब की सूरत नबी (स) के ज़हन से कभी मिट नहीं सकती थी—ख़ास तौर पर इस लम्हे में जब उन्हें उनकी शदीद ज़रूरत महसूस हो रही थी।
एक बार वह अपने घर आए और उनके बालों में मिट्टी लगी हुई थी, जो क़ुरैश के कुछ बदतमीज़ों ने उनके सर पर डाल दी थी। उनकी बेटी उदास हो गई और रोने लगी। वह अपने वालिद के सर से मिट्टी हटाने लगी। नबी (स) ने उसे तसल्ली दी और फरमाया: "मत रो मेरी बेटी! अल्लाह तुम्हारे वालिद की हिफ़ाज़त करता है।"
फिर अपने चचा अबू तालिब के गुज़रे दौर को याद करके—जब कोई उनके एक बाल को भी छूने की जुरअत न करता था— उन्होंने फरमाया: "क़ुरैश मुझे नुक़सान नहीं पहुँचा सके जब तक अबू तालिब ज़िंदा थे!"
हर मौके पर उनके मुंह से ऐसे कलिमात निकलते रहे जो उनके चचा की याद, उनकी चाहत, और उनके शानदार गुज़रे हुए दौर की ज़रूरत को बयान करते थे: "ऐ चचा! आपकी जुदाई मैंने कितनी अचानक महसूस की!"
अल्लाह ने अपने रसूल की आज़माइश का इरादा किया। यह मुक़द्दर था कि उन्हें दो ऐसे हादसों का सामना करना पड़े जो एक-दूसरे से भी ज़्यादा तल्ख़ थे। तक़रीबन उन्हीं दिनों में उन्होंने दो मददगार खो दिए, जो बार-बार उनके रंज-ओ-ग़म में उनके साथ रहे; अबू तालिब—अपनी क़ुव्वत और मज़बूती के साथ— जो क़ुरैश को नबी (स) को नुक़सान पहुँचाने की जुरअत से रोकते थे—और ख़दीजा, (1) अपने माल, मेहरबानी, जज़्बात, वफ़ादारी और फिदाकारी के साथ, जो बार-बार उनकी मुसीबतों में उनका सहारा बनीं, उनका दर्द हल्का करतीं और उनके ज़ख़्मों पर मरहम रखतीं।
उन्होंने दोनों को एक बहुत ही नाज़ुक वक़्त में खो दिया। उनके लिए वसी’ दुनिया तंग हो जाती, और वुजूद तारीक लगने लगता—अगर वह अल्लाह पर भरोसा न रखते और उसी पर तवक्कुल न करते— अल्लाह की मुकम्मल रहमत के साथ।
उन्होंने उन्हें उन सख़्त सालों के बाद खोया जो उन्होंने शि’ब में गुज़ारे, जब उनके चचा की उम्र अस्सी साल से ज़्यादा थी। वे साल फित्ना और जद्दोजहद से भरपूर थे, मगर उन्होंने अच्छे फल दिए और एक अज़ीम शान-ओ-शौकत छोड़ी, जो बाद में और भी बढ़ती चली गई।
दर्द के एक लम्हे में उनके मुंह से एक बोझिल और उदास कलाम निकला—मगर अल्लाह पर भरोसे से भरपूर, उसकी रज़ा की उम्मीद से लबालब, क़ज़ा-ओ-क़दर पर सब्र से भरा हुआ— और अपने रब से लोगों की ज़्यादतियों, तौहीन और तकलीफ़ों की शिकायत करते हुए: "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अपनी कमज़ोरी, अपने कम सहारों और लोगों के बीच अपनी बे-क़द्री की शिकायत करता हूँ! ऐ अल्लाह, सबसे बढ़कर रहम करने वाले! तू कमज़ोरों का रब है; तू मेरा रब है; तू मुझे किसके हवाले करता है? किसी ऐसे मुख़ालिफ़ के जो मुझ पर तिरछी नज़र डाले... या किसी दुश्मन के जो मुझ पर ग़ालिब आ जाए? अगर तू मुझसे नाराज़ नहीं है तो मुझे कोई परवाह नहीं... मगर तेरी आफ़ियत मेरे लिए बेहतर है... मैं तेरे चेहरे के नूर की पनाह लेता हूँ, जिससे अँधेरा रौशन हो जाता है और दुनिया-ओ-आख़िरत के मामले सँवर जाते हैं—कि तेरी नाराज़गी मुझ पर न आए और तेरा ग़ज़ब मुझ पर न उतरे। मैं तेरी मग़फ़िरत माँगता हूँ यहाँ तक कि तू मुझसे राज़ी हो जाए। कोई क़ुव्वत नहीं, कोई ताअत नहीं, मगर तेरे ही ज़रिये..."
अबू तालिब के बाद नबी (स) के लिए मक्का में कोई पनाह बाक़ी न रही कि वह उसकी तरफ़ रुजू करें। वह हिफ़ाज़ती क़िला, जो उन्हें आफ़ात से बचाता था, ढह गया और वह मददगार, जिसने उनके लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया था, अब ज़िंदा न रहा।
अपनी बेचैनी और दर्द के आलम में, फ़रिश्ते ने उन पर यह इलाही हुक्म नाज़िल किया: "इस (मक्का) से निकल जाओ! तुम्हारा मददगार वफ़ात पा चुका है।

हज़रात अबू तालिब (अ.स.) का ज़िक्र रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व.) की अहादीस में
अबू तालिब के हालात नबी (स) के ज़हन से कभी दूर न होते थे और न ही उनकी सूरत उनकी नज़र से ओझल होती थी। उन्होंने अपने चचा को एक लम्हे के लिए भी नहीं भुलाया। वह उन्हें याद रखते, उनकी तारीफ़ करते और उनकी अमर ख़िदमात और शानदार कारनामों पर उनके लिए दुआ करते, ताकि उस शख़्स के एहसान का हक़ अदा हो सके जिसने उन पर बहुत से एहसानात किए थे।
नबी (स) अपने ऊपर किए गए किसी भी एहसान से कभी बे-परवाह नहीं रहते थे। इसी लिए वह अक्सर उनका ज़िक्र करते—एक तरफ़ शुक्रगुज़ारी के लिए और दूसरी तरफ़ दूसरों को भी उसी राह पर चलने की तरग़ीब देने के लिए।
एक दिन एक बद्दू, जिसके चेहरे पर ग़म और उदासी की अलामतें थीं, नबी (स) के पास आया, इस उम्मीद के साथ कि कोई ऐसी चीज़ मिल जाए जो उसके कुछ रंज को हल्का कर दे। उसने नबी (स) से अर्ज़ किया: "ऐ रसूल-ए-ख़ुदा! हम आपके पास आए हैं, हमारे पास न कोई ऊँट है और न ही हमारे बच्चे खाने को कुछ पा सकते हैं।" फिर उसने शेर के कुछ अशआर पढ़े:
हम आपके पास आए हैं और हमारी कुंवारी की छाती सूख गई है, और माँ ने अपने बच्चे को नज़रअंदाज़ कर दिया है। (1)
बच्चे के हाथ ढीले पड़ गए और वह ज़मीन पर बेहोश हो गया; न वह कुछ कर सकता है, न हिल सकता है। हमारे पास खाने को सिर्फ़ हँडस (कड़वा फल), ख़ून और ऊँटों के बाल हैं।
हमारे पास आपके सिवा कोई नहीं कि हम उसकी तरफ़ पनाह लें।
क्या लोग नबियों के सिवा किसी और की तरफ़ रुजू करते हैं?
रहमत वाले नबी (स) इस दुखद मंज़र से बहुत मुतअस्सिर होकर खड़े हो गए और क़दम घसीटते हुए मिम्बर की तरफ़ चले। अल्लाह की हम्द के बाद, उन्होंने उससे दुआ की: "ऐ अल्लाह! हम पर बहुत ज़्यादा बारिश नाज़िल कर—बहती हुई, भरपूर— ताकि पौधे उगें, थन भर जाएँ, और तू ज़मीन को उसकी मौत के बाद ज़िंदा कर दे... और इसी तरह तुम उठाए जाओगे।"
जैसे ही नबी (स) ने दुआ पूरी की, आसमान रोशन होने लगा और ज़मीन ने भरपूर बारिश पाना शुरू कर दिया।
एक आदमी नबी (स) के पास रोता हुआ आया और बोला: "ऐ रसूल-ए-ख़ुदा! सैलाब! सैलाब!"
नबी (स) ने अपने हाथ—जिनकी उम्मीदें कभी रद्द न होती थीं—आसमान की तरफ़ उठाए और उनके होंठ—जिनकी दुआ अल्लाह के यहाँ कभी नामुराद न होती थी—ने कहा: "हमारे इर्द-गिर्द हो और हम पर न हो!"
घने बादल हटने लगे और लोगों के दिलों से दहशत भी साथ ले गए।
नबी (स) खुश हुए और उनके होंठों पर मुस्कराहट आ गई, लेकिन उन्हें क़रीबी गुज़रा हुआ अतीत याद आ गया और उन्होंने आह भरी: "अबू तालिब क्या ही शख़्स थे! अगर वह ज़िंदा होते तो खुश होते। हमें उनके शेर कौन सुनाएगा?"
उनके चचेरे भाई इमाम अली खड़े हुए और अर्ज़ किया: "ऐ रसूल-ए-ख़ुदा! शायद आप उनके इस शेर की तरफ़ इशारा कर रहे हैं:
और एक सफ़ेद-चेहरा, जिसके चेहरे के वसीले से दुआ की जाती है, ताकि बादल ख़ैर लाएँ।
वह यतीमों की पनाह और बेवाओं का निगहबान है।"
नबी (स) ने फरमाया: "हाँ।" फिर अली अपने वालिद के कसीदे के और अशआर पढ़ते रहे और नबी (स) मिम्बर पर खड़े-खड़े अपने मुख़्लिस चचा के लिए अल्लाह से मग़फ़िरत की दुआ करते रहे।
क्या हम यहाँ रुक जाएँ कि नबी (स) ने वफ़ात के बाद भी अपने चचा के लिए मग़फ़िरत की दुआ की?
नबी (स) हर मौके पर अपने चचा को याद करते थे, क्योंकि उनका ज़हन हमेशा उनकी नेक ख़िदमात में मशग़ूल रहता था और वह उनके बड़े-बड़े कारनामों को याद रखते थे। बहुत बार नबी (स) अपने चचा की लायक़-ए-तारीफ़ अल्फ़ाज़ में तारीफ़ करते, और यक़ीनन नबी (स) किसी ऐसे शख़्स की तारीफ़ नहीं करते जो इसके क़ाबिल न हो। जब अली अपने वालिद का शेर पढ़ते, तो नबी (स) उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ जारी रखते, और यक़ीनन नबी (स) किसी ऐसे शख़्स के लिए मग़फ़िरत की दुआ नहीं करते जो ईमान वाला न हो।
नबी (स) ने फरमाया: "किसी शख़्स से (उसकी वफ़ात के बाद) वफ़ा करना, उसके बच्चों से वफ़ा करना है।" और नबी (स) से बढ़कर कौन होगा जो अपने ही फरमान पर सबसे बढ़कर अमल करे?
नबी (स) ने अपने चचा अबू तालिब से वफ़ा उनके बेटे अली से वफ़ा करके निभाई।
एक बार उन्होंने इमाम अली से फरमाया: "मेरे मक़ाम का तुमसे ज़्यादा हक़दार कोई नहीं; तुम सबसे पहले मुसलमान हो, तुम मेरे चचेरे भाई और मेरे दामाद हो। तुम्हारे पास फ़ातिमा हैं—ईमान वाली औरतों की सरदार। और इससे पहले तुम्हारे वालिद, क़ुरआन के नाज़िल होने के दौर में, मेरे सरपरस्त और मददगार थे, और मैं उनके बाद भी उनके औलाद का बहुत ख़याल रखकर उनके हक़ को अदा करने में बेहद सावधान हूँ।" (1)
देखा आपने, नबी (स) के दिल में अबू तालिब का क्या मक़ाम था? नबी (स) ने क़ुरआन के नुज़ूल के दौरान अबू तालिब के हालात को अली की फ़ज़ीलतों में से एक फ़ज़ीलत क़रार दिया। उन्होंने समझा कि यह उन पर लाज़िम करता है कि अली को अपने मक़ाम—मक़ाम-ए-नुबूवत—का सबसे ज़्यादा हक़दार ठहराएँ। और उन्होंने इस फ़ज़ीलत को अली की दूसरी फ़ज़ीलतों के साथ जोड़ दिया: इस्लाम में सबक़त, क़राबत और दामादी...
नबी (स) ने अली को बताया कि वह अबू तालिब का एहसान इस तरह अदा करते रहेंगे कि उनके बेटों का बहुत ख़याल रखेंगे।
इसलिए नबी (स) का जानशीन अली के सिवा कोई नहीं हो सकता था, क्योंकि इन तमाम फ़ज़ीलतों के साथ उनसे बढ़कर कोई हक़दार था ही नहीं!
फिर एक बार उन्होंने अकील से फरमाया: "ऐ अबू यज़ीद, मैं तुमसे दो बार मुहब्बत करता हूँ; एक तुम्हारी मेरे साथ क़राबत की वजह से और दूसरी इस वजह से कि मैं जानता हूँ मेरे चचा तुमसे कितनी मुहब्बत करते थे।" (1)
नबी (स) को अपने चचा से कैसी अज़ीम मुहब्बत थी! वह अकील से क़राबत की वजह से मुहब्बत करते थे और दूसरी मुहब्बत इस वजह से कि उन्हें मालूम था अबू तालिब अकील से बहुत ज़्यादा मुहब्बत करते थे। उन्होंने समझा कि जिससे उनके चचा मुहब्बत करते हों, उससे मुहब्बत करना उन पर लाज़िम है।
यह एक साफ़ दलील है जो हमें बताती है कि नबी (स) को अपने चचा अबू तालिब से कितनी बड़ी मुहब्बत थी।
बद्र के दिन, जब जंग अपने जोश में थी, अबू उबैदा बिन अल-हारिस बिन अल-मुत्तलिब मुशरिकीन से भिड़े, अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिए। जब उत्बा बिन रबीअ— या शैबा, जैसा कि बयान किया गया—ने उनकी टाँग काट दी, तो अल्लाह की तलवारों में से दो खिंची हुई तलवारें—अली और हमज़ा—लपके, दुश्मन को अपने अटल वारों से ढेर किया, अपने साथी को बचाया और उसे उस छप्पर (अरिश) तक उठा लाए जहाँ नबी (स) मौजूद थे।
उबैदा की कटी हुई, बहती हुई टाँग ने भी उसे इससे नहीं रोका कि वह आँखें खोलकर काँपती हुई आवाज़ में नबी (स) से कहे: "ऐ रसूल-ए-ख़ुदा! अगर अबू तालिब ज़िंदा होते, तो जानते कि उन्होंने सच कहा था जब उन्होंने मुशरिकीन को मुख़ातिब करके कहा था:
अल्लाह के घर की क़सम, तुमने झूठ कहा है!
हम मुहम्मद को हरगिज़ नहीं छोड़ेंगे; हम उनके लिए जद्दोजहद और क़िताल करेंगे, हम उनका साथ देंगे यहाँ तक कि उनके इर्द-गिर्द क़त्ल हो जाएँ।
उनके लिए हम अपनी बीवियों और बच्चों की परवाह नहीं करते।"
नबी (स) अपने चचा के ज़िक्र से मुतअस्सिर हुए और अबू उबैदा के साथ-साथ उनके लिए भी अल्लाह से मग़फ़िरत की दुआ करने लगे।
जब क़ुरैश शिकस्त खा गए और जंग थम गई, तो नबी (स) ने मुशरिकीन की लाशों पर तफ़क्कुर भरी नज़र डाली और कुछ याद आया। अबू बक्र उनके पास थे। नबी (स) ने अबू बक्र से फरमाया: "काश अबू तालिब ज़िंदा होते! वह जानते कि हमारी तलवारों ने सरदारों के साथ क्या किया है।" (1) उन्होंने अबू तालिब के कसीदे के इस शेर की तरफ़ इशारा किया:
ख़ाना-ए-ख़ुदा की क़सम! तुमने झूठ कहा।
अगर मेरी पेशगोई संगीन साबित हो, तो हमारी तलवारें बड़ों को चीर देंगी।
एक बार अल-अब्बास ने नबी (स) से पूछा: "ऐ रसूल-ए-ख़ुदा! क्या आप अबू तालिब के लिए दुआ करते हैं?"
नबी (स) ने उन्हें जवाब दिया: "मैं उसके लिए अपने रब से हर भलाई की उम्मीद रखता हूँ।"
कुतुब-ए-हदीस में एक सही रिवायत आई है कि नबी (स) ने फरमाया: "क़ियामत के दिन मैं अपने वालिद, अपनी वालिदा, अपने चचा—अबू तालिब—और अपने एक भाई के लिए शफ़ाअत करूँगा, जो दौर-ए-जाहिलियत में रहा था।"
यह रिवायत मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से बयान की गई है मगर उसका मफ़हूम एक ही है।
इन रिवायात ने हम पर यह लाज़िम किया कि हम नबी (स) के मददगार के ईमान को तस्लीम करें— जिसका नबी (स) ज़िक्र नहीं करते थे मगर यह कि सबसे बेहतरीन अल्फ़ाज़ में उसकी तारीफ़ करते। वह अक्सर अपने रब से उसके लिए दुआ करते थे। यक़ीनन नबी (स) कभी अपनी ख़्वाहिश की पैरवी नहीं करते थे, बल्कि हर एक को उसके मुनासिब मक़ाम पर रखते थे, चाहे अच्छा हो या बुरा।
अगर नबी (स) ने अपने चचा की तारीफ़ की और अल्लाह से उनकी मग़फ़िरत की दुआ की, और उनके चचा मुसलमान न होते—जो नबी (स) की शान से बहुत दूर है— तो फिर नबी (स) अल्लाह की नाफ़रमानी करते—अल्लाह पनाह!—जैसा कि बहुत सी आयात में है, जैसे:
1. (तुम ऐसे लोगों को नहीं पाओगे जो अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखते हों, कि वे उन लोगों से दोस्ती करें जो अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालफ़त करते हैं, चाहे वे उनके बाप हों या उनके बेटे या उनके भाई या उनके रिश्तेदार; यही वे हैं जिनके दिलों में उसने ईमान जमा दिया) 58:22।
क़ुरआन-ए-मजीद ने इस बात की नफ़ी की कि अल्लाह और क़ियामत के दिन पर ईमान रखने वाले उन लोगों से ज़रा भी मुहब्बत रखें जो अल्लाह और उसके रसूल से दुश्मनी रखते हों, भले ही उनके बीच क़रीबी रिश्ता ही क्यों न हो।
अल्लाह ने इस बात की तस्दीक़ की कि एक दिल में उस पर ईमान और कुफ़्फ़ार से मुहब्बत जमा नहीं हो सकती। बेहतर होगा कि इस आयत की तफ़्सीर में अज़-ज़मख़शरी की बात नक़्ल की जाए: "यूँ मालूम होता है कि ईमान वाले लोगों का मुशरिकों से मुहब्बत करना नामुमकिन है। इसका मक़सद यह है कि मोमिन अल्लाह के दुश्मनों से पूरी तरह किनारा करें और उनके साथ किसी भी तरह की मेल-जोल से बचें। अल्लाह ने यह कहकर इसकी ताअकीद की: (चाहे वे उनके बाप हों) और: (यही वे हैं जिनके दिलों में उसने ईमान जमा दिया), और अपने इस क़ौल: (शैतान की जमाअत) को अपने इस क़ौल: (अल्लाह की जमाअत) से मुक़ाबला करके, तुम ईमान में इससे बढ़कर वफ़ादारी नहीं पाओगे कि अल्लाह के चाहने वालों से मुहब्बत की जाए और अल्लाह के दुश्मनों से बरअत इख़्तियार की जाए। हक़ीक़त में यही सबसे ख़ालिस ईमान है।"
फिर उन्होंने नबी (स) से मंसूब एक हदीस बयान की: "ऐ अल्लाह! किसी फ़ासिक़ या काफ़िर को मेरी मुहब्बत पाने का मौक़ा न दे, क्योंकि जो मुझ पर नाज़िल हुआ है, उसमें यह आयत है: (तुम ऐसे लोगों को नहीं पाओगे जो अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखते हों कि वे उन लोगों से दोस्ती करें जो अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालफ़त करते हैं... यही वे हैं जिनके दिलों में उसने ईमान जमा दिया)।"
मज्मअुल-बयान के मुसन्निफ़ ने कहा: "इसका मतलब यह है कि कुफ़्फ़ार से मुहब्बत और ईमान एक दिल में जमा नहीं हो सकते।" (2)
2. (ऐ ईमान वालो! मेरे दुश्मन और अपने दुश्मन को दोस्त न बनाओ— क्या तुम उन्हें मुहब्बत देते हो जबकि वे उस हक़ का इंकार करते हैं जो तुम्हारे पास आया है) 60:1।
इस आयत में अल्लाह ने मोमिनों को मना किया कि वे कुफ़्फ़ार को दोस्त बनाएं, उनसे मुहब्बत रखें, उनकी मदद करें या उनसे मदद चाहें। 3. (ऐ ईमान वालो! अपने बाप और अपने भाइयों को सरपरस्त न बनाओ अगर वे ईमान पर कुफ़्र को तरजीह दें; और तुम में से जो उन्हें सरपरस्त बनाए, वही ज़ालिम हैं। कह दो: अगर तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीवियाँ, तुम्हारे क़रीबी रिश्तेदार, वह माल जो तुमने कमाया है, वह कारोबार जिसकी मंदी से तुम डरते हो, और वे घर जिन्हें तुम पसंद करते हो—अल्लाह, उसके रसूल और उसके रास्ते में जिहाद से ज़्यादा अज़ीज़ हों, तो इंतज़ार करो यहाँ तक कि अल्लाह अपना हुक्म ले आए; और अल्लाह फ़ासिक़ क़ौम को हिदायत नहीं देता) 9:23-24।
इन आयात में अल्लाह ने मोमिनों को मना किया कि वे अपने बापों और भाइयों को सरपरस्त बनाएं अगर वे काफ़िर हों। ईमान, मोमिन और काफ़िर के दरमियान जज़्बाती रिश्ता रोक देने का सबब बनता है, भले ही काफ़िर उसका बाप या भाई ही क्यों न हो जो सबसे क़रीबी रिश्तेदार होते हैं। फिर अल्लाह ने बताया कि कुफ़्फ़ार से मुहब्बत करना या उन्हें सरपरस्त बनाना मोमिन को दायरा-ए-ईमान से निकालकर ज़ालिमों में शामिल कर देता है। फिर अल्लाह ने उन्हें अपने अज़ाब की धमकी दी, क्योंकि वे सरकश लोग हैं।
अज़-ज़मख़शरी ने इन आयात की तफ़्सीर में बयान किया कि नबी (स) ने फरमाया: "तुम में से कोई मोमिन नहीं बनता जब तक वह अल्लाह के लिए मुहब्बत न करे और अल्लाह के लिए नफ़रत न करे; वह अल्लाह के लिए अपने से दूर वाले से भी मुहब्बत करता है और अपने से क़रीबी वाले से भी नफ़रत करता है।"
यह बहुत सख़्त आयत है, बल्कि शायद सबसे सख़्त—जो लोगों को दीन में नरमी दिखाने पर मलामत करती है... सबसे मुत्तक़ी लोग भी ख़ुद को परखें: क्या वे अल्लाह के अहकाम की पाबंदी में सख़्त हैं? क्या वे अल्लाह के दीन को अपने बापों और बच्चों पर तरजीह देते हैं...?
मज्मअुल-बयान के मुसन्निफ़ ने कहा: "दीन का मामला क़राबत पर मुक़द्दम है, चाहे इससे वालिदैन से रिश्ता टूट जाए, क्योंकि ईमान वाला ग़ैर-रिश्तेदार, बे-ईमान रिश्तेदार से बेहतर है। अल-हसन ने कहा: जो मुशरिकों की पैरवी करे, वह मुशरिक है।" (3)
4. (ऐ ईमान वालो! तुम में से जो अपने दीन से फिर जाए, तो अल्लाह एक क़ौम लाएगा: वह उनसे मुहब्बत करेगा और वे उससे मुहब्बत करेंगे; मोमिनों के सामने नरम, और काफ़िरों के सामने सख़्त) 5:54।
5. (और अगर वे अल्लाह, नबी और जो उस पर नाज़िल हुआ उस पर ईमान लाते, तो उन्हें दोस्त न बनाते; मगर उनमें से ज़्यादातर फ़ासिक़ हैं) 5:81।
अल्लाह ने ईमान की शरायत में से यह रखा कि मोमिनों के बीच दिली लगाव और आपसी उन्सियत एक हाथ या मज़बूत इमारत की तरह हो; हर हिस्सा दूसरे को कसकर थामे।
कुफ़्फ़ार के मुक़ाबले में कड़ाई और सख़्ती उन्हें इससे रोकेगी कि वे मोमिनों की मज़बूत बुनियाद को रौंद दें और उनकी पुख़्ता वहदत को तोड़ दें।
इब्न अब्बास ने कहा: "तुम मोमिनों को एक-दूसरे के लिए ऐसे मेहरबान और नरम पाओगे जैसे बेटा अपने बाप के लिए और जैसे गुलाम अपने मालिक के लिए; और तुम उन्हें कुफ़्फ़ार के लिए ऐसे सख़्त और खुरदरा पाओगे जैसे दरिंदा अपने शिकार के लिए।"
दूसरी आयत में अल्लाह ने उन लोगों का ईमान नकार दिया जो कुफ़्फ़ार को दोस्त बनाते हैं, और इस तरह वे अल्लाह के ग़ज़ब और अज़ाब के मुस्तहिक़ ठहरे। वे जहन्नम में हमेशा रहेंगे।
"कुछ मोमिनों का कुफ़्फ़ार की मदद करना, उनकी मुनाफ़क़त का काफ़ी सबूत है और यह कि उनका ईमान सच्चा नहीं; बल्कि वे अपने कुफ़्र और निफ़ाक़ पर क़ायम हैं।"
6. (मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं, और जो उनके साथ हैं वे कुफ़्फ़ार पर सख़्त, और आपस में रहमदिल हैं) 48:29।
मुफ़स्सिरों ने इस आयत के बाद अल-हसन का यह क़ौल ज़िक्र किया: "वे—मोमिन—कुफ़्फ़ार और मुशरिकों से इस हद तक अलग रहे कि वे कोशिश करते थे कि उनके कपड़े उनके अपने कपड़ों को न छुएँ और उनके बदन उनके अपने बदनों को न छुएँ।"
अज़-ज़मख़शरी ने कुछ अक़वाल के बाद कहा: "हर दौर में मुसलमानों पर लाज़िम है कि वे इस बरअत पर बहुत ध्यान दें। उन्हें चाहिए कि जो लोग उनके दीन और अक़ीदे पर ईमान नहीं रखते, उनके साथ सख़्ती बरतें और उनसे दूरी इख़्तियार करें। और उन्हें चाहिए कि अपने इस्लामी भाईयों के लिए मेहरबान रहें, उनके साथ भलाई करें, हर नुक़सान के मुक़ाबले में उनका दिफ़ा करें, उनकी मदद करें, उनके लिए नरमी रखें, और उनके साथ बेहद शाइस्ता और सच्चे रहें।" (1)
लेकिन अफ़सोस कि मुसलमानों ने उलटा किया। गोया उनके ज़ेहन में आयत उलट गई हो। वे अपने मुख़ालिफ़ों के लिए नरम हो गए और आपस में सख़्त और शदीद। उनमें से कुछ ने अपने दीन के भाइयों को अपने दुश्मनों की ख़ातिर क़ुर्बान कर दिया। और कुछ ने एक-दूसरे के साथ ऐसा बुरा सुलूक किया कि दुश्मन भी न करता। अफ़सोस कि वे अपने दीन के दुश्मनों के आगे झुक गए—चाहे वे उसी मुल्क में हों या बाहर; मग़रिब में हों या मशरिक में—और उन्हें अपने ही लोगों से ज़्यादा चाहने लगे। उन्होंने अपने निजी मफ़ाद हासिल करने के लिए—जो हक़ीक़त में उनके दीन के दुश्मन के मफ़ाद थे— जुर्म और ख़यानत में हद से बढ़ गए। उन्होंने अपने नागरिकों को क़ुर्बान किया और अपनी क़ौम को घिनौने मुस्तअमिर के लिए लज़ीज़ निवाला बनाकर पेश कर दिया।
ऐसे लोग आख़िरकार अपने गुनाहों के बदले बुरी ही सज़ा पाएँगे।
यही वजह है कि उम्मत के रिश्ते टूट गए और वहदत बिखर गई। इख़्तिलाफ़ की आग हर चीज़ में यूँ रेंग गई जैसे सूखी लकड़ी में भड़कती लौ।
अब चलिए ऊपर बयान की गई आयात के मौज़ू पर वापस आते हैं। क्या मुमकिन था कि नबी-ए-इस्लाम किसी मुशरिक काफ़िर पर सिर्फ़ इस वजह से नरमी और रहमत करें कि वह उनका रिश्तेदार है, और उन तमाम आयात का इनकार कर दें जो आसमान से उन पर नाज़िल हुई थीं?
क्या वह यह कबूल करते कि एक मुशरिक काफ़िर उनकी हिमायत करे, हालाँकि उन्होंने ख़ुद फरमाया था: "ऐ अल्लाह! किसी फ़ासिक़ या काफ़िर को मेरी मुहब्बत पाने का मौक़ा न दे" ...?
हक़ीक़त यह थी कि यह शख़्स—जिसने नबी (स) की मदद की, हिमायत की और उन पर एहसान किए— फिर नबी (स) का उस पर शुक्रगुज़ार होना, उससे मुहब्बत करना, और बार-बार उसकी तारीफ़ करना... यह हक़ीक़त उन आयात के मआनी से टकराती नज़र आती—जो धमकी, सख़्ती, इंजार और ग़ज़ब से भरी हुई थीं।
यह बात उसी सूरत में सही ठहर सकती थी जब हम (अल्लाह पनाह!) यह कहें कि नबी (स) ने अपने रब के अहकाम की परवाह न की जो उन पर नाज़िल हुए थे, और उन्होंने बेपरवाही से क़ुरआन-ए-मजीद के उसूलों की मुख़ालफ़त कर दी! हम यह बात इसलिए कहेंगे ताकि जालसाज़ों के इस क़ौल की तौजीह हो सके कि अबू तालिब काफ़िर थे— हालाँकि यह साबित हो चुका कि उन्होंने नबी (स) और उनके मिशन की मदद और हिफ़ाज़त बहुत मज़बूती और बहादुरी से की।
और चूँकि कोई भी यह कहने की जुरअत नहीं कर सकता, इसलिए आदमी मजबूरन यह इक़रार करेगा कि अबू तालिब मोमिन थे—जब बे-शुब्हा यह साबित हो गया कि नबी (स) अक्सर उनके लिए दुआ करते, उनकी तारीफ़ करते और जब भी उनका ज़िक्र आता उन्हें बुज़ुर्गी और शरफ़ देते थे।
यह सब—अबू तालिब के अज़ीम कारनामों और वजूद के सफ़्हे पर छोड़े गए उनके असर से हटकर भी— अबू तालिब के ईमान के नूर को यक़ीन की किरणों से चमकाता है।

हज़रत अबू तालिब (अ) का इमाम अली (अ) की कहावतों में ज़िक्र
जब हम इमाम अली (स) के अपने वालिद के बारे में अक़वाल की तरफ़ आते हैं, तो हमें बहुत से सबूत मिलेंगे जो उनके वालिद के सच्चे ईमान की तस्दीक़ करते हैं ताकि उनके बे-ईमानी के बारे में गढ़े हुए तमाम झूठ रद्द हो जाएँ।
जब उनके वालिद ने आँखें बंद कीं और उनकी रूह बेहतर जहान की तरफ़ बुलंद हुई, तो वह नबी (स) के पास आए और ग़मगीन ख़बर दी। नबी (स) ने उन्हें बताया कि क्या करना है। उन्होंने अपने वालिद के जिस्म को धोया (ग़ुस्ल दिया), उसे ख़ुशबू लगाई, और कफ़न पहनाया; फिर नबी (स) के हुक्म के मुताबिक़ अपने वालिद को क़ब्र तक लेकर गए।
क्या ये काम मुसलमानों के सिवा किसी और के लिए किए जा सकते थे? मुझे नहीं मालूम मैं क्या कहूँ...!
फिर उन्होंने नबी (स) को देखा कि वे उनके वालिद के जिस्म के सामने खड़े हैं— सबसे बेहतरीन अल्फ़ाज़ में उनकी तारीफ़ कर रहे हैं, उनकी आँखों से आँसू बह रहे हैं, और सीने में दर्द की आहें अटक रही हैं।
दिन गुज़रे। नबी (स) बहुत परेशानी में आ गए। सख़्त हालात हर तरफ़ से उन्हें घेरने लगे। वह निहायत नाज़ुक हालत में पहुँच गए। उन्होंने अपने मेहरबान चचा के बड़े नुक़सान पर शिकवा और दर्द की आहें भरनी शुरू कर दीं।
अबू तालिब की तस्वीर अली के ज़ेहन से गुज़री। उन्हें अपने वालिद का मिशन के लिए जुरअतमंदाना मौक़िफ़ और यह याद आया कि उन्होंने नबी (स) का कैसे दिफ़ा और हिफ़ाज़त की थी। उनके जज़्बात उबल पड़े और अंदरूनी दर्द का काँटा चुभने लगा। आँसू उनकी आँखों से बहने लगे और वे यह अशआर पढ़ने लगे:
ऐ अबू तालिब! पनाह माँगने वालों की पनाह!
बंजर ज़मीनों के लिए बारिश!
तारीकी में नूर!
तुम्हारा जुदा हो जाना हमें तोड़ गया।
अल्लाह तुम पर रहमत करे, अल्लाह तुमसे राज़ी हो; तुम अल-मुस्तफ़ा के लिए बेहतरीन चचा थे।
साल गुज़रते रहे और बनी उमय्या ने झूठी रिवायात गढ़ने की पूरी कोशिश की, जिनकी लपटें इमाम अली (स) तक जा पहुँचीं।
एक दिन इमाम अली मस्जिद के सहन में लोगों से घिरे बैठे थे कि उन में से एक आदमी—जिसने गढ़ी हुई रिवायात सुन-सुनकर सच और झूठ में उलझन पाल ली थी— उनके पास आया और बोला: "ऐ अमीरुल मोमिनीन! आप उस बुलंद मक़ाम पर हैं जिसमें अल्लाह ने आपको रखा है, जबकि आपका बाप जहन्नम में अज़ाब में है... ?"
इमाम अली का चेहरा ग़ुस्से से सुर्ख़ हो गया कि बनी उमय्या कैसी बातें गढ़ रहे थे। उन्होंने उस आदमी से कहा: "चुप रहो! अल्लाह तुम्हारा मुँह बंद करे! उस अल्लाह की क़सम जिसने मुहम्मद को नबी बनाकर भेजा, अगर मेरा बाप ज़मीन पर हर गुनाहगार के लिए शफ़ाअत करे, तो अल्लाह उसकी शफ़ाअत क़बूल करेगा! क्या मेरा बाप जहन्नम में अज़ाब में होगा, जबकि उसका बेटा जन्नत और जहन्नम के दरमियान बाँटने वाला है? क़ियामत के दिन अबू तालिब का नूर तमाम मख़लूक़ के नूरों को बुझा देगा सिवाय पाँच नूरों के..."
ऐसा शख़्स—इमाम अली जैसी बुलंद शख़्सियत—अपने ऊँचे मक़ाम, सिफ़ात, फ़ज़ाइल और कमालात के साथ, जो ईमान की बुलंदी पर थे और जिन्हें कभी शिर्क की कदूरत न लगी, किस तरह अपने वालिद से मुतअस्सिर हो सकते थे अगर वालिद मोमिन न होते या मुशरिक होते? क्योंकि ऐसी बात बेटे की पाकीज़ा सिफ़्हा पर दाग़ होती, उसकी फ़ज़ीलत को कम करती और उसके ऊँचे मक़ाम को चोट पहुँचाती।
एक बार फिर इमाम अली ने कहा: "अल्लाह की क़सम! न मेरे बाप ने, न मेरे दादा—अब्दुल मुत्तलिब, हाशिम या अब्द मनाफ़—ने कभी किसी बुत की इबादत की। वे ख़ाना (काबा) की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ अदा करते थे, हज़रत इब्राहीम (स) के दीन पर, जिसके अक़ीदे पर वे क़ायम थे।" (1)
अबुत-तुफ़ैल आमिर बिन वाइला ने एक रिवायत बयान की कि इमाम अली ने कहा: "जब मेरे बाप का इंतेक़ाल हो रहा था, नबी (स) उनके पास थे। फिर नबी (स) ने मुझे मेरे बाप के बारे में ऐसी बात बताई जो मेरे लिए इस दुनिया और इसकी तमाम चीज़ों से बेहतर थी।"
एक और मौक़े पर उन्होंने बयान किया कि उनके वालिद अबू तालिब ने अपने ईमान का एलान खुलकर क्यों नहीं किया: "अल्लाह की क़सम! अबू तालिब (अब्द मनाफ़ बिन अब्दुल मुत्तलिब) मोमिन मुसलमान थे, मगर उन्होंने अपना ईमान छुपाए रखा, क्योंकि उन्हें डर था कि क़ुरैश बनी हाशिम को नुक़सान न पहुँचा दें।"
फिर एक बार उन्होंने कहा: "अबू तालिब उस वक़्त तक नहीं फौत हुए जब तक उन्होंने नबी (स) को अपने से राज़ी न कर लिया।"
ये थे इमाम अली के अपने वालिद के बारे में अक़वाल। ये उनके वालिद के ईमान की तस्दीक़ के लिए काफ़ी दलीलें हैं। इमाम अली ने ये बातें जान-बूझकर बयान कीं जब उन्होंने वह झूठ सुने जो उनके वालिद पर कुफ़्र का इल्ज़ाम लगाते थे।
क्या इमाम अली ने यह सब सिर्फ़ बाप-बेटे के जज़्बे या क़राबत की हमीयत में कहा, हक़ीक़त और सच की परवाह किए बग़ैर?
मैं नहीं समझता कि जो शख़्स इस्लाम पर सिद्क़ से ईमान रखता हो, वह यह कहने की जुरअत करेगा, क्योंकि वह मुसलमानों के इमाम और इस्लाम के सच्चे वली के मुक़द्दस मक़ाम की बे-हुरमती करेगा; और साथ ही नबी (स) की उन रिवायात के भी ख़िलाफ़ होगा जो इमाम अली के फ़ज़ाइल के बारे में बयान हुई हैं।
अली हर हाल में हक़ से कभी न हटते, चाहे जो कुछ भी हो जाए। नबी (स) ने फरमाया: "अली हक़ के साथ है और हक़ अली के साथ है। वह उसके साथ घूमता है जहाँ भी अली घूमे।"
हमें नबी (स) की हर उस रिवायत का ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं जो उन्होंने अपने वफ़ादार वली अली के बारे में फरमाई, क्योंकि ये रिवायात सूरज की रौशनी की तरह वाज़ेह थीं।
अगर कोई शख़्स इमाम अली के अक़वाल की तौजीह यह कहकर करे कि वे सिर्फ़ क़राबत की वजह से थे, तो वह यक़ीनन नबी (स) पर भी एतराज़ करेगा—क्योंकि नबी (स) ने ऐसे शख़्स की तारीफ़ की होगी जिस पर जज़्बा-ए-क़राबत ईमान पर ग़ालिब आ गया हो, जो दीन पर रिश्तेदारी को तरजीह देता हो, और नतीजतन बातिल की पैरवी करके हक़ को बदल देता हो! इमाम अली पर यह शरई फ़र्ज़ था कि अगर उनके वालिद मुशरिक हालत में मरे होते, तो वे उनसे बेज़ारी इख़्तियार करते। तब उनके वालिद दुश्मन-ए-ख़ुदा समझे जाते, और इमाम अली को कभी उनकी तारीफ़ नहीं करनी चाहिए थी; क्योंकि वालिद का हक़ कभी अल्लाह के हक़ से ऊपर नहीं हो सकता। उन्हें अपने वालिद नबी इब्राहीम (स) की सुन्नत पर चलना चाहिए था, जैसा कि क़ुरआन ने कहा: (...फिर जब उस पर ज़ाहिर हो गया कि वह अल्लाह का दुश्मन है, तो उसने उससे बेज़ारी जता दी) 9:114।
एक सच्चे मोमिन के लिए यह मुमकिन नहीं कि वह अल्लाह के दुश्मन की पैरवी करे, बल्कि अगर वह अल्लाह का क़ुर्ब चाहता है तो उसे अपने रब के अहकाम की पैरवी करनी होगी।
तमाम मुसलमानों में, कुल मिलाकर, अली के ईमान और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत में कोई उनके बराबर नहीं हो सकता।
इस्लामी तारीख़ ने हमें सच्ची दींदारी के बेहतरीन नमूने दिखाए हैं—ऐसे मुसलमानों के, जिन्होंने अपने क़रीबी रिश्तेदारों—बाप या भाइयों—के बारे में अपने जज़्बात को भी कुचल दिया जब क़राबत उनके अक़ीदे से टकराती थी। सच्चा ईमान जब मज़बूत हो जाए तो कोई चीज़ उसके सामने नहीं टिकती।
तारीख़ ने अब्दुल्लाह बिन अब्दुल्लाह बिन उबय्य बिन सलूल (1) का वाक़िआ बयान किया है अपने वालिद के साथ—जिसने क़बीला-ए-मुस्तलिक़ के ख़िलाफ़ जंग में कुछ मुनाफ़िक़ाना बातें कीं और मुसलमानों के दरमियान एक तरह की फूट पैदा कर दी।
जब अब्दुल्लाह ने यह सुना तो वह नबी (स) के पास गया और बोला: "ऐ रसूलुल्लाह! मैंने सुना है कि आप मेरे बाप को क़त्ल करना चाहते हैं। अगर यह सच है, तो आप मुझे हुक्म दें; मैं ख़ुद उसे क़त्ल करके उसका सर आपके पास ले आऊँगा। मुझे डर है कि अगर आप किसी और को हुक्म दें और वह उसे क़त्ल करे, तो मेरा नफ़्स मुझे यह गवारा नहीं करेगा कि मैं अपने बाप के क़ातिल को लोगों के बीच चलता हुआ देखूँ, फिर मैं उसे क़त्ल कर बैठूँ और इस तरह एक काफ़िर की ख़ातिर एक मोमिन को क़त्ल कर दूँ, और नतीजतन मैं जहन्नम में चला जाऊँ।"
वह नबी (स) से इल्तिजा करने लगा कि उसके बाप को उसके सिवा कोई और क़त्ल न करे! उसे डर था कि अगर यह काम उसके अलावा किसी और से हुआ तो वह क़ातिल से बदला ले बैठेगा और वह काम कर बैठेगा जो उस पर अल्लाह का ग़ज़ब ले आएगा! लेकिन अगर वह ख़ुद अपने हाथों से अपने बाप को क़त्ल करे, तो उसके दिल में अपने बाप के क़ातिल के ख़िलाफ़ कोई ग़ुस्सा न रहेगा, हालाँकि अपने हाथों से बाप को क़त्ल करना उसके लिए बहुत भारी होगा। रहमत वाले नबी ने उसे इन दोनों मुश्किलों से निकाल लिया—उन्होंने उस मुनाफ़िक़ को माफ़ कर दिया और उसे उसके मोमिन बेटे की ख़ातिर छोड़ दिया।
यह एक और वाक़िआ है जो दिखाता है कि दीन का जज़्बा रिश्तेदारी के जज़्बे पर कैसे ग़ालिब आता है।
जंग-ए-सिफ़्फ़ीन के बाद अदी बिन हातिम अपने बेटे ज़ैद के साथ मारे गए सिपाहियों के पास से गुज़रे। मुआविया की फ़ौज के मारे गए लोगों में ज़ैद का मामा (माँ का भाई) भी था। ज़ैद अपने मामा के क़ातिल की तलाश में निकला। जब उसने क़ातिल को पाया तो अपने नेज़े से उसे मार डाला। इस पर अदी अपने बेटे ज़ैद पर बहुत ग़ुस्सा हुआ; उसने उसे डाँटा, मलामत की और उसे तथा उसकी माँ को सख़्त गालियाँ दीं। उसने कहा: "ऐ बेहया औरत के बेटे! अगर मैं तुम्हें उनके हवाले करके क़त्ल न करवा दूँ तो मैं मुहम्मद के दीन पर नहीं!"
लेकिन ज़ैद अपने बाप से भाग गया और मुआविया के पास जा मिला, जिसने उसे अच्छा पनाह दी और उसकी हिफ़ाज़त की। फिर अदी ने आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर अपने बेटे पर बद-दुआ की और कहा: "ऐ अल्लाह! ज़ैद मुसलमानों से अलग हो गया और काफ़िरों से जा मिला। ऐ अल्लाह! उसे अपनी ऐसी तीर से मार जो कभी चूकती नहीं! अल्लाह की क़सम! मैं उससे कभी एक लफ़्ज़ भी बात नहीं करूँगा और न कभी उसके साथ एक छत के नीचे रहूँगा।" (2)
बाप की औलाद के लिए मुहब्बत चाहे कितनी ही बड़ी हो, फिर भी तुम देखते हो कि अदी अपने बेटे को क़त्ल करना चाहता था, क्योंकि उसने एक बेगुनाह मोमिन मुसलमान को क़त्ल करके गुनाह किया था। और जब बेटा भागकर मुआविया के ज़ालिम गिरोह की तरफ़ चला गया तो अदी के पास अल्लाह से उसके ख़िलाफ़ दुआ करने के सिवा कुछ न रहा।
सिफ़्फ़ीन की जंग में ऐसा वाक़िआ सिर्फ़ यही नहीं था। तारीख़-नवीसों ने एक दूसरा वाक़िआ भी बयान किया है:
मुआविया की ज़ालिम फ़ौज में से एक जाँबाज़ निकला और इमाम अली की फ़ौज के एक सिपाही को मुबारज़े के लिए ललकारा। वे कुछ देर तक लड़े यहाँ तक कि इमाम अली की फ़ौज वाला सिपाही अपने दुश्मन को गिरा सका और उसकी छाती पर बैठ गया। जब वह उसे क़त्ल करने लगा तो उसने उसका चेहरा खोला और मालूम हुआ कि वह उसका भाई है। लेकिन उसने अपनी फ़ौज की बहुत सी आवाज़ें सुनीं जो उसे क़त्ल करने को कह रही थीं। उसने कुछ देर ठहरकर कहा: "यह मेरा भाई है।" उन्होंने कहा: "इसे छोड़ दो।" लेकिन वह बिना सच्ची तौजीह के रज़ामंद न हुआ, क्योंकि वह अपने दीन के फ़र्ज़ पर भाईचारे को तरजीह नहीं दे सकता था। उसने कहा: "कभी नहीं! जब तक अमीरुल मोमिनीन मुझे इसे छोड़ने की इजाज़त न दें!" जब इमाम अली को यह बताया गया तो उन्होंने कहा: "इसे छोड़ दो!"
अगर उसे अपने सरदार इमाम अली का हुक्म न मिलता, तो वह यक़ीनन अपने ईमान और अक़ीदे की ख़ातिर अपने भाई को क़त्ल कर देता।
ये लोग हरगिज़ इमाम अली से ज़्यादा मोमिन या मुख़लिस नहीं हो सकते जिनके कंधों पर इस्लाम क़ायम हुआ, और जिनकी तलवार ने मुशरिकों के बड़े-बड़े सर गिराए, जिससे इस्लाम बहुत मज़बूत हुआ।
इमाम अली हरगिज़ अपने वालिद को न छोड़ते अगर उन्हें पता होता कि वे काफ़िर हैं, और न ही वे कभी झूठी तारीफ़ करते। वे नबी (स) के बाद अल्लाह और उसके रसूल के रास्ते में ईमान और इख़्लास का सबसे ऊँचा नमूना थे।
अगर अली को अपने वालिद के ईमान पर यक़ीन न होता, तो वे उनके ख़िलाफ़ गढ़े गए झूठ का इनकार न करते, और न ही उन्हें बेहतरीन अल्फ़ाज़ में सराहते। सच कहने के सबसे ज़्यादा हक़दार वे ही थे—even अगर वह बात उनके वालिद के ख़िलाफ़ ही क्यों न होती। उनका अज़ीम ईमान और इख़्लास उन्हें कभी भी हक़ के साफ़ रास्ते से हटने नहीं देता।
नबी (स) के बाद क़ुरआन के अहकाम पर क़ायम रहने और उसकी मनाहियों से बचने में भी वही सबसे बढ़कर थे।
हमने देखा कि ऊपर बयान की गई क़ुरआनी आयात काफ़िरों की पैरवी करने वालों के लिए सख़्त धमकी भरे मआनी रखती हैं... और यक़ीनन अली—जो हक़ का ज़िंदा नमूना थे—क़ुरआन-ए-मजीद के एक लफ़्ज़ की भी मुख़ालफ़त नहीं कर सकते थे!
पाठक के लिए बेहतर होगा कि इमाम अली के एक ख़ुत्बे का यह हिस्सा बयान किया जाए, जो सिफ़्फ़ीन की जंग के दिनों में एक दिन, सबके सामने, उन्होंने कहा:
"जब हम नबी (स) के साथ थे, तो हमने अपने बापों, बेटों, भाइयों और चचाओं को क़त्ल किया, और इससे हमारा ईमान और इस्लाम के अहकाम के सामने हमारी तस्लीम और बढ़ गई। हमने जिहाद की ख़ातिर, और दुश्मन के पहलवानों से मुबारज़ा करने की ख़ातिर, सबसे कड़वी मुसीबतें सहन कीं..."
यह कितनी शानदार तस्वीर है! यह हमें दिखाती है कि मुसलमान हक़ को साबित करने और बातिल को मिटाने में कितने मज़बूत और पुख़्ता थे— चाहे क़ुर्बानी उनके अपने बाप और बेटे ही क्यों न होते—जैसा कि क़ुरआन ने बयान किया है।

हज़रत अबू तालिब (अ) का अहलुल बैत (अ) की कहावतों में ज़िक्र
अगर हम अहलुल बैत की सीरतों का मुतालआ करें, तो पाएँगे कि उनमें से हर एक ने अबू तालिब पर लगाए गए इल्ज़ामात को रद्द किया, और उन इल्ज़ामात के पीछे की वजहें बयान कीं जिन्होंने अबू तालिब के ईमान को बिगाड़कर उन्हें काफ़िरों में शामिल दिखाने की कोशिश की।
जब-जब झूठ और जालसाज़ी बढ़ती गई, हक़ की एक आवाज़ उठी जिसने उस उलझन को बिखेर दिया, और सच की एक किरण चमकी जिसने उस नाइंसाफ़ी और बदनीयती की तारीकी को रोशन कर दिया।
1. उनमें से एक शख़्स—जिसने अबू तालिब के ईमान के बारे में गढ़े गए झूठ सुने थे— ने इमाम सज्जाद (अली बिनुल हुसैन) (स) से उन इल्ज़ामात के बारे में पूछा। इमाम सज्जाद ने कहा: "हाँ!"
पूछने वाले ने दोबारा सवाल किया ताकि उन इल्ज़ामात की हक़ीक़त और उनके सच या झूठ होने का यक़ीन कर सके: "यहाँ कुछ लोग कहते हैं कि अबू तालिब काफ़िर थे!"
इमाम सज्जाद ने दर्द भरी आह भरी और ऊँची आवाज़ में रो पड़े: "कैसा ताज्जुब! क्या वे अबू तालिब पर (कुफ़्र का) इल्ज़ाम लगाते हैं या नबी (स) पर, जिन्हें अल्लाह ने कई आयात में हुक्म दिया कि कोई मोमिना औरत किसी काफ़िर मर्द के निकाह में उसकी बीवी बनकर बाक़ी न रहे? और कोई शख़्स इसमें शक नहीं करता कि फ़ातिमा बिन्त असद सबसे पहली मोमिन औरतों में से थीं। वे अबू तालिब की बीवी रहीं यहाँ तक कि अबू तालिब का इंतेक़ाल हो गया।"
इमाम सज्जाद के इस क़ौल से यह मालूम हुआ कि जो शख़्स अबू तालिब को काफ़िर समझता है, वह नबी (स) पर यह इल्ज़ाम लगाता है कि उन्होंने क़ुरआन के अहकाम की मुख़ालफ़त की या अपने चचा के मामले में उन्हें लागू करने में बेपरवाह रहे।
फ़ातिमा बिन्त असद—अबू तालिब की बीवी और अली की माँ—के सच्चे ईमान का इनकार कोई नहीं कर सकता, और कोई यह नहीं कह सकता कि नबी (स) ने अबू तालिब और उनकी बीवी फ़ातिमा का निकाह तोड़ दिया था। अगर अबू तालिब बे-ईमान होते, तो नबी (स) को उनके और उनकी मोमिना बीवी के दरमियान जुदाई करानी पड़ती।
चूँकि फ़ातिमा बिन्त असद अबू तालिब की बीवी रहीं यहाँ तक कि वे फौत हो गए, इसलिए जो शख़्स अबू तालिब को बे-ईमान कहेगा, वह यक़ीनन नबी (स) पर अपने रब की नाफ़रमानी का इल्ज़ाम लगाएगा। यानी जो अबू तालिब को बे-ईमान कहे, वह बेबाकी से इस्लाम के दिल—अज़ीम नबी (स)—पर इल्ज़ाम लगाता है।
2. इमाम बाक़िर से अबू तालिब के बारे में उस झूठी रिवायत पर सवाल किया गया जो कहती थी कि अबू तालिब जहन्नम में होंगे। इमाम बाक़िर ने जवाब दिया: "अगर अबू तालिब का ईमान एक पलड़े में और लोगों का ईमान दूसरे पलड़े में रखा जाए, तो अबू तालिब का ईमान भारी पड़ेगा।"
फिर उन्होंने कहा: "क्या तुम नहीं जानते कि अमीरुल मोमिनीन अली (स) ने अपनी ज़िन्दगी में अब्दुल्लाह, आमिना और अबू तालिब की तरफ़ से हज करने का हुक्म दिया, और फिर अपनी वसीयत में भी उनके लिए हज कराने का हुक्म दिया?"
अबू तालिब का ईमान किसी नकल करने वाले का नहीं था, बल्कि एक बसीरत वाले का ईमान था। यह ईमान एक जद्दोजहद करने वाले मददगार का ईमान था। अबू तालिब अरबों के सबसे बड़े क़बीले के सरदार थे—बल्कि अरबियत की रूह थे। वे उस शहर के रईस थे जिसे तमाम अरब उसकी हुरमत और क़ुद्सियत की वजह से ज़ियारत करते थे। ऐसा इताअत-शुदा रहनुमा और आला दर्जे का सरदार—एक यतीम के पीछे चल पड़ा जिसे अबू तालिब ने ख़ुद पाला-पोसा था। उन्होंने अपनी सरदारी और बुलंदी छोड़ी और अपने भतीजे—नबी—की पैरवी की, जिसे आसमान ने ख़ालिक़ और मख़लूक़ के दरमियान वसीला चुना था। क्या यह सच्चा ईमान नहीं था जिसने इस अज़ीम शख़्स को उन गुलामों की तरह बना दिया जो नबी (स) के पीछे चल पड़े थे?
फिर इमाम बाक़िर ने अबू तालिब के ईमान पर यह कहकर दलील क़ायम की कि इमाम अली ने अबू तालिब की तरफ़ से हज कराने का हुक्म दिया— सिर्फ़ अपनी ज़िन्दगी में ही नहीं, बल्कि अपने बाद भी—और इसे वसीयत में दर्ज किया। हज इस्लाम के बुनियादी अरकान में से है; इसलिए अली किसी बे-ईमान आदमी की तरफ़ से हज का हुक्म नहीं दे सकते थे!
जहाँ तक इमाम सादिक़ (स) का ताल्लुक़ है, उनके पास अपने अज़ीम दादा अबू तालिब के बारे में बहुत से अक़वाल हैं, जिनमें उन्होंने अपने दादा पर लगाए गए तमाम इल्ज़ामात की तख़्तीअ की। इमाम सादिक़ का दौर बनी उमय्या की हुकूमत के ख़ात्मे के बाद था— जिसने लोगों पर आफ़तों और मुसीबतों की बारिश कर दी थी— और बनी अब्बास के दौर की शुरुआत थी, जो अलवियों के हक़ लौटाने के बहाने हुकूमत में आए थे। वे दावा करते थे कि हक़ असल हक़दारों को लौटाएँगे, मगर यह महज़ बहाना था जिसे उन्होंने अपनी नई हुकूमत की बुनियाद बनाया।
थोड़ा सा वक़्त गुज़रा कि तलवारें अलवियों की गर्दनों से हट गईं और लोगों के मुँह से ताले खुले, मगर जैसे ही हुकूमत की बुनियादें मज़बूत हुईं, हालात फिर बदल गए।
यही वह ज़िंदा वजह थी जिसने जअफ़र बिन मुहम्मद अस-सादिक़ की आवाज़ को हक़ को बुलंद आवाज़ से ऐलान करने और लोगों में उसकी रौशनियों को फैलाने पर उभारा। हालाँकि उनके पास वक़्त कम था, फिर भी उन्होंने बनी हाशिम के पाक उसूलों को फैला दिया। नबी (स) के मददगार अबू तालिब का भी इमाम सादिक़ की ज़िंदा रिवायात में वाफ़िर हिस्सा है।
एक बार किसी ने इमाम सादिक़ से पूछा: "लोग कहते हैं कि अबू तालिब जहन्नम में हैं!"
इमाम सादिक़ ने कहा: "वे झूठ बोलते हैं! जिब्रईल ने कभी ऐसी चीज़ नाज़िल नहीं की।"
फिर उन्होंने इज़ाफ़ा किया: "अबू तालिब की मिसाल असहाब-ए-कहफ़ जैसी है; उन्होंने अपना ईमान छुपाया और शिर्क का इज़हार किया, तो अल्लाह ने उन्हें दोगुना अज्र दिया। अबू तालिब ने भी अपना ईमान छुपाया और शिर्क का इज़हार किया, तो अल्लाह ने उन्हें दोगुना अज्र दिया... वे इस दुनिया से उस वक़्त तक नहीं गए जब तक उन्हें यह ख़बर न दी गई कि वे जन्नत में होंगे... फिर लोग उन्हें कैसे बयान करते हैं? अबू तालिब के इंतेक़ाल की रात जिब्रईल नाज़िल हुए और कहा: "ऐ मुहम्मद! मक्का से निकल जाओ! अबू तालिब के बाद वहाँ तुम्हारा कोई मददगार नहीं।"
इमाम सादिक़ ने कहा कि अल्लाह अबू तालिब को दोगुना सवाब देगा, क्योंकि उन्होंने जब मस्लहत देखी तो ईमान छुपाया; इस तरह उन्हें ईमान का भी अज्र मिलेगा और ईमान छुपाने का भी अज्र मिलेगा। हर शख़्स अपने अक़ीदे को छुपा नहीं सकता, चाहे वह मिशन की मस्लहत ही क्यों न हो।
इमाम सादिक़ ने क़ुरआन में बयान किए गए असहाब-ए-कहफ़ से अबू तालिब की मिसाल दी, और कहा कि अल्लाह ने (नबी (स) पर वह्य के ज़रिए) उन्हें जन्नत की बशारत दी। इतिहास-नवीसों ने बयान किया है कि नबी (स) ने कुछ लोगों को जन्नती होने की ख़बर दी थी। उनमें ऐसे भी हो सकते हैं जो इस्लाम की हिमायत और दिफ़ा में अबू तालिब के बराबर न हों!
फिर इमाम सादिक़ ने अबू तालिब के ईमान पर एक बड़ी दलील बयान की— कि जिब्रईल ने अबू तालिब के इंतेक़ाल के बाद नबी (स) को मक्का छोड़ने का हुक्म दिया, क्योंकि अबू तालिब की वफ़ात से नबी (स) मक्का में मदद और हिफ़ाज़त से महरूम हो गए थे। क्या अबू तालिब जैसा शख़्स काफ़िर हो सकता है, या जहन्नम उसका बदला हो सकता है? अगर ऐसा होता तो मुसलमान और मुशरिक में कोई फ़र्क़ न रहता।
एक बार इमाम सादिक़ और यूनुस बिन नबाता के दरमियान बातचीत हुई। इमाम सादिक़ ने यूनुस से पूछा: "ऐ यूनुस! लोग अबू तालिब के बारे में क्या कहते हैं?" यूनुस ने कहा: "वे कहते हैं कि वह जहन्नम में हैं और वहाँ उनका सर उबलता है।"
इमाम सादिक़ ने कहा: "अल्लाह के दुश्मनों ने झूठ कहा! अबू तालिब (नबियों, सिद्दीक़ों, शहीदों और नेक लोगों) के साथियों में से हैं— और क्या ही अच्छी संगत है"

एक बार फिर इमाम सादिक़ ने उस आदमी को जवाब दिया जिसने कहा कि लोग अबू तालिब को काफ़िर बताते हैं: "वे झूठ बोलते हैं! यह कैसे हो सकता है जबकि उन्होंने कहा था:
क्या तुम नहीं जानते कि हमने मुहम्मद को मूसा की तरह नबी पाया! यह पहले किताबों में दर्ज है!
फिर एक बार उन्होंने कहा: "अबू तालिब काफ़िर कैसे हो सकते हैं जबकि उन्होंने कहा था:
वे अच्छी तरह जानते थे कि हमारे बेटों ने कभी झूठ नहीं बोला, और न ही वह बेहूदा बातों की परवाह करता था।
और वह सफ़ेद-चेहरा, जिसकी वजह से दुआ की जाती है ताकि बादल भलाई ले आएँ।
वह यतीमों की पनाह और बेवाओं का निगहबान है।"
इमाम सादिक़ ने कहा: "अमीरुल मोमिनीन (इमाम अली) को अबू तालिब की शायरी का पढ़ा जाना और लिखित होना पसंद था। उन्होंने कहा: इसे (यह शायरी) सीखो और अपने बच्चों को सिखाओ, क्योंकि यह अल्लाह के दीन के मुताबिक़ है और इसमें बहुत इल्म है।"
इस रिवायत में अली की तरफ़ से अपने वालिद के ईमान की वाज़ेह गवाही भी मौजूद है। यह हमें अबू तालिब की क़द्र और बुलंद मक़ाम दिखाती है। इमाम अली अपने वालिद की शायरी सुनकर बहुत खुश होते थे; इसीलिए उन्होंने हुक्म दिया कि इसे सीखा और सिखाया जाए, क्योंकि यह अल्लाह के मिशन से मेल खाती है और इसमें पिछली इलाही मज़ाहिब के बारे में बहुत इलाही इल्म है।
4. दुर्स्त बिन अबू मंसूर ने इमाम मूसा अल-काज़िम से अबू तालिब के बारे में पूछा। पूछने वाले ने अबू तालिब के ईमान के बारे में सवाल नहीं किया, क्योंकि यह उसके लिए यक़ीनी था, बल्कि उसने ईमान से भी ऊपर किसी बात के बारे में पूछा।
उसने पूछा: "क्या नबी (स) अबू तालिब के ताबे थे?"
इमाम काज़िम ने कहा: "नहीं! बल्कि वह (अबू तालिब) वसीयतों के अमीन थे, फिर उन्होंने उन्हें नबी (स) को सौंप दिया।"
उस आदमी ने पूछा: "क्या उन्होंने वसीयतें नबी (स) को इस तरह दीं जैसे नबी (स) उनके ताबे थे?"
इमाम काज़िम ने कहा: "अगर नबी (स) उनके ताबे होते तो वह वसीयतें उन्हें न देते!"
उस आदमी ने पूछा: "तो फिर अबू तालिब का क्या हाल था?"
इमाम काज़िम ने कहा: "उन्होंने नबी (स) और उनकी रिसालत पर ईमान लाया, इसलिए उन्होंने वसीयतें उन्हें सौंप दीं।")
यह रिवायत इस किताब में अबू तालिब की शख़्सियत के बारे में हमारी कही बात की तस्दीक़ करती है।
अबू तालिब जैसा शख़्स मौजूद होना ज़रूरी था ताकि इब्राहीम (स) की रिसालत की किरण मुहम्मद (स) की रिसालत की चमकती लौ से जुड़ सके।
रिवायत से मालूम होता है कि पूछने वाला अबू तालिब के ईमान पर यक़ीन रखता था और यह समझता था कि अबू तालिब उन वसीयतों के अमीन थे जिन्हें उन्हें नबी मुहम्मद (स) को सौंपना था। यक़ीनन किसी मुशरिक को इस इलाही अमानत का अमीन नहीं बनाया जा सकता था।
पूछने वाला—अबू तालिब के बुलंद मक़ाम को जानते हुए—यह भी समझता था कि रिसालत के ज़ुहूर से पहले नबी मुहम्मद (स) सरपरस्ती के लिहाज़ से अबू तालिब के ताबे थे, मगर इमाम काज़िम ने बहुत वाज़ेह अंदाज़ में जवाब देकर इस वह्म को दूर कर दिया।
जब वह्म के बादल हट गए तो उसने अबू तालिब की हालत के बारे में पूछा, और इमाम काज़िम ने जवाब दिया कि अबू तालिब ने मुहम्मद की नुबूवत की तस्दीक़ की और अल्लाह पर ईमान लाया—वरना वे वसीयतें नबी (स) को न सौंपते।
5. अब्बान बिन महमूद ने इमाम रज़ा (स) को उस वक़्त ख़त लिखा जब गढ़े हुए झूठों से उसका ईमान हिलने लगा था: "अल्लाह मुझे आप पर क़ुर्बान कर दे! मुझे अबू तालिब के ईमान के बारे में शक हो गया है!"
इमाम रज़ा (स) ने उसे लिखा: "(और जो शख़्स रसूल की मुख़ालफ़त करे, उसके बाद कि उस पर हिदायत ज़ाहिर हो चुकी हो, और मोमिनों के रास्ते के सिवा किसी और रास्ते पर चले, तो हम उसे उसी तरफ़ फेर देंगे जिधर वह ख़ुद फेरा, और उसे जहन्नम में दाख़िल करेंगे; और वह बुरा ठिकाना है) (2) फिर: अगर तुम अबू तालिब के ईमान का इक़रार नहीं करते, तो तुम्हारा अंजाम जहन्नम होगा।" (3)
इमाम रज़ा के जवाब से यह ज़ाहिर हुआ कि अबू तालिब के ईमान में शक करना नबी (स) पर ईमान से टकराता है, और हिदायत को जान लेने के बाद उसके रास्ते से हटना है; और जो हिदायत के साफ़ रास्ते से हटे वह ईमान की हद से बाहर हो जाता है, और फिर उसका रास्ता उसे जहन्नम तक ले जाता है। इसे नबी (स) को दुख पहुँचाना समझा जाएगा, और नबी (स) को दुख पहुँचाना ऐसा गुनाह है जो जहन्नम तक ले जाता है।
अल्लाह ने क़ुरआन-ए-मजीद में फरमाया: (यक़ीनन जो अल्लाह और उसके रसूल को अज़ियत देते हैं, अल्लाह ने उन्हें दुनिया और आख़िरत में लानत की, और उनके लिए रुसवा करने वाला अज़ाब तैयार किया) 33:57, और: (और जो रसूलुल्लाह को अज़ियत देते हैं, उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है) 9:61।
नबी (स) ने अपनी एक रिवायत में फरमाया: "जो मेरे एक बाल को भी तकलीफ़ पहुँचाए, उसने मुझे तकलीफ़ पहुँचाई; और जिसने मुझे तकलीफ़ पहुँचाई, उसने अल्लाह को तकलीफ़ पहुँचाई।"
6. इमाम अस्करी (हसन बिन अली) ने अपने आबा से रिवायत की गई एक लंबी हदीस में कहा: "अल्लाह तआला ने अपने रसूल (मुहम्मद) पर वह्य की: (मैंने तुम्हें दो क़िस्म के मददगारों से मदद दी है; एक गिरोह तुम्हारी मदद छुपकर करता है और दूसरा गिरोह खुलकर। जहाँ तक छुपकर मदद करने वाले गिरोह का ताल्लुक़ है, उनका सरदार और सबसे बेहतर तुम्हारा चचा अबू तालिब है; और जहाँ तक खुलकर मदद करने वाले गिरोह का ताल्लुक़ है, उनका सरदार और सबसे बेहतर उसका बेटा अली बिन अबू तालिब है।)"
फिर उन्होंने इज़ाफ़ा किया: "अबू तालिब फ़िरऔन की क़ौम के मोमिन की तरह हैं; वह अपना ईमान छुपाए रखता था।" इन दो गिरोहों में से एक को अपना काम छुपकर करना था, जब तक कि उसके लिए खुलकर करना मुमकिन न हो... जैसे फ़रिश्तों की मदद, जिसका ज़िक्र क़ुरआन में है: (...और ऐसी फ़ौजें उतारीं जिन्हें तुमने नहीं देखा) 9:26। (...और उसे ऐसी फ़ौजों से मज़बूत किया जिन्हें तुमने नहीं देखा) 9:40।
(...कि तुम्हारा रब तुम्हारी मदद तीन हज़ार उतरे हुए फ़रिश्तों से करे) 3:124। (तुम्हारा रब तुम्हारी मदद पाँच हज़ार तबाही मचाने वाले फ़रिश्तों से करेगा) 3:125। (मैं तुम्हारी मदद एक हज़ार फ़रिश्तों से करूँगा जो एक के बाद एक आएँगे) 8:9। और भी बहुत सी आयात हैं जो इस मौज़ू पर हैं।
अबू तालिब नबी (स) की मदद नहीं कर सकते थे जब तक वे अपना ईमान छुपाए न रखते। वे फ़िरऔन की क़ौम के उस मोमिन की तरह थे जिसका वाक़िआ क़ुरआन में आया है। अगर फ़िरऔन की क़ौम का मोमिन अपना ईमान न छुपाता, तो फ़िरऔन हज़रत मूसा (स) को क़त्ल कर देता। वह अपने लोगों में इतना असरदार था कि उन्हें पता नहीं था कि वह मोमिन है; वे उसे अपने जैसा समझते थे। यही हाल अबू तालिब का नबी (स) की रिसालत के साथ था। इसी मआनी की तरफ़ इमाम अस्करी ने इशारा किया जब उन्होंने अपने आबा से यह हदीस बयान की जो उन्होंने नबी (स) की तरफ़ मंसूब की।
नबी की औलाद के अक़वाल पर कोई शक नहीं कर सकता और यह गुमान नहीं कर सकता कि उनके अक़वाल ग़ैर-सच्चे हो सकते हैं— जबकि क़ुरआन ने उनकी इस्मत की तस्दीक़ करते हुए कहा: (अल्लाह तो बस यही चाहता है कि तुमसे नापाकी दूर रखे, ऐ अहल-ए-बैत, और तुम्हें अच्छी तरह पाक कर दे) 33:33।
यह क़ुरआनी आयत नबी की पाक औलाद की इस्मत बयान करती है, कुछ गुमराह मुफ़स्सिरीन की शर्मनाक कोशिशों के बावजूद जो इसके मआनी बिगाड़ना चाहते थे।
अहलुल बैत क़ुरआन के बराबर थे। वे आसमान और ज़मीन के दरमियान तनी हुई रस्सी की तरह थे; जो उससे चिपक गया वह हमेशा की बुलंदी तक पहुँच गया, और जो उससे हट गया वह नीचे ही रह गया—हलाक़त के ख़तरों में घिरा हुआ।
नबी (स) ने फरमाया: "मैं तुम्हारे बीच दो भारी चीज़ें छोड़ रहा हूँ; अगर तुम इन्हें थामे रहोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे: अल्लाह की किताब और मेरी इत्रत (अहलुल बैत)। ये दोनों कभी जुदा नहीं होंगे यहाँ तक कि हौज़ पर मेरे पास आएँगे।"
यह सहीह हदीस—जिस पर मुसलमानों का इज्मा है—नबी की औलाद की इस्मत पर एक और दलील है।
जो कोई उन पर शक करे, वह क़ुरआन पर शक करता है—जिसके वे बराबर हैं— और जो उन्हें छोड़ दे वह हलाक हो जाएगा।
इस्मत और तहारत की तस्दीक़ करने वाली और भी बहुत सी क़ुरआनी आयात और नबवी अहादीस हैं। हम उन्हें बयान नहीं करना चाहते क्योंकि वे हमारे मौज़ू से बाहर हैं।
जो क़ुरआन के बराबर हैं, वे यक़ीनन सिवाय सच के कुछ नहीं कहते। वे सबसे ज़्यादा हक़दार हैं कि क़ुरआन की मुख़ालफ़त न करें, और वे सबसे पहले हैं जो उसके अहकाम की इताअत करते और उसकी मनाहियों से बचते हैं।
तो क्या वे किसी शख़्स की तारीफ़—चाहे वह उनका बाप ही क्यों न हो—झूठी करेंगे और उसमें वह चीज़ मंसूब करेंगे जो उसमें न हो? क्या वे सिर्फ़ क़राबत की वजह से बिना किसी दलील के उसे एक असली जुर्म से बरी कर देंगे? हरगिज़ नहीं!
जो यह कहेगा, वह उनके बुलंद मक़ाम की बे-हुरमती करेगा— जो दरअसल नबी (स) ही का मक़ाम है— और वह नबी (स) की हुरमत और उनकी रिसालत की हुरमत को भी तोड़ेगा।

हज़रत अबू तालिब (अ) का सहाबा और दूसरों की कहावतों में ज़िक्र
हमें नबी (स) के सहाबा में ऐसे बहुत से लोग मिले जिनकी आँखें न तो बुरी ख़याली से अंधी हुईं और न ही निजी मुफ़ादात की वजह से वे सीधी राह से हटे; वे अबू तालिब के ईमान का इक़रार करते और उनके नेक आमाल का ज़िक्र करते थे।
हम नहीं चाहते कि इस तहक़ीक़ को लंबा करने के लिए सहाबा ने अबू तालिब के बारे में जो कुछ कहा है वह सब नक़्ल करें, बल्कि हम उनकी कुछ बातों को दलील के तौर पर बयान करना चाहते हैं ताकि हक़ीक़त वाज़ेह हो।
1. ख़लीफ़ा अबू बक्र ने कहा: "अबू तालिब इस दुनिया से उस वक़्त तक नहीं गए जब तक उन्होंने यह नहीं कहा: अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।"
यही बात अल-अब्बास से भी नक़्ल की गई है।
2. अब्दुल्लाह बिन अब्बास से एक आदमी ने पूछा: "ऐ रसूलुल्लाह के चचेरे भाई! क्या आप मुझे अबू तालिब के बारे में बताएँगे? क्या वह मुसलमान थे या नहीं?"
अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने जवाब दिया: "वह मुसलमान कैसे न होते
जबकि उन्होंने कहा:
"वे अच्छी तरह जानते थे कि हमारे बेटे ने कभी झूठ नहीं बोला, और न ही वह बेहूदा बातों की परवाह करता था।"
अबू तालिब असहाब-ए-कहफ़ की तरह थे; उन्होंने अपना ईमान छुपाया और शिर्क ज़ाहिर किया, तो अल्लाह ने उन्हें दोगुना अज्र दिया।"
3. अज़ीम सहाबी अबू ज़र्र—जिनकी आँखें न सोने की चमक से अंधी हुईं और न मुआविया की सख़्ती से डरें—ने कहा: "उस अल्लाह की क़सम जिसके सिवा कोई माबूद नहीं! अबू तालिब (अल्लाह उनसे राज़ी हो) इस दुनिया से उस वक़्त तक नहीं गए जब तक वे मुसलमान नहीं हो गए..."
4. हस्सान बिन साबित—शाइर—ने यह शेर पढ़ा:
"अगर तुम किसी मरने वाले पर मातम करो, तो वफ़ादार शख़्स पर मातम करो; वफ़ादार के भाई पर।"
सिब्त बिन अज-जौज़ी ने इस शेर की शरह करते हुए कहा: "इससे मुराद हमज़ा और अबू तालिब हैं।"
5. ये इक़रार किसी एक ज़माने तक महदूद नहीं थे, न ही किसी ख़ास तबक़े तक... हर वह शख़्स जो सच्चा, इंसाफ़पसंद, बे-लाग और मुख़्तलिफ़ वह्मों से ग़ैर-मुतअस्सिर था, उस अँधेरे में एक रौशनी की किरण की तरह उभरा जो सीधी राह को रौशन करती है। ऐसी ही एक हक़ बात अब्बासी बादशाह अब्दुल्लाह अल-मामून के मुँह से भी निकली— हालाँकि वह इतना सच्चा आदमी न था—मगर यह एक इंसाफ़ की बात थी जो उसके मुँह से चाहे इरादतन निकली या बे-इरादा। उसने कहा: "अल्लाह की क़सम! अबू तालिब मुसलमान हो गए जब उन्होंने कहा:
मैंने नबी की मदद की—रब के नबी की—ऐसी तलवारों से जो बिजली की तरह चमकती थीं।
मैंने रब के नबी की दिफ़ा की और उनकी हिफ़ाज़त की, एक मेहरबान निगहबान की तरह।
मैं उनके दुश्मनों की तरफ़ जवान ऊँट की तरह सावधानी से रेंगता हूँ, लेकिन उन पर शेर की तरह दहाड़ता हूँ जो अपने ठिकाने में दहाड़ता है।"
6. अबू जअफ़र अल-इस्क़ाफ़ी ने अपनी रिसाला (नक़्द अल-उस्मानिय्या) में, जब वह अज-जाहिज़ की रिसाला (अल-उस्मानिय्या) का रद्द लिख रहे थे, अबू तालिब का ज़िक्र किया। वह उनकी तारीफ़ किए बिना रह न सके। उन्होंने कहा: "अबू तालिब (नबी के) वालिद की जगह थे, सरपरस्त, मददगार और हिफ़ाज़त करने वाले थे, और उनके बिना नबी (स) कामयाब न होते। मगर इसके बावजूद, अकसर रिवायात के मुताबिक़ वह (अबू तालिब) मुसलमान नहीं हुए।"
हमें यह बात अजीब लगी; बल्कि हमें यह गुमान नहीं था कि अबू जअफ़र ने आख़िरी जुमला कहा होगा, क्योंकि यह उनके पहले बयान से टकराता है; और यह भी कि अबू जअफ़र उन्हीं में से थे जो अबू तालिब के मुसलमान होने के क़ायल थे—जैसा कि हम आख़िरी बाब में बयान करेंगे।
और हमें इस पर और ज़्यादा शक इस वजह से हुआ कि हमारा माख़ज़ उसी रिसाले का असल मत्न नहीं, बल्कि उसका ख़ुलासा था जो हसन अस-संदूबी ने जमा किया था, जिनका ज़िक्र हमने किताब की शुरुआत (दहलीज़ पर) में किया है।
अगर यह साबित हो जाए कि आख़िरी जुमला अबू जअफ़र ही का है, तो उन्होंने इसमें अपना निजी नज़रिया बयान नहीं किया, बल्कि सिर्फ़ यह कहा कि कुछ रिवायात में अबू तालिब के मुसलमान न होने का ज़िक्र आया है।
एक दूसरी जगह, जब अबू जअफ़र ने उन लोगों का ज़िक्र किया जो अबू तालिब की नेक दुआ और नबी (स) के साथ उनकी वफ़ादारी की वजह से मुसलमान हुए, तो उन्होंने कहा: "...और उनकी (अबू तालिब की) वजह से बनी हाशिम मक्का में मख़ज़ूम, सह्म और जुमह की क़बीलों के ख़िलाफ़ नबी (स) की दिफ़ा करते रहे... और उनकी वजह से बनी हाशिम ने शिअब में घेराबंदी को सहा... और उनकी दुआ और मुहम्मद (स) के साथ उनकी वफ़ादारी की वजह से उनकी बीवी फ़ातिमा बिन्त असद मुसलमान हो गईं। वह अबू बक्र और दूसरों से ज़्यादा मेहरबान और अच्छे मिज़ाज थे... और जो चीज़ उन्हें मुसलमान होने से रोकती—अगर यह साबित हो कि वे मुसलमान नहीं हुए— वह बस तक़य्या थी।" )
यह आख़िरी बयान इस मआनी में नहीं था कि वह अबू तालिब के मुसलमान न होने के क़ायल थे, जैसा कि उनके शागिर्द इब्न अबुल हदीद ने बयान किया।
यह बात—अगर यह उन्हीं की हो—शायद उन्होंने उस वक़्त कही हो जब वे अबू तालिब के ईमान पर पूरी तरह मुतमइन नहीं हुए थे; फिर जब उन्होंने हक़ की तलाश में तहक़ीक़ की और यक़ीन हासिल किया, तो उन्होंने वही बयान कर दिया जिस पर वे मुतमइन हो गए। यह बात अबू तालिब के ईमान के इज़हार की नफ़ी करती है, ईमान की नफ़ी नहीं— क्योंकि तक़य्या इंसान को असल अक़ीदा छुपाने पर मजबूर करती है।
7. अज-जाहिज़—अपनी रिसाला (अल-उस्मानिय्या) में अपनी रुस्वा और जाहिलाना हालत के बावजूद— जब अली के इस्लाम में सबक़त को कमज़ोर दिखाने के लिए अबू तालिब का ज़िक्र करता है, तो वह भी यह कहे बिना रह न सका: "क्या तुम नहीं जानते कि क़ुरैश और मक्का के तमाम लोग नबी (स) को नुकसान नहीं पहुँचा सके जब तक अबू तालिब ज़िंदा थे?"
8. तज़किरतुल ख़वास के मुसन्निफ़ ने, इमाम अली (स) के तज़किरा के ज़िम्न में अबू तालिब का ज़िक्र करने, उनके कुछ नेक कारनामे बयान करने, नबी (स) के अबू तालिब के बारे में अक़वाल और नबी (स) की उनके लिए रहमत की दुआ का ज़िक्र करने के बाद कहा: "मैं कहता हूँ: यह बात कि अबू तालिब अहल-ए-जन्नत में से हैं, इस पर ग़ौर करने की ज़रूरत नहीं। इस पर बहुत सी दलीलें हैं: नबी (स) की हिफ़ाज़त की उनकी कोशिश, उनकी मदद और नुसरत, मुशरिकों और काफ़िरों के नुक़सान से उनकी दिफ़ा, अबू तालिब के इंतिक़ाल पर नबी (स) का ग़म, और नबी (स) का उस साल को ‘साल-ए-ह़ुज़्न’ कहना क्योंकि उसी साल अबू तालिब और ख़दीजा का इंतिक़ाल हुआ, और नबी (स) का यह दुआ करना कि अल्लाह अबू तालिब पर रहम करे और उन्हें बख़्श दे, और अल्लाह का अबू तालिब की दुआ क़बूल करना—ख़ास तौर पर जब उन्होंने उस पर इसरार किया।"
फिर मुसन्निफ़ ने, अबू तालिब की ईमानदारी साबित करने के लिए, उनके बारे में मासूम इमामों के अक़वाल, और ख़ुद अबू तालिब के नबी (स) और उनके दीन के बारे में अक़वाल का हवाला दिया।
बेहतर होगा कि यह इबारत नक़्ल की जाए: "...और यह भी कि उनके दुश्मनों में से किसी ने यह नहीं कहा कि उन (अबू तालिब) के बेटों को इस पर ग़ुस्सा था कि उनका बाप काफ़िर था।
मुआविया—उस (अली) का सख़्त दुश्मन और मुख़ालिफ़—अम्र बिन अल-आस, अब्दुल्लाह बिन अज़-ज़ुबैर, मरवान और दूसरे लोग, उसे ताना देने, बदनाम करने और उस पर वह बातें लगाने के बावजूद जिनसे वह पाक था, कभी यह इल्ज़ाम न लगा सके कि उसका बाप काफ़िर था... हालाँकि वह (अली) उन्हें अक्सर उनके बाप-दादाओं और माँओं के कुफ़्र, और उनकी नसब की पस्ती पर ताना देता था, मगर उन्होंने जवाब में यह बात नहीं कही...!
यह सबसे बड़ी दलील है जो उनके (अबू तालिब) के ईमान को साबित करती है, और आम लोगों (सुन्नियों) में से उन लोगों की बुरी तअस्सुब को दिखाती है जिन्होंने उन पर कुफ़्र का इल्ज़ाम लगाया।
ऐ इंसाफ़पसंदो! इस्लाम के सूरज और उसके नूर के ख़िलाफ़ चमगादड़-सिफ़त लोगों की बदनीयती पर ग़ौर करो...!"
यह एक वाज़ेह दलील थी और हक़ीक़त पर आधारित एक माक़ूल नतीजा था! अगर इमाम अली के सख़्त दुश्मनों को यक़ीन होता कि अबू तालिब मोमिन नहीं थे, तो वे ज़रूर इसी बात से इमाम अली को बदनाम करते— जबकि उन्होंने अपनी पूरी कोशिश की कि उन पर बहुत से गढ़े हुए ऐब लगा दें जिनसे वे यक़ीनन पाक थे। कोई ईमान, कोई सच्चाई, और कोई ज़मीर उन्हें इससे रोक नहीं सकता था, मगर उनके पास इसका कोई रास्ता ही नहीं था।
9. इस बाब में हमें एक ईसाई ज़बान से निकला हुआ यह वाज़ेह बयान नक़्ल करना चाहिए, जिसने हक़ को पहचाना, उसकी हिमायत की, नूर को देखा और उसी की तरफ़ राहनुमाई की।
हम इसे बिना किसी तब्सिरा के नक़्ल करते हैं, क्योंकि इन सतरों की हक़ायक़ को किसी तब्सिरा या वज़ाहत की ज़रूरत नहीं।
इतिहास-निगार लेखक अब्दुल मसीह अल-अंताकी ने कहा: "इतिहासकारों ने अबू तालिब के ईमान के बारे में इख़्तिलाफ़ किया है। कुछ ने कहा कि वे मुसलमान थे और कुछ ने कहा कि वे मुशरिक थे। दोनों गिरोहों के पास दलीलें और नबी (स) की रिवायात थीं जिन पर उन्होंने एहतिजाज किया।
मेरे जैसा आदमी इतना संगीन मामला तय करने वाला नहीं।
मगर हक़ीक़ी वाक़ेयात से ली गई दलीलें उन्हीं की राय की ताईद करती हैं जिन्होंने कहा कि अबू तालिब मोमिन थे; क्योंकि इंसान चाहे अपने क़रीबी रिश्तेदार—बेटा, भतीजा या دامाद—से कितनी ही मोहब्बत क्यों न करता हो, वह अपने महबूब से बे-परवाह नहीं रह सकता अगर वह उसे अपने दीन और अक़ीदे की मुख़ालफ़त करते, उसकी बुनियादें गिराने और उसकी जगह दूसरा दीन क़ायम करने की कोशिश करते देखे... वह बे-परवाह नहीं रह सकता—सिवाय इसके कि वह ख़ुद उसी नए दीन पर ईमान रखता हो— क्योंकि, जैसा कि तुम अच्छी तरह जानते हो, लोग अपने दीन से चिमटे रहते हैं और उसे इस क़दर मुक़द्दस समझते हैं कि एक मोमिन अपने बेटे या अपने बाप को भी क़त्ल करने पर तैयार हो जाता है अगर वह उसे अपने दीन की तौहीन करते या अपने ख़ुदा की बे-अदबी करते देखे।
अगर यह बात आम लोगों पर लागू होती है, तो यह उनसे भी ज़्यादा अबू तालिब जैसे सरदार पर लागू होती है, जिनका क़ुरैश में ऊँचा मुक़ाम था; इसलिए वे अपने आप से भी और अपने मुक़ाम की वजह से भी इस बात के पाबंद थे कि अपने उस दीन की हिफ़ाज़त करें जिस पर वे और उनकी क़ौम पहले से कायम थे, ताकि उनका मुक़ाम बरक़रार रहे, वे अपनी क़ौम के सामने ज़लील न हों, और अपने देवताओं के ग़ज़ब में आकर—फिर आख़िरत भी खो देने—का ख़तरा न उठाएँ।
इसी वजह से अबू तालिब के दिल में अपने भतीजे (स) की रिसालत पर ईमान होना ज़रूरी है, मगर उन्होंने किसी ख़ास मक़सद के तहत—जिसे हिकमत और सियासी हालात ने माँगा—उसका ऐलान नहीं किया।
अगर उन्होंने शुरुआत-ए-रिसालत में अपना ईमान ज़ाहिर कर दिया होता, तो क़ुरैश उनके ख़िलाफ़ हो जाते, उनका रुतबा और इज़्ज़त जाती... और फिर वे अपने भतीजे की—जो उस वक़्त कमज़ोर थे—क़ुरैश के नुक़सान से हिफ़ाज़त नहीं कर पाते। इसी ने उन्हें अपना ईमान छुपाने पर मजबूर किया।
उनके काम, उनके अशआर और उनके ख़ुत्बात उनके ईमान को साफ़ तौर पर दिखाते हैं, ख़ास तौर पर जब उन्होंने अपनी शायरी और तक़रीरों में अल-मुस्तफ़ा (स) की दिफ़ा और तारीफ़ की— अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक—जिसका ख़ात्मा उनकी वाज़ेह वसीयत पर हुआ। वे यह सब क़ुरैश में अपनी ताक़त और ऊँचे मुक़ाम पर भरोसा करके कर सके।
इस बुनियाद पर, अबू तालिब यक़ीनन बेहतरीन सहाबा और मददगारों में से थे।
कितना अच्छा होता अगर आज इस्लाम के पास भी ऐसे मर्द होते जो इसकी दिफ़ा कर सकते और इसकी शान बहाल कर सकते जैसा अबू तालिब ने शुरुआत-ए-रिसालत में किया था, तो इस्लाम हमेशा सरबुलंद रहता।
यही थे अबू तालिब—अल-मुस्तफ़ा (स) के सरपरस्त, उनके चचा, उनके महबूब, उनके मददगार—और हमारे मौला अमीरुल मोमिनीन, दीन के अमीर और अल्लाह के फ़ातेह शेर, अली बिन अबू तालिब—के वालिद...! हाँ, वही अज़ीम शख़्स जिसने दो नूरानी सूरजों को परवरिश दी जिनसे ज़िंदगी और दीन का आसमान रौशन हुआ!"
हमें नहीं लगता कि इस वाज़ेह बयान को किसी तब्सिरा की ज़रूरत है।
इतिहास के सफ़्हों पर ऐसे बहुत से वाक़ेयात हैं जो इस बात की ताईद करते हैं कि दीन का जज़्बा, नसबी रिश्ते के जज़्बे से ज़्यादा मज़बूत और ज़्यादा पुख़्ता होता है। अगर दोनों मैदान-ए-कशमकश में आमने-सामने हों, तो फ़तह यक़ीनन पहले के हिस्से में होती है और शिकस्त दूसरे के हिस्से में।
10. डॉ. ताहा हुसैन ने कहा: "नबी (स) के साथ अबू तालिब की मेहरबानी मशहूर है, और क़ुरैश के मुक़ाबले में उनकी दिफ़ा और उनके दीन की हिमायत की जद्दोजहद बहुत नामवर है।"
11. इंसाफ़पसंद उस्ताद अब्दुल अज़ीज़ सय्यिदुल अहल ने अबू तालिब पर एक किताब लिखी। कुछ क़ारीनों ने नोट किया कि उन्होंने अबू तालिब के ईमान का ऐलान नहीं किया।
मेरा ख़याल इसके बरअक्स है। मुझे लगता है कि उस्ताद ने सबसे वाज़ेह तौर पर यह इक़रार किया है कि अबू तालिब अव्वलीन मोमिनीन और सबिक़ीन मुसलमानों में से थे, और उन्होंने इस्लाम पर बहुत एहसान किए।
अगर किताब में इसके सिवा कुछ न भी होता सिवाय उसके मुक़द्दमे की उन चंद चमकदार सतरों के, तो वही इस बात की बेहतरीन दलील होती कि मुसन्निफ़ शैख़-ए-बनी हाशिम के बारे में क्या सोचता है।
बेहतर होगा कि उन चमकदार सफ़्हों की कुछ सतरें नक़्ल की जाएँ। मुसन्निफ़ ने कहा: "लोगों का उस शख़्स के साथ इंसाफ़ न था जिसने नबी (स) को पाला-पोसा और चालीस साल से ज़्यादा उनकी हिफ़ाज़त की, कि उसके अहवाल को मुख़्तसर कर दिया जाए, बिखेर दिया जाए और तोड़-मरोड़ दिया जाए, और उसके अहवाल बयान करने वाले बहुत कम और उलझे हुए रह जाएँ...
फिर उसके तमाम एहसान भुला दिए गए और इतिहास ने उसके इंतिक़ाल के वक़्त उसके साथ एक अजीब और कमज़ोर रवैया अपनाया। इतिहास ने उस शख़्स के बारे में—जिसने नुबूवत की हिफ़ाज़त की और उसे मज़बूती, कुर्बानी और वफ़ादारी के साथ बचाया— ऐसे लिखा गोया वह किसी वह्म-आफ़रीदा ज़बान से किसी इत्तिफ़ाक़ी चीज़ या किसी नए आए हुए अजनबी का तज़किरा कर रहा हो...!
उस शख़्स ने अपनी पूरी ज़िंदगी नबी (स) की हिमायत में गुज़ारी, अपने ख़ानदान को उनके पीछे चलने पर मजबूर किया, अपनी ताक़त, मोहब्बत और माल उनके लिए खर्च किया, उनके दुश्मनों से झगड़ा किया, उन पर वार किया और उन्हें शिकस्त दी, और मुसीबतों के रास्ते में अपने भतीजे की तरफ़ ख़ुलूस के साथ दौड़ पड़ने के लिए ख़ुद को तैयार रखा।
अबू तालिब का वजूद सृष्टि की ज़रूरतों में से एक ज़रूरत था, और ऐसा सहारा था जो मिशन के बाक़ी रहने और फैलने के लिए मौजूद होना चाहिए— जैसा कि इब्न ख़लदून ने अपनी नज़रिया में कहा...
यह अल्लाह की मंशा है; कोई आदमी, कोई अक़ीदा और कोई दीन जीत नहीं सकता जब तक उसके पास ऐसा पर्याप्त सहारा न हो जो उसे या उसे (दीन को) भयंकर तअस्सुब के मुक़ाबले में बचाए। फिर वह आदमी या दीन अपने पैरोक़ारों और मददगारों के ज़रिये ग़ालिब आता है, मगर वह सहारा सबसे पहला होना चाहिए, क्योंकि उसके बिना न पैरोक़ार होंगे न मददगार।"
"...और अबू तालिब ने वह फ़र्ज़ अदा करने में कोई कोताही नहीं की जो उन पर था, और वह भारी ज़िम्मेदारी उठाने में बोझिल नहीं हुए जो उन्हें निभानी थी। उन्होंने नबी (स) की हिमायत की और मदद की, उनके लिए तमाम लोगों से टकरा गए, और घमंड उन्हें गुनाह की तरफ़ नहीं ले गया जैसा कि दूसरे बड़ों को ले गया, जिन्होंने लोगों को गुमराह किया।
अबू तालिब तमाम क़ुरैश के सरदार थे—बिना किसी के हमसर।"
"नबी (स) अपने चचा के इंतिक़ाल पर रो पड़े; और मुहम्मद के सिवा कौन इतना नर्मदिल, रहमत करने वाला और वफ़ादार होकर रो सकता था, जबकि उसके रब ने उसे बेहतरीन तरबियत दी? उन्होंने अपने चचा पर मातम किया—उस पर जिसने उन्हें पाला, हिफ़ाज़त की, सहारा दिया और उनके लिए हर तकलीफ़ बर्दाश्त की। अबू तालिब उनके लिए बाप थे जब बाप छिन गया, उनका दायाँ हाथ थे जब उन्हें मददगार चाहिए था, और उनका गिरोह थे जब उन्हें ज़ुल्म मिटाने, बातिल को कुचलने और ताग़ूत को नेस्तनाबूद करने के लिए मज़बूत हक़ चाहिए था!"
हमने कोशिश की कि किताब में फैली हुई बहुत सी बातें नक़्ल न करें, मगर अपनी कोशिश के बावजूद हमें ऊपर के अल्फ़ाज़ नक़्ल करने पड़े।
अब हम क़ारी से पूछना चाहते हैं: "क्या मुमकिन है कि हम कहें कि मुसन्निफ़ ने अबू तालिब के मुसलमान होने का एलान नहीं किया, जबकि उसने अपनी किताब में यह सब कुछ कहा? हमने ये इबारात महज़ नमूने के तौर पर नक़्ल की हैं ताकि उसकी वाज़ेह गवाही सामने आ जाए—जो यक़ीनन सच्ची गवाही है!"
12. हमें उस्ताद जॉर्ज जिरदाक को उनकी शानदार किताब (इमाम अली; इंसानी इंसाफ़ की आवाज़) में पाया कि वे अबू तालिब की बहुत ही उम्दा तारीफ़ और ताज़ीम के साथ चर्चा करते हैं।
हमें लगा कि इस हैरतअंगेज़ ज़िक्र में से कुछ नक़्ल करना चाहिए।
उस्ताद ने कहा: "जब उनके दादा—अब्दुल मुत्तलिब, नबी के दादा—का इंतिक़ाल हुआ, तो उनके चचा अबू तालिब—अली के वालिद—ने उन्हें अपने पास ले लिया। लड़का हमदर्दी, नर्मी और बेहतरीन तरबियत के उस दायरे में ज़िंदगी गुज़ारता रहा जो मरहूम बाप ने रहने वाले बेटे के लिए छोड़ दिया था।"
फिर यह बयान करने के बाद कि अब्दुल मुत्तलिब ने अपने पोते की निगरानी की वसीयत अबू तालिब को की थी, उन्होंने कहा: "...और वह अबू तालिब को चुनते ही न अगर वे उनके असल एहसास और सोच के बारे में मुतमइन न होते। हालाँकि अब्दुल मुत्तलिब के तमाम बेटे मेहरबान और हमदर्द थे, लेकिन उनकी मेहरबानी और हमदर्दी अबू तालिब की तरह इतनी पुख़्ता और गहरी न थी।
परवरिश और तरबियत में हमदर्दी और मेहरबानी का असर माल-दौलत के असर से ज़्यादा नुमायाँ होता है; इसीलिए अब्दुल मुत्तलिब ने मुहम्मद (स) की देख-रेख के लिए अबू तालिब को चुना।
इसके अलावा, अबू तालिब को अपने भतीजे से इतनी गहरी हमदर्दी थी कि वह उन्हें ज़रूर मजबूर करती कि वे उनकी भरपूर देखभाल करें—even अगर उनके बाप ने वसीयत न भी की होती! तो फिर क्या हाल होता जब दोनों चीज़ें—उनकी हमदर्दी और बाप की वसीयत—एक साथ हों?"
"इसमें शक नहीं कि अबू तालिब एक अच्छे और महबूब इंसान थे; एक अच्छे इंसान, जिनके पास एक नेक बुज़ुर्ग की हिकमत थी, जो वफ़ादार और तजरबेकार थे, और जो अपनी मेहरबानी, वफ़ादारी और तजुर्बे की हर चीज़ को हर हाल में अमल में लाते थे।"
आइए इस ख़ूबसूरत जुमले को सुनें: "गोया जब अल्लाह ने अब्दुल मुत्तलिब के ख़ानदान में से नबी को चुना, तो उसने इस सख़ावत-भरे चचा को भी उन्हें पालने के लिए चुन लिया! गोया वजूद की क़ुदरत ने अबू तालिब के लिए रास्ता हमवार किया कि वे अपने भतीजे के बारे में वह बात जान लें जो किसी और ने न जानी।"
एक और शानदार बात—जो अबू तालिब की शख़्सियत को उसके तमाम अच्छे मआनी के साथ वाज़ेह करती है—यूं कही: "...अबू तालिब की फ़ितरत के अच्छे मआनी मुहम्मद की रूह के अंदर हरकत करने लगे। प्यार करने वाले चचा की निगरानी में पलते हुए वे उनके वजूद का हिस्सा बन गए।"
"अबू तालिब इस्लाम में पहले शख़्स थे जिन्होंने मुहम्मद के लिए मोहब्बत से भरी शायरी कही और उनकी हिमायत की दावत दी। जब भी उनके भतीजे को कोई नुक़सान पहुँचाने वाली बात या काम होता, वे बहुत ग़ुस्सा हो जाते।" "अबू तालिब ने अपनी ज़िंदगी भर एक लम्हे के लिए भी यह नहीं भुलाया कि मुहम्मद उन ऊँचे अख़लाक़ की कड़ी हैं जो ख़ुद उनमें, उनके भाई अब्दुल्लाह में, और उनके वालिद अब्दुल मुत्तलिब में फ़ितरी तौर पर थे।" "जब अबू तालिब का इंतिक़ाल हुआ तो नबी (स) ने महसूस किया कि उन्होंने वह सबसे बड़ा सहारा खो दिया है जिस पर वे भरोसा करते थे और जो उन्हें क़ुरैश के नुक़सान से बचाता था। यह एहसास मुहम्मद और उनके चचा के बीच नेकी के वसीले की कड़ी को दिखाता है— उस घर के सरदार के साथ जिसमें मुहम्मद पले-बढ़े और ऊँचे अख़लाक़ हासिल किए।
अबू तालिब को खोकर मुहम्मद ने यह महसूस किया कि उन्होंने वह मददगार खो दिया जो उनके लिए खुद को कुर्बान करने और हर नुक़सान से बचाने के लिए तैयार था— वह क़ुरैश और उनके ज़ालिमों के मुक़ाबले में उनका मज़बूत क़िला था— यहाँ तक कि नबी (स) ने कहा: "मुझे अपनी क़ौम की तरफ़ से कोई नुक़सान नहीं पहुँचा जब तक मेरे चचा का इंतिक़ाल नहीं हुआ।"
हम मुहम्मद के दिल को भर देने वाले इस गहरे ग़म को कितना जायज़ ठहराएँ जब उनके चचा का इंतिक़ाल हुआ?
इस रंज का कारण क्या था जबकि मुहम्मद इतने सब्र वाले, अज़्म रखने वाले और मुतमइन थे कि उनकी रिसालत कामयाब होगी— चाहे दुश्मन कितने ही हों, मददगार कितने ही कम हों, और अच्छों-बुरों के हालात कैसे भी हों?
हाँ! इस रंज का कारण क्या था? वह आफ़त जो मुहम्मद (स) पर आई जब उन्होंने अपने चचा को खो दिया— सबसे प्यारे इंसान को, जो उनके लिए इतना मेहरबान था और जो दुश्मनों के शर से उनकी हिफ़ाज़त करता था।
मुहम्मद के बहते आँसू वाज़ेह दलील हैं कि उन्होंने अपने वजूद का एक हिस्सा खो दिया— अपना हाल भी और अपना माज़ी भी!"
फिर एक दूसरे बाब में उन्होंने उस हमदर्दी की डोर पर बात की जो मुहम्मद और अली के बीच वैसी ही थी जैसी अबू तालिब और मुहम्मद के बीच, और कैसे उस एकता ने अच्छे फल दिए।
उन्होंने कहा: "मुहम्मद और अली के बीच हमदर्दी और भाईचारे का रिश्ता जारी रहा, और रिसालत की कामयाबी के लिए उनकी आपसी तआवुन भी जारी रही— जब से मुहम्मद ने अबू तालिब को जाना, और जब से अली ने मुहम्मद को जाना, और जब से ये तीनों एक घर में जमा हुए जिसकी बुनियाद बुज़ुर्गी के मआनी पर रखी गई थी।
अबू तालिब के घर की ख़ुसूसियात बस वही तहरीक थीं जिन्होंने अबू तालिब और अली को मुहम्मद की नबूग़त को समझने पर उभारा— जो पहले में हमदर्दी और कुर्बानी की सूरत में और दूसरे में अज़ीम अक़्ल, गहरे एहसासात और ऐसी कुर्बानी की सूरत में ज़ाहिर हुई जो मोज़िज़ों जैसी लगती है!"
कोई क़ारी कह सकता है कि लेखक ने अबू तालिब की जो तारीफ़ की, उसमें यह साफ़ नहीं कहा कि अबू तालिब मुसलमान थे, क्योंकि उन्होंने बस अबू तालिब की ऊँची खूबियाँ, नबी (स) से उनकी मुहब्बत और हिफ़ाज़त में उनकी लगन, और रिसालत की दावत व नुसरत का ज़िक्र किया।
हम इसी पर काफ़ी हैं। हमें जॉर्ज जिरदाक जैसे बड़े मुफ़क्किर से यह सुनने की ज़रूरत नहीं कि वह नूर को देख रहे हैं... जब उन्होंने नूर की सिफ़त बयान कर दी, उसके पहलू दिखा दिए और उसी की तरफ़ रहनुमाई कर दी। यही काफ़ी है कि हमें महसूस हो जाए कि वह उसी नूर की राह पर चल रहे हैं जिसकी वे तारीफ़ करते हैं।
इसलिए हमें क़ारी का हाथ पकड़कर यह दिखाने की ज़रूरत नहीं कि इन अल्फ़ाज़ में क्या मआनी हैं—क्योंकि ये बहुत वाज़ेह हैं और अबू तालिब के ईमान की खुली इक़रार-गवाही से भरे हुए हैं।
हम उनके इस जुमले की तरफ़ इशारा करना चाहते हैं: "गोया वजूद की क़ुदरत ने अबू तालिब के लिए रास्ता हमवार किया कि वे अपने भतीजे के बारे में वह बात जान लें जो किसी और ने न जानी।"
और: "मुहम्मद उन ऊँचे अख़लाक़ की कड़ी हैं जो अबू तालिब, उनके भाई अब्दुल्लाह और उनके वालिद अब्दुल मुत्तलिब में फ़ितरी तौर पर थे।" मुहम्मद इन लोगों की कड़ी कैसे हो सकते हैं अगर ये मुशरिक होते? अल्लाह बचाए!
फिर अबू तालिब की वह अज़ीम रूह क्या थी जो मुहम्मद की रूह में घुल गई और दोनों रूहें मिलकर एक चीज़ के दो हिस्से बन गईं? और फिर अबू तालिब, मुहम्मद और अली एक ऐसी हक़ीक़त कैसे बन गए जिसे बाँटा न जा सके?
अबू तालिब के घर की ख़ुसूसियात वह मज़बूत वजह थीं जिन्होंने बाप और बेटे को नबी (स) की नबूग़त समझने तक पहुँचाया, और वह समझ उनमें गहरी हमदर्दी और कुर्बानी की सूरत में ज़ाहिर हुई— जो सिर्फ़ इसीलिए एकजुट थीं कि रिसालत कामयाब हो, और इस कामयाबी के लिए जो कुछ दरकार था वह मौजूद रहे: गहरी हमदर्दी, अज़ीम अक़्ल और ऐसी कुर्बानी जो मोज़िज़ों जैसी लगे।
यह ऊँची हमदर्दी नबी (स) और उनके चचा व उनके चचेरे भाई के बीच उस वक़्त से एकजुट थी जब उन्होंने अपने चचा को जाना और जब उनके चचेरे भाई ने उन्हें जाना— और यह एक ऐसी मज़बूत एकता बनी जिसे अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये तीनों एक ऐसे घर में जमा हुए जो बुज़ुर्गी और फ़ज़ीलत की बुनियादों पर बना था।
फिर वह नेकी क्या थी जिसके वसीले मुहम्मद, उनके चचा और अली के बीच जुड़ गए?
क्या मुहम्मद किसी मुशरिक से नेकी के वसीले हासिल कर सकते थे?
क्या किसी ज़िद्दी मुशरिक से नेकी हासिल करने की उम्मीद की जा सकती है?
क्या वह ज़िद्दी मुशरिक उस रसूल का साझी हो सकता था जो तौहीद की रिसालत फैलाएगा?
नबी (स) के लिए यह बिल्कुल फ़ितरी था कि जब उन्होंने अपने चचा को खोया तो उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने वह सबसे बड़ा स्तंभ खो दिया जिस पर वे टिकते थे, जिसके ज़रिये वे महफ़ूज़ थे, और जिसकी वजह से उनकी रिसालत की हिफ़ाज़त होती थी। उनके चचा उस घर के सरदार थे जिसमें वे सबसे ऊँचे अख़लाक़ के साथ पले-बढ़े।
मुहम्मद (स) के लिए यह भी फ़ितरी था कि वे ग़मगीन हों, हालाँकि वे बहुत सब्र वाले और बहुत मज़बूत थे, और अपने रब पर पूरा यक़ीन रखते थे कि वह उनकी रिसालत को ज़रूर कामयाब करेगा— चाहे कामयाबी के ज़ाहिरी असबाब बहुत कम हों, दुश्मन मददगारों से कहीं ज़्यादा हों, और बुरे लोगों की तादाद अच्छे लोगों से बढ़ी हुई हो।
मगर यह वह ग़म है जो रह जाता है जब इंसान उस सबसे प्यारे शख़्स को खो दे जो हिफ़ाज़त और दिफ़ा करता रहा... यह वह कमी है जो इंसान को ऐसा महसूस कराती है गोया उसने अपने वजूद का एक हिस्सा खो दिया— जो उसके हाल से लेकर उसके माज़ी तक फैला हुआ था!
ये नक़्लें काफ़ी हैं और हमें और ज़्यादा नक़्ल करने की ज़रूरत नहीं। इनमें पर्याप्त दलीलें और इक़रार मौजूद हैं, जिन्हें बहुत सी शख़्सियतों ने उसी नुक्ते की तरफ़ रहनुमाई करते हुए वाज़ेह किया— हालाँकि मुख़्तलिफ़ वह्मों और मक़ासिद की वजह से अंदाज़ अलग-अलग हो सकते हैं। यह नुक्ता है: मज़लूम हक़ की हिमायत, छुपी हुई हक़ीक़तों का पर्दाफ़ाश, और उस माहौल में हक़ की आवाज़ बुलंद करना जो शोर मचाती झूठी बातों, घिनौने भौंकने और सांपों की डरावनी फुफकार से भरा हुआ हो जो हर तरफ़ अपना ज़हर फैलाते हैं।
मगर हक़ चमकता हुआ हक़ है और सच दमकता हुआ सच...!
अल्लाह यक़ीनन सच्चे मददगार और वफ़ादार सहायक हक़ के लिए तैयार करता है, ताकि न फ़ज़ीलत और रज़ीलत बराबर हो जाएँ और न बुराई अच्छाई पर ग़ालिब आ जाए!