हुदैबिया की सुलह के बाद, हिजरत के सातवें साल की शुरुआत में, नबी (अ.स.) ने ख़ैबर पर हमला करने का फ़ैसला किया। ख़ैबर इब्रानी शब्दकोश का एक लफ़्ज़ है। इसका मतलब या तो क़िला होता है या मज़बूत फ़सील। एक और क़ौल यह है कि अमालिक़ा (दिग्गजों) में दो भाई थे, जिनके नाम यसरिब और ख़ैबर थे। जहाँ-जहाँ वे आबाद हुए, वे जगहें उन्हीं के नाम से मशहूर हो गईं। इसी वजह से यसरिब के नाम पर शहर का नाम पहले अल-मदीना रखा गया। उसी तरह उस भाई के नाम पर इस जगह का नाम ख़ैबर पड़ा।
ख़ैबर अल-मदीना से अस्सी मील दूर, हिजाज़ और शाम की सरहद पर वाक़े है। यह अपने नख़लिस्तानों और हरियाली के लिए मशहूर था और इसमें यहूदी आबाद थे। यह उनकी हथियारबंद ताक़तों का भी मरकज़ था। हिफ़ाज़त के लिए उन्होंने सात छोटे-बड़े क़िले बनाए थे। इन क़िलों के नाम थे: अल-नअम, अल-क़तीबा, अश-शीक़्क़, अन-नतात, अल-वाती, सलामलाम और क़मूस।
इन क़िलों में दस से चौदह हज़ार तक यहूदी रहते थे। इनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्हें पहले अल-मदीना से निकाला गया था और जिन्होंने कुफ़्फ़ार के साथ मिलकर मुसलमानों से जंग की थी, और अपनी ज़्यादा तादाद और बेहतर हथियारों के बावजूद हार गए थे।
जब उन्होंने सुना कि मुसलमानों ने अल-हुदैबिया में क़ुरैश की सुलह की शर्तें मान ली हैं, तो उन्होंने समझा कि अब मुसलमानों में लड़ने का इरादा नहीं रहा। इस ग़लतफ़हमी की वजह से उन्होंने सोचा कि मुसलमानों ने अपनी जंग की रूह छोड़ दी है, और इसलिए यहूदियों के लिए सही वक़्त आ गया है कि वे मुसलमानों पर हमला करें और अहज़ाब की जंग की शर्म मिटा दें।
हालाँकि यहूदी तादाद में कम नहीं थे, फिर भी अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए उन्होंने बनू-ग़तफ़ान से मदद का समझौता किया, जो ख़ैबर से लगभग छह मील दूर रहते थे। उन्होंने बनू-ग़तफ़ान से वादा किया कि अगर वे मुसलमानों के ख़िलाफ़ जीत में मदद करेंगे, तो उन्हें ख़ैबर की आधी पैदावार दी जाएगी।
बनू-ग़तफ़ान ने यह पेशकश मान ली और इस मुहिम के लिए चार हज़ार सिपाही भेजे।
जब नबी (अ.स.) को पता चला कि ख़ैबर के यहूदी अल-मदीना पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं, तो आपने जल्द से जल्द तादीबी कार्रवाई करने का इरादा किया। इसलिए हुदैबिया से लौटने के बाद, आप अल-मदीना में बीस दिन ठहरे और एक हज़ार छह सौ सहाबा के साथ, जिनमें कुछ घुड़सवार थे और बाक़ी पैदल, ख़ैबर की तरफ़ रवाना हुए।
जब इस्लामी लश्कर ख़ैबर के बाहरी इलाक़े में पहुँचा तो सुबह का वक़्त था। ख़ैबर के रहने वाले अपने खेतों की तरफ़ खेती के औज़ार और पानी के मटके लेकर जा रहे थे। जब उन्होंने इस्लामी लश्कर को आते देखा, तो वे अपने क़िलों की तरफ़ भाग गए।
जब नबी (अ.स.) ने उन्हें भागते देखा, तो आपने “अल्लाहु अकबर” का नारा बुलंद किया और फ़रमाया:
“ख़ैबर तबाह हो गया! जब भी हम किसी क़ौम की सरहद में दाख़िल होते हैं, तो जिन पर बुरे दिन आते हैं, उन पर बहुत बुरे दिन आते हैं।”
नबी (अ.स.) जानते थे कि बनू-ग़तफ़ान यहूदियों की मदद करने के लिए तैयार हैं अगर जंग छिड़ गई। इसलिए आपने अपनी फ़ौज को रणनीतिक तौर पर राजिह नाम की जगह पर ठहराया, जो ख़ैबर और बनू-ग़तफ़ान की आबादियों के बीच थी। इस मंसूबे का मक़सद यह था कि बनू-ग़तफ़ान यहूदियों की मदद के लिए न पहुँच सकें।
जब उन्होंने मुसलमानों के आने की ख़बर सुनी और ख़ैबर की तरफ़ जाने के लिए निकले, तो मुसलमानों की फ़ौज ने उन्हें रास्ते में ही रोक लिया। अपने ही गाँवों की तबाही के ख़ौफ़ से वे लोग वापस लौट गए।
बनू-ग़तफ़ान के लौट जाने के बाद अब मुसलमानों ने ख़ैबर का घेराव शुरू किया। यहूदियों ने औरतों और बच्चों को क़िला-ए-क़तीबा में महफ़ूज़ कर दिया और बाक़ी क़िलों में बंद होकर मुसलमानों पर तीरों की बौछार शुरू कर दी।
कुछ झड़पों के बाद मुसलमानों ने कई क़िले फ़तह कर लिए, लेकिन फ़तह इस बात पर निर्भर थी कि इब्न अबिल-हक़ीक़ के उस क़िले को क़ाबू में किया जाए जो ढलान वाली एक पहाड़ी पर वाक़े था और जिसे क़मूस कहा जाता था।
उस क़िले का नाम भी क़मूस ही था। यही वह क़िला है जिसे रिवायतों और तारीख़ में ख़ैबर कहा गया है। उस क़िले के सामने एक गहरी ख़ंदक़ थी।
अपनी जगह और बनावट की वजह से यह क़िला बहुत ज़्यादा मज़बूत था और लगभग ناق़ाबिले-फ़तह समझा जाता था।
ग़ज़वात में आम तौर पर सरदारी नबी (अ.स.) के पास होती थी और अलम उठाने वाले हज़रत अली (अ.स.) होते थे। लेकिन इस मौक़े पर नबी (अ.स.) को कुछ दिनों से कनपटियों में दर्द था और हज़रत अली (अ.स.) आँखों की सूजन की वजह से ख़ैबर में जंग के लिए क़तारों में शामिल नहीं हो सके।
इसी वजह से कुछ लोगों को अपने आपको आगे बढ़ाने का मौक़ा मिल गया और उन्होंने बिना किसी बाक़ायदा मंज़ूरी के अपने हाथों में अलम उठा लिया और क़िला-ए-क़मूस पर क़ब्ज़ा करने का इरादा कर लिया।
इस तरह हज़रत उमर ने अलम अपने हाथ में लिया और फ़ौज के एक दस्ते के साथ क़िले पर हमला करने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने अपनी पूरी कोशिश की लेकिन कामयाब न हो सके और मायूस और बददिल होकर लौट आए।
इसके बाद अबू-बक्र ने अलम अपने हाथ में लिया और वही नतीजा सामने आया। हज़रत उमर ने दूसरी बार अलम लिया और फिर भी अपने मक़सद में नाकाम रहे।
अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने सिपाहियों को इल्ज़ाम दिया, लेकिन सिपाहियों ने साफ़ तौर पर इस हार को उनकी जंगी रणनीति की नाकामी क़रार दिया।
तबरी लिखते हैं:
“जब हज़रत उमर कुछ लोगों के साथ ख़ैबर वालों से मुक़ाबला करने के लिए गए, तो वह और उनके साथी भाग खड़े हुए और नबी (अ.स.) के पास लौट आए। उस वक़्त सिपाहियों ने कहा कि उमर ने बुज़दिली दिखाई, और उमर ने कहा कि सिपाही बुज़दिल हैं।”
जब नबी (अ.स.) के सिर का दर्द कुछ कम हुआ, तो आप अपने ख़ैमे से बाहर तशरीफ़ लाए और फ़ौज का गिरा हुआ हौसला देखकर फ़रमाया:
“अल्लाह की क़सम! मैं कल झंडा ऐसे शख़्स को दूँगा जो लगातार हमला करेगा और वह भागने वालों में से नहीं होगा! वह अल्लाह और उसके रसूल (अ.स.) से दोस्ती रखता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे दोस्ती रखते हैं। अल्लाह हमारे लिए उसके ही हाथों फ़तह अता करेगा!”
नबी (अ.स.) ने, सरदारों द्वारा सिपाहियों पर इल्ज़ाम लगाने के बावजूद, उन सिपाहियों में कोई तब्दीली नहीं की जो पहले हमलों में गए थे। आपने सिर्फ़ सरदार को बदला, क्योंकि किसी भी मुहिम की कामयाबी सरदार की साबित-क़दमी और उसकी क़यादत पर निर्भर करती है।
जब सरदार जंग के मैदान में पीठ दिखा देता है, तो फ़ितरी तौर पर सिपाही भी उसी की पैरवी करते हैं। रिवायत के अल्फ़ाज़ भी इसी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करते हैं कि पहले हमलों में सरदार ही भाग खड़े हुए थे।
वरना इस बात की कोई ज़रूरत न थी कि ख़ास तौर पर यह कहा जाए कि अगली बार झंडा ऐसे शख़्स को दिया जाएगा जो साबित-क़दम होगा और कभी भागेगा नहीं।
बहरहाल, नबी (अ.स.) का यह बयान एक ऐसा आईना है जिसमें पूरे मामले की वज़ाहत भी है और ख़ैबर को फ़तह करने वाले की ख़ूबियों का बयान भी। और उन चेहरों की पहचान भी जो मैदान छोड़कर भाग गए थे।
इस बयान में फ़तह की बशारत भी मौजूद है। बयान की शुरुआत में क़सम खाई गई और यक़ीनी तौर पर कहा गया कि अगले दिन फ़तह उन्हीं की होगी।
इसलिए यह बयान अल्लाह की तरफ़ से वह्य का नतीजा था, क्योंकि आने वाले कल की पेशगोई करना जायज़ नहीं। अल्लाह का हुक्म है कि इंसान यह न कहे कि वह कल कोई काम ज़रूर करेगा, जब तक यह न कहे: अगर अल्लाह ने चाहा।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“और किसी चीज़ के बारे में यह न कहो कि मैं इसे कल ज़रूर करूँगा, मगर यह कि अल्लाह चाहे।” (सूरह अल-कहफ़: 23)
रिवायत में जो अल्फ़ाज़ बयान हुए हैं, वे कम हैं, लेकिन हर लफ़्ज़ उस शख़्स की तारीफ़ और उसकी बरतरी को ज़ाहिर करता है जिसे नबी (अ.स.) ने अपने बयान का मक़सूद ठहराया।
सबसे पहला इज़हार यह है कि वह एक “मर्द” होगा। अगर इस लफ़्ज़ को मजाज़ी मआनों में लिया जाए, तो इसका मतलब यह है कि वह बहादुरी की मिसाल होगा और पूरे अज़्म और इस्तिक़लाल के साथ जंग लड़ेगा।
इस लफ़्ज़ का इस्तेमाल पहले झंडा उठाने वालों के ख़िलाफ़ एक इशारती ताना भी है, क्योंकि उनमें बहादुरी की यह सिफ़त मौजूद न थी। वरना वे सब भी मर्द ही थे।
मर्द वह होता है जो जब जंग के मैदान में उतर जाए, तो या तो फ़तह हासिल करे या दुश्मन के हमलों में शहीद हो जाए, लेकिन कभी पीठ न दिखाए।
दूसरी ख़ूबी जो नबी (अ.स.) ने बयान की वह यह है कि वह बहादुर होगा और भागने वालों में से नहीं होगा।
जब यह कह दिया गया कि वह बहादुर होगा, तो फिर यह कहने की कोई ज़रूरत न थी कि वह भागेगा नहीं। लेकिन यह बात इसलिए कही गई ताकि वे लोग जो झंडा उठाने के ख़्वाहिशमंद थे, अपने दिलों में झाँक कर देखें कि क्या उनके क़दम जंग के मैदान में कभी डगमगाए थे।
अगर ऐसा था, तो उन्हें चाहिए कि झंडा उठाने की तमन्ना को अपने दिल से निकाल दें।
तीसरी ख़ूबी जो नबी (अ.स.) ने बयान की, यह है कि वह अल्लाह और उसके रसूल (अ.स.) का दोस्त होगा और अल्लाह और उसका रसूल (अ.स.) उसके दोस्त होंगे।
दोस्ती की यही कशिश है जो इंसान को अल्लाह के रास्ते में हर मुश्किल और सख़्ती का सामना करने की ताक़त देती है।
इसी वजह से अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“बेशक अल्लाह उन लोगों से दोस्ती करता है जो उसके रास्ते में इस तरह सफ़ों में लड़ते हैं जैसे वे सीसा पिलाई हुई दीवारें हों।”
नबी (अ.स.) की एक और तरफ़ से इशारा यह था कि क़िला उसी के हाथों फ़तह होगा। जहाँ साबित-क़दमी होती है, वहाँ अल्लाह की मदद आती है।
इस फ़तह पर इतना यक़ीन था कि हुदैबिया से वापसी पर नबी (अ.स.) को इन अल्फ़ाज़ में रूयत दिखाई गई:
“वे क़रीब ही फ़तह हासिल करेंगे।”
इसी वजह से नबी (अ.स.) ने फ़रमाया:
“अल्लाह उसी के हाथों फ़तह अता करेगा।”
अल्लाह ने फ़तह की पेशगोई की और नबी (अ.स.) ने बयान किया कि अगली कोशिश में जो झंडा उठाएगा वही फ़ातिह होगा।
नबी (अ.स.) के इस एलान के बाद यह बात हर ज़बान पर आ गई। फ़िज़ा में इंतज़ार और उम्मीद की कैफ़ियत पैदा हो गई। हर सहाबी यह चाहता था कि कल वही खुशनसीब हो जिसके हाथ में झंडा दिया जाए।
यहाँ तक कि वे लोग भी जो इस मुहिम में पहले झंडा उठा चुके थे और नाकाम हो गए थे, उम्मीद लगाए बैठे थे कि अगली बार उन्हीं का नाम लिया जाएगा।
इब्नुल-असीर लिखते हैं:
“क़ुरैश में से हर शख़्स यह उम्मीद कर रहा था कि वही झंडा उठाने वाला होगा।”
अगर वे लोग रिवायत के अल्फ़ाज़ पर ग़ौर करते और गुज़रे हुए वाक़िआत को अपने ज़हन में रखते, तो हर एक लफ़्ज़ उम्मीद के चराग़ को बुझाने के लिए काफ़ी था।
लेकिन इंसानी फ़ितरत यही है कि इंसान ऊँचे ओहदों का दावा करता है, चाहे उसे कामयाबी की उम्मीद कितनी ही कम क्यों न हो।
वे सब यक़ीन रखते थे कि हज़रत अली (अ.स.) मैदान में आने के क़ाबिल नहीं होंगे, क्योंकि उनकी आँखों की सूजन उन्हें अपने पैरों के नीचे ज़मीन देखने भी नहीं देती थी।
इसलिए वे आपस में एक-दूसरे को तसल्ली दे रहे थे कि हज़रत अली (अ.स.) की वजह से उन्हें किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं है, और अब झंडा किसी और को ही मिलेगा।
जब लोग इस तरह अंदाज़े और क़यास लगा रहे थे, उसी दौरान हज़रत अली (अ.स.) को नबी (अ.स.) के उस एलान की ख़बर पहुँची जो आपने फ़रमाया था।
यह सुनकर हज़रत अली (अ.स.) ख़ामोश हो गए और आपने कहा:
“ऐ अल्लाह! जिसे तू अता करे उसे कोई महरूम नहीं कर सकता, और जिसे तू महरूम करे उसे कोई अता नहीं कर सकता।”
अगली सुबह के इंतज़ार में सहाबी सारी रात अपने बिस्तरों पर करवटें बदलते रहे।
सुबह होते ही वे सब नबी (अ.स.) के ख़ैमे के सामने इकट्ठा हो गए।
मुहम्मद इब्न इस्माईल अल-बुख़ारी लिखते हैं:
“वे सब सुबह-सवेरे नबी (अ.स.) के पास जमा हो गए, और हर एक यह उम्मीद कर रहा था कि झंडा उसी को दिया जाएगा।”
सुबह की नमाज़ के बाद नबी (अ.स.) अपने ख़ैमे से बाहर तशरीफ़ लाए और आपके हाथ में एक सफ़ेद झंडा था।
झंडे को देखते ही हर दिल में एक नई उम्मीद जाग उठी। हर कोई आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा। कोई दूसरों को पीछे हटाकर अपने आपको सामने लाना चाहता था, तो कोई गर्दन उचकाकर नबी (अ.स.) की तरफ़ देख रहा था।
कुछ लोग इतने बेचैन और पुरजोश थे कि उनके नाम तारीख़-ए-इस्लाम में दर्ज हो गए। उन्हीं में हज़रत उमर भी थे, जिन्होंने ख़ुद कहा:
“उस दिन से पहले मुझे कभी सरदारी की इतनी चाह नहीं हुई थी, जितनी उस दिन हुई। उस दिन मैंने अपनी गर्दन उचकाई और उम्मीद की कि झंडा मुझे दिया जाएगा।”
बुरैदा इब्न असलमा, जो ग़ज़वा-ए-ख़ैबर में मौजूद थे, उन्होंने हज़रत उमर और अबू-बक्र दोनों के नाम लेते हुए कहा:
“दूसरे दिन अबू-बक्र और उमर, दोनों ने झंडा पाने की उम्मीद में अपनी गर्दनें उठाईं।”
सअद इब्न अबी वक़्क़ास कहते हैं:
“मैं नबी (अ.स.) के क़रीब उकड़ूँ बैठा था, फिर उठा और आपके सामने खड़ा हो गया।”
नबी (अ.स.) से आपके किसी भी सहाबी की बहादुरी छुपी हुई न थी। यह मुमकिन न था कि आप सिर्फ़ गर्दन उठाने पर किसी के दावे को मान लें या उकड़ूँ बैठने वाले किसी शख़्स को रद्द कर दें।
आपने मजमे पर नज़र डाली और फ़रमाया: “अली कहाँ हैं?”
किसी ने यह नहीं सोचा था कि हज़रत अली (अ.स.) का नाम लिया जाएगा। चारों तरफ़ से आवाज़ें आईं कि उन्हें आँखों की सख़्त सूजन है।
नबी (अ.स.) ने फ़रमाया कि किसी को भेजो और उन्हें बुलाकर लाओ।
इसलिए सलमा इब्न अल-अक़्वा गए और हज़रत अली (अ.स.) को नबी (अ.स.) के पास ले आए।
नबी (अ.स.) ने हज़रत अली (अ.स.) का सिर अपनी गोद में रखा, अपना लुआब उनकी सूजी हुई आँखों पर लगाया और दुआ फ़रमाई:
“ऐ अल्लाह! इन्हें गर्मी और सर्दी के असर से बचा, और इनके दुश्मन के मुक़ाबले में इनकी मदद और नुसरत फ़रमा।”
नबी (अ.स.) का लुआब हज़रत अली (अ.स.) की आँखों के लिए दवा साबित हुआ। फ़ौरन सूजन जाती रही और उनकी आँखें ठीक हो गईं।
उसी वक़्त हस्सान इब्न साबित ने, नबी (अ.स.) की मद्ह में, ये अशआर कहे:
“ख़ैबर की जंग में
अली (अ.स.) की आँखें सूज गई थीं,
नबी (अ.स.) का लुआब
उनकी दवा बन गया।
बिना किसी दवा के
आँखें रोशन हो गईं,
मुबारक हो वह इलाज
और मुबारक हो वह शिफ़ा।
नबी (अ.स.) ने फ़रमाया
मैं झंडा उसे दूँगा
जो दोधारी तलवार है,
जो बहादुर है,
दुश्मनों की सफ़ों को चीरने वाला है,
और नबी (अ.स.) से मुहब्बत रखता है।”
जब हज़रत अली (अ.स.) की आँखें ठीक हो गईं, तो नबी (अ.स.) ने ख़ुद हज़रत अली (अ.स.) के चोग़े के ऊपर ज़िरह पहनाई, तलवार उनकी कमर में बाँधी, और झंडा उनके हाथ में देकर क़िला-ए-ख़ैबर फ़तह करने का हुक्म दिया।
हज़रत अली (अ.स.) ने झंडा हाथ में लिया, खड़े हुए, नबी (अ.स.) की तरफ़ रुख़ किया और अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह! आप चाहते हैं कि मैं उनसे कितनी देर तक जंग करूँ?”
नबी (अ.स.) ने फ़रमाया:
“उनसे जंग करते रहो यहाँ तक कि वे इस्लाम क़बूल कर लें। अल्लाह की क़सम! अगर तुम्हारे ज़रिये एक भी आदमी सीधे रास्ते पर आ जाए, तो यह लाल बालों वाले ऊँट पाने से बेहतर है।”
हज़रत अली (अ.स.) तेज़ी से मैदान-ए-जंग की तरफ़ बढ़े। कुछ लोगों ने उनसे कहा कि थोड़ा ठहर जाएँ ताकि वे भी उनके साथ चलें, लेकिन हज़रत अली (अ.स.) एक लम्हे के लिए भी नहीं रुके।
आप चलते रहे यहाँ तक कि क़िला-ए-क़मूस के क़रीब पहुँच गए और वहीं झंडा गाड़ दिया।
क़िले के ऊपर से एक यहूदी ने उन्हें देखा और पूछा:
“तुम कौन हो?”
हज़रत अली (अ.स.) ने जवाब दिया:
“मैं अली इब्न अबी तालिब हूँ।”
जब उस यहूदी ने हज़रत अली (अ.स.) की हैबत और अंदाज़ देखा, तो उसने कहा:
“ऐ यहूदियों के गिरोह! तुम्हारी हार तय है!”
यहूदी क़िला-ए-क़मूस की मज़बूती पर बहुत ज़्यादा घमंड करते थे। इस्लामी फ़ौज के पहले झंडा उठाने वालों की नाकामी की वजह से उनका हौसला बुलंद था।
लेकिन अपने ही आदमी के मुँह से ऐसी बात सुनकर उनकी क़तारों में अफ़रातफ़री मच गई और उनके दिलों में ख़ौफ़ बैठ गया।
इसी दौरान मुसलमानों के कुछ और लोग भी हज़रत अली (अ.स.) के क़रीब पहुँच गए।
क़िले का हाकिम मरहब का भाई अल-हारिस, जो इससे पहले जंग के मैदान में आ चुका था, अचानक आगे बढ़ा और ज़ोरदार हमला किया।
उसके इस अचानक हमले में दो मुसलमान शहीद हो गए।
हज़रत अली (अ.स.) बिजली की तरह लपके और अल-हारिस को एक ही वार में क़त्ल कर दिया।
जब मरहब ने देखा कि उसका भाई मारा गया है, तो उसकी आँखों में ख़ून उतर आया।
उसने पहले से पहनी हुई ज़िरह के ऊपर एक और ज़िरह पहन ली, सर पर पत्थर से तराशा हुआ ख़ुद (हेलमेट) रखा, दो तलवारें और एक नेज़ा हाथ में लिया और क़िले से बाहर निकल आया।
वह जंग के शेर पढ़ते हुए आगे बढ़ रहा था और कह रहा था:
“ख़ैबर के लोग जानते हैं
कि मैं मरहब हूँ,
मैं हथियारों से लैस
और तजुर्बेकार योद्धा हूँ!”
मरहब भारी जिस्म वाला और जंग में माहिर था। जब उसने मुकाबले की दावत दी, तो बहुत कम लोग उसके सामने आने की हिम्मत कर सके।
दियारबक़री लिखते हैं:
“मुसलमानों में से किसी के लिए यह मुमकिन न था कि वह मरहब का सामना कर सके।”
जब हज़रत अली (अ.स.) ने मरहब का यह रजज़ सुना, तो आपने जवाब में फ़रमाया:
“मैं वही हूँ
जिसे उसकी माँ ने हैदर नाम दिया,
मैं शेर हूँ,
जंगल के बाघ की तरह बहादुर।
मेरी कलाइयाँ मज़बूत हैं
और मेरी गर्दन चौड़ी है,
जंगल के शेर की तरह
देखने में ख़ौफ़नाक।
मैं ऐसा वार करूँगा
कि तेरे जोड़ तोड़ दूँ,
और दुश्मन को
जंगली जानवरों का चारा बना दूँ।
मैं काफ़िरों की सफ़ों पर
अपनी तलवार चलाऊँगा,
और तुझे
ज़ोरदार वार से
ढेर कर दूँगा।”
मरहब आगे बढ़ा और हज़रत अली (अ.स.) पर ज़ोरदार वार करने की कोशिश की।
हज़रत अली (अ.स.) ने उसके वार से अपने आपको बचाया और उसी वक़्त उस पर पलटकर ज़बरदस्त हमला किया।
हज़रत अली (अ.स.) की तलवार का वार मरहब के पत्थर के बने हुए ख़ुद (हेलमेट) को चीरता हुआ उसके सिर में उतर गया और जबड़ों तक जा पहुँचा।
मरहब ज़मीन पर ज़ोर की आवाज़ के साथ गिर पड़ा और वहीं ढेर हो गया।
मरहब की मौत ने यहूदियों के दिल तोड़ दिए।
इसके बाद जब यहूदियों के कुछ और मशहूर पहलवान भी हज़रत अली (अ.स.) के हाथों मारे गए, तो उनकी सफ़ों में पूरा अफ़रातफ़री फैल गई और वे सब क़िले की तरफ़ भाग खड़े हुए।
हज़रत अली (अ.स.) लगातार आगे बढ़ते रहे।
इसी दौरान एक यहूदी ने हज़रत अली (अ.स.) के बाज़ू पर वार किया, जिसके ज़ोर से आपकी ढाल हाथ से गिरकर ज़मीन पर जा पड़ी।
उस वक़्त अल्लाही क़ुव्वत से हज़रत अली (अ.स.) ने क़िले का एक भारी दरवाज़ा उखाड़ लिया और उसी को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया।
वह दरवाज़ा इतना भारी था कि बाद में आठ आदमी भी मिलकर उसे उठा न सके।
इस बारे में अबू-राफ़े कहते हैं:
“मेरे साथ सात आदमी थे और मैं आठवाँ था। हम सबने मिलकर उस दरवाज़े को पलटने की बहुत कोशिश की, लेकिन हम ऐसा न कर सके।”
हज़रत उमर भी इस वाक़िये से बहुत हैरान हुए। उन्होंने हज़रत अली (अ.स.) से कहा कि आपने बहुत भारी बोझ उठाया है।
हज़रत अली (अ.स.) ने जवाब दिया:
“मुझे तो वह मेरी अपनी ढाल से भी ज़्यादा भारी महसूस नहीं हुआ।”
इस ज़बरदस्त क़ुव्वत को देखकर यहूदी दहशत में आ गए और अपने आपको क़िले के अंदर बंद कर लिया।
हज़रत अली (अ.स.) आगे बढ़े और एक ही ज़ोरदार झटके में क़िले के दरवाज़े के दोनों पल्ले अपने हाथों में उखाड़ लिए।
यह हैरतअंगेज़ ताक़त महज़ इंसानी ताक़त नहीं थी, बल्कि यह अल्लाही क़ुव्वत का नतीजा थी।
इसी वजह से हज़रत अली (अ.स.) ख़ुद फ़रमाते हैं:
“मैंने ख़ैबर के क़िले का दरवाज़ा अपनी इंसानी ताक़त से नहीं तोड़ा, बल्कि अल्लाह की दी हुई क़ुव्वत मेरी मददगार बनी।”
अगर कोई शख़्स इस्लाम की राह में कोई ख़िदमत अंजाम दे, तो यह एक बहुत बड़ा गुनाह है कि उस ख़िदमत को किसी और की तरफ़ मंसूब कर दिया जाए।
लेकिन इख़्तियार और हुकूमत की चाह में इस्लामी तारीख़ में ऐसी कोशिशें बार-बार की गई हैं।
ख़ैबर के वाक़िये में भी कुछ लोगों ने, नाकाम होने के बावजूद, ऐसी ही कोशिश की।
उन्होंने जाबिर इब्न अब्दुल्लाह अंसारी के नाम से एक रिवायत गढ़ ली, हालाँकि वे उस वक़्त ख़ैबर में मौजूद ही नहीं थे, कि मरहब को मुहम्मद इब्न मस्लमा अंसारी ने क़त्ल किया था।
यह दावा बिलकुल खुल्लम-खुल्ला किया गया, हालाँकि तमाम बड़े इतिहासकार इस बात के गवाह हैं कि मरहब हज़रत अली (अ.स.) से लड़ते हुए ख़ुद इमाम (अ.स.) के हाथों मारा गया।
क्या मुहम्मद इब्न मस्लमा का नाम कभी तारीख़ में किसी बहादुर के तौर पर लिया गया है या नहीं, लेकिन उनका नाम ज़रूर उन लोगों में शामिल है जिन्होंने हज़रत अली (अ.स.) की बैअत से इंकार किया और खुलकर आपकी मुख़ालफ़त की।
मुमकिन है इसी रवैये की वजह से इमाम (अ.स.) के दुश्मनों ने यह कहानी गढ़ी हो।
अगर वाक़ई मरहब का क़ातिल मुहम्मद इब्न मस्लमा होता, तो तारीख़ उन्हें फ़ातिह-ए-ख़ैबर के तौर पर पहचानती।
क्योंकि मरहब को क़ाबू में करना और उसे ख़त्म करना गोया ख़ैबर को फ़तह करने के बराबर था।
अगर मुहम्मद इब्न मस्लमा को इतिहासकार फ़ातिह-ए-ख़ैबर के तौर पर मान लेते, तो फिर उन्हें नबी (अ.स.) की उस रिवायत के बारे में ज़रूर सोचना पड़ता, जिसमें आपने फ़रमाया था: “अल्लाह उसी के हाथों फ़तह अता करेगा।”
इस बात पर तमाम उलमा और इतिहासकार इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कि ये अल्फ़ाज़ नबी (अ.स.) ने हज़रत अली (अ.स.) के बारे में फ़रमाए थे।
फिर यह कैसे मुमकिन है कि नबी (अ.स.) अपने इल्म-ए-इलाही से फ़ातिह का नाम बता दें, और कुछ लोग इस वाक़िये को किसी और की तरफ़ मंसूब करने की कोशिश करें।
अगरचे यहूदी क़बीलों ने नबी (अ.स.) से अमन और मदद के मुआहिदे कर रखे थे, लेकिन जब भी उन्हें मौक़ा मिला, वे फ़साद से बाज़ नहीं आए।
इसी वजह से उन्हें अल-मदीना से निकाल दिया गया।
अल-मदीना छोड़ने के बाद भी उनकी सरगर्मियाँ जारी रहीं।
आख़िरकार उनके लिए सख़्त तादीबी कार्रवाई के सिवा कोई और रास्ता बाक़ी नहीं रहा।
यह जंग इन्हीं तमाम हालात का नतीजा थी, जिसमें पंद्रह मुसलमान शहीद हुए और बानवे यहूदी मारे गए।
औरतों को क़ैद किया गया, जिनमें हुयय इब्न अख़्तब की बेटी सफ़िय्या भी थीं, जिनसे नबी (अ.स.) ने निकाह फ़रमाया।
बाक़ी यहूदियों को इस शर्त पर छोड़ दिया गया कि वे ख़ैबर की ज़मीनों पर किसान बनकर काम करेंगे और पैदावार का आधा हिस्सा मुसलमानों को देंगे।
ख़ैबर एक बेहद ज़रख़ेज़ इलाक़ा था और अरब के हिजाज़ सूबे की ख़ुराक़ की ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा यहीं से पूरा होता था।
जब यह इलाक़ा मुसलमानों के क़ब्ज़े में आया, तो इससे उन्हें मआशी ख़ुशहाली हासिल हुई।
मुहाजिरीन, जो मक्का छोड़ने के बाद तंगी और ग़रीबी में थे, उन्हें अपनी ज़िंदगी बेहतर बनाने के मौक़े मिले।
अब्दुल्लाह इब्न उमर कहते हैं:
“ख़ैबर की फ़तह के बाद हमें यह क़ुदरत और वसीला मिला कि हम पेट भरकर खाना खा सकें।”
उम्मुल-मोमिनीन हज़रत आइशा कहती हैं:
“जब ख़ैबर फ़तह हुआ, तो हमें यह एहसास हुआ कि अब हम पेट भरकर खजूरें खाएँगे।”
बलाज़ुरी फुतूह़-उल-बुलदान में लिखते हैं कि ख़ैबर की पैदावार में से नबी (अ.स.) की हर ज़ौजा को अस्सी वसक़ खजूर और बीस वसक़ जौ मिलता था।
हालाँकि इस मुहिम में पैदल सिपाहियों की एक बड़ी तादाद मौजूद थी, लेकिन फ़तह सिर्फ़ और सिर्फ़ अली इब्न अबी तालिब (अ.स.) के हाथों हुई।
अगरचे दूसरों ने भी अपने हाथों में झंडा लेकर लड़ने की कोशिश की, लेकिन वे मैदान-ए-जंग से पीठ फेरकर लौट आए।
बार-बार की नाकामी के बाद नबी (अ.स.) ने एलान किया कि अगले दिन झंडा फ़ातिह के हाथ में दिया जाएगा।
सहाबा के दरमियान इंतज़ार और उम्मीद अपने उरूज पर थी, लेकिन फ़ातिह वही था जिसे अल्लाह और उसके रसूल (अ.स.) ने पहले ही तय कर दिया था।
और वह फ़ातिह अली इब्न अबी तालिब (अ.स.) थे।
इस तरह ख़ैबर की फ़तह न सिर्फ़ एक फ़ौजी कामयाबी थी, बल्कि इस्लामी तारीख़ का एक अज़ीम मोड़ भी साबित हुई, जिसने मुसलमानों को मआशी मज़बूती, सियासी इस्तिहकाम और दीनी सरफ़राज़ी अता की।
ख़ैबर की इस फ़तह ने यह हक़ीक़त हमेशा के लिए रौशन कर दी कि सिर्फ़ तादाद या हथियार कामयाबी की ज़मानत नहीं होते, बल्कि ईमान, साबित-क़दमी और अल्लाह की मदद ही असली फ़तह की बुनियाद होती है।
और यही वजह है कि ख़ैबर की फ़तह आज भी अली इब्न अबी तालिब (अ.स.) के नाम से जानी जाती है।