हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.)


भाग–1 : नस्ब, ख़ानदान और रिसालत के शुरुआती संरक्षक


प्रस्तावना

इस्लामी इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनकी ज़िंदगी सिर्फ़ घटनाओं का सिलसिला नहीं होती, बल्कि वे अपने किरदार, समझदारी और वफ़ादारी के ज़रिए पूरी उम्मत के लिए रहनुमा बन जाते हैं। ऐसी ही एक अज़ीम शख़्सियत हैं हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.)

शिया अक़ीदे के मुताबिक़, हज़रत अब्बास (अ.) न केवल रसूलुल्लाह ﷺ के सगे चाचा थे, बल्कि वे उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस्लाम के सबसे नाज़ुक और मुश्किल दौर में रिसालत की ढाल बनकर हिफ़ाज़त की।

उनकी ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि दीन की ख़िदमत हमेशा तलवार उठाने से ही नहीं होती, बल्कि कभी–कभी हिकमत, सब्र और दूरदर्शिता भी इस्लाम के लिए सबसे बड़ी ताक़त बन जाती है।

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1. नस्ब और ख़ानदान: बनी हाशिम की रौशन कड़ी

हज़रत अब्बास (अ.) का ताल्लुक़ क़ुरैश के सबसे प्रतिष्ठित ख़ानदान बनी हाशिम से था। उनके पिता हज़रत अब्दुल मुत्तलिब मक्का के महान नेता, हाजियों के ख़ादिम और तौहीद पर क़ायम व्यक्ति थे।

शिया इतिहास के अनुसार, अब्दुल मुत्तलिब बुतपरस्ती से दूर थे और अल्लाह की एकता पर यक़ीन रखते थे। ज़मज़म के कुएँ का दोबारा इख़राज़ और हाजियों की सेवा उनके महान कार्यों में शामिल हैं।

ऐसे पाक और रौशन माहौल में हज़रत अब्बास (अ.) ने परवरिश पाई, जिसका असर उनकी पूरी ज़िंदगी में साफ़ दिखाई देता है।

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2. जन्म और बचपन

हज़रत अब्बास (अ.) का जन्म लगभग 566 ईस्वी में मक्का में हुआ। वे रसूलुल्लाह ﷺ से उम्र में सिर्फ़ दो या तीन साल बड़े थे, इसी कारण दोनों के बीच सिर्फ़ चाचा–भतीजे का नहीं, बल्कि गहरे आत्मीय संबंध थे।

शिया रिवायतों में आता है कि हज़रत अब्बास (अ.) रसूल ﷺ के बेहद क़रीब थे और उन्हें बचपन से ही सच्चाई, अमानत और इंसाफ़ से मोहब्बत थी।

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3. मक्का का समाज और सामाजिक हैसियत

इस्लाम से पहले मक्का एक व्यापारिक और क़बीलाई समाज था। इज़्ज़त, दौलत और रिश्तों का संतुलन बेहद अहम माना जाता था।

हज़रत अब्बास (अ.) एक कामयाब व्यापारी थे, जिनका इत्र और कपड़ों का व्यापार दूर–दूर तक मशहूर था। उन्हें हाजियों को ज़मज़म का पानी पिलाने की सिक़ाया की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी, जो बहुत बड़ा सम्मान माना जाता था।

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4. बिअसत के बाद की भूमिका

जब रसूलुल्लाह ﷺ ने इस्लाम का ऐलान किया, तो मक्का में ज़ुल्म और विरोध का दौर शुरू हो गया।

शिया अक़ीदे के अनुसार, हज़रत अब्बास (अ.) ने खुले टकराव से बचते हुए अपने सामाजिक प्रभाव और समझदारी से रसूल ﷺ की रक्षा की।

उन्होंने क़ुरैश के भीतर रहकर इस्लाम के लिए ऐसे रास्ते खोले जो खुले संघर्ष से मुमकिन नहीं थे।

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5. बैअत–ए–अक़बा में ऐतिहासिक भूमिका

बैअत–ए–अक़बा के अवसर पर, हज़रत अब्बास (अ.) ने मदीना के लोगों से रसूल ﷺ की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी को बहुत स्पष्ट शब्दों में सामने रखा।

यह भाषण उनके राजनीतिक विवेक, दूरदर्शिता और अहलेबैत के प्रति उनकी गहरी वफ़ादारी का प्रमाण है।

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6. शिया दृष्टिकोण: तक़य्या और हिकमत

शिया अक़ीदे में तक़य्या को हालात के अनुसार दीन की रक्षा का एक वैध और बुद्धिमत्तापूर्ण तरीक़ा माना जाता है।

हज़रत अब्बास (अ.) का किरदार इस उसूल का बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने बिना इस्लाम को नुक़सान पहुँचाए उसकी जड़ों को मज़बूत रखा।

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7. रसूलुल्लाह ﷺ से भावनात्मक रिश्ता

शिया रिवायतों में आता है कि रसूलुल्लाह ﷺ हज़रत अब्बास (अ.) का विशेष सम्मान करते थे।

रसूल ﷺ का यह फ़रमान प्रसिद्ध है: “अब्बास मुझसे हैं और मैं अब्बास से हूँ।”

यह कथन उनके रिश्ते की रूहानी और मिशनी गहराई को दर्शाता है।

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भाग–1 का निष्कर्ष

हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) की शुरुआती ज़िंदगी यह स्पष्ट करती है कि वे इस्लाम के ख़ामोश संरक्षक थे।

उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि हिकमत, सब्र और वफ़ादारी कभी–कभी तलवार से भी ज़्यादा असरदार होती है।

भाग–2 : इस्लाम का इज़हार, बद्र की घटना और ख़ुफ़िया इस्लामी सेवाएँ

प्रस्तावना (भाग–2)

भाग–1 में हमने हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) के नस्ब, बचपन और इस्लाम के शुरुआती दौर में उनकी ख़ामोश लेकिन प्रभावशाली भूमिका को समझा।

इस भाग में हम उस संवेदनशील दौर पर चर्चा करेंगे, जहाँ इस्लाम को लेकर उनका रुख़, बद्र की जंग में उनकी मौजूदगी और मक्का में रहकर की गई ख़ुफ़िया सेवाएँ शिया अक़ीदे के अनुसार स्पष्ट होती हैं।

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1. इस्लाम क़ुबूल करने का प्रश्न: ज़ाहिर और बातिन

इतिहास में सबसे अधिक चर्चा इसी विषय पर मिलती है कि हज़रत अब्बास (अ.) ने इस्लाम कब स्वीकार किया।

शिया विद्वानों के अनुसार, हज़रत अब्बास (अ.) ने इस्लाम बहुत आरंभिक दौर में ही दिल से स्वीकार कर लिया था, लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ के निर्देश पर उन्होंने अपने ईमान को ज़ाहिर नहीं किया।

इसका उद्देश्य यह था कि मक्का में रहकर वे इस्लाम और रसूल ﷺ दोनों की सुरक्षा कर सकें।

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2. तक़य्या: शिया अक़ीदे की रोशनी में

शिया अक़ीदे में तक़य्या को हालात के अनुसार दीन की रक्षा का एक वैध और बुद्धिमत्तापूर्ण तरीक़ा माना जाता है।

हज़रत अब्बास (अ.) का पूरा किरदार इस उसूल का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने अपनी सामाजिक स्थिति और समझदारी से इस्लाम को नुक़सान से बचाया।

यह स्पष्ट करता है कि हर परिस्थिति में खुला टकराव ही दीन की सेवा नहीं होता।

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3. मक्का में रहकर ख़ुफ़िया इस्लामी सेवाएँ

हिजरत के बाद मक्का, इस्लाम के विरुद्ध साज़िशों का केंद्र बन गया था।

ऐसे समय में हज़रत अब्बास (अ.) ने मक्का में रहकर क़ुरैश की गतिविधियों पर नज़र रखी और कई बार यह सूचनाएँ मदीना तक पहुँचाईं।

शिया रिवायतों के अनुसार, उनकी वजह से कई संभावित हमले पहले ही विफल हो गए।

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4. बद्र की जंग (2 हिजरी / 624 ईस्वी)

बद्र की जंग इस्लाम की पहली निर्णायक सैन्य परीक्षा थी।

इतिहास में मिलता है कि हज़रत अब्बास (अ.) क़ुरैश की ओर से इस युद्ध में उपस्थित थे, लेकिन यह उपस्थिति मजबूरी और तक़य्या के अंतर्गत थी।

शिया दृष्टिकोण के अनुसार, उन्होंने न दिल से युद्ध किया और न मुसलमानों को कोई वास्तविक हानि पहुँचाई।

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5. क़ैद और रसूलुल्लाह ﷺ का विशेष व्यवहार

बद्र की जंग के बाद हज़रत अब्बास (अ.) क़ैद कर लिए गए।

रसूलुल्लाह ﷺ ने उनके साथ असाधारण नरमी और सम्मान का व्यवहार किया, जो उनके आपसी रिश्ते और विश्वास को दर्शाता है।

यहीं पर हज़रत अब्बास (अ.) ने अपने इस्लाम को सार्वजनिक रूप से प्रकट किया।

शिया अक़ीदे के अनुसार, यह नया ईमान नहीं, बल्कि पहले से मौजूद ईमान का इज़हार था।

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6. मदीना की ओर हिजरत

बद्र के बाद, हज़रत अब्बास (अ.) मक्का से मदीना की ओर रवाना हुए और इस्लामी समाज का सक्रिय हिस्सा बने।

मदीना में उन्हें एक सम्मानित बुज़ुर्ग सहाबी के रूप में स्वीकार किया गया।

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7. फ़तह–ए–मक्का से पहले की भूमिका

फ़तह–ए–मक्का से पहले, हज़रत अब्बास (अ.) ने रसूल ﷺ और क़ुरैश के बीच सुलह और संवाद की भूमिका निभाई।

अबू सुफ़ियान को रसूल ﷺ के पास लाना और मक्का में बिना ख़ून–ख़राबे के प्रवेश उनकी राजनीतिक समझ का प्रमाण है।

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भाग–2 का निष्कर्ष

इस भाग से स्पष्ट होता है कि हज़रत अब्बास (अ.) का किरदार केवल एक ऐतिहासिक उपस्थिति नहीं था, बल्कि वे इस्लाम की रणनीतिक सुरक्षा का एक अहम स्तंभ थे।

उनकी ज़िंदगी यह सिखाती है कि दीन की रक्षा के लिए हिकमत, तक़य्या और सब्र अक्सर तलवार से भी अधिक प्रभावशाली होते हैं।

भाग–3 : ग़ज़वात में भूमिका, हुनैन की ऐतिहासिक घड़ी और अहलेबैत से निस्बत

प्रस्तावना (भाग–3)

भाग–2 में हमने देखा कि हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) ने किस प्रकार तक़य्या और हिकमत के साथ मक्का में रहकर इस्लाम की रक्षा की, बद्र की जंग के बाद अपने ईमान का इज़हार किया और मदीना की ओर हिजरत की।

इस भाग में हम उस दौर पर चर्चा करेंगे जब हज़रत अब्बास (अ.) इस्लामी समाज के खुले और सक्रिय सदस्य बनकर ग़ज़वात में शामिल हुए, और विशेष रूप से ग़ज़वा–ए–हुनैन में उनका ऐतिहासिक किरदार सामने आया।

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1. मदीना में प्रवेश और सामाजिक भूमिका

मदीना पहुँचने के बाद हज़रत अब्बास (अ.) को एक वरिष्ठ और सम्मानित सहाबी के रूप में स्वीकार किया गया।

उनकी उम्र, अनुभव और क़बीलाई समझ इस्लामी समाज के लिए एक महत्वपूर्ण पूंजी थी।

वे न केवल युद्ध के मैदान में, बल्कि परामर्श, सुलह और सामाजिक मामलों में भी रसूलुल्लाह ﷺ के सहायक बने।

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2. इस्लामी ग़ज़वात में सहभागिता

इस्लाम के प्रसार के साथ–साथ कई निर्णायक ग़ज़वात हुए, जिनमें हज़रत अब्बास (अ.) ने अपनी निष्ठा और साहस का प्रमाण दिया।

शिया इतिहास के अनुसार, वे ऐसे सहाबियों में थे जो संकट के समय रसूलुल्लाह ﷺ के सबसे क़रीब खड़े रहते थे।

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3. ग़ज़वा–ए–हुनैन: इस्लामी इतिहास की निर्णायक घड़ी

ग़ज़वा–ए–हुनैन 8 हिजरी (630 ईस्वी) में हुआ।

यह वह युद्ध था जिसमें प्रारंभिक चरण में मुस्लिम सेना में भगदड़ मच गई थी।

कई लोग मैदान छोड़कर पीछे हट गए, लेकिन कुछ चुनिंदा सहाबी रसूलुल्लाह ﷺ के साथ डटे रहे।

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4. हुनैन में हज़रत अब्बास (अ.) का ऐतिहासिक किरदार

शिया और सुन्नी दोनों स्रोतों में यह बात स्पष्ट रूप से मिलती है कि हज़रत अब्बास (अ.) उस समय रसूलुल्लाह ﷺ के पास डटे रहने वालों में शामिल थे।

उनकी बुलंद और गूंजती हुई आवाज़ इस युद्ध की दिशा बदलने का कारण बनी।

उन्होंने ज़ोर–ज़ोर से पुकारा: “ऐ अंसार! ऐ बैअत–ए–रिज़वान वालों!”

उनकी आवाज़ सुनकर भागते हुए मुसलमान वापस लौटे और स्थिति संभली।

इस प्रकार, हुनैन की संभावित हार एक ऐतिहासिक विजय में बदल गई।

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5. बुलंद आवाज़ और शारीरिक प्रभाव

हज़रत अब्बास (अ.) अपनी बुलंद आवाज़ और मजबूत कद–काठी के लिए प्रसिद्ध थे।

उनकी आवाज़ युद्ध के मैदान में एक सेनापति की तरह प्रभाव डालती थी।

यह गुण हुनैन की लड़ाई में इस्लाम के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ।

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6. रसूलुल्लाह ﷺ के साथ निकटता

हुनैन के बाद, रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत अब्बास (अ.) की वफ़ादारी और साहस की ख़ुले शब्दों में सराहना की।

शिया रिवायतों के अनुसार, रसूल ﷺ उन्हें अपने अत्यंत विश्वसनीय साथियों में गिनते थे।

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7. अहलेबैत (अ.) से गहरी निस्बत

हज़रत अब्बास (अ.) अहलेबैत (अ.) से विशेष रूप से जुड़े हुए थे।

इमाम अली (अ.) और हज़रत फ़ातिमा (स.अ.) के घराने से उनका संबंध सिर्फ़ पारिवारिक नहीं, बल्कि रूहानी और मिशनी भी था।

वे हमेशा अहलेबैत (अ.) के सम्मान और हक़ की रक्षा के लिए खड़े रहे।

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8. नैतिक और अक़ीदती महत्व

हज़रत अब्बास (अ.) का यह दौर हमें सिखाता है कि संकट के समय दीन के साथ खड़े रहना ही सच्ची वफ़ादारी है।

शिया अक़ीदे में हुनैन की घटना अब्बास (अ.) के ईमान की परिपक्वता और अटल निष्ठा का स्पष्ट प्रमाण मानी जाती है।

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भाग–3 का निष्कर्ष

भाग–3 से यह स्पष्ट होता है कि हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) सिर्फ़ शुरुआती दौर के संरक्षक नहीं थे, बल्कि इस्लाम के खुले संघर्षों में भी एक मज़बूत स्तंभ बने।

उनकी बुलंद आवाज़, अटल साहस और रसूलुल्लाह ﷺ से निकटता इस्लामी इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी।

भाग–4 : वफ़ात, विरासत, अब्बासी नस्ल और शिया अक़ीदती मूल्यांकन

प्रस्तावना (भाग–4)

भाग–3 में हमने हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) की ग़ज़वात में भूमिका, विशेष रूप से ग़ज़वा–ए–हुनैन में उनके निर्णायक किरदार और अहलेबैत (अ.) से उनकी गहरी निस्बत को समझा।

इस अंतिम भाग में हम उनके जीवन के अंतिम वर्षों, उनकी वफ़ात, उनकी नस्ल और विरासत, और शिया अक़ीदे में उनके स्थायी मक़ाम का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

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1. रसूलुल्लाह ﷺ के बाद का दौर

रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात के बाद इस्लामी समाज एक कठिन और संवेदनशील दौर में प्रवेश कर गया।

हज़रत अब्बास (अ.) इस समय एक वरिष्ठ, अनुभवी और सम्मानित सहाबी थे, जिनका समाज में गहरा प्रभाव था।

शिया अक़ीदे के अनुसार, वे हर उस अवसर पर अहलेबैत (अ.) के सम्मान और अधिकार की रक्षा के पक्ष में खड़े रहे।

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2. इमाम अली (अ.) से संबंध और समर्थन

हज़रत अब्बास (अ.) इमाम अली (अ.) के बहुत क़रीबी और समर्थक थे।

वे जानते थे कि इमाम अली (अ.) ही रसूलुल्लाह ﷺ के सच्चे उत्तराधिकारी और इस्लाम की वास्तविक व्याख्या के वाहक हैं।

हालाँकि उन्होंने खुले राजनीतिक संघर्ष में भाग नहीं लिया, लेकिन उनकी सहानुभूति, समर्थन और नैतिक पक्षधरता अहलेबैत (अ.) के साथ स्पष्ट रूप से जुड़ी रही।

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3. सामाजिक नेतृत्व और सलाहकार की भूमिका

हज़रत अब्बास (अ.) मदीना में एक बुज़ुर्ग, समझदार और न्यायप्रिय व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे।

लोग सामाजिक, क़बीलाई और पारिवारिक विवादों में उनसे सलाह लेने आते थे।

उनका व्यवहार संयम, शांति और इंसाफ़ पर आधारित था, जो इस्लामी नैतिकता का सजीव उदाहरण है।

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4. वफ़ात (इंतक़ाल)

हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) का इंतक़ाल 32 हिजरी (653 ईस्वी) में मदीना मुनव्वरा में हुआ।

उस समय ख़िलाफ़त का दौर हज़रत उस्मान का था।

उन्हें जन्नतुल बक़ी में दफ़्न किया गया, जहाँ अहलेबैत (अ.) और अनेक महान सहाबा आराम फ़रमा रहे हैं।

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5. हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (र.)

हज़रत अब्बास (अ.) की सबसे महान विरासत उनके पुत्र हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (र.) हैं।

वे इस्लामी इतिहास के सबसे बड़े विद्वानों में गिने जाते हैं और उन्हें “तरजुमान–उल–क़ुरआन” कहा जाता है।

यह उनकी परवरिश और इल्मी माहौल का परिणाम था जो हज़रत अब्बास (अ.) ने अपने घर में क़ायम किया।

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6. अब्बासी नस्ल और ऐतिहासिक प्रभाव

हज़रत अब्बास (अ.) की नस्ल से आगे चलकर अब्बासी ख़िलाफ़त क़ायम हुई।

हालाँकि शिया अक़ीदे में राजनीतिक सत्ता को इमामत के समकक्ष नहीं माना जाता, फिर भी यह स्वीकार किया जाता है कि अब्बासी दौर में इल्म, दर्शन और संस्कृति को विशाल संरक्षण मिला।

यह प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से हज़रत अब्बास (अ.) की इल्मी और नैतिक विरासत से जुड़ा माना जाता है।

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7. शिया अक़ीदे में हज़रत अब्बास (अ.) का मक़ाम

शिया अक़ीदे के अनुसार, हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) उन हस्तियों में से हैं जिन्होंने अहलेबैत (अ.) की हिफ़ाज़त और सम्मान के लिए हर दौर में सही पक्ष चुना।

उनका किरदार तक़य्या, हिकमत, वफ़ादारी और दूरदर्शिता का आदर्श उदाहरण है।

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8. आज की उम्मत के लिए पैग़ाम

हज़रत अब्बास (अ.) की ज़िंदगी हमें सिखाती है कि:

  • हर जिहाद तलवार से नहीं होता
  • समझदारी और सब्र भी दीन की ख़िदमत हैं
  • अहलेबैत (अ.) से वफ़ादारी ईमान का हिस्सा है
  • सत्ता से अधिक नैतिकता महत्वपूर्ण है
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समापन (निष्कर्ष)

हज़रत अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब (अ.) की ज़िंदगी इस्लामी इतिहास का एक शांत लेकिन अत्यंत प्रभावशाली अध्याय है।

वे न केवल रसूलुल्लाह ﷺ के चाचा थे, बल्कि इस्लाम के ख़ामोश संरक्षक, अहलेबैत (अ.) के वफ़ादार समर्थक और उम्मत के सच्चे मार्गदर्शक थे।

उनका नाम हमेशा हिकमत, वफ़ादारी और इंसाफ़ के साथ लिया जाता रहेगा।