क़िब्ले की तब्दीली इस्लामी तारीख़ का एक अत्यंत बुनियादी और निर्णायक वाक़िआ है। पहली नज़र में यह केवल नमाज़ की दिशा बदलने का मसला लगता है, लेकिन शिया अक़ीदे, क़ुरआनी तफ़सीर और ऐतिहासिक रिसर्च के मुताबिक़ यह दरअसल ईमान, इलाही इताअत, उम्मत की पहचान, और विलायत का एक गहरा और बहुस्तरीय इम्तिहान था।
क़िब्ला — अर्थात वह दिशा जिसकी ओर मुसलमान नमाज़ अदा करते हैं — को बैतुल-मक़्दिस (अल-अक़्सा, क़ुद्स) से काबा-ए-मुअज़्ज़मा (मक्का) की ओर बदला गया हिजरत के लगभग 16–17 महीनों बाद, मध्य शाबान (15 शाबान 2 हिजरी — लगभग फ़रवरी 624 ई.) में।
यह तब्दीली मदीना मुनव्वरा में ज़ुहर या अस्र की नमाज़ के दौरान हुई, जब रसूल-ए-ख़ुदा ﷺ को वह्य प्राप्त हुई और उसी नमाज़ में आप ﷺ तथा आपके पीछे खड़े तमाम मोमिनों ने तुरंत अपना रुख़ बदल लिया।
काबा इस्लाम में केवल एक इमारत नहीं, बल्कि तौहीद की सबसे प्राचीन निशानी है। क़ुरआन के अनुसार यही वह पहला घर है जो इंसानों के लिए अल्लाह की इबादत हेतु बनाया गया।
मक्का के दौर में नबी-ए-अकरम ﷺ इस तरह नमाज़ अदा करते थे कि काबा भी सामने रहे और रुख़ बैतुल-मक़्दिस की ओर भी हो।
हिजरत के बाद मदीना एक बहु-धार्मिक समाज बन गया, जहाँ मुसलमानों के साथ-साथ यहूदी क़बीले, मुनाफ़िक़ और मुशरिक अरब मौजूद थे।
शिया तफ़सीरी दृष्टि से, प्रारंभिक क़िब्ला-ए-क़ुद्स यहूदियों पर हुज्जत तमाम करने और नबुव्वती सिलसिले की continuity दिखाने के लिए था।
سَيَقُولُ السُّفَهَاءُ مِنَ النَّاسِ مَا وَلَّاهُمْ عَن قِبْلَتِهِمُ الَّتِي كَانُوا عَلَيْهَا
सयक़ूलुस्-सुफ़हाऊ मिनन्-नास मा वल्लाहुम् अन् क़िब्लतिहिमुल्-लती कानू अलैहा
“लोगों में से नासमझ कहेंगे: इन्हें इनके उस क़िब्ले से किसने फेर दिया जिस पर ये पहले थे?” (सूरह अल-बक़रह 2:142)
قُل لِّلَّهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُ يَهْدِي مَن يَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
क़ुल् लिल्लाहिल्-मशरिक़ि वल्-मग़रिब यहदी मय्यशाऊ इला सिरातिम्-मुस्तक़ीम
“कह दीजिए: पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के हैं; वह जिसे चाहता है सीधे रास्ते की हिदायत देता है।” (2:142)
قَدْ نَرَىٰ تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضَاهَا
क़द् नरा तक़ल्लुब वज्हिका फ़िस्-समा फ़लनुवल्लियन्नका क़िब्लतन तरज़ाहा
“हम तुम्हारे चेहरे का बार-बार आसमान की ओर पलटना देखते हैं, तो हम अवश्य तुम्हें उस क़िब्ले की ओर फेर देंगे जिससे तुम प्रसन्न हो जाओगे।” (2:144)
यह वह ऐतिहासिक क्षण था जब नमाज़ के बीच ही रसूल-ए-ख़ुदा ﷺ ने बैतुल-मक़्दिस से काबा की ओर 180 डिग्री रुख़ बदल लिया।
आपके पीछे खड़े सभी मोमिनों ने बिना किसी सवाल या संकोच के तुरंत आपका अनुसरण किया। यही स्थान आगे चलकर मस्जिद-ए-क़िब्लतैन के नाम से जाना गया।
وَمَا جَعَلْنَا الْقِبْلَةَ الَّتِي كُنتَ عَلَيْهَا إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يَتَّبِعُ الرَّسُولَ مِمَّن يَنقَلِبُ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ
वमा जअल्नल्-क़िब्लतल्लती कुन्त अलैहा इल्ला लिनअलमा मय्यत्तबिउर्-रसूल मिम्मय्यनक़लिबु अला अक़िबैह
“और हमने वह क़िब्ला जिस पर तुम पहले थे सिर्फ़ इसलिए रखा ताकि स्पष्ट हो जाए कि कौन रसूल की पैरवी करता है और कौन उलटे पाँव फिर जाता है।” (2:143)
وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُضِيعَ إِيمَانَكُمْ
वमा कानल्लाहु लियुज़ीअ इमानकुम्
“और अल्लाह ऐसा नहीं है कि तुम्हारे ईमान (पहली नमाज़ों) को ज़ाया कर दे।” (2:143)
शिया अक़ीदे के अनुसार, क़िब्ले की तब्दीली विलायत के उसूल की पहली सामूहिक परीक्षा थी।
जिस प्रकार क़िब्ले में रसूल ﷺ की इताअत बग़ैर सवाल फ़र्ज़ थी, उसी प्रकार विलायत में इमाम-ए-हक़ की इताअत।
2 हिजरी में क़िब्ले की तब्दीली इस्लामी तारीख़ का वह मोड़ थी जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि:
ईमान हुक्म बदलने से नहीं, बल्कि हुक्म मानने से साबित होता है।